वांगचुक अनशन: कॉकरोच धरना क्यों न हो पाया लांच? कांग्रेस कहां?
सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल से राहुल गांधी की दूरी पर सवाल, कांग्रेस का क्या है रूख?
सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक दिल्ली के जंतर मंतर पर पिछले 19 दिनों से अनशन पर हैं. उनकी सेहत को लेकर चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं.
पिछले महीने 28 जून से सोनम वांगचुक ने अनशन शुरु किया था । तब से उनका वजन नौ किलो तक घट गया है. विपक्ष के कई नेताओं ने उनसे अनशन ख़त्म करने की अपील की है लेकिन वांगचुक ने अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है.
प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितता को लेकर जंतर मंतर पर विरोध-प्रदर्शन की शुरुआत कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने की थी और बाद में सोनम वांगचुक इसमें शामिल हुए थे.
वांगचुक के इस अनशन की तुलना 2011 में अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के अनशन से भी हो रही है. तब अन्ना के साथ बॉलीवुड की कई हस्तियों समेत विपक्ष के नेता भी अनशन स्थल आते थे लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो रहा है. तब विपक्ष में भारतीय जनता पार्टी थी और केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी.
अब केंद्र में भाजपा सरकार है और कई लोग लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से सवाल पूछ रहे हैं कि वह इस अनशन से दूर क्यों हैं?
2011 में अन्ना आंदोलन के दौरान तत्कालीन विपक्षी पार्टी भाजपा खुलकर समर्थन कर रही थी लेकिन कांग्रेस सतर्क दिख रही है
हाल के हफ़्तों में राहुल गांधी ने नीट परीक्षा में अनियमितताओं पर भाजपा सरकार की तीखी आलोचना की और देश के प्रमुख कोचिंग केंद्र कोटा में छात्रों से भी मिले. लेकिन दिल्ली में सीजेपी के प्रदर्शन से उनकी तत्काल अनुपस्थिति ने सवाल खड़े किए हैं.
भूख हड़ताल पर बैठे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने कहा कि अगर विपक्षी दल युवा-नेतृत्व वाले इस आंदोलन में शामिल नहीं होते हैं, तो यह उनकी “संकीर्ण सोच” मानी जाएगी.
वांगचुक ने द इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि अगर विपक्ष, जिसमें कांग्रेस भी शामिल है, नीट परीक्षा में अनियमितताओं के ख़िलाफ़ कॉकरोच जनता पार्टी की ओर से शुरू किए गए इस आंदोलन का समर्थन नहीं करता, तो जनता उन्हें ख़ारिज कर देगी.
राहुल गांधी 17 जुलाई को देहरादून में छात्रों के साथ एक जनसभा करेंगें. कांग्रे ‘छात्रों की गूंज’ अभियान चला रही है, जिसमें वह पेपर लीक विषय पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा मांग रही है. यही सीजेपी के आंदोलन का भी प्रमुख मुद्दा है.
2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की हार में अन्ना आंदोलन की भी भूमिका मानी जाती है. तब भाजपा अन्ना आंदोलन का समर्थन कर रही थी. इसका फ़ायदा अरविंद केजरीवाल को दिल्ली में हुआ था क्योंकि 2013 में 15 सालों से सत्ता में रही कांग्रेस को हरा दिया था और भाजपा पहली बार पूर्ण बहुमत से केंद्र में सत्ता में आई थी.
ऐसे में कहा जा रहा है कि कांग्रेस में डर है कि कहीं भाजपा विरोधी माहौल सीजेपी के पक्ष में न चला जाए.
कांग्रेस से सवाल उनके नेताओं के जवाब
वरिष्ठ पत्रकार निखिल वागले ने एक्स पर सवाल पूछा है कि कांग्रेस पार्टी सीजेपी के आंदोलन से ख़ुद को दूर क्यों रख रही है?
निखिल वागले की इस पोस्ट का जवाब गुजरात के वडगाम से कांग्रेस विधायक जिग्नेश मेवाणी ने दिया, ”मैं आपकी पोस्ट में जताई गई चिंता का सम्मान करता हूँ. जब सोनम वांगचुक जी जैसे व्यक्ति, जिन्हें शिक्षा के क्षेत्र में वास्तविक इनोवेशन के लिए जाना जाता है, लाखों बच्चों और उनके अभिभावकों का भविष्य बर्बाद करने वाली अनियमितताओं के ख़िलाफ़ भूख हड़ताल पर बैठते हैं, तो यह निश्चित रूप से पूरे देश का ध्यान मांगता है. उनकी बिगड़ती सेहत हम सभी के लिए चिंता का विषय है. कांग्रेस उनके साथ खड़ी है और हर उस नागरिक के साथ है जो इन मुद्दों पर संघर्ष कर रहा है.”
