डीप टेक मैटलर्जी

 

India Missed The Bus On Ai Zoho Founder Sridhar Vembu Opinion On Investor View Said We Will Happily Take The Other Side
‘भारत ने मौका गंवा दिया… 10-15 साल में सब पता चल जाएगा’, श्रीधर वेम्बु ने कहा- विपरीत दांव लगाने को तैयार
Zoho फाउंडर श्रीधर वेम्बु ने एआई को लेकर भारत की मौजूदा स्थिति पर निवेशक दृष्टिकोण  से उलट बात की है। निवेशकों को लगता है कि भारत के टेक सेक्टर का भविष्य फीका है। हालांकि श्रीधर वेम्बु ने कहा है कि वह इस सोच के विपरीत दांव लगाने को तैयार हैं। वेम्बु ने डीप-टेक का उदाहरण दिया है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के क्षेत्र में दुनिया की दिग्गज कंपनियां बड़े पैमाने पर निवेश कर रही हैं और भारत की मौजूदा स्थिति को लेकर निवेशकों में बहुत उत्साह नहीं है। उन्हें लगता है कि यहां के टेक सेक्टर का भविष्य थोड़ा फीका है। हालांकि जोहो के फाउंडर श्रीधर वेम्बु ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में जो बात कही है, वह एक दूसरे पहलू को भी दिखाती है। निवेशकों की यह सोच कि भारत ने मौका गंवा दिया है। श्रीधर वेम्बु ने डीप-टेक की बात करते हुए कहा है कि अगले 10 से 15 साल में सबकुछ पता चल जाएगा। उनका मानना है कि निवेशकों की सोच से उलट हम विपरीत दांव लगाने को तैयार हैं। क्या कुछ कहा है श्रीधर वेम्बु ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में, आइए जानते हैं।

श्रीधर वेम्बु ने डीप-टेक की बात करते हुए कहा है कि अगले 10 से 15 साल में सबकुछ पता चल जाएगा।

श्रीधर वेम्बु का सोशल मीडिया पोस्ट
श्रीधर वेम्बु का सोशल मीडिया पोस्ट एक न्यूज आर्टिकल को आधार बनाता है, जिसमें एआई को लेकर मौजूदा वैश्विक माहौल की बात की गई है। इस पर श्रीधर वेम्बु ने लिखा कि अमेरिका में AI को लेकर एक अलग ही दीवानगी है। वहां कंपनियों में इस पर पानी की तरह पैसा बहाने यानी भारी निवेश की होड़ मची है। इस होड़ के कारण सप्लायर्स जैसे- चिप बनाने वाली कंपनियां बंपर कमाई कर रही हैं, जबकि खरीदार पैसा चुका रहे हैं। इससे कंपनियों की मार्केट वैल्यू आसमान छू रही है।

दूसरी तरफ, विदेशी निवेशकों का भारत को लेकर मानना है कि भारत एआई (AI) की रेस में पीछे छूट गया है और यहां के टेक सेक्टर का भविष्य थोड़ा फीका है। लेकिन हम इस सोच के बिल्कुल विपरीत दांव लगाने को तैयार हैं। हम एआई कंपनियों द्वारा किए जा रहे अंधाधुंध खर्च (कैश बर्न) के पीछे नहीं भागना चाहते। हम भारत में ‘बोरिंग’ लगने वाले डीप-टेक (Deep Tech) सेक्टर्स में लंबी अवधि के लिए निवेश कर रहे हैं। अगले 10-15 साल में पता चल जाएगा कि हमारा सही था या गलत।

समझदार लोग कभी भी मार्केट हाइप या इंस्टेंट ट्रेंड्स के पीछे नहीं भागते। वो पता लगाते हैं कि आज कौन सी जरूरी चीज ‘आउट ऑफ फैशन’ है और भविष्य में काम आ सकती है। – श्रीधर वेम्बु, जोहो फाउंडर

श्रीधर वेम्बु के पोस्ट का मतलब
श्रीधर वेम्बु ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट से यह बताना चाहा है कि मौजूदा समय में भले ही भारत की कार्यशैली एआई को लेकर उतनी एक्टिव ना दिखती हो, लेकिन इससे भविष्य का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
भारत डीप टेक में काम करके अपने लिए टिकाऊ और मजबूत रास्ता चुन सकता है। डीप टेक का एक भाग मेटलर्जी (Metallurgy) भी है।
आसान भाषा में इसे मेटल इंडस्ट्री से जोड़ सकते हैं जिसमें जमीन से निकलने वाले मेटल्स को रिफाइन करके अलग-अलग कामों में उपयोग करने के लिए तैयार किया जाता है।
भविष्य में सेमीकंडक्टर से लेकर इलेक्ट्रिक वीकल्स के क्षेत्र में मेटलर्जी का उपयोग बहुत अधिक होना है। श्रीधर वेम्बु ने अपने पोस्ट में इसे एक सुनहरा अवसर बताया है।
डीप टेक से तात्पर्य उन अत्याधुनिक और अक्सर क्रांतिकारी तकनीकों से है जो गहन वैज्ञानिक खोजों, इंजीनियरिंग नवाचारों या अनुसंधान क्षेत्रों में हुई प्रगति पर आधारित हैं और जिनमें उद्योगों, अर्थव्यवस्थाओं और जीवन को मौलिक रूप से बदलने की क्षमता है।

