ज्ञान: निंदा और प्रशंसा कैसे समाप्त करती हैं आपको?
किसी को असफल बनाना हो तो उसके दो तरीके हो सकते हैं। एक तो सामान्य तरीका है कि लगातार उसकी निंदा ही करते रहो। कड़वा बोलो, कुछ अच्छा भी करे तो उसमें बुराई खोज लो। उसका आत्मविश्वास कभी ऐसा होगा ही नहीं कि वो कोई बड़ा कार्य करने की सोचे भी। अगर अपनी क्षमता से अधिक का प्रयास नहीं करेगा तो क्षमता कभी बढ़ेगी नहीं और वो आगे नहीं बढ़ पायेगा, ठहरा रहेगा। नया कुछ सृजन करने में निंदा का इतना डर होगा कि प्रयास ही न करे। गतिशील विश्व में ठहरे रहने का अर्थ पीछे जाना है, लोग आगे जाते जायेंगे और वो पिछड़ जायेगा।
एक दूसरा उपाय है व्यक्ति के हर कार्य की प्रशंसा करते रहना। वो गलत भी करे तो उसे सही बताते रहने से भी ऐसा ही होगा। ये कुछ-कुछ वैसा है जैसे कृत्य करते हुए आपने शकुनी-कर्ण आदि को महाभारत में देखा-सुना होगा। दुर्योधन कितना भी गलत करे, भीम को विष दे दे, लाक्षागृह में आग लगाने का षड्यन्त्र कर ले। यहाँ तक कि द्रौपदी चीरहरण भी करवा दे तो उसके आस पास के लोग उसे ही सही ठहरा रहे थे। मीठा-मीठा बोलकर उसकी ही प्रशंसा कर रहे होते हैं। इसलिए नीति के नाम पर बताया जाता है कि वैद्य, मंत्री और आचार्य हर बात में सहमती जताने लगें तो विनाश निकट ही है ऐसा समझ लेना चाहिए।
सिर्फ मीठा बोलते रहने से भी हानि होगी और सिर्फ कड़वा बोलते रहने से भी वही होगा। इसी बात को दुर्गा सप्तशती के शुरूआती हिस्से से भी समझ सकते हैं। मीठी-कड़वी बातें कानों के जरिये आपके दिमाग तक पहुँचती हैं और किसी भी नए सृजन की क्षमता को समाप्त कर डालती हैं। मधु और कैटभ नाम के दो राक्षस जिनके नाम से ही एक मधुर और दूसरा तिक्त/कड़वा लगता है, दोनों भगवान विष्णु के कान के मैल से उत्पन्न होते हैं। उत्पन्न होते ही जो सबसे पहला काम ये करते हैं, वो ये था कि सृजन के लिए जो ब्रह्मा जी उत्तरदायी हैं, उनका विनाश कर देने पर तुल जाते हैं। ब्रह्मा जी कि प्रार्थना पर भगवान विष्णु जागते भी हैं, तो इन राक्षसों का वध आसान नहीं था। उनको समझने-संतुष्ट करने के बाद ही उनका विनाश किया जा सका।
मनुष्यों के साथ भी बिलकुल ऐसा ही है। कहावतों में ही कहा जाता है कि जो माता से भी अधिक प्रेम दर्शाने लगे, उसे डायन समझो। वो खा जाना चाहती है। लगातार कोई निंदा करे तो फिर भी एक बार पहचानना आसान है। जो प्रशंसा ही करता जाए, उसे शत्रु के रूप में पहचान पाना कठिन होगा। फिर भी ये करना तो आवश्यक है। सूटकेस-फ्रिज इत्यादि में बंद होने वाली युवतियों ने माता पिता से ज्यादा, अत्यधिक प्रेम या अत्यधिक प्रशंसा में इसे पहचाना होता तो संभव है कि बच पातीं। लेकिन फिर उन्हें बचपन में धार्मिक ग्रन्थ पढ़वाने पर तो उनके साधू-सन्यासी हो जाने का डर लगा होगा न? इसलिए परिवार ने ऐसा कुछ पढ़ने-सीखने नहीं दिया होगा।
