पर्यावरण एक्टिविस्टों को CJI ने दिखाया दर्पण तो……..
जहां दांव लगे, वहीं आप लोग… CJI के कमेंट पर नया बखेड़ा, पूर्व नौकरशाह-एक्टिविस्ट परेशान
नई दिल्ली 26 मई 2026। देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की एक और टिप्पणी पर कोहराम मच गया है। हालांकि, ये टिप्पणी 15 दिन पुरानी है लेकिन विरोध का सिलसिला जारी है। पूर्व सिविल सेवकों, वकीलों, कानूनी और पर्यावरण कार्यकर्ताओं के समूहों ने खुली चिट्ठी लिखकर CJI को सूर्यकांत की उन टिप्पणियों की आलोचना की है, जिनमें उन्होंने “कथित पर्यावरणविदों और कार्यकर्ताओं” के विकास परियोजनाओं में अडंगा लगाने की कोशिशों के बारे में बात की थी।
CJI जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने 11 मई को विकास परियोजनायें रोकने को याचिकाएं दायर करने की प्रवृत्ति की निंदा करते हुए पूछा था कि अगर ऐसी याचिकाएं दायर की जाती रहीं, तो देश कैसे प्रगति करेगा। CJI की पीठ ने तब कहा था, “हमें इस देश में एक भी ऐसी परियोजना दिखाएं, जहां इन तथाकथित पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कहा हो कि हम इस परियोजना का स्वागत करते हैं।” ये टिप्पणियां पीठ ने तब की, जब पीठ राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की पश्चिमी क्षेत्र की पीठ के एक आदेश के खिलाफ याचिका पर सुन रही थी।
गुजरात के पिपावाव बंदरगाह का मामला
इस याचिका में NGT द्वारा गुजरात में पिपावाव बंदरगाह के विस्तार के लिए दी गई पर्यावरण मंज़ूरी (EC) के खिलाफ अपील निरस्त किए जाने को चुनौती दी गई थी। हालांकि, CJI के नेतृत्व वाली पीठ ने इस याचिका पर याचिकाकर्ताओं को आंशिक राहत दी थी। पीठ ने अपने आदेश में कहा था, “हालांकि हम इस से सहमत नहीं हैं कि NGT ने बिना कोई कारण बताए अपील निरस्त कर दी है, फिर भी हम अपीलकर्ता को NGT के सामने पुनर्विचार याचिका दायर करने की आज़ादी देते हैं।” लेकिन सुनवाई में CJI ने जिस तरह की टिप्पणियां कीं, उसका विरोध शुरू हो गया।
हर चीज अदालत में घसीट लाते हैं
CJI ने टिप्पणी करते हुए कहा था, “हमें इस देश में एक भी ऐसी परियोजना दिखाओ, जिसके बारे में ये कथित पर्यावरणविद और कार्यकर्ता कहें कि हम इस परियोजना का स्वागत करते हैं।” उन्होंने आगे कहा, “आप हर चीज़ को अदालत में घसीट लाते हैं। इस देश में जिस तरह की याचिकाएं दायर की जा रही हैं, उनका मकसद सिर्फ विकास को रोकना है। यही समस्या है। देखिए, आप लोग नहीं चाहते कि बंदरगाहों का विस्तार हो। फिर देश कैसे आगे बढ़ेगा?” CJI ने ये भी कहा था, “आप NGT गए, और दुर्भाग्य से इससे आपकी नीयत पर बहुत सारे सवाल खड़े होते हैं। आप किसी भी अधिकारी के पास जाकर यह नहीं बताते कि ‘मैं एक विशेषज्ञ हूँ, मुझे लगता है कि इसमें ये कमियाँ हैं’… अगर आप सचमुच विशेषज्ञ हैं तो। आप कोई RTI कार्यकर्ता हैं, आप कोई फलाँ-फलाँ कार्यकर्ता हैं, पर्यावरणविद हैं, आपके पास बहुत सारी डिग्रियाँ हैं… जहाँ दाँव लगे, वहीं…।”
CJI की इन्हीं टिप्पणियों के विरोध में 22 मई को पूर्व सिविल सेवकों, वकीलों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं के एक मंच, ‘कॉन्स्टिट्यूशन कंडक्ट ग्रुप’ के 71 सदस्यों ने ओपन लेटर लिखकर बताया है कि CJI की टिप्पणियाँ देश में पर्यावरण और संरक्षण से जुड़े सुरक्षा उपायों को कमजोर कर सकती हैं, और निचली अदालतों को भी ऐसा ही रवैया अपनाने के लिए प्रभावित कर सकती हैं।
सिर्फ़ रबर स्टैंप का काम
खुली चिट्ठी में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि “पर्यावरण मंत्रालय द्वारा बनाए गए ज़्यादातर विशेषज्ञ और वैधानिक निकायों में… सिर्फ़ सरकारी या रिटायर्ड सरकारी अधिकारी ही होते हैं और सुप्रीम कोर्ट से गुज़ारिश की गई है कि वह इन मूल्यांकन निकायों पर आँख मूँदकर भरोसा न करे, जो सरकार के लिए सिर्फ़ रबर स्टैंप का काम करते हैं।”
टिप्पणियां वापस लेने की मांग
उसी दिन, देश भर के 600 से ज़्यादा नागरिकों और नागरिक समाज समूहों की हस्ताक्षरित एक और चिट्ठी में कहा गया कि इन टिप्पणियों से “उन नागरिकों को, जो पर्यावरण से जुड़े फ़ैसलों की क़ानूनी जाँच चाहते हैं, एक संदिग्ध वर्ग के तौर पर पेश किए जाने का खतरा है।” इसके अलावा देश के 72 वकीलों, विधि छात्रों, विधि शिक्षकों और कानून की शिक्षा प्राप्त करने वाले कार्यकर्ताओं के एक समूह ने भी प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत को पिछले दिनों एक खुला पत्र लिखकर विकास परियोजनाओं को रोकने के लिए याचिका दायर करने के तरीके पर उच्चतम न्यायालय की हालिया टिप्पणियों को वापस लेने की मांग की है। पत्र में कहा गया है कि ये टिप्पणियां कानून, वैधानिक संस्थाओं और उच्चतम न्यायालय द्वारा दशकों में बनाए गए न्यायशास्त्र के दायरे में पारिस्थितिकी की रक्षा करने वाले संबंधित नागरिकों, समुदायों और समूहों पर गलत आक्षेप वाली हैं।