डीप टेक मेटलर्जी (Deep Tech Metallurgy) का तात्पर्य धातु विज्ञान (धातुओं के निष्कर्षण,शोधन और निर्माण) में गहन वैज्ञानिक अनुसंधान,आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और उन्नत इंजीनियरिंग के उपयोग से है。यह पारंपरिक खनन या धातु ढलाई से बहुत अलग है और उच्च तकनीकी चुनौतियों व बड़े निवेश पर आधारित है。

यह आधुनिक तकनीकी दुनिया में क्यों अत्यंत महत्वपूर्ण है, इसके प्रमुख पहलू निम्नलिखित हैं:इलेक्ट्रिक व्हीकल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स: इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) की बैटरियों और कंप्यूटर चिप्स के लिए ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ (जैसे लिथियम, कोबाल्ट, और रेयर-अर्थ मेटल्स) की रिफाइनिंग डीप टेक मेटलर्जी के बिना संभव नहीं है。
मटीरियल साइंस (सामग्री विज्ञान): एयरोस्पेस (रॉकेट और विमान), रक्षा, और सेमीकंडक्टर उद्योगों के लिए अत्यंत हल्की और मजबूत धातुओं या मिश्र धातुओं (Alloys) का निर्माण इसी क्षेत्र में आता है।
कार्बन उत्सर्जन में कमी (Green Metallurgy): पारंपरिक धातु भट्टियां बहुत प्रदूषण करती हैं। डीप टेक मेटलर्जी के जरिए ‘ग्रीन स्टील’ और कम कार्बन वाले मेटल उत्पादन की नई तकनीकों पर काम हो रहा है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सिमुलेशन: धातुओं के गुणों में सुधार करने और नए मिश्र धातु बनाने के लिए लैब में भौतिक परीक्षण करने के बजाय AI और क्वांटम कंप्यूटिंग का उपयोग किया जा रहा है, जिससे समय और लागत दोनों बचती हैं।
यह क्षेत्र भारत जैसे देशों के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि सेमीकंडक्टर से लेकर ऊर्जा परिवर्तन तक की सफलता इसी पर निर्भर करती है。

डीप टेक मेटलर्जी में नैनो-मटीरियल और पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। इसमें ‘ग्रीन सिंथेसिस’ और ‘डीप यूटेक्टिक सॉल्वैंट्स’ (DES) के जरिए पर्यावरण के अनुकूल नैनोकण बनाना और औद्योगिक अपशिष्ट (जैसे भारी धातुएं) साफ करने के लिए नैनो-अधिशोषकों का उपयोग शामिल है।डीप टेक मेटलर्जी (Deep Tech Metallurgy) के अंतर्गत नैनो-मटीरियल और पर्यावरण-अनुकूल (Eco-friendly) तकनीकों के ये रहे  प्रमुख पक्ष:

1. ग्रीन नैनो-मटीरियल (Green Nanomaterials)पौधों और सूक्ष्मजीवों का उपयोग: पारंपरिक और जहरीले रासायनिक तरीकों की जगह पौधों के अर्क, बैक्टीरिया और कवक का उपयोग करके नैनो-कण (Metal-based Nanoparticles) तैयार किए जा रहे हैं।

नैनो-कोटिंग्स: धातुओं पर नैनो-स्केल की सुरक्षात्मक परतें (जैसे डायमंड-जैसे कार्बन) चढ़ाई जा रही हैं, जिससे एयरोस्पेस और ऑटोमोटिव पुर्जों की क्षमता और उम्र कई गुना बढ़ जाती है।

2. पर्यावरण-अनुकूल तकनीकें (Eco-friendly Tech)पानी की सफाई (फाइटोरेमेडिएशन): खदानों के अपशिष्ट जल से खतरनाक भारी धातुओं को निकालने के लिए ‘नैनो-एलम’ जैसे नैनो-कणों का निर्माण और उपयोग हो रहा है।

