वांगचुक अनशन:कॉकरोच धरना क्यों नही हो पाया लांच?

सोनम वांगचुक का आंदोलन अब किसी तरह सम्मानजनक विदाई मिल जाए उतना बाकी है और जितने भी लोग आ रहे है वही लोग जो कभी साहिन बाग में थे तो किसान आंदोलन में थे, मणिपुर पर थे और आज NEET पर है।

आंदोलन की शुरुआत में जिस तरह के जनसमर्थन की उम्मीद की गई थी, वह वैसा दिखाई नहीं दिया। सोशल मीडिया पर कुछ और लेकिन ज़मीन पर बड़ी संख्या में आम लोगों की भागीदारी नहीं थी, इसी कारण अब धीरे-धीरे अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेता, कुछ फिल्मी हस्तियां और विभिन्न विचारधाराओं से जुड़े लोग समर्थन देने पहुंच रहे हैं, जिससे आंदोलन को एक राजनीतिक और प्रतीकात्मक सहारा मिले और फजीहत न हो।

जिनमें अभिनेत्री स्वरा भास्कर और समाजवादी पार्टी की सांसद प्रिया सरोज , राजदीप से लेकर आशुतोष, योगेंद्र यादव प्रशांत भूषण उसी कड़ी का हिस्सा हैं।
अब धीरे धीरे लेफ्ट विंग टुकड़े टुकड़े ढपली और बॉलीवुडिया गैंग एक्टिव हो चुका है जो इस सोनम वांगचुक के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहा है ताकि आने वाले समय मैं भी ऐसे ही कोई मोदी विरोधी आंदोलन खड़ा किया जा सके।

इनको ही नहीं बल्कि उस इकोसिस्टम को भी पता लग गया होगा कि सोशल मीडिया पर लाखों या करोड़ों फॉलोअर्स होना और जनता का वास्तविक समर्थन हासिल करना, दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं।

मोबाइल की स्क्रीन पर दिखाई देने वाला एक “फॉलो” बटन और सड़क पर उतरकर किसी आंदोलन में शामिल होना, दोनों की कीमत एक जैसी नहीं होती। लाखों लोग किसी व्यक्ति को मनोरंजन, जिज्ञासा, आदत या खबरों के लिए फॉलो कर सकते हैं, लेकिन जब बात किसी आंदोलन के समर्थन की आती है, तब वही लोग घर से निकलकर मैदान में आएं, यह बिल्कुल अलग परीक्षा होती है।

यही वजह है कि इतिहास में कई ऐसे आंदोलन हुए जिनके नेताओं के पास सोशल मीडिया जैसा कोई साधन नहीं था, फिर भी लाखों लोग स्वतः सड़कों पर उतर आए। वहीं आज ऐसे भी कई उदाहरण हैं जहां करोड़ों व्यूज़ और लाखों फॉलोअर्स होने के बावजूद वास्तविक भीड़ बहुत सीमित रही। सोशल मीडिया लोकप्रियता का पैमाना हो सकता है, लेकिन जनसमर्थन का अंतिम प्रमाण नहीं।

करोड़ों फॉलोअर्स के प्रभाव से सरकार पर तत्काल दबाव बनेगा, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारें केवल ऑनलाइन ट्रेंड देखकर नहीं, बल्कि व्यापक जनमत, संस्थागत प्रक्रियाओं और वास्तविक सामाजिक दबाव को देखकर निर्णय लेती हैं। यदि किसी आंदोलन को समाज के बड़े वर्ग का समर्थन नहीं मिलता, तो केवल डिजिटल लोकप्रियता उसके लिए पर्याप्त नहीं होती।

जनता भी सपोर्ट करती लेकिन जब देखा कि अनशन के नाम पर
👉मेरा लिंग मेरी मर्जी,
👉मैं क्या पहनूं टोटल LGBTQ मेरी मर्जी,हो रहा है,
👉रात के अंधेरे में जेएनयू के ढपली बाज चुम्मा चाटी का कार्यक्रम चला रहे है 👉हिंदू धर्म को गालियां छेड़खानी और
👉बस नाम रहेगा अल्लाह का चल रहा..

