तमिलनाडू खेला:राज्यपाल क्यों नही बुला रहे विजय को? सुको का क्या है निर्देश
तमिलनाडु में खेला अभी खत्म नहीं, चेन्नई से पुडुचेरी तक रिसॉर्ट पॉलिटिक्स; क्या फिर पलटेगी बाजी?
तमिलनाडु चुनाव बाद हंग एसेम्बली से सरकार गठन को राजनीतिक उठापटक जारी है। सबसे बड़ी पार्टी टीवीके बहुमत से दूर है।
नई दिल्ली। तमिलनाडू चुनाव के 4 मई को चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। सी जोसेफ विजय की पार्टी टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी लेकिन उसका सफर रोलरकोस्टर राइड बना है और अभी तक सरकार बनाने को बहुमत नहीं पा सकी है।
4 मई को तमिलनाडु विधानसभा चुनाव परिणाम घोषित होने के तुरंत बाद साफ हो गया कि सी जोसेफ विजय की पार्टी ‘तमिलगा वेट्री कझगम’ (TVK) 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन बहुमत के लिए उसे अभी भी 10 सीटों की जरूरत है। तभी से पर्दे के पीछे जोड़-तोड़ का खेल शुरू हो गया।
शुरू हुआ विधायकों के जोड़-तोड़ का खेल
खबरों के अनुसार, एआईएडीएमके के दो वरिष्ठ नेताओं एस.पी. वेलुमणि और सी.वी. षणमुगम ने एडापड्डी के. पलानीस्वामी को बिना बताए अपनी पार्टी के 47 में से 33 विधायकों को तोड़कर टीवीके की मदद करने की कोशिशें शुरू कर दीं।
चेन्नई में अपने घर से ही अपनी चाल चलते हुए वेलुमणि ने षणमुगम के साथ मिलकर 33 विधायकों को अपने पाले में लाने की योजना बनाई। ऐसा करके वे दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा पार कर लेते और ‘दल-बदल विरोधी कानून’ (anti-defection law) की पकड़ से भी बच जाते।
ठीक उसी समय यानी 4 मई की रात को खबरों के अनुसार ईपीएस ने डीएमके की युवा शाखा के नेता और विधायक उदयनिधि स्टालिन के साथ बातचीत शुरू कर दी। इस बातचीत का मकसद डीएमके और उसके सहयोगी दलों के 74 विधायकों के समर्थन से सरकार बनाना था, ताकि विजय को मुख्यमंत्री बनने से रोका जा सके।
डीएमके के नेताओं ने किया एआईएडीएमके के साथ गठबंधन का समर्थन
इस प्रस्ताव ने जल्द ही जोर पकड़ लिया। कई वरिष्ठ डीएमके नेताओं ने इस कदम का समर्थन किया और निवर्तमान मुख्यमंत्री एमके स्टालिन पर दबाव डाला कि वे अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी एआईएडीएमके के साथ गठबंधन करने पर विचार करें।
इसके साथ ही 4 मई से लेकर 6 मई की दोपहर तक तीन दिनों तक वेलुमणि और शनमुगम ने टीवीके नेताओं बुसी आनंद और आधव अर्जुन के साथ-साथ विजय के चुनावी रणनीतिकार जॉन अरोकियासामी के साथ गहन बातचीत की।
टीवीके सामने रखी गईं ये शर्तें
उन्होंने जो मांगें रखीं, उनमें हर पांच विधायकों के लिए एक मंत्री पद (जो कुल मिलाकर सात बनते हैं) और एक उपमुख्यमंत्री का पद शामिल था। 6 मई को जब कांग्रेस के विधायक समर्थन पत्र लेकर टीवीके के पनैयूर स्थित कार्यालय पहुंचे तो उसके बाद टीवीके की ओर से पूरी तरह चुप्पी छा गई।
VCK, CPI और CPM द्वारा विजय को समर्थन देने के मामले में लगातार टालमटोल किए जाने के बाद टीवीके ने गुरुवार, 7 मई को अपनी चुप्पी तोड़ी और वेलुमणि-शनमुगम के नेतृत्व वाले समूह के साथ बातचीत फिर से शुरू की।
उसी दिन सुबह 11 बजे बुसी आनंद और विजय के दोस्त विष्णु रेड्डी, वेलुमणि से मिले और उनके साथ करीब एक घंटे तक बातचीत की। लेकिन कुछ घंटों बाद, जब CPI और CPM ने विजय को अपना समर्थन देने का ऐलान किया तो टीवीके ने वेलुमणि-षणमुगम के प्रस्ताव के प्रति फिर से ठंडा रवैया अपना लिया।
पलानीस्वामी भी हरकत में आए