अपशिष्ट जल शोधन (Wastewater Treatment): नैनो-तकनीक आधारित उन्नत फिल्टर और सोखने वाले पदार्थों (Adsorbents) के जरिए पानी से विषैले रंग और क्रोमियम जैसी भारी धातुओं को अलग किया जा रहा है।

3. अनुसंधान और नवाचार (Research & Innovation)डीप यूटेक्टिक सॉल्वैंट्स (DES): कम जहरीले, सस्ते और पर्यावरण-अनुकूल सॉल्वैंट्स का उपयोग करके नैनो-मटीरियल के गुणों को संशोधित (Functionalize) किया जा रहा है।

ऊर्जा संक्रमण: बैटरी धातुओं और दुर्लभ पृथ्वी तत्वों (Rare Earth elements) के निष्कर्षण को टिकाऊ और कम कार्बन-उत्सर्जन वाला बनाने के लिए नई धातुकर्म प्रक्रियाओं पर शोध जारी है।

 

निम्न आलेख 11/09/2024 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित “India’s march towards deep tech” लेख आधारित है। इसमें भारत के पारंपरिक सॉफ्टवेयर से ‘डीप टेक’ की ओर आगे बढ़ने की चर्चा है, जो जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य देखभाल जैसी वैश्विक चुनौतियों के समाधान की आवश्यकता से प्रेरित है। भारत सरकारी समर्थन और उन्नत स्टार्ट-अप परितंत्र से वैश्विक डीप-टेक परिदृश्य में अग्रणी भूमिका निभाने को तैयार हो है।

 

भारत का तकनीकी परिदृश्य पारंपरिक रूप से सॉफ्टवेयर और उपभोक्ता इंटरनेट पर केंद्रित रहा है। हालाँकि जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य सेवा जैसी वैश्विक चुनौतियों के समाधान की बढ़ती आवश्यकता ने उसे ‘डीप टेक’ (deep tech) की ओर आगे बढ़ने के लिये प्रेरित किया है। ये अत्याधुनिक स्टार्ट-अप अभूतपूर्व समाधान (solutions) के सृजन के लिये वैज्ञानिक खोज और इंजीनियरिंग नवाचार का लाभ उठा रहे हैं।

भारतीय नवाचार की यह नई लहर AI, रोबोटिक्स और जैव प्रौद्योगिकी जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों के साथ जटिल समस्याओं को संबोधित कर रही है। अंतरिक्ष प्रक्षेपण से संबद्ध स्काईरूट एरोस्पेस (Skyroot Aerospace) और ड्रोन से संबद्ध आईडिया फोर्ज (Idea Forge) जैसे स्टार्ट-अप ऐसे अग्रणी समाधान विकसित कर रहे हैं, जिनमें कभी स्थापित अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों का वर्चस्व रहा था। राष्ट्रीय डीप टेक स्टार्ट-अप नीति (Deep Tech Startup Policy) और शोध संस्थानों के लिये वित्तपोषण में वृद्धि जैसी पहलों के साथ सरकार भी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इस समर्थनकारी पारितंत्र के साथ भारत की सुदृढ़ STEM शिक्षा और जीवंत स्टार्ट-अप संस्कृति देश को वैश्विक डीप टेक दौड़ में नेतृत्वकारी भूमिका निभा सकने के लिये तैयार कर रही है। जबकि चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं, जैसे विनियमन संबंधी चुनौतियों के बीच आगे बढ़ना और प्रतिभा को आकर्षित करना, लेकिन डीप टेक की दिशा में भारत के प्रयास देश को नवाचार में अग्रणी बनाने की व्यापक क्षमता रखते हैं।

