मत:कौन हैं दिमागी नक्सल? जानिये बृजलाल और किरिन रिजिजू की सूची

PM मोदी के ‘दिमागी नक्सल’ बयान की केंद्रीय मंत्री किरिन रिजिजू और उत्तर प्रदेश के पूर्व DGP सांसद बृजलाल ने व्याख्या की है जबकि कांग्रेस नेता पी चिदंबरम और जयराम रमेश भड़क गये
नई दिल्ली / लखनऊ 16 अगस्त 2026। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से ‘दिमागी नक्सल’ को लेकर दिए गए बयान पर देश की राजनीति गर्मा गई है. इस कड़ी में उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी और भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद बृजलाल ने ‘दिमागी नक्सल’ की विस्तृत परिभाषा देते हुए उन्हें समाज को घातक बताया है.

स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से दिए गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘दिमागी नक्सल’ (Intellectual/Urban Naxal) वाले बयान पर देश में राजनीतिक पारा चढ़ गया है। विपक्ष के लगातार हमलों के बीच केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने सोशल मीडिया से पलटवार करते हुए स्पष्ट किया है कि प्रधानमंत्री ने विपक्षी नेताओं को इस शब्द से संबोधित  नहीं किया था।

केंद्रीय मंत्री ने ‘दिमागी नक्सल’ की सोच रखने वालों की स्पष्ट परिभाषा देते हुए बताया कि यह बयान किन लोगों के संदर्भ में था।

किरेन रिजिजूः ‘दिमागी नक्सली कौन हैं?’

किरेन रिजिजू ने बताया कि ‘दिमागी नक्सली’ की श्रेणी में मुख्य रूप से तीन तरह के लोग आते हैं:

संविधान का विरोधः वे लोग जो माओवादियों व हिंसक विचारधारा का समर्थन करते हैं और भारतीय संविधान को खारिज करते हैं।

अलगाववाद का समर्थनः जो अलगाववादियों के साथ खड़े होते हैं और अनुच्छेद 370 की वापसी का समर्थन करते हैं।

देश की संप्रभुता पर हमलाः जो भारत से पूर्वोत्तर (North-East) राज्यों को अलग करने के लिए रणनीतिक ‘चिकन नेक’ (Siliguri Corridor) को काटने की मंशा रखते हैं।

भाजपा के राज्यसभा सांसद और उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी बृजलाल ने रविवार को प्रधानमंत्री मोदी के ‘दिमागी नक्सली’ वाले बयान की नई परिभाषा दी है. उन्होंने कहा कि जंगलों में रहने वाले हथियारबंद नक्सलियों से भी ज्यादा खतरनाक ये ‘दिमागी नक्सली’ हैं, जो शहरों में प्रोफेसर, शिक्षक, एनजीओ संचालक, बुद्धिजीवी, कवि और लेखक के रूप में सक्रिय हैं. बता दें कि प्रधानमंत्री मोदी के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से ‘दिमागी नक्सल’ को लेकर दिए गए बयान पर देश की राजनीति गर्मा गई है. कांग्रेस इस पर लगातार हमलावर है. ऐसे में उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी और सांसद का यह बयान और राजनीतिक पारा गर्मा सकता है.

बृजलाल ने लखनऊ में कहा, ‘आज मैं ‘दिमागी नक्सली’ के बारे में बात करना चाहता हूं. ये जंगलों या बीहड़ों में नहीं रहते. ये हथियार नहीं रखते और गोलियां नहीं चलाते. ये सिर्फ अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करते हैं. ये शहरों में प्रोफेसर, टीचर, एनजीओ हेड, इंटेलेक्चुअल, कवि और लेखक के रूप में दिखते हैं. ये लेख लिखते हैं, कॉन्फ्रेंस और सेमिनार आयोजित करते हैं, जिनमें आम लोगों, खासकर युवाओं के दिमाग में अपनी हिंसक विचारधारा ठूंसते हैं. इसलिए ये उन नक्सलियों से कहीं ज्यादा खतरनाक हैं जो जंगलों में रहते थे और जिन्हें लगभग खत्म कर दिया गया है.’

कौन-कौन लोग हैं ‘दिमागी नक्सल’?