जिग्नेश ने लिखा है, ”लेकिन हमें पूरे परिप्रेक्ष्य को भी देखना चाहिए.
जिग्नेश को जवाब देते हुए निखिल वागले ने लिखा है, ”मैं जानता हूँ कि राहुल गांधी और एनएसयूआई इस मुद्दे पर पहले से अभियान चला रहे हैं. लेकिन सोनम वांगचुक का समर्थन करने में क्या ग़लत है? इससे निश्चित रूप से राहुल गांधी की साख और जनस्वीकार्यता बढ़ेगी.”
”राहुल गांधी समझें कि वह सिर्फ़ एक राजनीतिक दल के नेता नहीं हैं, बल्कि लोकसभा में विपक्ष के नेता भी हैं. इसलिए उन्हें हर उस नागरिक आंदोलन के साथ खड़ा होना चाहिए, जो संविधान में विश्वास रखता है.”
”भारत जोड़ो यात्रा के बाद अपने अभियानों से राहुल गांधी ने लोगों की अपेक्षाएं काफ़ी बढ़ा दी हैं. मैंने भारत जोड़ो यात्रा के दौरान उनके जुनून और प्रतिबद्धता को क़रीब से देखा है. लेकिन अगर उन्हें पूरे देश का नेतृत्व करना है, तो उन्हें जनता के मुद्दों और आंदोलनों के प्रति और अधिक संवेदनशील होना होगा.”
भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक की बिगड़ती सेहत
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा सांसद शशि थरूर ने जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रहे लोगों को संबोधित एक पत्र लिखा है. थरूर ने लिखा है, ”मैं आज आपसे एक राजनेता या सांसद के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के रूप में बात कर रहा हूँ जो भारत की युवा पीढ़ी के साथ जो कुछ हो रहा है, उससे गहराई से व्यथित है.”
”यह मुद्दा मेरे लिए व्यक्तिगत भी है. मेरा जन्म एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ. मेरे पिता अख़बार में नौकरी करते थे और मेरी मां गृहिणी थीं. परिवार में तीन बच्चों की पढ़ाई की ज़िम्मेदारी पिता की एकमात्र आय पर थी. हमारे जैसे परिवार के लिए योग्यता कोई नारा नहीं थी. छात्रवृत्ति, निष्पक्ष परीक्षाएं और ईमानदार परिणाम ही वे रास्ते थे, जिनके सहारे एक वेतन तीन बच्चों के सपनों को आगे बढ़ा सकता था.”
”मैंने मुंबई और कोलकाता में स्कूली शिक्षा प्राप्त की, फिर दिल्ली में कॉलेज की पढ़ाई की. विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान हासिल किया और आईआईएम में प्रवेश भी मिला. लेकिन मैंने अपनी रुचि के विषय अंतरराष्ट्रीय संबंधों का अध्ययन करने के लिए छात्रवृत्ति के सहारे अमेरिका जाने का फ़ैसला किया. मुझे विरासत में कुछ नहीं मिला. जो कुछ भी हासिल किया, वह कड़ी मेहनत और हां, परीक्षाओं के दम पर किया.”
”इसीलिए मैं जानता हूं कि निचले और मध्यम आय वर्ग के युवाओं के लिए योग्यता आधारित और निष्पक्ष व्यवस्था ही आगे बढ़ने की सबसे बड़ी सीढ़ी है. जब यही सीढ़ी टूट जाती है, जब प्रश्नपत्र लीक हो जाते हैं, परीक्षाएं रद्द हो जाती हैं और व्यवस्था पर भरोसा ख़त्म हो जाता है, तब अमीर और प्रभावशाली लोगों के बच्चों पर इसका वैसा असर नहीं पड़ता. उनके पास आगे बढ़ने के दूसरे रास्ते होते हैं. लेकिन टूटते हैं आपके सपने, आपके परिवारों के त्याग और कई बार तो दुखद रूप से युवाओं की जिंदगियां भी”
इस बीच सोमवार को शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने राहुल गांधी से अपील की कि वे दिल्ली के जंतर-मंतर पहुंचकर जारी प्रदर्शन का समर्थन करें. ठाकरे ने कॉकरोच जनता पार्टी और सोनम वांगचुक के प्रति अपना समर्थन जताते हुए आंदोलन के पक्ष में अधिक लोगों के आगे आने की अपील की.
