सोनम वांगचुक दो दिन में मर जाएंगे,उनका 8 किलो वजन गिर गया है… हर दूसरे सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर के स्टोरी में ये दिख रहा है….
पर तब भी ये वो सेंटिमेंट नही ला पा रहा हैं ,जो हो चुका है…
क्या सचमूच आप 22 अप्रैल 2015 का दिन भूल गए हैं….
ठीक इसी जंतरमंतर पर लोग खा रहे हैं,पी रहे हैं…बाइट दे रहे हैं..कल तो कुणाल कामरा ने बकायदा सीता के पति से लेकर नीता के पति जैसा भद्दा मोकिंग स्टेटमेंट देकर लोगों से ताली बजवा दी है….उनको भी वो दिन याद नही होगा जब एक हुई रैली हुई थी आम आदमी पार्टी की…
रैली का नेतृत्व उस समय के संवैधानिक पद पर बैठे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कर रहे थे…
रैली का मुख्य मुद्दा भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक का विरोध था…
इसी रैली के दौरान राजस्थान के किसान गजेंद्र सिंह पेड़ पर चढ़ गए और बाद में उनकी अरविंद केजरीवाल और उनके चेलों के सामने मृत्यु हो गई…
इस घटना के बाद पूरे देश में क्या विवाद हुआ…आम आदमी पार्टी ने क्या किया… अरविंद केजरीवाल छुप गया और सबको याद है वो आशुतोष का मक्कारी के आंसू गिराना..
परिवार जनों ने आम आदमी पार्टी पर गजेंद्र को उकसाने का आरोप लगाया… दिल्ली पुलिस ने मामले की जांच की…
नतीजा किसी पार्टी के उकसावे पर जान देने वालों को कुछ नही मिला पर 2021 में पुलिस ने अदालत में कैंसलेशन रिपोर्ट दाखिल की, जिसमें किसी व्यक्ति के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने की बात कही गई….आदमी खत्म हो गया तो बात खत्म हो गया…
मुझे कुमार विश्वास के वाक्पटूता से बहुत कोफ्त होती है,हर उस व्यक्ति से होती है जो खुद को सर्वज्ञानी समझ लेता है, विद्यार्थी बनने की जगह पर…पर उनकी एक बात से मैं हमेशा सहमत रही हूं कि अरविंद केजरीवाल ने जनांदोलन की हत्या कर दी है…वजह है 2011 से 2015 तक उनका किया गया सत्तालोभ में भूखा रह कर नौटंकी प्रदर्शन…
जनलोकपाल बिल पर मिली सत्ता बस 10 साल में शराब,शिक्षा घोटाले में बदल गया… वैगनआर कब लग्जरी घर और सुख सुविधा में बदल गया,लोगों को जब तक ज्ञान हुआ वो फ्री बाइज के चक्कर में बहुत कुछ गंवा चुके थे…
ये सोनम का आंदोलन भी धर्मेश प्रधान के इस्तीफे की जगह जैसे ही राजनीति लोगों की आवाजाही और शिक्षा की जगह अननेसेसरी धर्म,फूड कल्चर,एक्टिविज्म में बदला ,लोगों का इंटरेस्ट खत्म हो गया….
आज सब सोनम के दो दिन में मर जाने की बाते कह रहे हैं जो ठीक उसी तरह गजेंद्र के मरने के बाद का आंदोलन खत्म करने का एग्जिट प्वाइंट ढूंढ रहे हैं और सोनम फंस चुके हैं क्योंकि आंदोलन ऐसे खत्म हुआ तो उनकी क्रेडिबिलिटी खत्म और नही खत्म हुआ तो उनकी मेडिकल कंडीशन की रिपोर्ट सामने हैं जिसमें अभी तक सब अंडर कंट्रोल है…
बाकी कल रात से जिन सोशल मीडिया इंफ्लूएंशर्स ने दिन रात दिपके का साथ दिया ,अब वो सोनम के पक्ष में और दिपके के खिलाफ पोस्ट लिखने लगे हैं कि कैसे दिपके ने इस आंदोलन को खुद पर सेंट्रलाइज्ड कर लिया और सारी फुटेज खुद खाने की कोशिश की…
सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो ये आंदोलन जल्दी ही व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप भांडाफोड़ पर खत्म होगा…
अंत में बस एक रिक्वेस्ट है कि सोनम वांगचुक को एक्टिविस्ट कहिए क्योंकि वो वैज्ञानिक नही है, नेचुरल ग्लेशियर की बर्फ इक्ट्ठा करके आर्टिफिशियल ग्लेशियर बनाना अगर वैज्ञानिक बनने की क्राइटेरिया है तो नाहक ही अंटार्कटिका में जी जान से वैज्ञानिक ग्लेशियर बचाने की कोशिश में जुटे हैं…
क्या आप जानते है सोनम वांगचुक की #पत्नी अमरीकी नागरिक है,…..