यहां तक को सोनम वांगचुक भी अपने आप को ठगा हुआ महसूस करने लगा था क्यों कि एक तरह वो तो लोगों को अपनी भूख हड़ताल दिखाना चाह रहा था दूसरी तरफ अभिजीत दीपके, सौरभ दास गपागप खाना ठूंसने में व्यस्त थे, बची कसर नवाबी लोगो के शौक पूरे करने वाले लौंडा नाच expert विजेता दहिया ने कर दी जो दिन रात ओर हर वक्त ठुमके लगाने का कार्यक्रम शुरू कर देता था।

तो लोगों ने भी इनकी तरफ ध्यान देना बंद कर दिया, और जो लोग आते भी थे तो सुबह की चाय दोपहर का नाश्ता और रात के खाने की वजह से आ रहे थे जिसे बाद में भीड़ कम होता देख शाहीन बाग 0.2 के कैटरर ने वो भी कम कर दिया।

आंदोलन के दौरान मूल मुद्दों के साथ-साथ ऐसे नारे, कार्यक्रम या गतिविधियां भी जुड़ गईं जिनसे बड़ी संख्या में सामान्य लोग स्वयं को नहीं जोड़ पाए। यदि किसी आंदोलन का केंद्र बिंदु धीरे-धीरे बदलने लगे या विभिन्न वैचारिक समूह अपने-अपने एजेंडे के साथ उसमें सक्रिय हो जाएं, तो आम जनता का ध्यान मूल उद्देश्य से हट जाता है।

आज की राजनीति में यह भ्रम बहुत तेजी से फैल गया है कि इंस्टाग्राम, यूट्यूब, एक्स या फेसबुक पर मिलियन फॉलोअर्स होने का अर्थ है कि वही लोग चुनाव में वोट देंगे, सड़कों पर उतरेंगे या हर आंदोलन में साथ खड़े होंगे। वास्तविकता इससे अलग है। सोशल मीडिया का एल्गोरिद्म लोकप्रियता दिखा सकता है, लेकिन लोकतंत्र में अंतिम ताकत जनता की वास्तविक भागीदारी, जनविश्वास और संगठन क्षमता से आती है।

राजनीतिक भूख हड़ताल इन स्वास्थ्य संबंधी उपवासों से अलग होती है। उसका उद्देश्य किसी मांग की ओर सरकार और समाज का ध्यान आकर्षित करना होता है। लोकतंत्र में उसका प्रभाव अंततः इस बात पर निर्भर करता है कि उसे कितना व्यापक जनसमर्थन प्राप्त होता है। यदि जनता बड़ी संख्या में किसी आंदोलन के साथ खड़ी होती है, तो उसका राजनीतिक प्रभाव बढ़ जाता है। यदि ऐसा नहीं होता, तो केवल सोशल मीडिया की लोकप्रियता या कुछ चर्चित चेहरों का समर्थन किसी आंदोलन को स्वतः सफल नहीं बना देता।
अन्ना आंदोलन भी यही है और साहिन बाग से लेकर ये वांगचुक आंदोलन भी यही है ,दोनों में जमीन आसमान का अंतर था।

आखिरकार लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत न तो ट्रेंडिंग हैशटैग होती है, न वायरल वीडियो और न ही करोड़ों फॉलोअर्स। सबसे बड़ी ताकत जनता का वास्तविक विश्वास, निरंतर समर्थन और शांतिपूर्ण जनभागीदारी होती है। यही अंतर सोशल मीडिया की लोकप्रियता और वास्तविक जनसमर्थन के बीच सबसे स्पष्ट रेखा खींचता है।

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‘कॉकरोचों’ के साथ एक रात, जंतर मंतर प्रोटेस्ट में मैंने क्या-क्या देखा
दिल्ली के एक वर्ग के लिए जंतर-मंतर आज भी देश का वह प्रदर्शनस्थल है, जहां लोग सत्ता से जवाबदेही मांगने आते हैं लेकिन दूसरे वर्ग को यह चुपचाप ऐसी जगह बन चुका है, जहां लोग शाम बिताने, घूमने-फिरने और घर लौटने से पहले कुछ समय बिताने आते हैं. हालांकि, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का यह आंदोलन इसलिए अलग दिखता है.

जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी का प्रोटेस्ट जारी है.
अविनाश कटील 15 जुलाई 2026,(आजतक में)
जब दिल्ली के नौकरीपेशा लोग दफ्तर से घर लौट रहे थे और शाम का ट्रैफिक कनॉट प्लेस को अपनी चपेट में ले रहा था, तब मैं एक ‘कॉकरोच’ बन चुका था. वह कॉकरोच नहीं, जिसे देखकर लोग चप्पल उठाकर मारने दौड़ पड़ते हैं, बल्कि व जिसे पिछले कुछ हफ्तों से नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर ठिकाना मिल गया है.

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) 28 जून से यहां केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को प्रदर्शन कर रही है और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी यहां अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं. इसलिए, एक रात को मैं भी उन्हीं में से एक कॉकरोच बन गया.

मैं शाम करीब 5:30 बजे जंतर-मंतर के प्रदर्शन स्थल पर पहुंचा. मेरे पास मोबाइल फोन, एक छाता, एक कंबल और एक पत्रकार की नहीं बल्कि एक युवा प्रदर्शनकारी जैसी जिज्ञासा थी. मैं पहले भी कई बार जंतर-मंतर आ चुका हूं, यहां तक कि उस पहले दिन भी जब अभिजीत दिपके के नेतृत्व में CJP ने अपना आंदोलन शुरू किया था लेकिन इस बार मेरा इरादा यहां पत्रकार नहीं, बल्कि एक प्रदर्शनकारी की तरह पूरी रात बिताने का था.

आंदोलन जोशीले भाषणों और नारेबाजी को याद किए जाते हैं लेकिन जंतर-मंतर में पूरी रात बिताने के बाद मैंने महसूस किया कि किसी भी आंदोलन की नींव सिर्फ इन्हीं चीजों पर नहीं, बल्कि कई और छोटे-छोटे पहलुओं पर भी टिकी होती है.

प्रदर्शनकारियों की भीड़ उम्मीद से ज्यादा

प्रदर्शनस्थल की ओर जाते समय मुझे लगा था कि मंगलवार होने से वहां ज्यादा भीड़ नहीं होगी. आखिरकार, यह कामकाजी दिन था. सोचा था कि प्रदर्शनकारी कम होंगे, मंच लगभग खाली होगा और वॉलेंटियर्स वीकेंड का इंतजार कर रहे होंगे. लेकिन जंतर-मंतर पहुंचने के शुरुआती कुछ मिनटों ने मेरी इस धारणा को सही भी साबित किया. प्लास्टिक की अधिकांश कुर्सियों पर दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के जवान बैठे थे, जबकि कई कुर्सियां अब भी खाली पड़ी थीं.

वामपंथी छात्र संगठनों AISF, SFI और AISA के कुछ कार्यकर्ता गोल घेरा बनाकर बैठे धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे थे. मुख्य मंच पर CJP के प्रमुख चेहरे थे. तेज गर्मी में बीता लंबा दिन खत्म होने को था और जंतर-मंतर की हवा पसीने की गंध से भारी हो चुकी थी.

प्रदर्शनस्थल के प्रवेश द्वार पर दिल्ली पुलिस के एक जवान ने मुझे रोककर सुरक्षा जांच की, जिसे वे एंटी-सैबोटाज चेक कहते हैं. जब वह मेरा बैग जांच रहा था, तो मैंने उससे बातचीत शुरू कर दी. पूछा कि रोज सबसे ज्यादा भीड़ कब जुटती है. उसने बताया, ‘ठीक उसी समय, जब आप आए हैं…’

उन्होंने कहा, ‘सुबह 10 बजे के बाद यहां बहुत कम लोग रहते हैं लेकिन शाम 6 बजे तक इंतजार कीजिए, तभी लोग बड़ी संख्या में आते हैं.’ कई महीनों से जंतर-मंतर पर तैनाती ने उस पुलिसकर्मी को आंदोलनों की गतिविधियों का अच्छा पर्यवेक्षक बना दिया था. उसकी बात आधे घंटे में ही सच हो गई. जंतर-मंतर के बाहर का फुटपाथ लोगों से भरने लगा.

