इतिहास: सुंदर लाल बहुगुणा को हराने वाले थे टिहरी सेनाध्यक्ष नत्थू सिंह सज्वाण

सिपाही से सेनाध्यक्ष तक का सफर

सन 1948 में जब बडियारगढ़, भरदार कडकोट एवं सकलान के पलट कर टिहरी शहर में आ गये थे और राज्य कर्मचारियों को पकड़कर कैद कर रहे थे, तब जिस व्यक्ति से आशंका थी कि वह गोली चलाने का आदेश देकर इस विप्लव को कुचल सकता है, वह शांत व गंभीर मुद्रा में खड़ाये रहा तथा चारों तरफ अपने लोगों को उमड़ते हुये देख रहा था । वह था टिहरी रियासत के थलसेना अध्यक्ष नत्थू सिंह सज्वाण । उन्हें पता था कि लोग समानान्तर सरकार कायम करके राजा के शासन को उखाड़ फेंकना चाहते हैं, किंतु उन्होंने धैर्य के साथ अपनी सेनाओं पर नियंत्रण बनाये रखा । आंदोलनकारियों ने जेल के फाटक खोल कर क़ैदियों को मुक्त्त कर दिया था कई उद्दंड कर्मचारियों को उनकी जगह जेल में डाल दिया था, परन्तु सेनाध्यक्ष यह सब अपनी आँखों से देख रहा था एवं सेनाओं को शांत रहने का आदेश दे रहा था । यदि वह चाहता, तो एक नया तिलाड़ी कांड रच सकता था और राजा की सत्ता को फिर से स्थापित कर सकता था । लेकिन वह बंदूकें झुकाये जनता की सत्ता स्थापित होते देख रहा था ।

क्या यह सन 1930 में घटित तिलाड़ी गोलीकांड का सबक था या देश के स्वतंत्र हो जाने का प्रभाव अथवा एक समझदार सेनानायक का परिचय ? इन प्रश्नों का थोड़ा-थोड़ा उत्तर हम नत्थू सिंह सज्वाण के सैनिक जीवन पर नजर डाल कर पा सकते हैं । वे 3 मई सन 1907 को टिहरी रियासत की सेना में सिपाही के पद पर भर्ती हुये थे । लगभग 9 वर्षो तक उन्होंने सिपाही के रूप में काम किया । इस बीच सन 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ गया, तो उन्हें अफ्रीका के मोर्चे पर भेजा गया । वहाँ उन्होंने रातोंरात एक पुल तैयार किया और सेना की एक पूरी कोर को आगे बढ़ा दिया । एक कोर में सैनिकों की तीन डिवीजन होती है । उनके इस प्रयोग के कारण ब्रिटिश सेना ने “सरदार बहादुर” की उपाधि से सम्मानित किया । इसके बाद 1 जनवरी सन 1917 को उन्हें सिपाही से जूनियर कमीशंड ऑफिसर बना दिया गया । यह मात्र संयोग नही कि चम्बा के दक्षिण ढलान पर स्थित मज्यूड़ गाँव के एक युवक को इसी महायुद्ध में ब्रिटिश सेना का सर्वोच्च विक्टोरिया क्रॉस मिला और उत्तरी ढलान पर स्थित गुल्डी गाँव के दूसरे युवक को तत्परता को सरदार बहादुर । वस्तुत: चम्बा के आस-पास के गाँवों से प्रथम विश्वयुद्ध में अनेक नौजवान विभिन्न मोर्चों पर लड़े थे, जिसमें  वीर भाव था । असल में वे देश के लिये लड़ भी नही रहे थे । बहरहाल, अफ्रीका से लौटने के बाद अफगान युद्ध शुरू हो गया और नत्थू सिंह सज्वाण को सन 1919 में उसमें भेज दिया गया । लेकिन अफगानिस्तान की वीरान पहाड़ियों पर उन्हें पानी नहीं मिला तो घोड़े की लगाम पर लगे भीगे चमड़े को चबाकर अक्सर प्यास बुझानी पड़ी ।