उन्होंने कहा, “मैं भी जाऊंगा. राहुल गांधी जी को भी जाना चाहिए. जिन लोगों को देश के युवाओं पर भरोसा है, उन्हें वहाँ जाना चाहिए. पूरे देश के लोगों को सड़कों पर उतरकर उनका समर्थन करना चाहिए.”उद्धव ठाकरे 20 जुलाई को दिल्ली पहुंचकर जंतर-मंतर जाकर प्रदर्शन में शामिल होंगें.
कॉकरोच जनता पार्टी को कई विपक्षी दलों के नेताओं का समर्थन मिल चुका है, लेकिन कांग्रेस ने अब तक सार्वजनिक समर्थन की घोषणा नहीं की है, जबकि वह पिछले कई महीनों से यही मुद्दा उठाती रही है.
आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) समेत कई विपक्षी दलों के नेताओं ने या तो आंदोलन के प्रति एकजुटता जताई है या फिर जंतर-मंतर पहुंचकर प्रदर्शनकारियों से मुलाक़ात की है.
आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी, तृणमूल कांग्रेस की महुआ मोइत्रा और कीर्ति आज़ाद, सीपीआईएस के महासचिव एम. ए. बेबी, वृंदा करात और केरल की वरिष्ठ नेता के. के. शैलजा,राकेश टिकैत ने इस ऑनलाइन संगठन का समर्थन किया है.
इससे पहले पिछले साल सितंबर में सोनम वांगचुक लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने को भूख हड़ताल पर बैठ थे. विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गया था और चार लोगों की जान चली गई थी. भारत के गृह मंत्रालय ने सोनम वांगचुक को ज़िम्मेदार ठहरा उन्हें गिरफ़्तार किया था.
सोनम वांगचुक से सोशल मीडिया पर लोगों ने सवाल पूछना शुरू कर दिया था कि वह पाकिस्तान क्यों गए थे. यह सवाल मैंने सितंबर 2025 में सोनम वांगचुक से पूछा था तो उन्होंने जवाब में कहा था, ”मैं जनवरी 2025 में पाकिस्तान गया था. संयुक्त राष्ट्र का पर्यावरण से जुड़े कार्यक्रम में तो मैंने मोदी साहब के पर्यावरण से जुड़े अच्छे कार्यक्रमों की तारीफ़ भी की थी. यह बहुत मर्यादित कार्यक्रम था और उसमें केवल मैं ही नहीं भारत के छह और एक्सपर्ट्स थे. यह कोई मेरा गोपनीय दौरा नहीं था.”
सोनम वांगचुक को लेकर भाजपा सरकार का रुख़ सख़्त रहा है
सोनम वांगचुक कौन हैं?
59 साल के सोनम वांगचुक से प्रेरित होकर फिल्म थ्री इडियट्स बनी थी. वांगचुक मानते हैं कि शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदला ज़रूरी है. उनका कहना है कि बच्चों को ऐसी शिक्षा दें, जिससे वे वास्तविक जीवन की समस्याओं के समाधान खोजने में सक्षम बनें.
उनके मुताबिक, इसकी शुरुआत स्कूल स्तर से होनी चाहिए, क्योंकि बच्चे अपने जीवन के लगभग 16 वर्ष स्कूल में बिताते हैं.
उन्होंने कहा था, “इसके बजाय हम उनसे बड़े होने के बाद कम समय में समस्याओं का समाधान खोजने की उम्मीद करते हैं, जबकि इसकी तैयारी स्कूल के स्तर से ही होनी चाहिए.”
सोनम वांगचुक के पिता चाहते थे कि वह सिविल इंजीनियर बनें, लेकिन उनकी रुचि मैकेनिकल इंजीनियरिंग में थी. अपने सपने पूरा करने को उन्हें घर छोड़ना पड़ा. उन्होंने स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख स्थापना किया, ताकि उन बच्चों को अवसर मिल सके, जिनकी योग्यता और सोच बचपन में उनकी अपनी सोच से मिलती-जुलती है.
सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) में अक्तूबर 2025 में पकड़ा गया था. लेकिन उनके ख़िलाफ़ इस तरह का यह पहला मामला नहीं था.
10 अक्तूबर 2024 को उन्हें दिल्ली पुलिस की हिरासत में पांच दिन बाद छोड़ा गया था. उन्हें लद्दाख से दिल्ली पदयात्रा में हिरासत में लिया गया था, वे एक सितंबर 2024 को लेह से दिल्ली चले थे। यात्रा रोक दी गई थी.हिरासत में उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी थी. बाद में केंद्रीय गृह मंत्रालय के सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों से बातचीत फिर शुरू करने के आश्वासन पर उन्होंने अपना अनशन समाप्त किया था.