कुछ लोग सीधे दफ्तर से पहुंचे. कॉलेज के छात्र हाथों में लिपटे हुए बैनर लेकर समूहों में आए. बुजुर्ग पुरुष और महिलाएं भी यह कहते हुए पहुंचे कि वे अपने पोते-पोतियों की शिक्षा का भविष्य सुरक्षित करने के लिए आए हैं. जंतर-मंतर पर मौजूद हर व्यक्ति प्रदर्शन करने या इस्तीफे की मांग के लिए नहीं आया था.

दिलचस्प बात यह थी कि जंतर-मंतर पर मौजूद हर व्यक्ति आंदोलन का हिस्सा नहीं था. युवा जोड़े हाथों में हाथ डाले प्रदर्शनस्थल पर टहल रहे थे. वे किसी पोस्टर को पढ़ने के लिए रुकते और फिर आगे बढ़ जाते. परिवार मुख्य मंच के पास तस्वीरें खिंचवा रहे थे. युवाओं के कुछ समूह भाषण सुनने से ज्यादा इंस्टाग्राम रील बनाने में व्यस्त दिखाई दिए.

दिल्ली के एक वर्ग के लिए जंतर-मंतर आज भी देश का वह प्रदर्शनस्थल है, जहां लोग सत्ता से जवाबदेही मांगने आते हैं लेकिन दूसरे वर्ग के लिए यह चुपचाप एक ऐसी जगह बन चुका है, जहां लोग शाम बिताने, घूमने-फिरने और घर लौटने से पहले कुछ समय बिताने आते हैं. हालांकि, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का यह आंदोलन इसलिए अलग नजर आता है क्योंकि इसने देश के अलग-अलग हिस्सों और विभिन्न विचारधाराओं से जुड़े लोगों को एक साथ आने का मंच दिया है.

सोनम वांगचुक के समर्थन में उमड़ रहे हैं लोग

जंतर-मंतर पर जिज्ञासा और आंदोलन के मिले-जुले माहौल के बीच एक ऐसा शख्स था, जिसके इर्द-गिर्द सब कुछ घूमता नजर आ रहा था. वह थे लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक.

मैं चुपचाप खड़ा होकर लोगों की बातचीत सुनता रहा. सबसे ज्यादा जिस नाम का जिक्र सुनाई दे रहा था, वह था सोनम वांगचुक. लोग पूछ रहे थे, ‘वह कब तक भूख हड़ताल पर रहेंगे? हम उनके जैसे इनोवेटर को खो नहीं सकते.’

मंगलवार को वांगचुक की भूख हड़ताल का 17वां दिन था. उनकी सेहत को लेकर चिंताएं लगातार बढ़ रही थीं और विभिन्न क्षेत्रों की कई प्रमुख हस्तियां उनसे अनशन खत्म करने की अपील कर रही थीं. जंतर-मंतर पर मौजूद आम लोगों के बीच भी उनकी सेहत को लेकर गहरी चिंता साफ दिखाई दे रही थी.

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के दर्जनों वॉलेंटियर्स अलग-अलग जिम्मेदारियां संभाल रहे थे. छात्र संगठनों ने अपने-अपने कोने बना रखे थे लेकिन लगभग हर बातचीत आखिरकार एक ही नाम पर आकर खत्म होती थी सोनम वांगचुक. यह बात वहां तैनात सुरक्षाबलों के जवान भी महसूस कर रहे थे. बैरिकेड के पास खड़े रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के एक जवान ने मुझसे कहा, ‘लोग वांगचुक को देखने आ रहे हैं. भीड़ उन्हीं की वजह से है.’

वांगचुक के संबोधन ने भावुक कर दिया

बुधवार को सोनम वांगचुक की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल 18वें दिन में पहुंच गई. वह अब केवल इस आंदोलन का चेहरा नहीं रह गए थे, बल्कि लोगों के लिए इस आंदोलन की भावनात्मक ताकत बन चुके थे. कई दिनों से लगातार उपवास के कारण वांगचुक सार्वजनिक रूप से बोलने से बच रहे थे. ऐसे में जब शाम करीब 7 बजे यह खबर फैलने लगी कि वह लोगों को संबोधित करेंगे, तो पूरे प्रदर्शनस्थल पर उत्साह की लहर दौड़ गई.