इससे आगे की कहानी में बताया जाता है कि इन राक्षसों के वध से जो मेदा यानि वसा (चर्बी) निकली, उसके कारण पृथ्वी सागर तल से ऊपर आई, दिखने लगी। मेदा से उत्पन्न होने के कारण धरती का एक नाम मेदिनी भी होता है। राक्षसी शरीर के वसा से उत्पन्न होने के कारण धरती अभक्ष्य यानी न खाने योग्य बताई गयी है। न्याय दर्शन में पृथ्वी को सूंघने के गुण से जोड़ा जाता है। जिनकी सूंघने की क्षमता कम हो गयी है, या चली गयी है, उनके लिए डॉक्टर, बागवानी करना एक अच्छा उपाय बताते हैं। मिट्टी खा नहीं सकते लेकिन हाथों-पैरों का जो मिट्टी के साथ स्पर्श बागवानी के दौरान होगा, उससे जिंक की आपूर्ति होगी और सूंघने की क्षमता वापस आएगी।
ऐसा हो सकता है कि डोडो पक्षी के गुण विकसित हो गए हों और शत्रु-मित्र में अंतर करने की क्षमता न बची हो। खतरे को सूंघने की क्षमता का विकास तो जरूरी है! दुर्गा सप्तशती के समाधी नाम के वैश्य की तरह आध्यात्मिक उपलब्धि चाहिए या सुरथ नाम के राजा जैसा सांसारिक उपलब्धियां चाहिए, वो दोनों ही दुर्गा सप्तशती से संभव हैं। दोनों में से कौन सी उपलब्धियां चाहिए, वो भी न पता हो तो अंत में आप “यथायोग्यं तथा कुरु” कहकर वो उत्तरदायित्व भी देवी पर ही छोड़ सकते हैं। #नवरात्रि का समय है। आप सभी को नवरात्रि की शुभकामनाएं!
पर्वत की ऊँची चोटी के लिए संस्कृत में “शिखर”, और उसे धारण करने वाले, यानी पर्वत के लिए “शिखरि” शब्द प्रयुक्त होता है। इसी का स्त्रीलिंग “शिखरिणी” हो जाएगा। इसी शब्द “शिखरिणी” का एक और उपयोग “सुन्दर कन्या” के लिए भी होता है। शिखरिणी संस्कृत काव्य का एक छन्द भी है। इसी शिखरिणी छन्द में आदि शंकराचार्य ने सौंदर्यलहरी की रचना की थी। संस्कृत जानने वालों के लिए, शाक्त उपासकों के लिए या तंत्र की साधना करने वालों के लिए सौन्दर्यलहरी कितना महत्वपूर्ण ग्रन्थ है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसकी पैंतीस से अधिक टीकाएँ, केवल संस्कृत में हैं। हिन्दी-अंग्रेजी भी जोड़ें तो पता नहीं गिनती कहाँ तक जाएगी।
आदि शंकराचार्य के सौन्दर्यलहरी की रचना के साथ भी एक किम्वदंती जुड़ी हुई है। कहते हैं वो एक बार कैलाश पर्वत पर गए और वहां भगवान शिव ने उन्हें सौ श्लोकों वाला एक ग्रन्थ दिया। देवी के अनेक रूपों के वर्णन वाले ग्रन्थ को उपहार में पाकर प्रसन्न आदि शंकराचार्य लौट ही रहे थे कि रास्ते में उन्हें नन्दी मिले। नन्दी ने उनसे ग्रन्थ छीन लेना चाहा और इस क्रम में ग्रन्थ आधा फट गया! आदि शंकराचार्य के पास शुरू के 41 श्लोक रहे और बाकी लेकर नन्दी भाग गए। आदि शंकराचार्य ने वापस जाकर भगवान शंकर को ये बात बताई तो उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं, 41वें से आगे के श्लोकों को देवी की स्तुति में तुम स्वयं ही रच दो!