उन्होंने आगे कहा कि ये लोग लोकतांत्रिक संस्थाओं, न्यायपालिका, सुरक्षा बलों और संविधान के प्रति लोगों में अविश्वास पैदा करते हैं. युवाओं में घुसपैठ कर बौद्धिक हेरफेर से उन्हें हिंसक गतिविधियों की ओर मोड़ने की कोशिश करते हैं. बृजलाल ने चेताया कि इनके खिलाफ सतर्क रहना जरूरी है क्योंकि यही लोग नक्सलियों की महिमामंडन करते हैं, उनके बारे में लिखते हैं और देश में अराजकता बनाए रखने को फंड जुटाते हैं।

पी चिदंबरम ने प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधा

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दिमागी नक्सल वाली टिप्पणी पर पलटवार किया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में लिखा कि मुझे दिमागी नक्सल होने पर गर्व है।

प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों और अधिकारियों से ‘दिमागी नक्सल’ सोच वाले लोगों को पहचानने और अलग-थलग करने की अपील की थी।

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा, “दो-तीन साल पहले, उन्होंने (PM मोदी) अपने राजनीतिक विरोधियों को ‘अर्बन नक्सल’ कहा था। उस समय संसद में यह सवाल उठा था कि ‘अर्बन नक्सल’ की परिभाषा क्या है। गृह मंत्री ने जवाब दिया कि ‘अर्बन नक्सल’ जैसी कोई चीज़ नहीं होती, न ही इसकी कोई परिभाषा है। आज प्रधानमंत्री लाल किले से अपने राजनीतिक विरोधियों के लिए दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं।”

कांग्रेस नेता ने कहा, “असलियत यह है कि वह आखिर में उन्हीं लोगों के उठाए गए मुद्दों और मांगों को मान लेते हैं, जिन्हें वह ‘अर्बन नक्सल’ कहते हैं। उन्होंने जाति जनगणना के विचार को ‘अर्बन नक्सल’ सोच बताकर खारिज कर दिया था, फिर भी एक साल पहले उन्होंने जाति-आधारित जनगणना की घोषणा की। पहले आप अपमानजनक बातें करते हैं उन्हें ‘अर्बन नक्सल’ या दिमागी नक्सल’ कहते हैं, लेकिन बाद में, आप उन्हीं मांगों को मान लेते हैं जो आपके राजनीतिक विरोधी कर रहे थे। 12 साल बाद भी उनके राजनीतिक भाषण में कुछ भी नया नहीं था।”

प्रधानमंत्री मोदी ने क्या कहा था?

शनिवार को प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले की प्राचीर से कहा था कि 2014 से सरकार की कार्रवाई से जंगल में होने वाली बगावत काफी हद तक खत्म हो गई है, जिसमें 3,500 से ज़्यादा सुरक्षाकर्मी मारे गए थे। लेकिन उन्होंने आरोप लगाया कि माओवादी मानसिकता वाले दिमागी नक्सल पहले सरकारी कमेटियों में पदों पर थे और पॉलिसी पर असर डालते थे। प्रधानमंत्री ने कहा कि युवाओं को राष्ट्र-निर्माण से जोड़े रखने पर ध्यान देना चाहिए और चेतावनी दी कि हथियारों से लैस माओवादी हिंसा आखिरी सांस ले रही है इसके बावजूद संस्थानों में एक वैचारिक नक्सल मानसिकता अभी भी मौजूद है।

कांग्रेस ने साधा निशाना

शनिवार को कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा। कांग्रेस ने दिमागी नक्सलियों के खिलाफ उनकी चेतावनी को खोखली राजनीतिक बयानबाजी बताया। जयराम रमेश ने बताया कि जब सरकार ने पहले राजनीतिक विरोधियों को अर्बन नक्सल कहा था, तो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को संसद में यह साफ़ करना पड़ा था कि ऐसी कोई आधिकारिक कानूनी परिभाषा मौजूद नहीं है।

लाल किले से प्रधानमंत्री मोदी ने क्या कहा था?

15 अगस्त को लाल किले से देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि जंगलों में बंदूकों वाले नक्सलियों को तो परास्त कर दिया गया है, लेकिन ‘दिमागी नक्सल’ या ‘नक्सली मानसिकता’ वाले लोग अभी भी समाज के लिए खतरा बने हुए हैं. पीएम मोदी ने देशवासियों से आह्वान किया था कि ऐसे ‘दिमागी नक्सलियों’ की पहचान कर उन्हें समाज से अलग-थलग किया जाए.

लाल किले से अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने सुरक्षा बलों की सफलताओं का उल्लेख करते हुए कहा था कि सरकार जंगलों से सशस्त्र नक्सलियों का खात्मा करने में सफल रही है।

प्रधानमंत्री मोदी कहा था कि वर्षों से माओवादी विचारधारा वाले व्यक्ति देश के नीति-निर्माण, सरकारी समितियों और सत्ता के गलियारों में सलाहकार के रूप में अपनी जड़ें जमा चुके थे। हालांकि सशस्त्र नक्सलवाद कम हुआ है, लेकिन ‘दिमागी’ (बौद्धिक) नक्सली अभी भी सक्रिय हैं और नीति-निर्माण को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं।

प्रधानमंत्री और भाजपा नेताओं के इस रुख पर विपक्षी दलों ने तीखा हमला बोला है. कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी नेताओं का कहना है कि सरकार इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करके लोकतांत्रिक विरोध, असहमति और आलोचकों की आवाज दबाने का प्रयास कर रही है.