इसके बाद वे टिहरी रियासत की सेना में लौट आये । मगर विश्वयुद्ध में अच्छी भूमिका निभाने के कारण उन्हें एक सम्मानजनक स्थान मिल गया । इसी से सन 1925 में जार्ज पंचम के राज्याभिषेक समारोह में उन्हें टिहरी रियासत का प्रतिनिधित्व करने इंग्लैंड भेजा गया । तब इंग्लैंड जाना इतना आसान नही था । कई महीनों बाद वे वहाँ से लौटे तो टिहरी में उनके सम्मान में एक समारोह का आयोजन किया गया । इसी दौरान ब्रिटिश साम्राज्य का सदस्य मैम्बर ऑफ ब्रिटिश एम्पायर (एम.बी.ई.) बनाया गया । एक सैनिक को यह बहुत बड़ा सम्मान था । फिर सन 1929 में उन्हें लेफ्टिनेंट कर्नल बना दिया गया और सन 1930 में सुरेंद्र सिंह की जगह सेनाध्यक्ष नियुक्त किया गया । लेकिन सन 1939 में दूसरा विश्वयुद्ध छिड़ गया तो उन्हें बर्मा और मलेशिया के मोर्चे पर भेजा गया । इस युद्ध में भी उन्होंने प्रशंसनीय कार्य किया जिसके लिए भारत के तत्कालीन वायसराय लिनलीथगो ने 28 मई सन 1943 को प्रमाणपत्र जारी करते हुऐ लिखा – “युद्ध के दौरान भर्ती के संदर्भ में आपकी सेवायें विशेषकर मेरी जानकारी में लाया गयी है । मैं विक्टर एलेक्जेंडर जान होप मार्कस ऑफ लिनलीथगो, वायसराय एवं गवर्नर जरनल ऑफ इंडिया आपको कीमती योगदान की इस प्रमाण-पत्र में अपनी व्यक्तिगत प्रशंसा अंकित करता हूँ ।

दूसरे विश्वयुद्ध के पश्चात नत्थू सिंह टिहरी रियासत की सेना में लौट आये और पुनः सेनाध्यक्ष का कार्यभार संभालने लगे । यद्यपि वे ज्यादा पढ़े-लिखे नही थे क्योंकि तब टिहरी रियासत छोड़कर कहीं कोई स्कूल नही था, परन्तु गुल्डी के लोग पैड़ी-गढ़वाल (ब्रिटिश गढ़वाल) से गुलाब सिंह नेगी नामक शिक्षक लाये थे, जो गाँव के पांच बच्चों को पढ़ाते थे, उनमें से एक नत्थू सिंह भी थे ।  प्राथमिक स्तर की शिक्षा ही वह उन्हें दे पाये थे । उससे पहले गाँव में किसी की चिठ्ठी-पत्री आती थी तो दूर कहीं ले जानी पड़ती थी । इस तरह अगर देखें तो नत्थू सिंह सजवाण जमीन से उठकर सेना के सर्वोच्च कमांडर के पद तक पहुँचे थे । उनके अधीन सैपर्स एंड मैनर्स, इन्फेंट्री, पेनियर एवं एनीमल ट्रांसपोर्ट जैसे सभी सैनिक विभाग थे । इसलिए जब नरेंद्रनगर और देवप्रयाग से आगे सड़कें गयी तो उनके निर्माण को भी उन्होंने वरीयता दी । टिहरी शहर में सन 1940 में गाड़ी पहुँच गयी थी ।

हालांकि दीवान चक्रधर जुयाल से लिखित आदेश लेने के बाद उन्हें तिलाड़ी से रवाईं के लोगों पर गोली चलाने का आदेश देना पड़ा, किन्तु उनकी वर्दी के भीतर एक बेहतर इंसान छिपा हुआ था । आदेश पालन तो एक सैनिक की अनिवार्य सेवा शर्त होती है । चंद्रसिंह गढ़वाली की तरह अवज्ञा करना हर किसी के वश में नही रहता है । फिर भी अवज्ञा कर्ता चाहे जितना बड़ा स्वतंत्रता सेनानी हो जाये पर सैनिक नही हो सकता है । मगर बंदूक की नली पर केंद्रित रहने वाले सैनिक के भीतर भी एक मनुष्य होता है । नत्थू सिंह सज्वाण के भीतर का मनुष्य भी अक्सर प्रकट होता रहता था । एक बार उनके पड़ोसी गाँव हड़म के दो भाई सोनू और मोनू अपना सबकुछ बेचकर देहरादून बसने जा रहे थे । जाते हुये नरेन्द्रनगर में उन्हें मिले उन्होंने  वही फटकार लगा कहा -घाटा मत पड़ो, अपनी धरती में रहकर आदमी ठीक तरह से पल और बढ़ सकता है । उन्होंने कुछ दिनों तक उन्हें अपने पास रोके रखा तथा बाद में वापस गाँव भेज दिया । फिर थोड़े दिनों बाद उन्हें सेना में भर्ती करवा दिया, तो उनकी स्थिति सुधर गयी ।

