कॉकरोच जपा से कोई चिंतित, कौन निश्चिंत?

Cockroach Janta Party Cjp Protest Over Alleged Examination Related Lapses At The Jantar Mantar In New Delhi
कॉकरोच’ से किसे है चिंता और क्यों ? जंतर मंतर पर युवाओं के प्रदर्शन से राजनीतिक गलियारे में हलचल
कॉकरोच जनता पार्टी रील की दुनिया से निकलकर शनिवार को रियल दुनिया में आई। जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने सैकड़ों युवा पहुंचे। कितने लोग और कौन लोग प्रदर्शन में आए इसे लेकर कांग्रेस समर्थक और आम आदमी समर्थक सोशल मीडिया पर आमने सामने हैं।

नई दिल्ली 7 जून  2026 : कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) रील की दुनिया से निकलकर शनिवार को रियल दुनिया में आई। जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने सैकड़ों युवा पहुंचे। कितने लोग और कौन लोग प्रदर्शन में आए इसे लेकर कांग्रेस समर्थक और आम आदमी समर्थक सोशल मीडिया पर आमने सामने हैं। कांग्रेस समर्थक जहां प्रदर्शन में आए युवाओं की ‘कम’ संख्या को लेकर सोशल मीडिया में मजाक बना रहे हैं और कह रहे हैं कि जो लोग पहुंचे हैं वो भी पुराने आप वाले हैं। वहीं आम आदमी पार्टी समर्थक पूछ रहे हैं कि कांग्रेस के लोग भाजपा का साथ क्यों दे रहे हैं।
Cockroach Janta Party Prootest
शिक्षा संकट और बेरोजगारी के खिलाफ जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने सैकड़ों युवा पहुंचे।

भाजपा के नेशनल जनरल सेक्रेटरी (ऑर्गनाइजेशन) बीएल संतोष ने एक्स पोस्ट पर लिखा कि डिजिटल स्पेस में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के समर्थकों के बीच ऑलआउट वॉर चल रही है। ‘कॉकरोच’ हाशिए पर जाते दिख रहे हैं।

किसे मिलेगा लाभ, इसे लेकर भी चिंता
दरअसल, ये एक बड़ा सवाल है कि युवाओं के असंतोष की इस नई डिजिटल लहर का राजनीतिक लाभ किसे मिलेगा और किसे नुकसान होगा। इसे लेकर भी अलग अलग राजनीतिक दलों के समर्थक एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। भाजपा समर्थक जहां इस उभार को लेफ्ट की फिर से वापसी करने की कोशिश के तौर पर और एंटी नेशनल बता रहे हैं। वहीं कांग्रेस के कुछ समर्थक आम आदमी पार्टी से कॉकरोच पार्टी के लोगों के जुड़ाव की बातें कर इस प्रदर्शन का ही मजाक बना रहे हैं।

भाजपा के लिए क्या
कॉकरोच जनता पार्टी की शुरुआत पिछले महीने ही व्यंग्यात्मक डिजिटल आंदोलन के रूप में हुई। शनिवार को जंतर-मंतर पर इनका पहला प्रदर्शन था। प्रदर्शन का मुख्य विषय पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताएं, बेरोजगारी और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग रहा। ये पहली नजर में सीधी चुनौती सत्ताधारी भाजपा को दिखती है। रोजगार और युवाओं के भविष्य को लेकर सरकार पहले से ही विपक्ष के निशाने पर रहती है। लेकिन इन युवाओं का अलग प्लेटफॉर्म पर आना और विपक्ष के साथ जुड़कर उनकी ताकत न बढ़ाना, भाजपा के लिए एक राहत की बात हो सकती है। हालांकि भाजपा के नेता कॉकरोच पार्टी की शुरुआत होने के साथ ही इसे एंटी इंडिया गैंग कह चुके हैं।

किसे मिलेगा युवाओं का साथ
कांग्रेस लंबे वक्त से बेरोजगारी, परीक्षा घोटालों और युवा विषयों को उठाती रही है। लेकिन CJP के साथ जिस तरह युवा दिख रहे हैं इससे ये सवाल भी उठा है कि क्या युवाओं को पारंपरिक विपक्षी दलों पर भरोसा नहीं रह गया है। क्या युवा अब विपक्षी दलों की बजाय डिजिटल आंदोलनों के साथ खड़े होना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। आम आदमी पार्टी ने कभी खुद को एंटी स्टैब्लिशमेंट और युवाओं की आवाज के तौर पर पेश किया था। CJP की भाषा, व्यंग्य, सोशल मीडिया आधारित संगठन और व्यवस्था विरोधी तेवर उसी स्पेस में जगह बना रहे हैं जहां कभी आम आदमी पार्टी का दबदबा था। इसलिए आप के लिए भी ये चुनौती है कि कहीं युवा असंतोष का नया चेहरा उसके बाहर न बन जाए। CJP अभी चुनावी दल नहीं है लेकिन डिजिटल स्पेस में तो यह युवा गुस्से का ब्रैंड बन चुका है। ऐसे में विपक्षी खेमे के भीतर यह खींचतान दिखेगी ही कि उसका फायदा किसे मिलता है।