डीप टेक (Deep Tech) क्या है?
परिचय: ‘डीप टेक’ या ‘डीप टेक्नोलॉजी’ वैज्ञानिक खोजों और इंजीनियरिंग सफलताओं से प्रेरित है, जो सैद्धांतिक अवधारणाओं को वास्तविक दुनिया के अनुप्रयोगों में साकार करती है।
वृद्धिशील सुधारों पर केंद्रित पारंपरिक तकनीक के विपरीत डीप टेक उद्यम प्रतिस्पर्द्धात्मक लाभ के लिये अभिनव प्रौद्योगिकियों का लाभ उठाते हैं, जिसके लिये प्रायः सुदीर्घ एवं अनिश्चित अनुसंधान एवं विकास (R&D) प्रक्रियाओं से गुज़रते हैं।
डीप टेक की मुख्य विशेषताएँ:
वैज्ञानिक गहनता: आधारभूत वैज्ञानिक खोजों या इंजीनियरिंग नवाचारों में निहित।
सुदीर्घ अनुसंधान एवं विकास चक्र: डीप टेक के लिये आमतौर पर अनुसंधान एवं विकास की विस्तारित समयावधि आवश्यक होती है।
उच्च पूंजी गहनता: सामान्यतः विशिष्ट उपकरण और प्रतिभा में पर्याप्त पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है।
विघटनकारी प्रभाव की क्षमता: इसमें नए बाज़ार के सृजन या मौजूदा बाज़ारों को व्यापक रूप से रूपांतरित करने की सक्षमता होती है।
डीप टेक के मुख्य क्षेत्र: AI एवं मशीन लर्निंग, रोबोटिक्स एवं ऑटोमेशन, क्वांटम कंप्यूटिंग, बायोटेक्नोलॉजी एवं सिंथेटिक बायोलॉजी, एडवांस्ड मैटेरियल्स साइंस, नैनोटेक्नोलॉजी, ब्लॉकचेन और डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर टेक्नोलॉजी आदि।

