मत: धूर्तों, पैट्रोल की लड़ाई भारत लड रहा है जीतने को
जब तक देश के अंतिम नागरिक को बेसिक इकॉनमी की समझ नहीं होगी तब तक कोई भी झूठी खबरे फैला कर लोगों में भ्रम पैदा करता रहेगा। सोशल मीडिया के दौर में तो झूठ और अफवाह फैलाना और तेज हो गया है।
संदीप चौधरी, अभिसार शर्मा, आरफ़ा खानम शेरवानी, रवीश कुमार, साक्षी जोशी जैसे धूर्त, पक्षकार और अफवाहबाज पत्रकार वही कर रहे हैं जिसका हमेशा डर बना रहता है। ऐसे तथाकथित प्रोपेगेंडा पत्रकारों की न्यूज़ कांग्रेसी-वामपंथी-इस्लामी गिरोह ऐसे वायरल करते है जैसे इन्होंने कोई बहुत बड़ा स्कैम पकड़ लिया हो जबकि असलियत में लोगों को बेसिक ऑयल इकोनॉमिक्स तक नहीं समझाई जा रही है। ये सभी सिर्फ गुमराह कर जनता को भड़काने में लगे हैं।
हालाँकि, अब आम लोग भी धीरे-धीरे इतने जागरूक हो गए हैं कि इनकी दाल अब आसानी से नहीं गल पाती लेकिन कई बार लोगों के मन में भ्रम पैदा करने में यह गिरोह कामयाब रहता है।
ऐसे कॉंग्रेसी दलालों की खबरें वायरल करने से पहले पूरी सच्चाई समझिए।
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 से 90 प्रतिशत क्रूड ऑयल विदेशों से आयात करता है। पिछले फाइनेंसियल वर्ष में भारत ने करीब 242 मिलियन टन क्रूड ऑयल इम्पोर्ट किया और इस पर लगभग 160 बिलियन डॉलर से ज्यादा खर्च हुआ।
यानी सिर्फ कच्चा तेल खरीदने पर ही भारत के लाखों करोड़ रुपये विदेश जाते हैं, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनिंग कैपेसिटी में से एक है। जामनगर जैसी रिफानरीज दुनिया में सबसे बड़ी है। भारत इम्पोर्टेड क्रूड ऑयल को रिफाइनरी में प्रॉसेस करके पेट्रोल, डीजल, ATF, LPG, पेट्रोकेमिकल्स और दूसरे पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स में बदलता है। इसके बाद इन रिफाइंड प्रोडक्ट्स का बड़ा हिस्सा दूसरे देशों को एक्सपोर्ट भी किया जाता है।
यानी भारत “कच्चा तेल” इम्पोर्ट करता है और तैयार फ्यूल और उससे बने प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट करता है। FY25 में भारत ने पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट करके लगभग 44 से 52 बिलियन डॉलर तक की कमाई की। सिर्फ 2025 में रिफाइंड फ्यूल एक्सपोर्ट्स लगभग 1.28 मिलियन बैरल्स प्रतिदिन के रिकॉर्ड स्तर तक पहुँच गया।
अब सोचिए अगर भारत रिफाइनिंग न करे तो क्या होगा?
भारत को दूसरे देशों से महंगा रिफाइंड फ्यूल खरीदना पड़ेगा। लेकिन भारत कच्चा तेल आयात करके उसको रिफाइन करके आगे बेचता है और ये वैल्यू एडिशन ही भारत की असली इंडस्ट्रियल स्ट्रेंथ है।
इससे भारत को क्या फायदा होता है?