भाजपा अध्यक्ष ने कहा- भारत का युवा पॉजिटिव पॉलिटिक्स करेगा
शनिवार शाम को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने झारखंड में इंटलेक्चुअल मीट को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि जो लोग इस देश के युवाओं को नेगेटिव पॉलिटिक्स के लिए ले जाना चाहते हैं, मैं उनको चेतावनी देता हूं कि भारत का युवा पॉजिटिव पॉलिटिक्स करेगा। हम लोकतंत्र के आधार पर निश्चित रूप से विरोध करेंगे, लेकिन लोकतंत्र के मापदंड को खत्म नहीं होने देंगे।

भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि कुछ लोग विदेश में बैठकर ये सोच लेते हैं कि हम भारत के युवाओं को दिशा दे देंगे। भारत का युवा किसान के साथ चौपाल में रहता है, कोचिंग इंस्टीट्यूट में रहता है, कॉलेज कैंपस में रहता है। लेकिन भारत का युवा दिल्ली में बैठे कुछ लोगों की मुठ्ठी की कठपुतली बनकर आगे नहीं बढ़ने वाला।

ये कॉकरोच नहीं हैं
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ये हैं अवधेश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार और चर्चित कॉलमिस्ट। टीवी की बहसों में उन्हें राष्ट्रवादी राजनीति पर विस्तार से अपनी बात रखते अक्सर देखा जाता है। फिर भी कल वे जंतर-मंतर पर मौजूद थे। सवाल उठना स्वाभाविक है कि वे वहां क्यों पहुंचे थे। सिर्फ वही नहीं, विद्यार्थी परिषद के दर्जनों कार्यकर्ता भी वहां दिखाई दिए।
अवधेश जी ने अपने आंखों-देखे विवरण में लिखा है कि वहां विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों से जुड़े अनेक लोग केवल जिज्ञासावश पहुंचे थे। इससे इतना तो साफ है कि जंतर-मंतर पर जुटी भीड़ सिर्फ कॉकरोचों की नहीं थी, उन्हें देखने और समझने वालों की भी थी।
करीब ढाई सौ पुलिसकर्मी और लगभग उतनी ही संख्या में मीडिया कर्मी भी वहां मौजूद थे। मैं स्वयं भी उनमें शामिल था। ऐसे में यह मानना कठिन नहीं कि जो भीड़ दिखाई दे रही थी, उसका बड़ा हिस्सा आंदोलन में भाग लेने नहीं, बल्कि घटनाक्रम को करीब से देखने आया था। दूसरे शब्दों में कहें तो वहां समर्थकों से ज्यादा तमाशबीन मौजूद थे।
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अवधेश कुमार की आंखों-देखी
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वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार ने जंतर-मंतर पर लंबा समय बिताने के बाद जो तस्वीर प्रस्तुत की, वह सोशल मीडिया पर बनाई गई धारणा से भिन्न है। उनके अनुसार जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी का धरना-प्रदर्शन चल रहा था, लेकिन कहीं भी आम लोगों के आवागमन में बाधा दिखाई नहीं दी। पुलिस की व्यवस्था वैसी ही थी जैसी दिल्ली में सामान्य धरना-प्रदर्शनों के दौरान होती है। आसपास की सड़कों पर समर्थकों की कोई बड़ी भीड़ या जुलूस नजर नहीं आया।

अवधेश कुमार का अनुमान है कि प्रदर्शन स्थल पर मौजूद लोगों की संख्या 1500 से अधिक नहीं रही होगी। हां, मीडिया उपस्थिति काफी थी। राष्ट्रीय और विदेशी मीडिया संस्थानों के साथ बड़ी संख्या में यूट्यूब चैनल संचालक भी  थे, जो लगातार लोगों से बातचीत और प्रसारण कर रहे थे। विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों से जुड़े कुछ चेहरे वहां दिखे, लेकिन संगठित भागीदारी में केवल भाकपा (माले) और आइसा के कार्यकर्ता ही सक्रिय दिखे । अन्य प्रमुख दलों की संगठित मौजूदगी नहीं दिखी।