तो इस तरह तंत्र के साधकों का ये प्रिय ग्रन्थ दो भागों में बंटा हुआ है। पहले 41 श्लोक देवी के महात्म्य से जुड़े हैं और आनन्दलहरी के नाम से जाने जाते हैं। जहाँ से देवी के सौन्दर्य का बखान है उस 42वें से लेकर सौवें श्लोक को सौन्दर्यलहरी कहते हैं। अब जिस छन्द में ये रचा गया है उस “शिखरिणी” पर वापस चलें तो उसका पहला अर्थ पहाड़ की चोटी बताया जाता है। नन्दा देवी या वैष्णो देवी जैसी जगहों के बारे में सुना हो तो याद आ जायेगा कि देवी को पर्वत की चोटी पर रहने वाली भी बताया जाता है। दूसरे हिस्से के लिए अगर “शिखरिणी” का दूसरा अर्थ सुन्दर कन्या लें, तो नवरात्र में कन्या पूजन भी याद आ जायेगा।
एंथ्रोपोलॉजिस्ट यानि मानवविज्ञानी जब धर्म का अध्ययन करते हैं तो उसे दो भागों में बांटने की कोशिश करते हैं। रिलिजन या मजहब के लिए संभवतः ये तरीका आसान होगा। वृहत (ग्रेटर) धारा में वो उस हिस्से को डालते हैं जिसमें सब कुछ लिखित हो और उस लिखे हुए को पढ़ने, समझने और समझाने के लिए कुछ ख़ास लोग नियुक्त हों। छोटी (लिटिल) धारा उसे कहते हैं जो लोकव्यवहार में हो, उसके लिखित ग्रन्थ नहीं होते और कोई शिक्षक भी नियुक्त नहीं किये जाते। भारत में धर्म की शाक्त परम्पराओं में ये वर्गीकरण काम नहीं करता क्योंकि आदि शंकराचार्य को किसी ने “नियुक्त” नहीं किया था। रामकृष्ण परमहंस या बाम-खेपा जैसे शाक्त उपासकों को देखें तो बांग्ला में “खेपा” का मतलब पागल होता है। इससे उनके सम्मान में कोई कमी भी नहीं आती, ना ही उनकी उपासना पद्दति कमतर या छोटी होती है।
तंत्र में कई यंत्र भी प्रयोग में आते हैं। ऐसे यंत्रों में सबसे आसानी से शायद श्री यंत्र को पहचाना जा सकता है। सौन्दर्यलहरी के 32-33वें श्लोक इसी श्री यंत्र से जुड़े हैं। साधकों के लिए इस ग्रन्थ का हर श्लोक किसी न किसी यंत्र से जुड़ा है, जिसमें से कुछ आम लोगों के लिए भी परिचित हैं, कुछ विशेष हैं, सबको मालूम नहीं होते। शिव और शक्ति के बीच कोई भेद न होने के कारण ये अद्वैत का ग्रन्थ भी होता है। ये त्रिपुर-सुंदरी रूप की उपासना का ग्रन्थ है इसलिए भी सौन्दर्य लहरी है। कई श्लोकों में माता श्रृष्टि और विनाश का आदेश देने की क्षमता के रूप में विद्यमान हैं।
इसके अंतिम के तीन-चार श्लोक (सौवें के बाद के) जो आज मिलते हैं, उन्हें बाद के विद्वानों का जोड़ा हुआ माना जाता है। उत्तर भारत में जैसे दुर्गा-सप्तशती का पाठ होता है वैसे ही दक्षिण में सौन्दर्यलहरी का पाठ होता है। शायद यही वजह होगी कि इसपर हिन्दी में कम लिखा गया है। इसपर दो अच्छे (अंग्रेजी) प्रचलित ग्रन्थ जो हाल के समय में लिखे गए हैं उनमें से एक रामकृष्ण मिशन के प्रकाशन से आता है और दूसरा बिहार योग केंद्र (मुंगेर) का है। दक्षिण और उत्तर में एक अंतर समझना हो तो ये भी दिखेगा कि सौन्दर्यलहरी में श्लोकों की व्याख्या और सम्बन्ध बताया जाता है। श्लोक का स्वरुप, उसके प्रयोग या अर्थ से जुड़ी ऐसी व्याख्या वाले ग्रन्थ दुर्गा सप्तशती के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं हैं।
बाकी आस पास के रामकृष्ण मिशन या दूसरे जो भी योग अथवा संस्कृत विद्यालय हों, वहां तक जाकर भी देखिये। संस्कृति को जीवित रखना समाज का ही कर्तव्य है।
#नवरात्र #चैत्र
✍🏻आनन्द कुमार जी की पोस्टों से संग्रहित
