ज्ञान:किस विद्वान ने खोजी थी कौटिल्य अर्थशास्त्र की पाण्डुलिपि ?
क्या आपने कभी सोचा है कि अगर मैसूर के एक सरकारी दफ्तर की धूल खाती आलमारी से ताड़ के पत्तों का एक बंडल न मिला होता, तो क्या हमें कभी पता चलता कि भारत के पास ढाई हजार साल पहले ही राजनीति, कूटनीति और अर्थशास्त्र का दुनिया का सबसे महान ग्रंथ मौजूद था? हम सब आचार्य चाणक्य और उनके ‘अर्थशास्त्र’ का नाम गर्व से लेते हैं, लेकिन इस महान ग्रंथ को गुमनामी के गहरे अंधेरे से निकालकर आधुनिक दुनिया के सामने लाने वाले असली भगीरथ कोई और नहीं, बल्कि रुद्रपटनम शामशास्त्री थे। वे एक ऐसे ‘मौन तपस्वी’ विद्वान थे, जिन्होंने अगर अपनी जिंदगी के कई साल पांडुलिपियों की खाक छानने में न लगाए होते, तो चाणक्य का ज्ञान हमेशा के लिए इतिहास के मलबे में दफन हो जाता।
शामशास्त्री का जन्म १८६५ में कर्नाटक के हासन जिले के एक बेहद साधारण परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनके भीतर संस्कृत और प्राचीन लिपियों को जानने की एक अजीब सी तड़प थी। उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत के दम पर संस्कृत में महारत हासिल की और बाद में मैसूर के ‘ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट’ में एक लाइब्रेरियन और क्यूरेटर के रूप में काम करना शुरू किया। उस समय इस संस्थान का काम राजा-महाराजाओं और पुराने मठों से मिली प्राचीन पांडुलिपियों को सहेजना था। यह काम बेहद उबाऊ और थका देने वाला था, जहाँ दिन भर धूल, दीमकों और सड़ते हुए ताड़ के पत्तों के बीच बैठना पड़ता था। लेकिन शामशास्त्री के लिए यह किसी खजाने की खोज जैसा था।
साल १९०४ की बात है, जब शामशास्त्री लाइब्रेरी के एक कोने में रखी उन पांडुलिपियों की कैटलॉगिंग बना रहे थे जिन्हें बरसों से किसी ने छुआ तक नहीं था। तभी तंजावुर के एक अज्ञात विद्वान ब्राह्मण द्वारा दान किए गए ताड़ के पत्तों का एक धूल धूसरित बंडल उनके हाथ लगा। वह लिपि आधुनिक कन्नड़ या देवनागरी नहीं थी, बल्कि ‘ग्रंथ लिपि’ थी, जो प्राचीन काल में संस्कृत लिखने के लिए दक्षिण भारत में इस्तेमाल होती थी। जब शामशास्त्री ने उन पत्थरों जैसे कड़े हो चुके पत्तों को धीरे-धीरे पलटना और पढ़ना शुरू किया, तो उनके रोंगटे खड़े हो गए। शुरुआती श्लोक में लिखा था कि यह अर्थशास्त्र प्राचीन आचार्यों के सिद्धांतों को संकलित करके बनाया गया है। शामशास्त्री समझ गए कि उनके हाथ में जो दस्तावेज है, वह कोई आम कहानी या कविता नहीं है। यह आचार्य चाणक्य का वह ‘अर्थशास्त्र’ था, जिसके बारे में दुनिया ने सिर्फ दूसरी किताबों में सुना था, लेकिन जिसका कोई सजीव वजूद पिछले १५०० सालों से किसी ने नहीं देखा था। पूरी दुनिया के इतिहासकार यह मान चुके थे कि यह ग्रंथ हमेशा के लिए विलुप्त हो चुका है।
