सेकुलरिज्म
पाकिस्तान, बांग्लादेश और अन्य 55 मुस्लिम देशों में भी वैसा संभव नहीं है जैसा आज उत्तर प्रदेश और केंद्र में देखा जा रहा है। राज्य सरकार 250 मुस्लिम हज इंस्पेक्टरों की नियुक्ति कर रही है, जिन्हें डीए, टीए, मुफ्त हज यात्रा और विशेष भत्ते जैसी सुविधाएं दी जाएंगी। यह तब हो रहा है जबकि केंद्र सरकार पहले से ही आईएएस अधिकारियों, डॉक्टरों और सहायकों की टीम भेजती है जो हज शुरू होने से एक महीने पहले जेद्दाह पहुंच जाती है और बड़े होटलों में ठहरती है। उनका पूरा खर्च सरकारी कोष से वहन किया जाता है। यह तुष्टिकरण की एक स्पष्ट मिसाल है, जो पहले सीमित रूप में थी लेकिन 2014 के बाद इसमें कई गुना वृद्धि हुई है।
इसके विपरीत, झारखंड सरकार के एक हिंदू मंदिर के अधिग्रहण की खबर सामने आई है, जिससे यह प्रश्न उठता है कि क्या भारत का संविधान वास्तव में सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित कर पा रहा है? संविधान कहता है कि सरकार किसी भी धर्म के साथ भेदभाव नहीं कर सकती, परंतु वास्तविकता में सरकार जहां हज यात्रियों को विशेष सुविधाएं देती है, वहीं मंदिरों से टैक्स वसूलती है और उनकी आय पर नियंत्रण रखती है।
इसी क्रम में केरल उच्च न्यायालय का एक हाल का निर्णय विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वक्फ बोर्ड ने केरल के मुनंबम तट पर 404 एकड़ से अधिक भूमि पर दावा किया था, जिसका वहां के 600 से अधिक परिवारों ने विरोध किया। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि यह भूमि वक्फ की संपत्ति नहीं है और वक्फ का दावा केवल ज़मीन हड़पने की एक चाल थी। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि भारत में वक्फ बोर्डों के पास सबूतों से अधिक दावे हैं, जिनका कोई ठोस आधार नहीं होता।
साथ ही, अदालत ने यह भी कहा कि मंदिर का धन देवताओं का होता है, न कि सरकार का। राज्य को यह अधिकार नहीं है कि वह धार्मिक संस्थाओं की संपत्ति को अपने राजस्व का स्रोत बनाए। इस संदर्भ में यह बात स्पष्ट हो जाती है कि देश में धार्मिक समानता और धर्मनिरपेक्षता का वास्तविक पालन केवल तब संभव होगा जब हर धर्म के अधिकारों और संपत्तियों की रक्षा निष्पक्षता के साथ की जाए। वर्तमान परिस्थितियों में यह विरोधाभास हमारे संवैधानिक आदर्शों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
