रघुराम राजन बाद एक और इकोनॉमिस्ट “मेक इन इंडिया” से असहमत, ‘इनोवेट इन इंडिया’ सुझाया

Raghuram Rajan Point Gets Support Top Economist Said Manufacturing Wont Provide Jobs In India Innovation Is The Future
Raghuram Rajan Point: रघुराम राजन की बात सही… टॉप इकोनॉमिस्ट ने बताया क्यों भारत में मैन्युफैक्चरिंग से नहीं होने वाला भला?
जाने-माने अर्थशास्त्री प्रसन्ना तांत्री ने भारत को मैन्युफैक्चरिंग से हटकर इनोवेशन और सर्विसेज पर फोकस करने की सलाह दी है। उनके अनुसार, रोबोटिक्स के कारण मैनुअल उत्पादन अब प्रतिस्पर्धी नहीं रहा। तांत्री ने ‘इनोवेट इन इंडिया’ और ‘आईएलआई’ पर जोर दिया। उन्‍होंने कहा असली नौकरियां गैर-व्यापार योग्य क्षेत्रों में हैं।

नई दिल्‍ली: इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (आईएसबी) के प्रोफेसर और जाने-माने अर्थशास्त्री प्रसन्‍ना तांत्री ने भारत सरकार को एक अहम सलाह दी है। उन्होंने कहा है कि भारत को अब अपनी नीतियों का ध्यान मैन्युफैक्चरिंग से हटाकर इनोवेशन और सर्विसेज पर लगाना चाहिए। तांत्री का मानना है कि रोबोटिक्स जैसी नई तकनीकों के कारण मैनुअल उत्पादन अब प्रतिस्पर्धी नहीं रहा। ऐसे में सरकार का यह सोचना कि छोटे और मध्यम स्तर की मैन्युफैक्चरिंग से नौकरियां पैदा होंगी, अब सही नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि असली नौकरियां गैर-व्यापार योग्य क्षेत्रों में हैं, जिन पर तकनीक का असर कम होता है। तांत्री ने यह भी बताया कि चीन का पुराना मैन्युफैक्चरिंग मॉडल अब भारत के लिए काम नहीं करेगा क्योंकि दुनिया बदल गई है। उन्होंने ‘ मेक इन इंडिया ‘ की जगह ‘इनोवेट इन इंडिया’ पर ध्यान देने, पीएलआई (प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव) की जगह आईएलआई (इनोवेशन लिंक्ड इंसेंटिव) लाने और दुनिया भर से बेहतरीन प्रतिभाओं को भारत में आकर्षित करने का सुझाव दिया है ताकि एक मजबूत इनोवेशन इकोसिस्टम बन सके।
Prasanna Tantri Raghuram Rajan

रघुराम राजन ने हाल में कहा था कि मैन्‍युफैक्‍चरिंग के जरिए रोजगार सृजित करने का समय निकल चुका है। भारत को ‘मस्तिष्क के कौशल’ पर फोकस्‍ड नया विकास का रास्‍ता अपनाना चाहिए। उनका मानना था कि भारत ऐसे समय चीन के ‘मैन्युफैक्चरिंग हब’ मॉडल को दोहरा नहीं सकता जब वैश्विक व्यापार बाधाएं बढ़ गई हैं। अन्य देश भी अपनी घरेलू मैन्‍युफैक्‍चरिंग क्षमताओं को बढ़ावा दे रहे हैं। प्रोफेसर तांत्री ने भी रघुराम राजन की बात का समर्थन किया।

हाथ से क‍िया गया उत्‍पादन प्रत‍िस्‍पर्धी नहीं
प्रोफेसर प्रसन्‍ना तांत्री ने एक पॉडकास्ट में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि नीति बनाने वाले अभी भी यह मानते हैं कि छोटे और मध्यम स्तर के मैन्युफैक्चरिंग से नौकरियां मिलेंगी। लेकिन, रोबोटिक्स जैसे तकनीकी बदलावों के कारण हाथ से किया गया उत्पादन अब प्रतिस्पर्धी नहीं रहा।

तांत्री ने सवाल उठाया, ‘मेरा मुद्दा यह है कि आपका ध्यान किस पर है? क्या आपका ध्यान ‘मेक इन इंडिया’ पर होना चाहिए या ‘इनोवेट इन इंडिया’ पर?’ अपनी बात पर जोर देते हुए कहा, ‘मेरी गुजारिश है – आप ‘इनोवेट इन इंडिया’ पर ध्यान दें।’ उन्होंने आगे समझाया, ‘क्योंकि सरकार सोचती है कि एसएमई और मैन्युफैक्चरिंग में नौकरियां हैं। वे वैसे भी जा रही हैं। आप इस रोबो चीज से कब तक लड़ेंगे? असली नौकरियां गैर-व्यापार योग्य क्षेत्रों में हैं। गैर-व्यापार योग्य नौकरियों की अच्छी बात यह है कि तकनीक उनमें ज्‍यादा बदलाव नहीं लाती।’

तांत्री ने बताया कि रोजगार बढ़ने की सबसे ज्‍यादा संभावना गैर-व्यापार योग्य क्षेत्रों यानी नॉन-ट्रेडेबल सेक्‍टर में है। इनमें व्यक्तिगत सेवाएं शामिल हैं। इन पर तकनीकी बदलावों का असर कम होता है। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा, ‘आप 20-30 साल पहले के नाई और अब के नाई के बारे में सोचिए। यह वही चीज है, उतनी ही मेहनत, उतने ही कर्मचारी। इसमें ज्‍यादा बदलाव नहीं आया है। जबकि व्यापार योग्य (ट्रेडेबल) क्षेत्रों में यह नाटकीय रूप से बदल गया है।’ उन्होंने स्पष्ट किया कि इन क्षेत्रों में तकनीक का प्रभाव कम होने से नौकरियां स्थिर रहती हैं।