सोनम वांगचुक का आंदोलन अब किसी तरह सम्मानजनक विदाई मिल जाए उतना बाकी है और जितने भी लोग आ रहे है वही लोग जो कभी साहिन बाग में थे तो किसान आंदोलन में थे, मणिपुर पर थे और आज NEET पर है।
आंदोलन के शुरु में जैसे जनसमर्थन की उम्मीद थी, वह वैसा दिखाई नहीं दिया। सोशल मीडिया पर कुछ और लेकिन ज़मीन पर बड़ी संख्या में आम लोगों की भागीदारी नहीं थी, इसी कारण अब धीरे-धीरे अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेता, कुछ फिल्मी हस्तियां और विभिन्न विचारधाराओं से जुड़े लोग समर्थन देने पहुंच रहे हैं, जिससे आंदोलन को एक राजनीतिक और प्रतीकात्मक सहारा मिले और फजीहत न हो।
जिनमें अभिनेत्री स्वरा भास्कर और समाजवादी पार्टी की सांसद प्रिया सरोज , राजदीप से लेकर आशुतोष, योगेंद्र यादव प्रशांत भूषण उसी कड़ी का हिस्सा हैं।
अब धीरे -धीरे लेफ्ट विंग टुकड़े- टुकड़े ढपली और बॉलीवुडिया गैंग एक्टिव हो चुका है जो इस सोनम वांगचुक के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश में है ताकि भविष्य में भी ऐसे ही कोई मोदी विरोधी आंदोलन खड़ा किया जा सके।

इनको ही नहीं बल्कि उस इकोसिस्टम को भी पता लग गया होगा कि सोशल मीडिया पर लाखों या करोड़ों फॉलोअर्स होना और जनता का वास्तविक समर्थन हासिल करना, दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं।
मोबाइल की स्क्रीन पर दिखाई देने वाला एक “फॉलो” बटन और सड़क पर उतरकर किसी आंदोलन में शामिल होना, दोनों की कीमत एक जैसी नहीं होती। लाखों लोग किसी व्यक्ति को मनोरंजन, जिज्ञासा, आदत या खबरों को फॉलो कर सकते हैं, लेकिन जब बात किसी आंदोलन के समर्थन की आती है, तब वही लोग घर से निकलकर मैदान में आएं, यह बिल्कुल अलग परीक्षा होती है।
यही वजह है कि इतिहास में कई ऐसे आंदोलन हुए जिनके नेताओं के पास सोशल मीडिया जैसा कोई साधन नहीं था, फिर भी लाखों लोग स्वतः सड़कों पर उतर आए। वहीं आज ऐसे भी कई उदाहरण हैं जहां करोड़ों व्यूज़ और लाखों फॉलोअर्स होने के बावजूद वास्तविक भीड़ बहुत सीमित रही। सोशल मीडिया लोकप्रियता का पैमाना हो सकता है, लेकिन जनसमर्थन का अंतिम प्रमाण नहीं।
करोड़ों फॉलोअर्स के प्रभाव से सरकार पर तत्काल दबाव बनेगा, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारें केवल ऑनलाइन ट्रेंड देखकर नहीं, बल्कि व्यापक जनमत, संस्थागत प्रक्रियाओं और वास्तविक सामाजिक दबाव को देखकर निर्णय लेती हैं। यदि किसी आंदोलन को समाज के बड़े वर्ग का समर्थन नहीं मिलता, तो केवल डिजिटल लोकप्रियता उसके लिए पर्याप्त नहीं होती।
जनता भी सपोर्ट करती लेकिन जब देखा कि अनशन के नाम पर
👉मेरा लिंग मेरी मर्जी,
👉मैं क्या पहनूं टोटल LGBTQ मेरी मर्जी,हो रहा है,
👉रात के अंधेरे में जेएनयू के ढपली बाज चुम्मा चाटी का कार्यक्रम चला रहे है 👉हिंदू धर्म को गालियां छेड़खानी और
👉बस नाम रहेगा अल्लाह का चल रहा..