कुछ ही मिनटों में अलग-अलग जगह बैठे लोग मंच के पास आकर जमा होने लगे. वॉलेंटियर्स ने अपनी बातचीत रोक दी. सैकड़ों मोबाइल फोन रिकॉर्डिंग के लिए हवा में उठ गए. यहां तक कि जो लोग यूं ही टहल रहे थे, वे भी वहीं रुक गए. मेरे बगल में खड़े एक युवा प्रदर्शनकारी ने कहा, ‘हमें नहीं पता था कि वह आज बोलेंगे. यह हमारे लिए एक सरप्राइज था.’

वांगचुक ने अपने संबोधन की शुरुआत उन लोगों का आभार जताते हुए की, जिन्होंने चुपचाप उनके साथ भूख हड़ताल में हिस्सा लिया. उन्होंने कहा, ‘हो सकता है कि हमारी भूख हड़ताल से तुरंत किसी का इस्तीफा न हो, लेकिन अगर इससे लोगों में जागरूकता आती है, तो हमारा उद्देश्य पूरा हो जाएगा.

उन्होंने कहा, ‘सिर्फ एक व्यक्ति के इस्तीफे से बहुत कुछ नहीं बदलता. जिस दिन जनता जाग जाएगी, उसी दिन भारत सरकार के हर विभाग में बदलाव दिखाई देगा. लगातार कई दिनों से उपवास पर होने के कारण उनकी ऊर्जा काफी कम हो चुकी थी इसलिए उन्होंने लगभग 10 मिनट तक ही लोगों को संबोधित किया.

वांगचुक की तरह कई और लोग भी भूख हड़ताल पर बैठे हैं

मंगलवार शाम वांगचुक के भाषण के बाद जब लोग मंच के आसपास से हटने लगे, तो मैंने उन प्रदर्शनकारियों की ओर जाना तय किया जो सुर्खियों और नारों से दूर चुपचाप अपना आंदोलन चला रहे थे. वहां करीब 10 प्रदर्शनकारी ऐसे थे, जो वांगचुक की तरह अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे थे.

जहां एक ओर सोशल मीडिया पर CJP के अभिजीत दिपके के कचौड़ी, नूडल्स और ब्रेड पकौड़ा खाते हुए वीडियो वायरल हो रहे थे, वहीं इन दूसरे अनशनकारियों की लगभग कोई चर्चा नहीं हो रही थी. उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से आए बहादुर सिंह मंगलवार को अपनी भूख हड़ताल के 14वें दिन में थे. एक पतले गद्दे पर पालथी मारकर बैठे बहादुर सिंह ने धीमी आवाज में बताया कि पांच मांगों ने उन्हें घर छोड़कर यहां आने के लिए मजबूर किया.

उन्होंने कहा, ‘मैं देश के लिए यहां आया हूं और जब तक अपनी मांगें पूरी नहीं करा लेता, तब तक घर वापस नहीं जाऊंगा.’ उनके बगल में लखनऊ से आए दीपक यादव बैठे थे, जिन्होंने बिना भोजन के 10 दिन पूरे कर लिए थे. उनके साथ तीन अन्य प्रदर्शनकारी भी थे, जिन्होंने हाल ही में अपना अनशन शुरू किया था.

बहादुर सिंह के तंबू के ठीक दाहिनी ओर आमीन, नेहा और मनीष बैठे थे, जो छात्र संगठन AISA से जुड़े हैं.। वे भी अपनी 17वें दिन की भूख हड़ताल जारी रखे हुए थे.

खाना बना सबसे बड़ा आकर्षण

चारों ओर आंदोलन की हलचल के बीच रात 10 बजे ठीक समय पर खाना पहुंचा और माहौल अचानक बदल गया. ऐसा लगा मानो भोजन ने पूरे आंदोलन को एक-दूसरे से जोड़ने का काम किया हो.

