मत:कौन हैं दिमागी नक्सल? जानिये बृजलाल और किरिन रिजिजू की सूची
PM मोदी के ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान पर यूपी के पूर्व DGP ने कह दी बड़ी बात
प्रधानमंत्री मोदी के ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान को यूपी के पूर्व डीजीपी ने किया परिभाषित, आप भी सुन लें इसके मायने
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से ‘दिमागी नक्सल’ को लेकर दिए गए बयान के बाद देश की राजनीति गर्मा गई है. इस कड़ी में उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी और भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद बृजलाल ने ‘दिमागी नक्सल’ की विस्तृत परिभाषा देते हुए उन्हें समाज के लिए घातक बताया है.
लखनऊ.नई दिल्लीः स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से दिए गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘दिमागी नक्सल’ (Intellectual/Urban Naxal) वाले बयान को लेकर देश में राजनीतिक पारा चढ़ गया है। विपक्ष द्वारा लगातार किए जा रहे हमलों के बीच केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने सोशल मीडिया के माध्यम से पलटवार करते हुए स्पष्ट किया है कि प्रधानमंत्री ने विपक्षी नेताओं के लिए इस शब्द का इस्तेमाल नहीं किया था।
केंद्रीय मंत्री ने ‘दिमागी नक्सल’ की सोच रखने वालों की स्पष्ट परिभाषा देते हुए बताया कि यह बयान किन लोगों के संदर्भ में था।
किरेन रिजिजूः ‘दिमागी नक्सली कौन हैं?’
किरेन रिजिजू ने बताया कि ‘दिमागी नक्सली’ की श्रेणी में मुख्य रूप से तीन तरह के लोग आते हैं:
संविधान का विरोधः वे लोग जो माओवादियों व हिंसक विचारधारा का समर्थन करते हैं और भारतीय संविधान को खारिज करते हैं।
अलगाववाद का समर्थनः जो अलगाववादियों के साथ खड़े होते हैं और अनुच्छेद 370 की वापसी का समर्थन करते हैं।
देश की संप्रभुता पर हमलाः जो भारत से पूर्वोत्तर (North-East) राज्यों को अलग करने के लिए रणनीतिक ‘चिकन नेक’ (Siliguri Corridor) को काटने की मंशा रखते हैं।
भाजपा के राज्यसभा सांसद और उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी बृजलाल ने रविवार को पीएम मोदी के ‘दिमागी नक्सली’ वाले बयान की नई परिभाषा दी है. उन्होंने कहा कि जंगलों में रहने वाले हथियारबंद नक्सलियों से भी ज्यादा खतरनाक ये ‘दिमागी नक्सली’ हैं, जो शहरों में प्रोफेसर, शिक्षक, एनजीओ संचालक, बुद्धिजीवी, कवि और लेखक के रूप में सक्रिय हैं. बता दें कि पीएम मोदी के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से ‘दिमागी नक्सल’ को लेकर दिए गए बयान के बाद देश की राजनीति गर्मा गई है. कांग्रेस इस पर लगातार हमलावर है. ऐसे में यूपी के पूर्व डीजीपी का यह बयान और सियासी पारा गर्मा सकता है.
PM मोदी के ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान पर यूपी के पूर्व DGP ने कह दी बड़ी बात
पीएम मोदी के ‘दिमगी नक्सल’ वाले बयान पर बृजलाल ने क्या कहा
बृजलाल ने लखनऊ में कहा, ‘आज मैं ‘दिमागी नक्सली’ के बारे में बात करना चाहता हूं. ये जंगलों या बीहड़ों में नहीं रहते. ये हथियार नहीं रखते और गोलियां नहीं चलाते. ये सिर्फ अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करते हैं. ये शहरों में प्रोफेसर, टीचर, एनजीओ हेड, इंटेलेक्चुअल, कवि और लेखक के रूप में दिखते हैं. ये लेख लिखते हैं, कॉन्फ्रेंस और सेमिनार आयोजित करते हैं, जिनमें आम लोगों, खासकर युवाओं के दिमाग में अपनी हिंसक विचारधारा ठूंसते हैं. इसलिए ये उन नक्सलियों से कहीं ज्यादा खतरनाक हैं जो जंगलों में रहते थे और जिन्हें लगभग खत्म कर दिया गया है.’
कौन-कौन लोग हैं ‘दिमगी नक्सल’?
उन्होंने आगे कहा कि ये लोग लोकतांत्रिक संस्थाओं, न्यायपालिका, सुरक्षा बलों और संविधान के प्रति लोगों में अविश्वास पैदा करते हैं. युवाओं में घुसपैठ कर बौद्धिक हेरफेर से उन्हें हिंसक गतिविधियों की ओर मोड़ने की कोशिश करते हैं. बृजलाल ने आगाह किया कि इनके खिलाफ सतर्क रहना जरूरी है क्योंकि यही लोग नक्सलियों की महिमामंडन करते हैं, उनके बारे में लिखते हैं और देश में अराजकता का माहौल बनाए रखने के लिए फंड जुटाते हैं.बृजलाल ने सतर्कता बरतने की सलाह देते हुए कहा कि यही लोग नक्सलियों का महिमामंडन करते हैं,उनके पक्ष में लिखते हैं और देश में अराजकता का माहौल बनाए रखने के लिए फंडिंग जुटाते हैं.
लाल किले से पीएम मोदी ने क्या कहा था?
15 अगस्त को लाल किले से देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि जंगलों में बंदूकों वाले नक्सलियों को तो परास्त कर दिया गया है, लेकिन ‘दिमागी नक्सल’ या ‘नक्सली मानसिकता’ वाले लोग अभी भी समाज के लिए खतरा बने हुए हैं. पीएम मोदी ने देशवासियों से आह्वान किया था कि ऐसे ‘दिमागी नक्सलियों’ की पहचान कर उन्हें समाज से अलग-थलग किया जाए.
लाल किले से अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने सुरक्षा बलों की सफलताओं का उल्लेख करते हुए कहा था कि सरकार जंगलों से सशस्त्र नक्सलियों का खात्मा करने में सफल रही है।
पीएम ने कहा था कि वर्षों से माओवादी विचारधारा वाले व्यक्ति देश के नीति-निर्माण, सरकारी समितियों और सत्ता के गलियारों में सलाहकार के रूप में अपनी जड़ें जमा चुके थे। हालांकि सशस्त्र नक्सलवाद कम हुआ है, लेकिन ‘दिमागी’ (बौद्धिक) नक्सली अभी भी सक्रिय हैं और नीति-निर्माण को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं।
प्रधानमंत्री और बीजेपी नेताओं के इस रुख पर विपक्षी दलों ने तीखा हमला बोला है. कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी नेताओं का कहना है कि सरकार इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करके लोकतांत्रिक विरोध, असहमति और आलोचकों की आवाज दबाने का प्रयास कर रही है.
कांग्रेस का पलटवार: ‘क्या सामाजिक न्याय की मांग करना दिमागी नक्सल है?’
पीएम मोदी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने तीखा हमला बोला- “जो भी सरकार की नीतियों का विरोध करता है या सवाल पूछता है, उसे किसी न किसी नाम से पुकारा जाने लगता है। जो लोग जातिगत जनगणना और सामाजिक न्याय की मांग कर रहे थे, क्या वे ‘दिमागी नक्सल’ हैं? सरकार पहले जातिगत जनगणना का विरोध करती रही और फिर 30 अप्रैल 2025 को इसे कराने की घोषणा की। सवाल उठाने वालों को राष्ट्रविरोधी या नक्सली करार देना सही नहीं है।”