ऐसा ही प्रस्ताव एक बार चक्रधर जुयाल ने उनके सामने रखा कि देहरादून के पास जमीन ले लें और अवकाश प्राप्ति के बाद सुखी जीवन बितायें । लेकिन नत्थू सिंह ने मना कर दिया । इसके बाद उन्होंने जाजल के पास सिंचित जमीन ली एवं धान और गेहूँ उगाने का सपना देखा । अभी तक यह जमीन परिवार के पास है, भले ही खा-कमा दूसरे लोग रहे हैं ।

एक बार उनकी सैनिक उपलब्धियों के लिए सरकार ने उन्हें देहरादून में चाय बाग में 10 एकड़ जमीन का प्रस्ताव दिया जिसे उन्होंने मना करते हुए चम्बा में देने को कहा तो उन्हें चम्बा के पास चौड़ियों नामक स्थान पर 10 एकड़ जमीन मिली । लेकिन इस पुरुस्कार को उन्होंने अपने पास रखना उचित नही समझा । उन्होंने फीता उठाया और चौड़ियों की पूरी जमीन गाँव के प्रत्येक परिवारों में बराबर -बराबर बांट दी । उनमें से एक हिस्सा अपने पास भी रख लिया । यही नही, वे गाँव के गरीबों से अक्सर रूबरू होते थे । गाँव के एक बुजुर्ग हुक्म सिंह सज्वाण कहते हैं .. “एक बार हमारे घर में खाने को नही था । उन्हें पता चला तो उन्होंने एक मण चावल भिजवा दिया ।

इसी तरह गाँव का एक बच्चा लंगोट पहन कर उनके सामने से गुजरा तो उन्होंने उसे रोक कर तुरंत उसका नाप लिया और दर्जी से उसके लिए कपड़े सिलवा दिये । गाँव वाले कृष्णा और तारा, दो विधवाओं का जिक्र करना भी नही भूलते हैं, जिनका हालचाल लेना इस थलसेनाध्यक्ष के नौकर का था । जब उन्हें मौका मिलता था तो वे फावड़ा उठाकर स्वयं अपने खेतों में काम करने चले जाते थे । गाँव के 80 वर्षीय बुजुर्ग रघुवीर सिंह सज्वाण कहते हैं – एक बार हम खतों में पुश्ता लगा रहे थे । वे छुट्टी में घर आये हुये थे । उन्होंने हमें देखा तो कहने लगे कि तुम मुझे पत्थर दो और मैं पुश्ता लगता हूँ । फिर वे पुश्ता लगाने लगे ।

यही वजह है कि सन 1948 में जब अवकाश ग्रहण किया और प्रजामंडल ने चुनाव करवाया, तो राजा समर्थक प्रजा हितकारिणी सभा के उम्मीदवार होने के बावजूद वे बमुंड, मनियार, उदकोट, एवं अठुर पट्टियों को मिलाकर बने विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीत गये । उन्होंने बाद में चिपको आंदोलन के लिए विख्यात हुये नेता सुंदरलाल बहुगुणा को हराया था । इस चुनाव में 24 विधायक प्रजामंडल से तथा 5 प्रजाहित्कारिणी सभा से चुने गये थे । एक वर्ष तक इस विधानसभा ने कार्य किया । उसके बाद टिहरी रियासत को भारतीय संघ का हिस्सा बनाया गया तथा उत्तरप्रदेश में मिला दिया गया । लेकिन जो सेनाध्यक्ष अवकाश प्राप्त करने के पश्चात अपने गाँव में एक सामान्य आदमी की तरह रहा था,वह 19 मई, सन 1950 को उदरशूल जैसी सामान्य बीमारी से चला गया । उसे चम्बा के पास रहने वाले वैद्य कपिलदेव भी उपलब्ध नही हो पाए ।

~कुँवर प्रसून, युगवाणी, जुलाई 2003

Nathusingh Sajwan Monument Trust की वाल से।

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