इनके पिता कांग्रेस से विधायक रहे है…..
खैर छोड़िए …..पहले कहानी पढ़िए……
अब आते हैं इस पूरी कहानी के सबसे अंधेरे अध्याय पर
– 32 साल पहले जब इस साजिश की मास्टरकी 🔑 एक अमेरिकी लड़की का रहस्यमय आगमन हुआ, नाम था रेबेका नॉर्मन।
1993 में जब कश्मीर में आतंकवाद अपने चरम पर था, तब यह 22-23 साल की अमेरिकी लड़की अचानक से लद्दाख पहुँची।
कौन सा युवा अमेरिकी अपने देश की सुख-सुविधाएँ छोड़कर भारत के सबसे दुर्गम इलाके में आना चाहेगा?
यह कोई साधारण बात नहीं थी।
रेबेका नॉर्मनने School for International Training (SIT) से 1991-1993 के बीच अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की थी।
यह SIT कोई साधारण कॉलेज नहीं है। वर्मोंट के ब्रैटलबोरो में स्थित यह संस्थान 1964 में पीस कॉप्स की ट्रेनिंग साइट के रूप में स्थापित हुआ था। अर्थात शांति सेना, किन्तु पीस कॉप्स का एजेंडा सिर्फ “शांति और मानवीय सेवा” तक सीमित नहीं है। इसकी गुप्त राजनीतिक दखलंदाजी के कई आयाम हैं।
दुनिया के देशों में आर्थिक और सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करना अमेरिकी श्रेष्ठता की भावना फैलाना विकासशील देशों के संसाधनों को चूसना, सरकारें गिराने और बनाने में भूमिका निभाना, अर्थात दुनियाभर में अमेरिका के छुपे हुए राजनीतिक और कूटनीतिक भूमिका को मजबूत करना है।
इसका सीधा संपर्क अमेरिकी विदेश विभाग से है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि आखिर SIT को फंडिंग कौन देता है?
फोर्ड फाउंडेशन, जॉर्ज सोरस का ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, और बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन।
ये वही संस्थाएँ हैं जो दुनियाभर में अमेरिकी हितों को आगे बढ़ाने का काम करती हैं।
तारीफ़ करनी होगी “रेबेका” के 32 साल के धैर्य, रणनीति और अपनी मातृभूमि अमेरिका के लिये समर्पण की, जो 1993 में लद्दाख आई और आज तक वहीं है – पूरे 32 साल से।
शुरुआत में जवान और खूबसूरत रेबेका, युवा वांगचुक की 1988 में स्थापित एनजीओ #SECMOL में अंग्रेजी शिक्षिका बनकर आई।
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3 साल रिलेशनशिप में रहने के बाद 1996 में सोनम वांगचुक ने उससे शादी कर ली। और यहीं से दिखता है असली खेल।
शादी के बाद वांगचुक की अंतरराष्ट्रीय पहुँच में जो आश्चर्यजनक तेजी आई, वह कोई संयोग नहीं था, इसमें स्पष्ट तौर पर रेबेका के माध्यम से भारत में अपने असेट को निर्मित करने में अमेरिका की भूमिका थी,
वो भी रणनीतिक रूप से उपयुक्त एक ऐसे सीमावर्ती स्थान पर जहाँ तीन देशों की सीमाएँ मिलती हों। फिर भारत में स्थित अमेरिकी प्रत्यक्ष और परोक्ष इको सिस्टम उसकी छवि गढ़ने में लग गये।
आउँगा उस नट्टू मुछंदर उर्फ टिंगू जि हादी पर भी आउंगा जो आजकल कलावा बाँध कर और तिलक लगा कर प्रधानमंत्री मोदी को जन्मदिन की बधाई दे रहा है, जिसकी बीवी को कभी भारत में डर लगता था।
उन्हें 2002 में अमेरिका आधारित गैर-लाभकारी संगठन अशोका की फेलोशिप मिली।