डीप टेक में भारत की स्थिति: भारत वर्तमान में अपने 3,600 स्टार्ट-अप्स के साथ (जिन्हें वर्ष 2023 में 850 मिलियन अमेरिकी डॉलर का वित्तपोषण प्राप्त हुआ) वैश्विक स्तर पर शीर्ष 9 डीप टेक पारितंत्रों में छठे स्थान पर है।
संस्थापक और निवेशक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) पर सबसे अधिक ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, जहाँ वर्ष 2023 में 74% नए डीप टेक स्टार्ट-अप्स AI पर केंद्रित थे, जबकि वित्तपोषित स्टार्ट-अप के 86% AI पर केंद्रित थे।
पेटेंट फाइलिंग में भी AI का ही वर्चस्व है, जो सभी डीप टेक पेटेंटों में 41% हिस्सेदारी रखता है।
भारत में डीप टेक के विकास के प्रोत्साहक प्रमुख कारक
सरकार का नीतिगत प्रोत्साहन: भारत सरकार की अग्रसक्रिय नीतियाँ डीप टेक के विकास को बढ़ावा देने में सहायक रही हैं।
8,000 करोड़ रुपए के बजटीय परिव्यय के साथ लॉन्च किया गया क्वांटम प्रौद्योगिकी और अनुप्रयोग पर राष्ट्रीय मिशन (National Mission on Quantum Technologies and Applications) इस प्रतिबद्धता की पुष्टि करता है।
राष्ट्रीय डीप टेक स्टार्ट-अप नीति 2023 का मसौदा प्रौद्योगिकीय विकास में तेज़ी लाने और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ाने पर लक्षित है।
अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF) अपनी 1 लाख करोड़ रुपए की निधि के साथ विभिन्न क्षेत्रों में अनुसंधान में भारी निवेश कर रहा है।
इन पहलों से डीप टेक नवाचार के लिये अनुकूल वातावरण का निर्माण होता है, जहाँ वे वित्तीय समर्थन और ऐसे नियामक ढाँचे प्रदान करते हैं जो प्रयोग करने और जोखिम उठाने को प्रोत्साहित करते हैं।
उद्यम पूंजी निवेश में वृद्धि: वर्तमान में डीप टेक वैश्विक वार्षिक उद्यम पूंजी निवेश में लगभग 20% की हिस्सेदारी रखती है, जो कि एक दशक पहले 10% थी।
अकेले 2023 में ही, आर्थिक मंदी के बावजूद, डीप टेक स्टार्ट-अप्स ने वैश्विक स्तर पर लगभग 40 बिलियन अमेरिकी डॉलर जुटाए।
यह प्रवृत्ति भारत में भी दिखाई देती है, जहाँ Observe.AI जैसी कंपनियों ने अपने कंवर्सेशनल इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म के लिये 214 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक की धनराशि जुटाई है।
दीर्घावधिक और उच्च-जोखिमपूर्ण टेक परियोजनाओं को समर्थन देने में निवेशकों की बढ़ती रुचि एक परिपक्व पारिस्थितिकी तंत्र और भारत की नवोन्मेषी क्षमताओं में बढ़ते भरोसे का संकेत देती है।
स्वदेशी समाधानों की बढ़ती मांग: आत्मनिर्भरता पर भारत का ज़ोर, विशेष रूप से रक्षा और अंतरिक्ष जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में, स्वदेशी डीप टेक समाधानों की मांग को प्रेरित कर रहा है।
स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) द्वारा वर्ष 2022 में विक्रम-S रॉकेट का सफल प्रक्षेपण इस प्रवृत्ति को परिलक्षित करता है।
रक्षा एवं सुरक्षा अनुप्रयोगों के लिये आइडियाफोर्ज टेक्नोलॉजी (ideaForge Technology) के उन्नत ड्रोन भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि डीप टेक क्षेत्र के स्टार्ट-अप्स द्वारा महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय आवश्यकताओं की पूर्ति की जा रही है।
यह मांग न केवल डीप टेक नवाचारों के लिये एक तैयार बाज़ार उपलब्ध कराती है, बल्कि भारत की विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों के विकास को भी प्रोत्साहन देती है।
सशक्त STEM प्रतिभा पूल: विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (Science, Technology, Engineering, and Mathematics- STEM) शिक्षा में भारत का मज़बूत आधार डीप टेक नवाचार के लिये एक समृद्ध प्रतिभा पूल प्रदान करता है।
प्रतिवर्ष 1.5 मिलियन से अधिक इंजीनियरिंग स्नातकों के साथ भारत के पास तकनीकी विशेषज्ञता का व्यापक भंडार मौजूद है।
चुनौती इसमें निहित है कि इस प्रतिभा को किस प्रकार बनाए रखा जाए और इन्हें डीप टेक उद्यमिता की ओर आगे बढ़ाया जाए। उद्योग-अकादमिक सहयोग में वृद्धि के साथ इस चुनौती को संबोधित करने का प्रयास किया जा रहा है।