ग्रंथ का मिलना तो सिर्फ शुरुआत थी, असली परीक्षा तो अब शुरू होनी थी। ताड़ के वे पत्ते वेंटिलेज और सदियों पुराने थे, कई जगह से टूट रहे थे और उन पर लिखी स्याही धुंधली हो चुकी थी। शामशास्त्री रोज़ घंटों मोमबत्ती या दीये की रोशनी में, मैग्निफाइंग ग्लास लेकर बैठते थे। वे एक-एक अक्षर को डिकोड करते, उसका मिलान करते और फिर उसे कागज़ पर उतारते। चाणक्य ने अर्थशास्त्र में कूटनीति और शासन व्यवस्था के लिए ऐसे प्राचीन तकनीकी शब्दों का इस्तेमाल किया था जो २०वीं सदी की शुरुआत के संस्कृत विद्वानों के लिए भी अजनबी थे। इसके समाधान के लिए शामशास्त्री ने कई-कई दिनों तक एक-एक शब्द के सही अर्थ को खोजने के लिए अन्य प्राचीन ग्रंथों का गहन अध्ययन किया। लगभग पांच साल की हाड़-तोड़ दिमागी मेहनत और बिना किसी सरकारी मदद के, रात-रात भर जागकर उन्होंने पूरे ग्रंथ का अनुवाद और संपादन पूरा किया।
साल १९०९ में शामशास्त्री ने चाणक्य के ‘अर्थशास्त्र’ का पहला अंग्रेजी अनुवाद दुनिया के सामने रखा। इस प्रकाशन ने पूरी दुनिया के बौद्धिक जगत में एक भूचाल ला दिया। उस समय तक ब्रिटिश और पश्चिमी इतिहासकार यह ढिंढोरा पीटते थे कि भारत के पास कभी कोई राजनीतिक समझ या शासन चलाने का व्यवस्थित ज्ञान नहीं था और भारतीय तो सिर्फ पूजा-पाठ में डूबे रहते थे। शामशास्त्री की इस खोज ने पश्चिमी अहंकार को चूर-चूर कर दिया। दुनिया ने देखा कि जब यूरोप कबीलों में जी रहा था, तब भारत के पास टैक्स सिस्टम, जासूसी नेटवर्क, विदेश नीति, आपदा प्रबंधन और युद्ध कला पर इतना विस्तृत और वैज्ञानिक ग्रंथ मौजूद था। जर्मनी और यूरोप के बड़े-बड़े विद्वान शामशास्त्री के इस काम को देखने मैसूर आने लगे।
शामशास्त्री के इस योगदान की भव्यता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के चांसलर और मैसूर के महाराजा के बीच एक बैठक चल रही थी, तो मैसूर के राजा ने महामना मदन मोहन मालवीय जी से पूछा कि वे उनके राज्य के लिए क्या कर सकते हैं? मालवीय जी ने तुरंत उत्तर दिया कि मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए, बस मुझे अपने राज्य के विद्वान शामशास्त्री के दर्शन करा दीजिए, जिन्होंने भारत का खोया हुआ गौरव वापस दिलाया है। जब महात्मा गांधी मैसूर यात्रा पर आए, तो वे भी विशेष रूप से शामशास्त्री से मिलने पहुंचे और देश के इस अनमोल रत्न के सामने अपना सिर झुकाया।
इतना बड़ा काम करने के बाद भी शामशास्त्री कभी आत्मप्रशंसा के जाल में नहीं फंसे। वे मैसूर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और बाद में पुरातत्व विभाग के निदेशक भी रहे, लेकिन उनका रहन-सहन हमेशा एक साधारण दक्षिण भारतीय शिक्षक जैसा ही रहा। वे अक्सर कहते थे कि मैंने कुछ नया नहीं लिखा, मैंने तो बस उस ऋषि के ज्ञान पर जमी धूल को साफ किया है। साल १९४४ में यह महान मनीषी चुपचाप इस दुनिया से विदा हो गया। आज हम जब भी मौर्य साम्राज्य की भव्यता, चाणक्य नीति की अचूकता और अखंड भारत के सिद्धांतों पर चर्चा करते हैं, तो उस चर्चा की नींव में रुद्रपटनम शामशास्त्री की उसी लाइब्रेरी के कोने में की गई खामोश साधना का पसीना छुपा होता है।
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