कांग्रेस का पलटवार: ‘क्या सामाजिक न्याय की मांग करना दिमागी नक्सल है?’

प्रधानमंत्री मोदी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने तीखा हमला बोला- “जो भी सरकार की नीतियों का विरोध करता है या सवाल पूछता है, उसे किसी न किसी नाम से पुकारा जाने लगता है। जो लोग जातिगत जनगणना और सामाजिक न्याय की मांग कर रहे थे, क्या वे ‘दिमागी नक्सल’ हैं? सरकार पहले जातिगत जनगणना का विरोध करती रही और फिर 30 अप्रैल 2025 को इसे कराने की घोषणा की। सवाल उठाने वालों को राष्ट्रविरोधी या नक्सली करार देना सही नहीं है।”

चिदंबरम को लोगों ने याद दिलाया उनका कार्यकाल

15 अगस्त को लाल किले के भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘दिमाग़ी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किया तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और देश के पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम ने प्रधानमंत्री के इस शब्द के इस्तेमाल पर कहा कि उन्हें ‘दिमाग़ी नक्सल’ होने पर गर्व है.

सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर की गई इस टिप्पणी के बाद भाजपा नेताओं ने चिदंबरम को निशाने पर लेना शुरू कर दिया है.

चिदंबरम की इस टिप्पणी पर गुजरात के उपमुख्यमंत्री हर्ष सांघवी ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा, “हैरानी? बिल्कुल नहीं. अब हम समझ सकते हैं कि पी. चिदंबरम के गृह मंत्री रहते और यूपीए सरकार में नक्सलवाद क्यों फलता-फूलता रहा. अब हम समझ सकते हैं कि 2004 से 2014 के बीच नक्सलवाद से लड़ते हुए 1,913 पुलिसकर्मी और सीआरपीएफ जवान क्यों मारे गए.”

”अब हम समझ सकते हैं कि यूपीए शासन में नक्सली हमलों में 5,019 से ज्यादा भारतीयों की जान क्यों गई. समझ सकते हैं कि गृह मंत्री चिदंबरम के कार्यकाल में नक्सलियों के 92 प्रतिशत हथियार पुलिस के शस्त्रागार से क्यों लूटे गए. समझ सकते हैं कि 2013 में 182 ज़िले नक्सली हिंसा की चपेट में क्यों थे. आंतरिक सुरक्षा के मामले में यूपीए सरकार का रिकॉर्ड खुद अपनी कहानी कहता है.”

‘ मोदी ने नक्सलवाद ख़त्म किया

वरिष्ठ भाजपा  नेता रविशंकर प्रसाद ने पी चिदंबरम की टिप्पणी की आलोचना की है
सांसद रविशंकर प्रसाद ने कहा, “मिस्टर चिदंबरम, इस बेहद गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणी से आपका क्या मतलब है? आप इतनी अच्छी अंग्रेज़ी बोलते हैं, इसलिए निश्चित तौर पर आप समझते होंगे कि प्रधानमंत्री ने क्या कहा और किस संदर्भ में कहा?”

”प्रधानमंत्री का कहना था कि मोदी सरकार और अमित शाह की दूरदर्शी नीतियों से नक्सलवाद और माओवाद का सफ़ाया हो गया है.”पीएम मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर दिए गए भाषण में ‘दिमाग़ी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किया था
15 अगस्त को लाल क़िले की प्राचीर से दिए अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “हथियारी नक्सल तो गए, लेकिन दिमाग़ी नक्सल मौके की तलाश में हैं. हिंसा अराजकता के वो रास्ते खोज रहे हैं. इन दिमाग़ी नक्सलियों को पहचानना होगा. इन दिमाग़ी नक्सलियों को आइसोलेट करना होगा और राष्ट्र को विकसित राष्ट्र बनाने की मुख्यधारा की ओर देश की युवा पीढ़ी को जोड़ना होगा.”

चिदंबरम की इस टिप्पणी पर पंजाब के भाजपा नेता रवनीत सिंह बिट्टू ने कहा, “पी. चिदंबरम अब रिटायरमेंट की उम्र में हैं, लेकिन मेरा उनसे और उनकी पार्टी से एक सवाल है. जब वह गृह मंत्री थे तब के रिकॉर्ड देखें तो उनके समय नक्सली और माओवादी सबसे ज्यादा सक्रिय थे.”

”उस समय उन्हें पूरा समर्थन हासिल था और झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में जितने बड़े पैमाने पर हत्याएं हुईं, उतनी उसके बाद कभी नहीं हुईं. इसलिए बेहतर होगा कि वे बिल्कुल न बोलें.”