बड़ी चुनौतियों के समाधान पर फोकस: भारत में डीप टेक स्टार्ट-अप्स स्वास्थ्य सेवा, जलवायु परिवर्तन और संवहनीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों की बड़ी चुनौतियों के समाधान पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
बायोकॉन (Biocon) और सिंजिन (Syngene) जैसी बायोटेक कंपनियाँ जीनोमिक्स एवं वैयक्तिक चिकित्सा अनुसंधान में अग्रणी स्थान रखती हैं।
इलेक्ट्रिक मोबिलिटी समाधानों पर सेल प्रोपल्शन (Cell Propulsion) का कार्य परिवहन और पर्यावरण संबंधी चुनौतियों को संबोधित करता है।
उच्च प्रभावपूर्ण एवं दीर्घकालिक समाधानों पर यह केंद्रित ध्यान न केवल प्रतिभा और निवेश को आकर्षित करता है, बल्कि भारतीय डीप टेक स्टार्ट-अप्स को वैश्विक समस्या समाधानकर्ता के रूप में स्थापित भी करता है, जिससे उनकी प्रासंगिकता और बाज़ार क्षमता में वृद्धि होती है।
भारत में डीप टेक क्षेत्र के विकास की राह की प्रमुख बाधाएँ
सुदीर्घ परियोजना अवधि की पहेली (Long Gestation Conundrum): डीप टेक नवाचारों को प्रायः वाणिज्यीकरण से अनुसंधान एवं विकास की सुदीर्घ अवधि की आवश्यकता होती है।
यह सुदीर्घ परियोजना अवधि अधिकांश उद्यम पूंजी फर्मों के सामान्य 3-5 वर्ष के निवेश दायरे से टकराव रखती है, जिससे डीप टेक स्टार्ट-अप्स के लिये वित्तपोषण अंतराल उत्पन्न होता है।
विकास समयसीमा और निवेशकों की अपेक्षाओं के बीच यह असंगति या तालमेल की कमी नवाचार को, विशेष रूप से जैव प्रौद्योगिकी एवं उन्नत सामग्री जैसे पूंजी-गहन क्षेत्रों में, बाधित कर सकती है।
प्रतिभा की रस्साकशी (Talent Tug-of-War): हालाँकि भारत बड़ी संख्या में STEM स्नातकों का उत्पादन करता है, लेकिन गहन प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में विशेषज्ञ प्रतिभाओं की व्यापक कमी पाई जाती है।
केवल 3% इंजीनियर ही AI, मशीन लर्निंग, डेटा विज्ञान और मोबाइल विकास जैसे क्षेत्रों में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी कौशल रखते हैं।
अत्याधुनिक नौकरियों में रोज़गार-योग्यता (employability) औसतन 1.7% आँकी गई है।
वैश्विक तकनीकी केंद्रों (tech hubs) की ओर प्रतिभा पलायन (brain drain) इस मुद्दे की गंभीरता को और बढ़ा देता है। अप्रैल 2022 और मार्च 2023 के बीच कनाडा आने वाले वैश्विक टेक इंडस्ट्री कर्मकारों में सबसे बड़ा समूह भारतीयों का था।
प्रतिभा की कमी के कारण अनुसंधान एवं विकास के प्रयास धीमे हो जाते हैं और डीप टेक क्षेत्र के स्टार्ट-अप्स के लिये नवाचार की लागत बढ़ जाती है।
विनियामक भूलभुलैया (Regulatory Labyrinth): डीप टेक प्रायः प्रौद्योगिकी के अत्याधुनिक स्तर पर कार्यरत होता है, जहाँ विनियमन या तो मौजूद ही नहीं होते या तेज़ी से उभर रहे होते हैं।
उदाहरण के लिये, भारत द्वारा वर्ष 2018 और 2021 के बीच ड्रोन नीति तैयार किये जाने के दौरान ड्रोन निर्माताओं को लगातार बदलते नियमों का सामना करना पड़ा।
‘जीन एडिटिंग’ या AI जैसे उभरते क्षेत्रों में स्पष्ट नियामक ढाँचे का अभाव स्टार्ट-अप्स के लिये अनिश्चितता पैदा करता है।
यह नियामक अस्पष्टता निवेश को बाधित कर सकती है और नवीन प्रौद्योगिकियों के अंगीकरण की प्रक्रिया को मंद कर सकती है।
बाज़ार की तैयारियों से असंगति (Market Readiness Mismatch): कई डीप टेक नवाचार इतने उन्नत होते हैं कि वे बाज़ार की तैयारी के दायरे से आगे निकल जाते हैं, जिससे उनके अंगीकरण की चुनौती उत्पन्न होती है।
उदाहरण के लिये, जबकि BosonQ Psi जैसी क्वांटम कंप्यूटिंग क्षेत्र के स्टार्ट-अप व्यापक प्रगति कर रहे हैं, लेकिन भारत में क्वांटम समाधानों का बाज़ार अभी भी नवजात अवस्था में है।
नवाचार और अंगीकरण में यह अंतराल ‘पहले मुर्गी आई या पहले अंडा आया की प्रायोगिक समस्या’ (chicken and egg problem) हो सकता है, जहाँ बाज़ार में आकर्षण की कमी भविष्य के निवेश को रोकती है, जबकि निवेश की कमी बाज़ार का विकास मंद कर देती है।
अवसंरचना की कमी: डीप टेक अनुसंधान को प्रायः विशिष्ट अवसंरचना और परीक्षण सुविधाओं की आवश्यकता होती है।
