भू स्वामित्वाधिकार सिद्ध नही होता राजस्व रिकॉर्ड से: सुप्रीम कोर्ट
Land Ownership In India Why Title Documents Matter More Than Revenue Entries
‘Revenue Records जमीन के मालिक होने का सबूत नहीं’ सुप्रीम कोर्ट के नये फैसले का क्या मतलब है
भारत में भूमि विवादों में अक्सर यह गलतफहमी होती है कि पट्टों या किश्तों वाले राजस्व रिकॉर्ड भूमि का मालिकाना हक साबित करते हैं। लेकिन मेरी सलाह है कि अपनी जानकारी दुरुस्त कर लीजिए।
नई दिल्ली: गांव-देहात में जमीन के मालिकाना हक को लेकर तमाम तरह की गलतफहमियां है। आम तौर पर पहले यही लोग मानते हैं कि यदि जमीन के राजस्व रिकार्ड में किसी का नाम है, तो यह लगभग तय होता था कि लोग जमीन का मालिकाना हक उसका ही मानें। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के हाल के एक फैसले ने यह साफ कर दिया है कि ऐसा नहीं हैं।
भूमि विवादों में दस्तावेज़ी प्रमाणों की भूमिका
जमीन के मालिकाना हक से जुड़े विवाद की पृष्ठभूमि
यह मामला तेलंगाना के कलवलानगरम गांव की लगभग 600 एकड़ जमीन से जुड़ा था। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार जिसे 1950 की अधिसूचना के तहत आरक्षित वन क्षेत्र घोषित करने का प्रस्ताव था। लेकिन अपीलकर्ताओं ने दावा किया कि निजाम शासन के दौरान 1931-32 में उन्हें यह जमीन पट्टे में मिली थी । जिसे जुड़े साक्ष्यों के रुप में उन्होंने जमीन से जुड़े राजस्व रिकॉर्ड अदालत को दिखाए थे। माामला अंत में हाईकोर्ट पहुंचा था जहां डिवीजन बेंच ने उनके दावे को खारिज कर दिया और कहा कि केवल राजस्व प्रविष्टियों से स्वामित्व साबित नहीं होता।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और फैसला
राज्य की हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
सुप्रीम कोर्ट में बुधवार 6 मई को जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एसवीएन भट्टी की बेंच के सामने यह मामला आया
इस मामले में जमीन के राजस्व रिकार्ड के अलावे बाकी सभी तथ्यों, साक्ष्यों और दलीलों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि सरकार से राजस्व रिकॉर्ड किए जाने का मूल उद्देश्य तो सिर्फ राजस्व वसूली है। इससे स्वामित्वाधिकार स्थापित नहीं किया जा सकता।
जमीन के मालिकाना हक के मामलों में Mutation या जमाबंदी के रिकार्ड स्वामित्व साबित नहीं करता, न ही वे किसी को भूमि का कानूनी मालिक घोषित कर सकते हैं।
न्यायालय ने मामले को और साफ करते हुए यह भी कहा कि राजस्व का रिकॉर्ड ज्यादा से ज्यादा केवल जमीनी कब्जे की पहचान दे सकते हैं, वह भी तभी जब बाकी कानूनी सबूतों के साथ मेल खाएँ।
संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत हाईकोर्ट का रिट क्षमता में जटिल स्वामित्व विवादों का निर्णय देना उचित नहीं। ऐसे मामलों में, जहां तथ्यात्मक और दस्तावेजी प्रमाणों की जाँच की आवश्यकता होती है, वहाँ सिविल कोर्ट ही उपयुक्त मंच है।
जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एसवीएन भट्टी की बेंच
फिर अंत में शीर्ष अदालत ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले को सही मानते हुए साफ किया कि केवल पहानी, या जमाबंदी, या अन्य किसी तरह की राजस्व प्रविष्टियों के आधार पर भूमि का मालिकाना हक साबित नहीं होता, जब तक कि प्राथमिक शीर्षक दस्तावेज यानि Title से जुड़े मूल कागजात पेश न किए जाएं और अपील खारिज कर दी।
भूमि विवादों में इस फैसले का होगा बड़ा असर
जैसा कि मैंने पहले भी बताया है कि भारत में भूमि विवादों में अक्सर यह गलतफहमी होती है कि पट्टों या किश्तों वाले राजस्व रिकॉर्ड भूमि का मालिकाना हक साबित करते हैं। लेकिन मेरी सलाह है कि अपनी जानकारी दुरुस्त कर लीजिए। आगे से सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की वजह से भूमि या संपत्ति से जुड़े विवादों में आपके पास सही वैध शीर्षक दस्तावेज़ों का होना जरूरी होगा। जैसे कि रजिस्टर्ड बिक्री, उपहार या पार्टीशन से जुड़े मूल दस्तावेज होने जरूरी होंगे। घरों, कृषि भूमि या व्यवसायिक जमीन के मालिकों के लिए केवल राजस्व रिकॉर्ड और इससे जुड़े सबूतों पर भरोसा