कुछ ही देर में वॉलेंटियर्स बड़े-बड़े स्टील के बर्तन लेकर भीड़ के बीच से गुजरने लगे. एक बर्तन में चावल थे, दूसरे में गाढ़ी सब्जी. डिस्पोजेबल प्लेटों के ढेर लगा दिए गए और देखते ही देखते बिना किसी शोर-शराबे के लोग कतार में लग गए. किसी को निर्देश देने की जरूरत नहीं पड़ी. ऐसा लग रहा था मानो सबने पिछले कई हफ्तों में यह व्यवस्था पहले से सीख ली हो.

मैं भी चुपचाप लाइन में लग गया. आखिर एक रात के लिए मैं भी कॉकरोच बन चुका था और सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो देखने के बाद मुझे भी इस खाने को लेकर उत्सुकता थी. मेरे हाथ में कागज की प्लेट थी और मैं बाकी लोगों की तरह अपनी बारी का इंतजार कर रहा था. जब मेरी प्लेट में चावल डाले गए, तो खाना परोस रहे वॉलेंटियर ने मुस्कुराते हुए कहा कि थोड़ा और ले लीजिए. खाना बेहद साधारण था, चावल और हल्के मसालों वाली ग्रेवी लेकिन जमीन पर पालथी मारकर कागज की प्लेट में बैठकर खाने का स्वाद कुछ अलग ही था.

खाने का खर्च कौन उठा रहा है?

कुछ देर बाद चावल खत्म हो गए, लेकिन किसी ने शिकायत नहीं की. वॉलेंटियर्स ने तुरंत बची हुई ग्रेवी के साथ समोसे परोसने शुरू कर दिए और लोगों की कतार बिना रुके आगे बढ़ती रही. रात 11:30 बजे, जब सबको लगा कि भोजन समाप्त हो चुका है, तभी एक व्यक्ति सिर पर बड़ा स्टील का बर्तन लेकर पहुंचा. उनका नाम रिजवान था. वे सीलमपुर-जाफराबाद से मीठे चावल बनाकर लाए थे.

उन्होंने हंसते हुए कहा, ‘मैंने दोपहर में मीठे चावल खाए थे. सोचा, आज रात मेरे ‘कॉकरोच’ भी मीठे चावल खाएं.’ मीठे चावलों के साथ आइसक्रीम के डिब्बे भी पहुंचे, जो कुछ ही मिनटों में खत्म हो गए. बच्चे उत्साह से दौड़ पड़े, जबकि बड़े लोग अपनी बारी का धैर्यपूर्वक इंतजार करते रहे. मुझे भी मिक्स्ड फ्रूट कैंडी आइसक्रीम मिली.

बाद में CJP के कई वॉलेंटियर्स ने बताया कि लगभग हर दिन का भोजन समर्थकों के सहयोग से तैयार होता है. कोई आर्थिक मदद करता है, तो कोई अपने घर से खाना बनाकर लेकर आता है. बिस्कुट, पीने का पानी और दूसरी जरूरी चीजें भी पूरे दिन उपलब्ध रहती हैं, ताकि प्रदर्शन में आने वाला कोई भी व्यक्ति भूखा या प्यासा वापस न जाए. रात के खाने के दौरान हंसी-मजाक का माहौल था, लेकिन एक दृश्य मेरे मन में हमेशा के लिए बस गया.

करीब 9:30 बजे, जब लोगों के लिए खाना लगाया जा रहा था, तभी सोनम वांगचुक चुपचाप करवट बदलकर मंच के बैंकग्राउंड की ओर मुंह करके लेट गए और सो गए. सच कहूं तो मुझे नहीं पता कि उन्होंने ऐसा क्यों किया. क्या वे इसलिए मुड़ गए कि सामने लोग खाना खा रहे थे जबकि वे स्वयं भूख हड़ताल पर थे? यह सिर्फ मेरी एक धारणा है लेकिन ये मेरे लिए पूरी रात का सबसे मार्मिक दृश्य था.

अभिजीत दिपके पर उठे सवाल

रात के भोजन के बाद मेरी मुलाकात उत्तर प्रदेश से आए CJP के वॉलेंटियर हसन अली से हुई. अली को वहां मौजूद लगभग हर व्यक्ति जानता था. हर कुछ मिनट में कोई न कोई उनसे पीने का पानी, किसी बुजुर्ग के लिए कुर्सी, मंच तक पहुंचने का रास्ता या कार्यक्रम की जानकारी पूछने आ जाता. वह हर सवाल का जवाब मुस्कुराते हुए और पूरे धैर्य के साथ देते रहे.