भारत विश्व के 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य की कंप्यूटर अवसंरचना में 2% से भी कम की हिस्सेदारी रखता है, जो कि अमेरिका और चीन जैसे देशों की तुलना में कई गुना कम है, जो संयुक्त रूप से लगभग 60% हिस्सेदारी रखते हैं।
इस तरह की अवसंरचना की कमी से न केवल स्टार्ट-अप्स की लागत बढ़ती है, बल्कि नवाचार की गति भी धीमी हो जाती है।
जबकि राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन जैसी पहलें कुछ अंतरालों को दूर करने का प्रयास करती हैं, फिर भी अवसंरचना की कमी विभिन्न डीप टेक क्षेत्रों में गंभीर बाधा बनी हुई है।
बौद्धिक संपदा संबंधी चुनौतियाँ: बौद्धिक संपदा (IP) को सुरक्षित रखना और उसका बचाव करना डीप टेक स्टार्ट-अप्स के लिये महत्त्वपूर्ण है, लेकिन भारत में यह एक जटिल चुनौती बनी हुई है।
विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (World Intellectual Property Organization) की वर्ष 2023 की रिपोर्ट में भारत को नवाचार में वैश्विक स्तर पर 40वाँ स्थान दिया गया, जो सुदृढ़ बौद्धिक संपदा संरक्षण की आवश्यकता को उजागर करता है।
वैश्विक पेटेंट फाइलिंग एवं प्रवर्तन की उच्च लागत और भारत में अपेक्षाकृत सुस्त पेटेंट अनुदान प्रक्रिया (जो अमेरिका में 23 माह की तुलना में औसतन 58 माह है) के कारण भारतीय डीप टेक स्टार्ट-अप्स वैश्विक नवाचार दौड़ में अलाभ की स्थिति का सामना कर सकते हैं।
वित्तपोषण की कमी: नैसकॉम (NASSCOM) और ज़िनोव (Zinnov) की रिपोर्ट से पता चलता है कि वर्ष 2023 में भारतीय डीप टेक स्टार्ट-अप्स के लिये वित्तपोषण में 77% की गिरावट आई, जहाँ कुल निवेश घटकर 850 मिलियन अमेरिकी डॉलर रह गया और सौदों की संख्या में 25% की कमी आई।
प्रमुख चुनौतियों में विस्तार के लिये वित्तपोषण सुरक्षित करना, प्रतिभा को आकर्षित करना और वैश्विक विस्तार करना शामिल है।
जून 2022 की तुलना में निवेशक पूल में 60% की कमी आई है, जहाँ बड़े वैश्विक निवेशक विशेष रूप से अनुपस्थित हैं, जिसके कारण निम्न-जोखिमपूर्ण सीड-स्टेज उद्यमों (seed-stage ventures) को प्राथमिकता दी जा रही है।
डीप टेक के विकास में गति लाने के लिये कौन-से उपाय किये जा सकते हैं?
‘डीप टेक क्लस्टर्स’ की स्थापना करना: बोस्टन के केंडल स्क्वायर (Kendall Square) जैसे सफल वैश्विक उदाहरणों से प्रेरणा ग्रहण करते हुए प्रमुख भारतीय शहरों में विशिष्ट डीप टेक क्लस्टर्स का सृजन किया जाए।
ये क्लस्टर्स स्टार्ट-अप्स, अनुसंधान संस्थानों और उद्योग भागीदारों को एक मंच पर ला सकेंगे।
उदाहरण के लिये, बेंगलुरू में AI एवं रोबोटिक्स क्लस्टर की स्थापना की जा सकती है, जबकि हैदराबाद में एयरोस्पेस एवं डिफेंस टेक पर ध्यान केंद्रित किया जा सकता है।
सरकार प्रमुख हितधारकों को आकर्षित करने के लिये कर प्रोत्साहन और सब्सिडीयुक्त अवसंरचना की पेशकश कर सकती है।
इस दृष्टिकोण से सहयोग को बढ़ावा मिलेगा, स्टार्ट-अप्स के लिये अवसंरचना की लागत कम होगी और प्रतिभा एवं संसाधनों का एक विशाल भंडार तैयार होगा।
डीप टेक-केंद्रित उद्यम निधि: सरकार-समर्थित उद्यम निधि (venture funds) स्थापित किये जाएँ, विशेष रूप से डीप टेक के लिये, जिनकी निवेश की अवधि सुदीर्घ हो (7-10 वर्ष) ताकि वे विस्तारित अनुसंधान एवं विकास (R&D) चक्रों के साथ संगत हो सकें।
स्टार्ट-अप्स के लिये फंड ऑफ फंड्स (Fund of Funds for Startups- FFS) के 10,000 करोड़ रुपए का 1% विशेष रूप से डीप टेक उद्यमों को आवंटित किया जा सकता है।
निजी वेंचर कैपिटल फर्मों के साथ साझेदारी कर मिश्रित वित्त मॉडल का सृजन किया जाए, जहां सरकारी निधियाँ निजी निवेशों के जोखिम को कम करती हैं।
यह दृष्टिकोण पूंजी-गहन, लंबी परियोजना अवधि की डीप टेक परियोजनाओं के लिये वित्त पोषण की कमी को पूरा करेगा, जिससे स्काईरूट एयरोस्पेस जैसे अधिकाधिक स्टार्ट-अप्स को अपने नवाचारों को बाज़ार में लाने में मदद मिलेगी।
‘रेगुलरिटी सैंडबॉक्स’ (Regulatory Sandboxes): विभिन्न डीप टेक क्षेत्रों में रेगुलरिटी सैंडबॉक्स को क्रियान्वित किया जाए, ताकि स्टार्ट-अप्स को नियंत्रित वातावरण में सरल विनियमनों के साथ नवाचारों का परीक्षण करने की अनुमति मिल सके।
फिनटेक के लिये RBI के रेगुलरिटी सैंडबॉक्स को AI, बायोटेक्नोलॉजी और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में भी अनुकूलन के साथ अपनाया जा सकता है।