पहला फायदा-
फॉरेन एक्सचेंज अर्निंग्स बढ़ती हैं और डॉलर की कमाई होती है।
दूसरा फायदा-
रिफाइनरी, शिपिंग , पोर्ट्स , ट्रांसपोर्ट , पेट्रोकेमिकल्स और इंजीनियरिंग सेक्टर्स में लाखों नौकरियाँ पैदा होती हैं।
तीसरा फायदा-
भारत ग्लोबल एनर्जी सप्लाई चेन में मजबूत पोजीशन बनाता है। आज एशिया, अफ्रीका और यूरोप के कई देश इंडियन रिफाइंड फ्यूल खरीदते हैं।
चौथा फायदा-
देश की रिफाइनिंग कैपेबिलिटी स्ट्रेटेजीक पॉवर बनती है। दुनिया में संकट आने पर भी भारत एनर्जी ट्रेड में मजबूत स्थिति में रहता है।
अब बात प्रधानमंत्री के तेल बचाने की अपील की
कुछ संदीप चौधरी जैसे कुछ दल्ले पत्रकार और विपक्षी पार्टियों के सोशल मीडिया हैंडल इसको ऐसे दिखा रहे हैं जैसे सरकार लोगों को तेल इस्तेमाल करने से रोक रही हो।
जबकि ऐसा कुछ नहीं है यह सिर्फ़ बेसिक इकोनॉमिक्स है।
भारत हर साल क्रूड ऑयल आयात पर लगभग 160 बिलियन डॉलर तक खर्च करता है। जब इंटरनेशनल ऑयल प्राइसेस बढ़ते हैं तो उसका असर इन्फ़्लेशन, रूपीज, ट्रेड डेफिसिट और फ्यूल प्राइसेस पर पड़ता है। सरकार को कई बार एक्साइज ड्यूटी कम करनी पड़ती है या प्राइस प्रेशर संभालना पड़ता है ताकि जनता पर ज्यादा बोझ न पड़े।
अगर देश में अनावश्यक फ्यूल कंजम्पशन कम होगा, फ्यूल एफिसिएंसी बढ़ेगी और पब्लिक ट्रांसपोर्ट ज्यादा इस्तेमाल होगा तो इम्पोर्टेड क्रूड की डिपेंडेंसी घटेगी। इससे इकॉनमी पर प्रेशर कम होगा और भारत ज्यादा वैल्यू एडेड रिफाइंड प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट कर पाएगा।
हर विकसित देश एनर्जी कंसर्वेशन की बात करता है। यह कोई नई या गलत सोच नहीं है। दुनिया के कई देशों में फ्यूल के दोगुने दाम हो चुके है क्यूंकि सरकार तेल पर भारत जैसे कोई सब्सिडी नहीं देती। सरकार लोगों से ऐसे ही अपील कर रही है कि लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट प्रयोग करे, ऑफिस जाने के बजाय घर से काम करे।
लेकिन कुछ दल्ले पत्रकार आधी जानकारी देकर ऐसा नरेटिव बना रहे हैं जैसे भारत तेल एक्सपोर्ट करके कोई गुनाह कर रहा हो। क्रूड ऑयल इम्पोर्ट और रिफाइंड फ्यूल एक्सपोर्ट के बीच का फर्क समझे बिना सेन्सेशनल हेडलाइन्स चलाना जर्नलिज्म नहीं बल्कि पत्रकारिता की जगह धूर्तता और दलाली की चरम सीमा है।
सच्चाई सीधी है।
1- भारत कच्चा तेल खरीदता है।
2- भारत उसे रिफाइन करता है।
3- भारत वैल्यू एडिशन करता है और रिफाइंड फ्यूल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स निर्यात करके अरबों डॉलर कमाता है।
यह कमजोरी नहीं बल्कि इकोनॉमिक स्ट्रेटेजी, इंडस्ट्रियल कैपेबिलिटी और ग्लोबल ट्रेड स्ट्रेंथ है। ये बेसिक इकोनॉमिक्स है।
ईरान युद्ध, होर्मुज बंद और तेल संकट… भारत कैसे मैनेज कर रहा ऑयल सप्लाई?
मध्य-पूर्व में संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित हुई, लेकिन भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को सफलतापूर्वक प्रबंधित किया है
28 फरवरी को मध्य-पूर्व में शुरू हुए संघर्ष ने दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति को हिला दिया। मिसाइलें, बारूदी सुरंगें, जहाजों पर हमले और अमेरिका की नाकेबंदी के बीच ईरान की ओर से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद कर दिया गया। दुनिया के कच्चे तेल व्यापार का पांचवां हिस्सा इसी संकरे जलडमरूमध्य से गुजरता है।
LPG और LNG की आपूर्ति भी बुरी तरह प्रभावित हुई। भारत, जिसकी अर्थव्यवस्था 90 प्रतिशत कच्चे तेल की जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, इस संकट का सामना सबसे बेहतर तरीके से कर रहा है। अमेरिका, चीन और जापान जैसे देशों के मुकाबले भारत के पास बड़े रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार नहीं हैं, लेकिन विविधीकरण की रणनीति और रूस के साथ मजबूत संबंधों ने इसे संभव बनाया।
सरकार के पास 60 दिनों का स्टॉक
सरकार के अनुसार, रणनीतिक भंडार समेत विभिन्न रूपों में भारत के पास 60 दिनों की पेट्रोलियम आपूर्ति उपलब्ध है। युद्ध के ढाई महीनों में दुनिया की 20 प्रतिशत कच्चे तेल आपूर्ति बाधित रहने के बावजूद भारत ने अपनी जरूरतें पूरी की हैं। सवाल उठता है कि भारत अपना तेल कहां से ला रहा है?