6 मई को, पलानीस्वामी भी हरकत में आ गए और उन्होंने एआईएडीएमके के सभी नए चुने गए विधायकों को अपने कैंप ऑफिस में बुलाया। वरिष्ठ नेताओं और पूर्व मंत्रियों के साथ दिन भर चली गहन चर्चाओं के बाद वे वेलुमणि और षणमुगम की उन कोशिशों को नाकाम करने में कामयाब रहे, जिनके तहत वे पार्टी विधायकों को विजय के नेतृत्व में सरकार बनाने के लिए एकजुट करना चाहते थे।
पलानीस्वामी टीवीके को किसी भी तरह का “स्वैच्छिक समर्थन” देने के खिलाफ अपने रुख पर कायम रहे। इसके बाद, उन्होंने पार्टी के उप महासचिव के.पी. मुनुसामी को यह सार्वजनिक रूप से ऐलान करने के लिए भेजा कि “एआईएडीएमके किसी भी हाल में टीवीके को समर्थन नहीं देगी।”
रिसॉर्ट्स में पहुंचे एआईएडीएमके विधायक
एआईएडीएमके के विधायकों को बाद में 6 मई को पुडुचेरी के रिसॉर्ट्स में ले जाया गया और संचार के सभी माध्यमों से काट दिया गया। यह घटना पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता की मृत्यु के बाद सामने आए कुख्यात कूवाथुर रिसॉर्ट प्रकरण की याद दिलाती है।
7 मई को, स्टालिन ने डीएमके विधायकों के साथ विचार-विमर्श किया और उन्हें निर्देश दिया कि पार्टी नेतृत्व अंततः जो भी निर्णय ले वे उसका पालन करें। गुरुवार सुबह सहयोगी दलों सीपीआई, सीपीएम और वीसीके के साथ एक बैठक के दौरान ही स्टालिन ने डीएमके-समर्थित, एआईएडीएमके-नेतृत्व वाली सरकार बनाने का विचार रखा और उनका समर्थन मांगा।
कहा जाता है कि उन्होंने सहयोगी दलों से आग्रह किया कि वे कांग्रेस की तरह अचानक संबंध न तोड़ें, बल्कि डीएमके गठबंधन में ही बने रहें। सहयोगी दलों ने कहा कि वे इस पर विचार करेंगे।
गठबंधन के एक नेता ने कहा, “उन्होंने सहयोगी दलों से कहा कि वे उन्हें सूचित किए बिना कुछ भी न करें। उन्होंने कहा कि वे उन्हें रोकेंगे नहीं।” शुक्रवार रात को, वीसीके प्रमुख थोल थिरुमावलवन ने स्टालिन से उनके सेनोटैफ रोड स्थित आवास पर मुलाकात की, जिसका उद्देश्य संभवतः सौहार्दपूर्ण ढंग से अलग होने पर चर्चा करना था।
विजय को रोकने पर जोर
हालांकि स्टालिन ने सार्वजनिक तौर पर यही कहा कि डीएमके एक मजबूत विपक्ष के तौर पर काम करना पसंद करेगी, लेकिन विजय को सरकार बनाने से रोकने के लिए पर्दे के पीछे जोरदार बातचीत जारी रही। सहयोगी दलों की प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं थी।
जहां तक ईपीएस की बात है, वे विधायकों से मिलने के लिए पुडुचेरी गए और फिर शुक्रवार देर रात चेन्नई लौट आए। आखिरकार, द्रविड़ पार्टियों की योजनाएं परवान नहीं चढ़ पाईं, क्योंकि वामपंथी दलों ने इस प्रस्ताव में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई।
इसके बजाय, वे वीसीके के करीब आ गए और टीवीके को समर्थन देने का फैसला किया। जहां एक तरफ दोनों वामपंथी दलों ने अगली सरकार बनाने की टीवीके की कोशिश में उसे खुलकर समर्थन दिया, वहीं वीसीके ने ‘देखो और इंतजार करो’ की नीति अपनाए रखी। पार्टी ने कहा कि अंतिम फैसला 9 मई की सुबह घोषित किया जाएगा।
देर रात एक और घटनाक्रम देखने को मिला, जब एएमएमके नेता टीटीवी दिनाकरन ने राज्यपाल अर्लेकर से मुलाकात की और मांग की कि ईपीएस को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई जाए।
थलापति विजय को सरकार बनाने का न्योता नहीं दे रहे राज्यपाल, बिहार के मामले में SC ने क्या कहा था?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल को सरकार बनाने के लिए सबसे बड़ी पार्टी या गठबंधन को आमंत्रित करना होता है, और वह बहुमत जुटाने के तरीके की जांच नहीं कर सकता।