भाजपा राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने कहा, “जो पी. चिदंबरम खुद को गर्व से ‘दिमागी नक्सली’ कहते हैं, उन्हें मैं बताना चाहता हूं कि आपके कार्यकाल में एक भी नक्सली आतंकवादी नहीं मारा गया. वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में सभी बड़े नक्सली कमांडरों का पूरी तरह सफ़ाया कर दिया गया और नक्सलवाद से पीड़ित गरीब आदिवासियों को बचाया गया. देश ने नक्सलवाद के ख़तरे को ख़त्म कर दिया है.”

‘चिदंबरम पाला बदल रहे हैं’
कई पत्रकारों ने यूपीए कार्यकाल में चिदंबरम के गृह मंत्री रहते हुए माओवाद के ख़िलाफ़ की गई कार्रवाइयों का ज़िक्र किया है
केंद्र सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय में वरिष्ठ सलाहकार दिलीप मंडल ने चिदंबरम की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर लिखा, ”दिमागी नक्सल जैसे शब्दों का सबसे पहला प्रयोग पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम ने 2010 में किया था.”

उन्होंने चिदंबरम के एक पूुराने बयान का लिंक डालते हुए लिखा, ”2010 में आप ये कह रहे थे. अब आपने पाला बदल दिया है.”

उन्होंने लिखा, ”13 साल सत्ता से बाहर रहने के बाद चिदंबरम की दिमागी हालत ठीक नहीं है. 2010 में केंद्रीय गृह मंत्री रहते हुए वे यूनिवर्सिटी और मीडिया में नक्सल सपोर्टर खोज रहे थे. 2012 में अर्बन नक्सल पर एक्शन शुरू किया. आज सुबह उठकर पहला काम: ये बताना कि वे दिमागी नक्सल हैं!”

पत्रकार गार्गी रावत ने लिखा, ”ये विडंबना है. मुझे याद है, गृह मंत्री के तौर पर पी. चिदंबरम ने यूपीए सरकार की ज्यादा आक्रामक और समन्वित नक्सल विरोधी रणनीति की अगुआई की थी. आज वही खुद को ‘दिमागी नक्सली’ कह रहे हैं.”

वरिष्ठ पत्रकार मिन्हाज मर्चेंट ने लिखा, ”मैं प्रधानमंत्री मोदी के ‘दिमागी नक्सली’ शब्द से सहमत नहीं हूं. इस तरह के नक्सलियों पर आप एक आरोप तो बिल्कुल नहीं लगा सकते. वह है बौद्धिक होने का.”

गृह मंत्री  चिदंबरम ने नक्सलियों के बारे में क्या कहा था?
2009 में चिदंबरम यूपीए सरकार में देश के गृह मंत्री थे.

तब उन्होंने कहा था, “देश की आंतरिक सुरक्षा को मुख्य रूप से तीन चीज़ों से ख़तरा है. पहला चरमपंथ, दूसरा पूर्वोत्तर में उग्रवाद और तीसरा नक्सलवाद.”

2010 में भारत के गृह मंत्री के तौर पर पी चिदंबरम ने कहा था कि अगले दो से तीन वर्षों में नक्सली प्रभावित इलाक़ों पर नियंत्रण हो जाएगा.

नई दिल्ली में आयोजित इंडिया ईकोनॉमिक समिट में चिदंबरम ने कहा था, “मुझे विश्वास है कि हम दो-तीन वर्षों में नक्सलियों के नियंत्रण वाले इलाक़ों पर क़ब्ज़ा कर लेंगे.”

उन्होंने कहा था कि उनके गृह मंत्री बनने के बाद राज्य सरकारों ने माओवादी विद्रोहियों के ख़िलाफ़ अभियान तेज़ किए हैं और अब बेहतर समन्वय से ऐसा हो रहा है.

चिदंबरम ने कहा था कि माओवादी सशस्त्र संघर्ष में विश्वास रखते हैं और अपने प्रभाव को बढ़ाना चाहते हैं लेकिन लोकतांत्रिक सरकार उनके इस मकसद को कामयाब नहीं होने देगी.

उनका कहना था कि भारत सरकार माओवादियों से निर्णायक तरीके से निपटने में सक्षम है.

माओवादियों के ख़िलाफ़ अभियान पर उन्होंने कहा, “हमें उल्लेखनीय सफलता मिली है और कुछ झटके भी लगे

प्रधानमंत्री मोदी की इस टिप्पणी के बाद विपक्षी दलों और आलोचकों ने पूछा है कि ‘दिमाग़ी नक्सल’ से उनका मतलब किन लोगों से है.कुछ आलोचकों का आरोप है कि सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वाले युवाओं, बुद्धिजीवियों और विचारकों को इस तरह के शब्दों से निशाना बनाया जा रहा है.

वहीं, भाजपा ने प्रधानमंत्री के बयान का बचाव किया कि इसे उसके व्यापक संदर्भ में समझने की ज़रूरत है.

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