आयात रणनीति में बड़ा बदलाव
Kpler में मॉडलिंग और रिफाइनिंग के मैनेजर सुमित रितोलिया के अनुसार, मार्च 2026 से भारत की कच्चे तेल आयात रणनीति में कई बदलाव आया है। होर्मुज़ में बाधाओं के चलते मध्य-पूर्व से आपूर्ति घटी और लॉजिस्टिक्स जोखिम बढ़ गए। भारतीय रिफाइनरों ने अटलांटिक बेसिन और होर्मुज़ से इतर स्रोतों की ओर तेजी से रुख किया।
इराक और खाड़ी देशों से कम आपूर्ति की भरपाई अमेरिका, ब्राजील, पश्चिम अफ्रीका और वेनेजुएला से बढ़ी खरीदारी से हुई। यह कोई एक स्रोत की जगह नहीं ले रहा, बल्कि उपलब्धता, रिफाइनरी अनुकूलता, ढुलाई लागत और प्रतिबंधों को ध्यान में रखकर कच्चे तेल के मिश्रण का व्यापक पुनर्गठन है। रितोलिया ने बताया, ‘रिफाइनर रूसी और अटलांटिक बेसिन के तेल के अधिक खरीदार बने हैं। साथ ही जहां उपलब्ध हो, सऊदी और UAE के उन ग्रेड्स को भी खरीद रहे हैं जिन्हें पहले नजरअंदाज किया जाता था।’
रूसी तेल: आपूर्ति की रीढ़
2022 के यूक्रेन युद्ध के बाद से रूस भारत के कच्चे तेल आयात में प्रमुख बना हुआ है। ट्रंप प्रशासन के प्रतिबंधों से दिसंबर 2025 से फरवरी 2026 तक थोड़ी कमी आई, लेकिन रूसी तेल सबसे बड़ा हिस्सा बना रहा। मार्च 2026 में अमेरिका-ईरान युद्ध शुरू होने पर रूसी आपूर्ति फिर से पुराने उच्च स्तर पर पहुंच गई।
इस बार तेल प्रीमियम कीमत पर खरीदा जा रहा है क्योंकि वैश्विक कीमतें ऊंची हैं। ट्रंप प्रशासन ने वैश्विक कीमतों को स्थिर रखने के लिए समुद्री रास्ते के रूसी तेल पर अस्थायी छूट दी, जिसे दो बार संशोधित किया जा चुका है।
भारत ने स्पष्ट किया कि उसका खरीद निर्णय ऊर्जा सुरक्षा और अर्थशास्त्र पर आधारित है। Rosneft और Lukoil जैसी कंपनियों से खरीदारी आर्थिक रूप से फायदेमंद रही। Kpler के आंकड़ों के मुताबिक, मार्च में रूसी आयात 1.9-2.0 मिलियन बैरल प्रतिदिन (Mbd) तक पहुंच गया।
मई में भी यह स्तर 1.9 Mbd के आसपास बना हुआ है। युद्ध शुरू होने के बाद रूस ने भारत को 140 मिलियन बैरल से ज्यादा तेल सप्लाई किया है। Baltic, Black Sea या Pacific मार्ग से आने वाला रूसी तेल होर्मुज़ जोखिम से पूरी तरह सुरक्षित है।
मध्य-पूर्व आपूर्ति के वैकल्पिक रास्ते
अप्रैल में भारत का कुल कच्चा तेल आयात घटकर 4.4 mbpd रह गया, जबकि सामान्य स्तर 5.2 mbpd था। इराक से आयात लगभग शून्य हो गया। ग्रांट थॉर्नटन भारत के ऑयल एंड गैस पार्टनर सौरव मित्रा बताते हैं कि रिफाइनरों ने नया मिश्रण अपनाया जिसमें रूस 30-37 प्रतिशत (1.5-1.7 mbpd) के साथ सबसे आगे रहा।
सऊदी अरब (0.65-0.70 mbpd), UAE (0.60-0.62 mbpd), वेनेजुएला, ब्राजील और ईरान से भी आपूर्ति हुई। मध्य-पूर्व तेल सऊदी की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन (यानबू, लाल सागर) और UAE की हबशान-फुजैराह पाइपलाइन से भेजा जा रहा है। इन बाईपास रूट्स से आपूर्ति जारी है, हालांकि इसमें 4-10 दिन अतिरिक्त लगते हैं और ढुलाई लागत बढ़ जाती है।
वेनेजुएला की वापसी