हालांकि, तांत्री ने यह भी बताया कि गैर-व्यापार योग्य नौकरियों में आय इस बात पर निर्भर करती है कि ऊंचे -मूल्य वाले व्यापार योग्य क्षेत्रों में काम करने वाले लोग कितने समृद्ध हैं। उन्होंने आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के विचारों का समर्थन किया।

रघुमराम राजन का क‍िया समर्थन
तांत्री ने कहा, ‘जब रघुराम राजन जैसा कोई व्यक्ति सेवाओं को बढ़ावा देने की बात करता है तो लोग उनका मजाक उड़ाते हैं। ओह, सामान्य लोग आईटी वगैरह में कैसे काम कर सकते हैं?’ उनका मतलब यह नहीं है। वह कोई बेवकूफ नहीं हैं।’ उन्होंने राजन के विचार को समझाया, ‘वह यह कह रहे हैं कि अगर आप सेवाएं बनाते हैं तो कुल व्यापार योग्य क्षेत्र ऊपर जाएगा। एक बार जब व्यापार योग्य क्षेत्र बढ़ता है तो ये लोग गैर-व्यापार योग्य सेवाओं के उपभोक्ता बनते हैं।’

अर्थशास्त्री तांत्री ने यह भी कहा कि भारत चीन के मैन्युफैक्चरिंग मॉडल को अब नहीं अपना सकता। समय बदल गया है। उन्होंने बताया कि चीन 20-30 साल पहले बढ़ा था। उस समय वैश्वीकरण की शुरुआत हो रही थी। उस दौर में चीन उत्पादन करके निर्यात कर सकता था। उन्होंने चीन के मॉडल की तुलना भारत से की, ‘चीन की बचत दर 50% थी। उन्होंने 50% निवेश किया। हमारी बचत दर घट रही है। हमारी बचत दर 30% है। हमारा निवेश कम हो रहा है। इसलिए हम उस मॉडल का इस्‍तेमाल नहीं कर सकते।’ उन्होंने आगे कहा, ‘और दूसरी बात, जब बाकी दुनिया रोबो के साथ मैन्युफैक्चरिंग कर रही है, अगर आप हाथ से मैन्युफैक्चरिंग करेंगे तो आपका उत्पाद प्रतिस्पर्धी नहीं होगा। आप वैसे भी बेच नहीं पाएंगे। इसलिए सबसे अच्छा विकल्प इनोवेशन है।’

प्रत‍िभाओं को वापस लाने की जरूरत
तांत्री ने सरकार को पीएलआई (प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव) योजना की जगह आईएलआई (इनोवेशन लिंक्ड इंसेंटिव) योजना लाने का सुझाव दिया। उन्होंने अपनी बात दोहराई, ‘दो-तिहाई लोग गैर-व्यापार योग्य क्षेत्रों में काम करते हैं… मैन्युफैक्चरिंग को इतना बढ़ावा देने के बावजूद मैन्युफैक्चरिंग का हमारा अनुपात बढ़ा नहीं है। पीएलआई की जगह मुझे लगता है कि आपके पास आईएलआई (इनोवेशन-लिंक्ड इंसेंटिव, प्रोडक्शन-लिंक्ड नहीं) होना चाहिए। हम अभी भी उस पुरानी शैली के उत्पादन वाली चीज में फंसे हुए हैं।’

जब उनसे पूछा गया कि क्या इनोवेशन को निर्देशित किया जा सकता है तो तांत्री ने जोर देकर कहा कि इनोवेशन प्रतिभा के समूहों और सहायक इकोसिस्टम पर फलता-फूलता है। उन्होंने कहा, ‘मैं इनोवेशन पर इतना जोर क्यों दे रहा हूं? जब आपके पास 20 अच्छे लोग एक साथ होते हैं तो इन लोगों का योग उनकी क्षमताओं के कुल योग से ज्‍यादा होता है। इनोवेशन एक बहुत अच्छी अवधारणा है जहां क्लस्टरिंग काम करती है।’ उन्होंने सिलिकॉन वैली का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि दशकों पहले यह भविष्यवाणी की गई थी कि तकनीक लोगों को कहीं से भी इनोवेशन करने देगी। लेकिन, हर इनोवेशन सिलिकॉन वैली से ही आता है। इसके लिए एक इकोसिस्टम की जरूरत होती है।’

तांत्री ने तर्क दिया कि भारत को ऐसे इकोसिस्टम बनाने के लिए दुनिया की शीर्ष प्रतिभाओं को आकर्षित करने पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने परप्‍लेक्सिटी AI के संस्थापक अरविंद श्रीनिवास का जिक्र किया। उन्होंने कहा, ‘जाहिर तौर पर वह अभी भी ग्रीन कार्ड धारक नहीं हैं। उस आदमी को किसी तरह ले आओ – वह एक व्यक्ति किसी भी पीएलआई से ज्‍यादा मूल्यवान हो सकता है। आप ऐसे 10 लोगों को एक साथ ला सकते हैं, आप एक इकोसिस्टम बनाएंगे।’ उन्होंने यह भी बताया कि अमेरिका में कई इनोवेटर वापस आने के लिए तैयार हैं।

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