E20 भी, EV भी… आखिर क्या है सरकार का प्लान, एक साथ दोनों पर क्यों हो रहा काम?

देश में E20 पेट्रोल का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV) को भी तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है. ऐसे में कई के मन में सवाल उठता है कि जब भविष्य इलेक्ट्रिक वाहनों का है तो फिर E20 पर इतना जोर क्यों है. वहीं, अगर एथेनॉल मिश्रित ईंधन को बढ़ावा दे रहे हैं तो EV पर बड़े पैमाने पर निवेश की क्या जरूरत है. दरअसल, दोनों का उद्देश्य अलग है और इसी से भारत अभी दोनों तकनीकों पर एक साथ काम कर रहा है.

नई दिल्ली 07 जुलाई 2026.भारत का ट्रांसपोर्ट सेक्टर इस समय परिवर्तनशील युग में है,जो क्लीन-मोबिलिटी के दो अलग-अलग विकल्प आधारित है. पहला विकल्प E20 पेट्रोल (20 परसेंट एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) का है और दूसरा बैटरी संचालित इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) का है. मौजूदा राष्ट्रीय नीति इन दोनों में से किसी एक की बजाय इन्हें एक क्रमिक, ‘ट्विन-ट्रैक’ यानी दोहरे रास्ते की रणनीति के रूप में देखती है.

पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने से कच्चे तेल की खपत कम होती है.

इस रणनीति में E20 ईंधन ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक तुरंत राहत देने वाले साधन के रूप में काम कर रहा है, जबकि इलेक्ट्रिक वाहनों को कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए अंतिम दीर्घकालिक (लॉन्ग-टर्म) समाधान के रूप में रखा गया है. वैश्विक ऊर्जा बाजार में हाल ही में आए उतार-चढ़ाव ने इस दोहरे दृष्टिकोण की जरूरत को और बढ़ा दिया है, क्योंकि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 85 परसेंट हिस्सा विदेशों से आयात करता है, जिससे देश पर आर्थिक दबाव हमेशा बना रहता है.

कम समय में E20 को मिली बड़ी कामयाबी
देश में E20 पेट्रोल की शुरुआत को बहुत कम समय में बड़ी सफलता मिली है. भारत ने अपने तय कानूनी शेड्यूल से काफी पहले ही घरेलू ईंधन सप्लाई को पूरी तरह से E20 पेट्रोल पर शिफ्ट कर दिया. इस तेज कदम की वजह से कच्चे तेल के आयात पर होने वाले खर्च में भारी कमी आई है, जिससे देश के 1.4 लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा की बचत हुई है. इसके साथ ही, इस नीति ने कृषि क्षेत्र को एक मजबूत आर्थिक सहारा दिया है, क्योंकि सरप्लस गन्ना, मक्का और खराब हो चुके अनाजों को एथेनॉल उत्पादन के लिए डायवर्ट किया जा रहा है जिससे सीधे तौर पर किसानों को फायदा मिल रहा है.

हालांकि, इन बड़े आर्थिक फायदों के बावजूद जमीनी स्तर पर अनिवार्य E20 रोलआउट के सामने कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं. उपभोक्ताओं के लिए सबसे बड़ी चिंता गाड़ी के माइलेज में आने वाली मामूली गिरावट है, क्योंकि शुद्ध पेट्रोल की तुलना में एथेनॉल में प्रति लीटर ऊर्जा का घनत्व (energy density) कम होता है. ऑटोमोटिव प्रयोगशालाओं के मुताबिक, इंजन के कैलिब्रेशन के आधार पर E20 ईंधन के इस्तेमाल से माइलेज में 3 परसेंट से 6 परसेंट तक की मामूली कमी आ सकती है. इसके अलावा, अप्रैल 2023 के बाद बने वाहन तो इस ईंधन के पूरी तरह अनुकूल हैं, लेकिन पुराने वाहनों के पार्ट्स पर इसका बुरा असर पड़ सकता है क्योंकि एथेनॉल स्वाभाविक रूप से नमी को सोखता है, जिससे सामान्य रबर गास्केट, होज और फ्यूल लाइन सील जल्दी खराब हो सकते हैं।