प्रतिबंधों के बाद बंद हुई वेनेजुएला आपूर्ति ट्रंप प्रशासन के कदमों के बाद फिर शुरू हुई। अप्रैल-मई में यह तेजी से बढ़ी और अमेरिका-ईरान युद्ध के बाद वेनेजुएला टॉप 5 सप्लायर्स में शामिल हो गया। रितोलिया कहते हैं कि वेनेजुएला के ग्रेड भारत के जटिल रिफाइनरों के लिए आकर्षक हैं। वे हल्के तेल के मिश्रण को संतुलित करते हैं और मिडिल डिस्टिलेट उत्पादन बढ़ाते हैं।
वैश्विक कमी और चुनौतियां
Kpler के अनुसार, भारत का आयात सामान्य स्तर से 700-800 kbd कम है। वैश्विक कमी और होर्मुज़ बाधा के कारण एशिया में तेल प्रवाह सीमित रहा। रितोलिया चेताते हैं कि नए स्रोत पूरी तरह मध्य-पूर्व की कमी की भरपाई नहीं कर पा रहे। भविष्य में मिश्रण मौजूदा पैटर्न पर ही रहने की संभावना है। रूस मुख्य आधारशिला बना रहेगा, जिसकी पूर्ति अटलांटिक बेसिन और वेनेजुएला से होगी। रिफाइनर सप्लाई सुरक्षा, बेहतर उपयोग और लागत को प्राथमिकता देंगे।
सरकार की घरेलू रणनीति
अनावश्यक मांग कम करने के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3.90 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई। चार साल बाद हुई यह बढ़ोतरी रिफाइनरों के नुकसान की आंशिक भरपाई करती है और खपत को नियंत्रित करती है। सरकार ने ‘विंडफॉल गेन्स टैक्स’ भी लगाया है ताकि रिफाइनर पेट्रोल-डीजल का निर्यात कम करें और घरेलू जरूरतें सुनिश्चित हों।
भारत की पेट्रोल रणनीति का मुख्य लक्ष्य कच्चे तेल की निर्भरता घटाना, आपात स्थिति को रणनीतिक भंडार (SPR) तैयार रखना और स्वदेशी ईंधन (जैसे इथेनॉल) प्रोत्साहन है। भारत अपनी आवश्यकता का लगभग 88% कच्चा तेल आयात करता है।भारत की प्रमुख पेट्रोल और ऊर्जा रणनीति के मुख्य बिंदु:
रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserves): आपात स्थितियों और अंतरराष्ट्रीय तनाव से निपटने को, भारत सरकार ने भूमिगत भंडारण बनाए हैं। विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पादुर स्थित इन भंडारों की कुल क्षमता 5.33 मिलियन मीट्रिक टन है। इसके अतिरिक्त, नए भंडार भी विकसित किए जा रहे हैं। कुल मिलाकर, सरकारी तेल कंपनियों के वाणिज्यिक स्टॉक को मिलाकर भारत के पास लगभग 74 दिनों का तेल भंडार है।
आयात के स्रोतों का विविधीकरण (Diversification of Imports): किसी एक क्षेत्र या देश पर निर्भरता घटाने को , भारत ने अपने कच्चे तेल के आयात का दायरा बढ़ा दिया है। अब देश 41 से अधिक देशों से तेल खरीद रहा है, जिससे आपूर्ति बाधित होने का खतरा काफी कम हो जाता है।
इथेनॉल मिश्रण (Ethanol Blending) पर जोर: पेट्रोल की खपत घटाने और आयात बिल में कटौती करने को सरकार इथेनॉल मिश्रण नीति तेज़ी से आगे बढ़ा रही है। भारत ने पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिश्रण (E20) लक्ष्य निर्धारित किया है और भविष्य में इसे 30% तक ले जाने को तकनीकी मानक अधिसूचित किए गए हैं।
ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition): पेट्रोलियम पर निर्भरता घटाने को, इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs), मेट्रो का विस्तार, और रेलवे के पूर्ण विद्युतीकरण (Electrification) पर ज़ोर दिया जा रहा है। इसके अलावा, कोयले से गैस और पेट्रोल बनाने की नई परियोजनाओं (Coal Gasification) पर भी निवेश हो रहा है।