अवधेश कुमार के अनुसार सोशल मीडिया पर यह वातावरण बना था कि अभिजीत के अमेरिका से लौटने पर उनका भव्य स्वागत होगा। बड़ी भीड़ सड़कों पर उतरेगी और राजधानी में व्यापक जनसमर्थन दिखेगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

प्रदर्शन को प्रारंभिक अनुमति नहीं थी, लेकिन आयोजकों के आग्रह पर दिल्ली पुलिस ने व्यवस्था कर दी। पुलिस पहले से तैयार थी और प्रदर्शनकारियों को निर्धारित स्थान पर शांतिपूर्ण ढंग से कार्यक्रम करने दिया गया। सुरक्षा व्यवस्था भी सामान्य रही। प्रवेश पर जांच, मेटल डिटेक्टर और बैरिकेडिंग जैसी व्यवस्थाएं वही थीं जो सामान्यत: ऐसे आयोजनों में दिखती हैं।

अवधेश कुमार का निष्कर्ष है कि सोशल मीडिया पर किसी विषय को लेकर बड़ा वातावरण बनाया जा सकता है, लेकिन उसे जमीन पर व्यापक जनान्दोलन का  रूप देना कहीं अधिक कठिन है। उनका मानना है कि परीक्षा प्रश्नपत्र लीक होना निश्चित रूप से गंभीर राष्ट्रीय चिंता का विषय है और इसका समाधान होना चाहिए, लेकिन केवल इसी विषय पर भारत में बांग्लादेश, श्रीलंका या नेपाल जैसा राजनीतिक बवाल वास्तविकता से दूर  है।

जंतर-मंतर का यह प्रदर्शन कम से कम उस धारणा की पुष्टि नहीं करता कि देश में बड़े जनविद्रोह जैसी स्थिति बन रही है। इस घटनाक्रम ने फिर दिखाया कि सोशल मीडिया की धारणा और जमीन पर मौजूद वास्तविकता में कई बार बड़का वाला अंतर होता है।

चले थे देश हिलाने, पर खुद की जमीन ऐसी खिसकी कि आंदोलन में सिर्फ दो चीजें ढूँढे से मिलीं—एक ‘मीडिया के कैमरे’ और दूसरे ‘सुरक्षाबल के डंडे’!

2-3 हजार की भीड़ जुटाने के लाले पड़ गए, और तथाकथित ‘महा-आंदोलन’ इतिहास का सबसे बड़ा ‘महा-फेल’ शो बन गया।
आखिरकार बैकरूम की वो कौन सी स्क्रिप्ट थी, जिसने इस खेल को पूरी तरह बिगाड़ दिया? आइए ज़रा क्रोनोलॉजी समझते हैं:
सामान्य वर्ग का ‘सख्त नो’: जब तक छात्रों के मुद्दे थे, युवाओं ने कंधे से कंधा मिलाया। लेकिन जैसे ही एजेंडा बदला, ‘जय भीम’ के नाम पर सवर्णों को टारगेट करने की स्क्रिप्ट चालू हुई, वैसे ही सामान्य वर्ग ने साफ कह दिया—”भैया, हम इस झांसे में नहीं आने वाले।”
ओबीसी (OBC) की समझदारी: पिछड़ों ने सीधा गणित लगा लिया—”भीड़ हमारी होगी, लाठियां और मुकदमे हमारे पिछवाड़े पर बजेंगे, घर पर बुलडोजर हमारे चलेगा… और मलाई ये नीले गमछे वाले नेता बनकर खाएंगे? फिर कोई नया UGC जैसा काला कानून लाकर हमारा ही हक मारेंगे। इसलिए, टाटा-बाय बाय!”
तथाकथित ‘बहुजन’ भाईचारे की हवा निकली: मुसलमानों ने भी अपने समाज को साफ हिदायत दे दी—”बलि का बकरा तुम बनोगे, एनकाउंटर और बुलडोजर का दर्द तुम झेलोगे, और नेता ये बनेंगे। अपने घर बैठो, इस सियासी जाल में मत फँसो।”
सनातन के मार्शल वीरों का किनारा: पासी, वाल्मीकि और अन्य वीर लड़ाकू समुदायों ने भी इस स्वार्थी एजेंडे को पहचान लिया और इस खोखले आंदोलन से पूरी तरह दूरी बना ली।
नतीजा?
जो लोग दूसरों की लंका लगाने चले थे, आज उनके ही आंदोलन की लंका लग चुकी है। अब किस मुंह से आरक्षण का नया राग अलापोगे? जब नीयत में खोट हो, तो आंदोलन का ऐसा ही ‘मोये-मोये’ होता है! 😝
जय दादा परशुराम! 🙏
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Akriti Tripathi @हाइलाइट

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