इलेक्ट्रिक व्हीकल्स: हाई-कैपिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की चुनौती
दूसरी तरफ, इलेक्ट्रिक वाहनों की तरफ कदम बढ़ाना लंबे समय में जीरो-इमिशन (शून्य उत्सर्जन) के लक्ष्य को पूरा करता है, लेकिन इसके लिए बहुत बड़े पूंजी निवेश (कैपिटल इन्वेस्टमेंट) की जरूरत है. पीएम ई-ड्राइव (PM E-DRIVE) योजना और एडवांस केमिस्ट्री सेल बैटरी स्टोरेज के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) जैसे सरकारी प्रयासों के दम पर शहरी इलाकों में ईवी को अपनाने की रफ्तार तेजी से बढ़ी है. सरकार का टैक्स ढांचा भी इसमें बड़ी मदद कर रहा है, जहां पारंपरिक पेट्रोल-डीजल गाड़ियों पर भारी-भरकम 28 परसेंट का जीएसटी (GST) लगता है, वहीं इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर सिर्फ 5 परसेंट की कम जीएसटी दर लागू है।

इसके बावजूद, ईवी सेक्टर में कुछ बड़े ढांचागत गतिरोध (structural bottlenecks) बने हुए हैं. हालांकि देश में इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर और थ्री-व्हीलर के लिए लोकल असेंबली को सफलतापूर्वक जोड़ लिया गया है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण हिस्से यानी बैटरी सेल के निर्माण के लिए सप्लाई चेन अभी भी आयातित रिफाइंड खनिजों पर बहुत ज्यादा निर्भर है. इसके अलावा, सार्वजनिक चार्जिंग नेटवर्क की रफ्तार गाड़ियों की बिक्री की तुलना में अभी भी काफी पीछे है, खासकर छोटे शहरों (टियर-2 और टियर-3) में, जिससे गाड़ी बीच में बंद होने का डर (range anxiety) बना रहता है. ग्रिड क्षमता की सीमाएं और एक यूनिफाइड, इंटरऑपरेबल चार्जिंग पेमेंट कार्ड का न होना भी गैर-कमर्शियल यूजर्स के लिए इसके इस्तेमाल को मुश्किल बनाता है.

बाजार का सच और नीति का तालमेल
आर्थिक और परिवहन मॉडलों के अनुमानों के अनुसार, भारत में पेट्रोल की खपत लगभग 2032 के शुरुआती दौर में अपने चरम (Peak) पर पहुंच सकती है, जिसके बाद बड़े पैमाने पर होने वाले विद्युतीकरण (mass electrification) के कारण इसमें गिरावट आनी शुरू होगी. इसलिए, लंबी अवधि की नीति योजना में इन समय-सीमाओं को बहुत सावधानी से संतुलित करने की जरूरत है. वर्तमान आवश्यकताओं से परे एथेनॉल डिस्टिलरीज (आसवन संयंत्रों) को जरूरत से ज्यादा क्षमता बढ़ाने की योजना बनाने से अगले दो दशकों में वह निवेश फंसी हुई पूंजी (stranded capital assets) में बदल सकता है क्योंकि तब इतने उत्पादन की मांग होगी ही नही।
भारत के लिए रणनीतिक जरूरत यह नहीं है कि वह E20 और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी में से किसी एक को चुने, बल्कि उनके अलग-अलग लाइफसाइकिल को सही तरीके से मैनेज करे. E20 ईंधन मौजूदा पारंपरिक वाहनों के बेड़े से तत्काल कार्बन उत्सर्जन घटाने और वित्तीय राहत देने में एक जरूरी अंतरिम पुल (transitional bridge) का काम कर रहा है. इसके साथ ही, देश को घरेलू बैटरी सेल निर्माण और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को आक्रामक तरीके से बढ़ाना जारी रखना होगा, ताकि जब भविष्य में लिक्विड फ्यूल का बाजार सिकुड़े,तो भारत एक परिपक्व इलेक्ट्रिक मोबिलिटी इकोसिस्टम की ओर पूरी तरह तैयार होकर कदम बढ़ा सके.

(Originally written by: Pathikrit Sen Gupta)

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