सुप्रीम कोर्ट: वेश्यावृत्ति समाप्ति उद्देश्य नहीं; कानून व्यवसायीकरण के खिलाफ

The Supreme Court Said That It Is Not Our Intention To Eliminate Prostitution The Law Only Deals With Its Commercialization
सुप्रीम कोर्ट: वेश्यावृत्ति को खत्म करना हमारा उद्देश्य नहीं; कानून केवल इसके व्यवसायीकरण के खिलाफ
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यह कानून न ही वेश्यावृति को खत्म करेगा और न ही इसे अपराध की श्रेणी में लाएगा बल्कि इसके व्यवसायीकरण को रोकना हमारा उद्देश्य है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 20वीं शताब्दी की शुरुआत में, वेश्यावृत्ति के लिए महिलाओं की तस्करी आम थी और इसे अनैतिक माना जाता था।

नई दिल्ली: 70 साल पुराने अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम (आईटीपीए) पर काफी विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि इस कानून का मुख्य उद्देश्य न तो वेश्यावृत्ति को समाप्त करना है और न ही इसे आपराधिक अपराध बनाना है, बल्कि इसके व्यवसायीकरण को रोकना है। न्यायमूर्ति जे बी परदीवाला और आर महादेवन की पीठ ने कहा कि हमें पूरा विश्वास है कि वेश्यावृत्ति का उन्मूलन या इसे आपराधिक अपराध बनाना इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य नहीं है। बल्कि, इसका उद्देश्य वेश्यावृत्ति के व्यवसायीकरण, यानी संगठित आजीविका के साधन के रूप में वेश्यावृत्ति को रोकना या समाप्त करना है।
Supreme Court on Prostitution
वेश्यावृति पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

20वीं शताब्दी में महिलाओं की तस्करी आम थी
वेश्यालयों से बचाई गई महिलाओं के पुनर्वास के मुद्दे पर विचार करते हुए, पीठ ने 1956 के अधिनियम का विश्लेषण किया और कहा कि 20वीं शताब्दी की शुरुआत में, वेश्यावृत्ति के लिए महिलाओं की तस्करी आम थी और इसे अनैतिक माना जाता था, इसलिए यह शब्द कानून से जुड़ गया

 

वेश्यावृति को लेकर सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश
हाल में सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश में कहा गया था कि पुलिस को स्वेच्छा से काम करने वाली वयस्क यौनकर्मियों के मामलों में हस्तक्षेप करने या उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई करने से बचना चाहिए। यौनकर्मियों को गिरफ्तार, दंडित या परेशान नहीं किया जाना चाहिए और पुलिस छापों के दौरान उनकी पहचान गोपनीय रखी जानी चाहिए।

वयस्क यौनकर्मियों को उनकी इच्छा के विरुद्ध हिरासत में नहीं लिया जा सकता या बचाया नहीं जा सकता और सुरक्षित हिरासत में नहीं रखा जा सकता। न्यायालय ने यौनकर्मियों की पसंद का सम्मान करते हुए पीड़ित-केंद्रित पुनर्वास पर विशेष बल दिया है।

भारत में वयस्क नागरिकों के आपसी सहमति से स्वेच्छा (अपनी मर्जी) से किया जाने वाला सेक्स वर्क (वेश्यावृत्ति) अपराध नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों के अनुसार, सेक्स वर्कर एक पेशा है और इसमें शामिल वयस्कों को पुलिस उत्पीड़न से बचने व सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार है।
हालांकि, इस पेशे से जुड़ी कई अन्य गतिविधियां अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 (ITPA) और भारतीय कानूनों में पूरी तरह से गैर-कानूनी और दंडनीय हैं :

क्या गैर-कानूनी है?
वेश्यालय (Brothel) चलाना: वेश्यालय का संचालन करना या उसे प्रबंधित करना कानूनन अपराध है।
दलाली/एजेंसी (Pimping/Trafficking): किसी अन्य व्यक्ति के लिए ग्राहक खोजना, दलाली करना या यौन शोषण के लिए मानव तस्करी करना पूरी तरह से अवैध है।
सार्वजनिक स्थानों पर ग्राहकों को रिझाना: सार्वजनिक जगहों पर या उसके आसपास ग्राहकों को बुलाना और परेशान करना गैर-कानूनी है।

बाल वेश्यावृत्ति: नाबालिगों (18 वर्ष से कम) को वेश्यावृत्ति में धकेलना जघन्य अपराध है।

यौनकर्मियों के कानूनी अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई भी वयस्क सेक्स वर्कर यदि अपनी मर्जी से यह काम कर रहा है, तो पुलिस को उसके निजी जीवन या काम में दखल देने का अधिकार नहीं है। यदि पुलिस किसी रेड या कार्रवाई में जाती है, तो उन्हें यौनकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार नहीं करना चाहिए। मीडिया को भी हिदायत दी गई है कि वे रेस्क्यू या रेड के दौरान यौनकर्मियों की तस्वीरें प्रकाशित न करें।

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