पहली बार नही है,शंकराचार्य पद पर विवाद की ये रही परंपरागत
आदि शंकराचार्य के बाद ज्योतिर्मठ सैकड़ों साल तक निष्क्रिय रहा। कोई स्थायी शंकराचार्य नहीं था, परंपरा लगभग टूटी हुई थी। साल 1941 में स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती सामने आते है। उन्हें साधु सन्त, अखाड़े और धर्माचार्य सर्वसम्मति से ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य घोषित करते हैं। 1952 में शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी ने एक हस्तलिखित वसीयत तैयार की, जिसमें उन्होंने अपने शिष्य शांतानंद सरस्वती को उत्तराधिकारी के रूप में नामांकित किया। 12 जून 1953 को शांतानंद सरस्वती को शंकराचार्य घोषित किया गया। शांतानंद सरस्वती पहले शंकराचार्य थे, जिन्होंने पहले गृहस्थ जीवन भी व्यतीत किया था। अर्थात उन्होंने विवाह के बाद सन्यास लिया था। कुछ लोगों ने उनकी नियुक्ति को परंपरा विरुद्ध बताया और ब्रह्मानंद सरस्वती की वसीयत को अस्वीकार कर दिया। कहा गया कि ब्रह्मानंद की वसीयत पारंपरिक नियमों के खिलाफ थी, क्योंकि प्राचीन मठ व्यवस्था में वसीयत का सिद्धांत मौजूद नहीं था। यह भी दावा किया गया कि ब्रह्मानंद की मानसिक स्थिति वसीयत लिखने के समय सक्रिय स्थिति में नहीं थी। विरोधी गुट के इन लोगों ने स्वामी कृष्णबोधाश्रम को ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य घोषित कर दिया। इसके बाद ये मामला कोर्ट चला गया। 1970 में इलाहाबाद सिविल जज ने निर्णय दिया कि शांतानंद सरस्वती की नियुक्ति वैध है, कृष्णबोधाश्रम को शंकराचार्य नही माना जा सकता। शंकराचार्य शांतानंद सरस्वती ज्योतिर्मठ की गद्दी पर विराजे रहते है। इसी बीच सार्वजनिक इंट्री होती है स्वामी स्वरूपनान्द सरस्वती की। वो सक्रिय होकर साधु संतों के बीच अपनी पैठ जमाते है। करपात्री महाराज के वो अतिप्रिय थे। इस बीच शंकराचार्य शांतानंद सरस्वती विश्नुदेवनंद सरस्वती को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर देते है। साधु संतों के एक गुट ने विश्नुदेवनंद सरस्वती को शंकराचार्य स्वीकार नहीं किया और स्वामी स्वरूपनान्द सरस्वती को शंकराचार्य घोषित कर दिया। इधर विश्नुदेवनंद ने वासुदेवनंद सरस्वती को शंकराचार्य पद सौंप दिया। मामला कोर्ट में गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2017 में फैसला दिया कि स्वरूपानंद सरस्वती और वासुदेवनंद सरस्वती दोनों को शंकराचार्य के रूप में अवैध हैं। इसका कारण समझिए, वासुदेवनंद को विश्नुदेवनंद सरस्वती ने शंकराचार्य नियुक्त किया था और विश्नुदेवनंद की खुद की नियुक्ति वैध नही थी क्योंकि उन्हें मठ के सभी संतों का समर्थन प्राप्त नही था। स्वामी स्वरूपनान्द को अवैध इसलिए ठहराया गया क्योंकि उनकी भी नियुक्ति भी मठ के संतों द्वारा नही की गई थी, न ही किसी शंकराचार्य द्वारा और न ही धर्म संसद द्वारा। वह कुछ सन्तो द्वारा समर्थित स्वघोषित शंकराचार्य थे। स्वयं करपात्री महराज ने उन्हें शंकराचार्य मानने से इनकार कर दिया था। स्वरूपानंद किसी शंकराचार्य की जगह पर नही बैठे थे, वे समानांतर दावेदार बनकर उभरे थे जो परंपरा विरोधी था। शांतानंद सरस्वती जीवित और पद पर थे इसलिए स्वरूपनान्द का दावा अवैध और अधर्म की श्रेणी में गिना गया। इसके बाद स्वामी स्वरूपानंद ने पहले द्वारका पीठ और फिर ज्योतिर्मठ पर दावा कर दिया। कोई भी शंकराचार्य एक साथ दो मठों की गद्दी पर नहीं बैठ सकता। यह परंपरा, शास्त्र और व्यवहार तीनों के विरुद्ध है। कुलमिलाकर स्वामी स्वरूपनान्द को शंकराचार्य के रूप अदालत और परंपरा में अवैध शंकराचार्य माना गया। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद उनके शिष्यों ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य घोषित कर दिया। चूँकि स्वामी स्वरूपनान्द सरस्वती ने उन्हें शंकराचार्य घोषित नही किया था और न ही संतों ने, किया भी होता तो भी मान्य नही होते क्योंकि स्वरूपनान्द स्वयं अवैध शंकराचार्य थे। उनकी नियुक्ति में परंपरागत नियमों का पालन नहीं हुआ था, मठ के संतों और अखाड़ा परिषद ने भी उन्हें अवैध शंकराचार्य घोषित कर रखा था इसलिए अक्टूबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने अविमुक्तेश्वरानंद शाही अभिषेक पर रोक लगा दी और 1941 की परंपरा के अनुसार वैध शंकराचार्य की नियुक्ति का निर्देश दिया था। अब अविमुक्तेश्वरानंद कह रहे हैं कि शंकराचार्य की नियुक्ति करना कोर्ट या सरकार का काम नहीं है। उन्हें कानून की जानकारी नहीं है। कोर्ट का काम शंकराचार्य की नियुक्ति करना नही है लेकिन जब शंकराचार्य पद के दो दावेदार हो तब यह मामला धर्म नहीं सिविल विवाद का हो जाता है और तब कोर्ट निर्देश दे सकती है कि 1941 के नियमों में वैध शंकराचार्य की नियुक्ति हो। इसका अर्थ यह है कि आज भी ज्योतिर्मठ में कोई वैध शंकराचार्य घोषित नहीं हुआ है।
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