टीवीके प्रमुख थलापति विजय।
चुनावों के बाद सरकार बनाने के लिए सबसे बड़ी पार्टी या चुनाव के बाद बने गठबंधन को आमंत्रित करने के अलावा राज्यपाल के पास कोई और विकल्प नहीं होता और वह इस बात की जांच नहीं कर सकता कि सबसे बड़ी पार्टी या गठबंधन ने बहुमत का समर्थन कैसे जुटाया है।
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठों ने 1994 के ऐतिहासिक एस.आर. बोम्मई फैसले से लेकर 2006 के रामेश्वर प्रसाद फैसले तक लगातार यही व्यवस्था दी है।
फैसले में की गई यूपीए सरकार की कड़ी आलोचना
रामेश्वर प्रसाद फैसले में यूपीए सरकार की कड़ी आलोचना की गई थी। यह आलोचना बिहार विधानसभा को भंग करने और राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए की गई थी। यह फैसला तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह की उस रिपोर्ट पर आधारित था, जिसमें कहा गया था कि जेडीयू और बीजेपी के बीच चुनाव-पूर्व कोई गठबंधन नहीं था और उनका एक साथ आना विधायकों की खरीद-फरोख्त (हॉर्स-ट्रेडिंग) की बू देता था।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
बोम्मई फैसले का हवाला देते हुए, 2006 के फैसले में बहुमत ने कहा था, “अगर ऐसे मनगढ़ंत अनुमानों के आधार पर किसी राजनीतिक पार्टी को चुनाव के बाद सरकार बनाने का दावा करने से रोकने वाले कदम को सही मान लिया जाए तो यह हमारे लोकतांत्रिक ताने-बाने को ही खत्म कर देगा।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “अगर विधायकों के बहुमत का समर्थन रखने वाली पार्टी को सरकार बनाने का दावा करने से रोकने के लिए ‘हॉर्स-ट्रेडिंग’ (विधायकों की खरीद-फरोख्त) के मनगढ़ंत दावों को आधार बनाया जाता है तो ‘इस governor president on bills
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‘बहुमत तो सदन के पटल पर ही साबित करना होगा’
अदालत ने ने कहा था, “अगर चुनावों के बाद दो या ज्यादा पार्टियां एक साथ आती हैं तो ऐसी गैर-कानूनी बातों के आधार पर बहुमत के उनके दावे को नकारना मुश्किल हो सकता है। ये ऐसे पहलू हैं जिन्हें राजनीतिक पार्टियों पर छोड़ देना ही बेहतर है, जिन्हें बेशक अपने लिए अच्छे और नैतिक मानक तय करने चाहिए, लेकिन किसी भी हाल में आखिरी फैसला मतदाताओं और विधायिका पर ही छोड़ना होगा, जिसमें विपक्ष के सदस्य भी शामिल होते हैं।”
सरकार बनाने का दावा करने वाली पार्टी या गठबंधन को जिस ‘फ्लोर टेस्ट’ (बहुमत परीक्षण) का सामना करना होता है, उस पर जोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में राष्ट्रपति शासन को रद्द कर दिया था और कहा था, “अंततः बहुमत सदन के पटल पर ही साबित करना होगा।”
बोम्मई मामले में एक बेंच ने चुनी हुई सरकारों को बर्खास्त करने या विधिवत चुनी हुई विधानसभा को भंग करने के लिए राज्यपाल की शक्तियों के दुरुपयोग के प्रति आगाह किया था और कहा था, “इस शक्ति की विशालता ही—जिसके द्वारा विधिवत गठित सरकार को बर्खास्त करके और विधिवत चुनी हुई विधानसभा को भंग करके किसी राज्य की जनता की इच्छा को निरस्त कर दिया जाता है—इसके बार-बार उपयोग या दुरुपयोग (जैसा भी मामला हो) के विरुद्ध एक चेतावनी का काम करना चाहिए। इस शक्ति के हर दुरुपयोग के अपने परिणाम होते हैं, जो शायद तुरंत स्पष्ट न हों, लेकिन कुछ वर्षों बाद एक विकराल रूप में सामने आते हैं।”