मैंने उनसे पूछा कि अगर मुझे यहीं रात बितानी हो तो क्या व्यवस्था होगी. मेरे पास कंबल और जरूरी सामान देखकर उन्होंने कहा, ‘अगर आप अपना बिस्तर नहीं लाए होते तो हम आपके लिए चादर का भी इंतजाम कर देते.’

उन्हें देखकर महसूस हुआ कि आंदोलन सिर्फ भाषणों के दम पर नहीं चलते. वे उन सैकड़ों गुमनाम वॉलेंटियर्स की मेहनत पर टिके रहते हैं, जो बिना किसी पहचान या प्रशंसा की उम्मीद के लगातार काम करते रहते हैं. रात 11:30 बजे के बाद प्रदर्शन का माहौल बदल गए. लोग छोटे-छोटे समूहों में बैठकर अपनी-अपनी चर्चा में मशगूल हो गए.

मैं भी अलग-अलग समूहों के बीच घूम रहा था कि एक बातचीत ने मुझे रोक लिया. पहली बार मैंने कुछ प्रदर्शनकारियों को CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके और संगठन के कुछ प्रमुख चेहरों की आलोचना करते सुना.

बुधवार की रात लगभग एक बजे का समय था. मुख्य मंच पर सन्नाटा था. सिर्फ सोनम वांगचुक सो रहे थे और कुछ स्वयंसेवक उनके पास बैठे थे लेकिन अभिजीत दिपके, सौरव दास, विजेता दहिया और आशुतोष रांका जो CJP के प्रमुख चेहरे माने जाते हैं. वहां मौजूद नहीं थे. आधी रात को उनकी अनुपस्थिति चर्चा का विषय बन गई.

एक प्रदर्शनकारी ने कहा, ‘कम से कम उनमें से किसी एक को सोनम सर के साथ रहना चाहिए था.’ समूह में बैठे एक बुजुर्ग ने टिप्पणी की, ‘इससे लगता है कि वे आंदोलन को लेकर उतने गंभीर नहीं हैं.’

सुबह होने से पहले जंतर-मंतर पर छाई खामोशी

जैसे-जैसे सुबह होने लगी. चर्चाओं की जगह धीरे-धीरे सन्नाटे ने ले ली. कुछ युवा प्रदर्शनकारी गद्दों पर लेट गए थे. कुछ अपने बैग के सहारे टिके हुए शाम को बनाई गई इंस्टाग्राम रील्स बार-बार देख रहे थे. तभी एक दिलचस्प घटना हुई. करीब एक ही समय पर आसपास कई मोबाइल फोन से फिल्म ‘3 इडियट्स’ का गीत ‘कहां से आया था वो…’ बजने लगा.

फिल्म 3 इडियट्स की कहानी सोनम वांगचुक के जीवन और विचारों से प्रेरित मानी जाती है. फिल्म में आमिर खान का निभाया गया रैंचो (फुंसुख वांगडू) चरित्र भी वांगचुक से प्रेरित बताते है और संयोग से तब वांगचुक कुछ ही मीटर दूर सो रहे थे. करीब 2 बजे मैं भी अपना कंबल बिछाकर लेट गया.

सुबह चार बजे तक जंतर-मंतर पूरी तरह शांत हो चुका था. मंच की रोशनी धीमी पड़ गई थी. बैनरों की जगह अब कंबलों ने ले ली थी. सिर्फ कुछ कॉकरोच अब भी जागे  थे. कुछ आंदोलन के गीत गुनगुना रहे थे, तो कुछ 20 जुलाई को प्रस्तावित संसद मार्च के अपने प्रदर्शन की तैयारी कर रहे थे. जब मैं पुलिस बैरिकेड पार कर उस दिल्ली में वापस लौटा, जो आखिरकार सो चुकी थी, तब मुझे एहसास हुआ कि उस मंगलवार की रात मैं सिर्फ कॉकरोचों को देखने वाला एक पत्रकार नहीं रह गया था. मैं खुद उनमें से एक बन गया था और यह रात शायद हमेशा मेरे साथ रहेगी.

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