उदाहरण के लिये, स्वचालित वाहनों के लिये एक सैंडबॉक्स ‘एथर एनर्जी’ (Ather Energy) जैसी कंपनियों को निर्दिष्ट क्षेत्रों में उन्नत स्वचालित सुविधाओं का परीक्षण करने की अनुमति दे सकता है।
यह दृष्टिकोण विनियामक स्पष्टता प्रदान करेगा, नई प्रौद्योगिकियों के विकास एवं अंगीकरण को गति प्रदान करेगा और विनियामकों को सूचना-संपन्न नीतियाँ तैयार करने में मदद करेगा।
डीप टेक शिक्षा पहल: स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर विशिष्ट डीप टेक पाठ्यक्रम के निर्माण के लिये शीर्ष IITs और निजी संस्थानों के साथ सहयोग का निर्माण किया जाए।
प्रधानमंत्री रिसर्च फेलोशिप योजना (PMRF) की तरह उभरती प्रौद्योगिकी क्षेत्र में उद्योग-प्रायोजित पीएचडी कार्यक्रम शुरू किया जाए।
यह पहल डीप टेक विशेषज्ञों की संख्या बढ़ाने पर लक्षित हो सकती है, जिससे इस क्षेत्र की कंपनियों (जैसे क्वांटम कंप्यूटिंग में QNu Labs) के समक्ष विद्यमान प्रतिभा की कमी की समस्या को संबोधित किया जा सकता है।
खुले नवाचार प्लेटफॉर्म: प्रमुख डीप टेक क्षेत्रों के लिये राष्ट्रीय खुले नवाचार प्लेटफॉर्म विकसित किये जाएँ, जहाँ स्टार्ट-अप्स, कॉरपोरेट्स और शिक्षाविदों के बीच सहयोग को सुविधाजनक बनाया जाए।
इन्हें ‘ग्लोबल साउथ कोविड-19 डिजिटल इनोवेशन चैलेंज’ जैसी सफल पहलों के अनुरूप तैयार किया जाए।
उदाहरण के लिये, Niramai जैसे स्टार्ट-अप (जो स्तन कैंसर का पता लगाने के लिये AI का उपयोग करता है) को प्रमुख अस्पताल शृंखलाओं और चिकित्सा अनुसंधान संस्थानों के साथ संबद्ध करने में ‘AI फॉर हेल्थकेयर’ जैसा कोई प्लेटफॉर्म महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
यह दृष्टिकोण डीप टेक नवाचारों को वास्तविक दुनिया की समस्याओं के साथ संरेखित करने में मदद करेगा और उन्नत प्रौद्योगिकियों के लिये बाज़ार में आकर्षण पैदा करेगा।
डीप टेक वाणिज्यीकरण कोष: प्रयोगशालाओं से विपणन योग्य उत्पादों तक अनुसंधान के संक्रमण का समर्थन करने के लिये डीप टेक वाणिज्यीकरण कोष (Deep Tech Commercialization Fund) की स्थापना की जाए।
उन्नत सामग्री, जैव प्रौद्योगिकी और ऊर्जा भंडारण जैसे क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करते हुए धन आवंटित किया जाए।
इसे अमेरिकी ऊर्जा विभाग के प्रौद्योगिकी वाणिज्यीकरण कोष (Technology Commercialization Fund) जैसे सफल कार्यक्रमों के आधार पर तैयार किया जा सकता है।
उदाहरण के लिये, यह कोष IISc बैंगलोर की सफल सॉलिड-स्टेट बैटरी प्रौद्योगिकी का वाणिज्यीकरण करने हेतु स्थापित स्टार्ट-अप को सहायता प्रदान कर सकती है।
वैश्विक डीप टेक गठबंधन (Global Deep Tech Alliances): सिलिकॉन वैली, तेल अवीव और सिंगापुर जैसे वैश्विक नवाचार केंद्रों के साथ एक रणनीतिक डीप टेक गठबंधन का निर्माण किया जाए।
द्विपक्षीय नवाचार कोष, संयुक्त अनुसंधान कार्यक्रम और प्रतिभा विनिमय पहल की स्थापना की जाए।
उदाहरण के लिये, क्वांटम प्रौद्योगिकियों पर भारत-इज़राइल द्विपक्षीय कार्यशाला (I2QT-2022) क्वांटम कंप्यूटिंग और क्रिप्टोग्राफी में प्रगति की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है।
निष्कर्ष
भारत का टेक परिदृश्य पारंपरिक सॉफ्टवेयर से डीप टेक की ओर एक व्यापक बदलाव को चिह्नित कर रहा है, जो जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य सेवा जैसी वैश्विक चुनौतियों से प्रेरित है। उभरती चुनौतियों का समाधान करने और क्षेत्र के विकास में गति लाने के लिये, NASSCOM ने एक बहुआयामी रणनीति की अनुशंसा की है, जिसमें नवाचार समूहों को सुदृढ़ करना, पेशेंट कैपिटल एवं कंप्यूटिंग अवसंरचना तक पहुँच बढ़ाना, राष्ट्रीय डीप टेक स्टार्टअप नीति के क्रियान्वयन में गति लाना, IP ढाँचे में सुधार करना और एक सुदृढ़ प्रतिभा पाइपलाइन विकसित करना शामिल है। विभिन्न चुनौतियों के बावजूद, भारत की STEM प्रतिभा और उद्यमशीलता की भावना इन उपायों से समर्थन पाकर डीप टेक नवाचार में देश को अग्रणी भूमिका प्रदान कर सकती है।

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