अशोका फेलोशिप दुनिया के सबसे बड़े सामाजिक उद्यमियों के नेटवर्क से जुड़ी एक प्रतिष्ठित फेलोशिप है और यह संस्था 70 से अधिक देशों में काम करती है।
भारत में 1981 से यह एक्टिव है और अब तक 307 अशोका फेलोज भारत में भी हैं।
नरेंद्र मोदी जी अब यह भी एक गंभीर जाँच का विषय है कि ये सारे मुखौटा धारी महानुभाव हैं कौन और ये किन किन गतिविधियों में जुटे हैं या जुटे रहे हैं, क्यूंकि सम्भव है कई गुजर चुके हों और कुछ गुजरने वाली स्थिति में हों।
2004 तक वांगचुक कांग्रेसी इको सिस्टम के खाँचे में फिट हो चुके थे और रिमोट कंट्रोल से कांग्रेस के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के माध्यम से उन्हें संरक्षण भी मिल गया और जल्द ही 2005 में राष्ट्रीय प्राथमिक शिक्षा गवर्निंग काउंसिल में नियुक्ति भी हो गयी।
2016 में रोलेक्स अवार्ड मिलता है जिसके तहत उन्हें 2,00,000 स्विस फ्रांक अर्थात भारतीय मुद्रा में आज के एक्सचेंज रेट के अनुसार लगभग 2 करोड़ 25 लाख रुपये।
यह पुरस्कार स्विट्जरलैंड की मशहूर घड़ी निर्माता कंपनी रोलेक्स (Rolex SA) द्वारा दिया जाता है, कहने को तो मानव कल्याण और पर्यावरण संरक्षण के लिए दिया जाता है
लेकिन मुख्यतः Rolex ब्रांड की वैश्विक छवि मजबूत करना होता है, लेकिन कहना न होगा कि इसके जैसी तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर भी अमेरिकी दबाव की छाया है जिनके CSR फंड का प्रयोग भी वो दुनियाभर के देशों में अपना मकसद पूरा करता है।
2018 में वांगचुक को रेमन मैग्सेसे अवार्ड मिला।
यह पुरस्कार फिलीपींस के तीसरे राष्ट्रपति रेमन मैग्सेसे (1953-1957) के नाम पर दिया जाता है जो शीतयुद्ध काल में स्वयं सीआईए के असेट थे।
1957 में “रेमन मैगसेसे फाउंडेशन” की स्थापना सीआईए समर्थित रॉकफेलर ब्रदर्स फंड जो अमेरिका की एक प्रमुख गैर-लाभकारी संस्था है, द्वारा की गयी जिसके शुरुआती ट्रस्टी भी अमेरिकन ही थे।
इस पुरस्कार का मक़सद अमेरिका समर्थित लोकतांत्रिक और सामाजिक मॉडल को एशियाई देशों में स्थापित करना है।
सोचिये अमेरिका कितनी दूर से मार करता है, और कैसे इन देशों की नामचीन हस्तियों को अपने प्रभाव में लेता है।
भारत में यह पुरस्कार तो बहुतों को मिला है पर उन्हें ही मिला जिनकी छवि अपने अपने दौर में एंटी एस्टेब्लिशमेंट (व्यवस्थाविरोधी अथवा सरकार विरोधी) थी।
टी एन शेषन से लेकर किरण बेदी और केजरीवाल से रविस कुमार तक सभी को इसी छवि के कारण पुरस्कार मिले।
बहुत ज्यादा अध्ययन और रिसर्च के बाद आप तक Rebecca की यह जानकारी पहुँच रही क्यूंकि उसकी बहुत सारी इन्फॉर्मेशन और तस्वीरें सुनियोजित ढंग से ब्लैकआउट की जा चुकी हैं।
फिर भी चिंता मत करिए हम ओर हमारे जैसे 😄
सोशल मीडिया के गुप्त खिलाड़ी वो सब बताएंगे जो अपने सुना ओर देखा नहीं होगा….
मेरी पुरानी 3 पोस्ट पढ़िए जिसमें मैग्सेसे का इतिहास और मैग्सेसे पाने वाले वांगचुग का काला चिट्ठा है
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