यहां तक कि सोनम वांगचुक भी खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगे थे क्यों कि एक तरह वो तो लोगों को अपनी भूख हड़ताल दिखाना चाह रहा था दूसरी तरफ अभिजीत दीपके, सौरभ दास गपागप खाना ठूंसने में व्यस्त थे, बची कसर नवाबी लोगो के शौक पूरे करने वाले लौंडा नाच expert विजेता दहिया ने कर दी जो दिन रात ओर हर वक्त ठुमके लगाने का कार्यक्रम शुरू कर देता था।
तो लोगों ने भी इनकी तरफ ध्यान देना बंद कर दिया, और जो लोग आते भी थे तो सुबह की चाय दोपहर का नाश्ता और रात के खाने की वजह से आ रहे थे जिसे बाद में भीड़ कम होता देख शाहीन बाग 0.2 के कैटरर ने वो भी कम कर दिया।
आंदोलन के दौरान मूल मुद्दों के साथ-साथ ऐसे नारे, कार्यक्रम या गतिविधियां भी जुड़ गईं जिनसे बड़ी संख्या में सामान्य लोग स्वयं को नहीं जोड़ पाए। यदि किसी आंदोलन का केंद्र बिंदु धीरे-धीरे बदलने लगे या विभिन्न वैचारिक समूह अपने-अपने एजेंडे के साथ उसमें सक्रिय हो जाएं, तो आम जनता का ध्यान मूल उद्देश्य से हट जाता है।
आज की राजनीति में यह भ्रम बहुत तेजी से फैल गया है कि इंस्टाग्राम, यूट्यूब, एक्स या फेसबुक पर मिलियन फॉलोअर्स होने का अर्थ है कि वही लोग चुनाव में वोट देंगे, सड़कों पर उतरेंगे या हर आंदोलन में साथ खड़े होंगे। वास्तविकता इससे अलग है। सोशल मीडिया का एल्गोरिद्म लोकप्रियता दिखा सकता है, लेकिन लोकतंत्र में अंतिम ताकत जनता की वास्तविक भागीदारी, जनविश्वास और संगठन क्षमता से आती है।
राजनीतिक भूख हड़ताल इन स्वास्थ्य संबंधी उपवासों से अलग होती है। उसका उद्देश्य किसी मांग की ओर सरकार और समाज का ध्यान आकर्षित करना होता है। लोकतंत्र में उसका प्रभाव अंततः इस बात पर निर्भर करता है कि उसे कितना व्यापक जनसमर्थन प्राप्त होता है। यदि जनता बड़ी संख्या में किसी आंदोलन के साथ खड़ी होती है, तो उसका राजनीतिक प्रभाव बढ़ जाता है। ऐसा नहीं होता, तो केवल सोशल मीडिया की लोकप्रियता या कुछ चर्चित चेहरों का समर्थन किसी आंदोलन को स्वतः सफल नहीं बना देता।
अन्ना आंदोलन भी यही है और साहिन बाग से लेकर ये वांगचुक आंदोलन भी यही है ,दोनों में जमीन आसमान का अंतर था।
आखिरकार लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत न तो ट्रेंडिंग हैशटैग होती है, न वायरल वीडियो और न ही करोड़ों फॉलोअर्स। सबसे बड़ी ताकत जनता का वास्तविक विश्वास, निरंतर समर्थन और शांतिपूर्ण जनभागीदारी होती है। यही अंतर सोशल मीडिया की लोकप्रियता और वास्तविक जनसमर्थन के बीच सबसे स्पष्ट रेखा खींचता है।
फेसबुक पोस्ट

‘कॉकरोचों’ के साथ एक रात, जंतर मंतर प्रोटेस्ट में मैंने क्या-क्या देखा
दिल्ली के एक वर्ग के लिए जंतर-मंतर आज भी देश का वह प्रदर्शनस्थल है, जहां लोग सत्ता से जवाबदेही मांगने आते हैं लेकिन दूसरे वर्ग को यह चुपचाप ऐसी जगह बन चुका है, जहां लोग शाम बिताने, घूमने-फिरने और घर लौटने से पहले कुछ समय बिताने आते हैं. हालांकि, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का यह आंदोलन इसलिए अलग दिखता है.
अविनाश कटील 15 जुलाई 2026,(आजतक में)
दिल्ली के नौकरीपेशा दफ्तर से घर लौट रहे थे और शाम का ट्रैफिक कनॉट प्लेस अपनी चपेट में ले रहा था, तब मैं एक ‘कॉकरोच’ बना था. वह कॉकरोच जिसे पिछले कुछ हफ्तों से नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर ठिकाना मिल गया है.
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) 28 जून से यहां केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को प्रदर्शनरत है । सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक यहां अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं. इसलिए, एक रात को मैं भी उन्हीं में से एक कॉकरोच बन गया.
मैं शाम करीब 5:30 बजे जंतर-मंतर के प्रदर्शन स्थल पर पहुंचा. मेरे पास मोबाइल फोन, एक छाता, एक कंबल और एक पत्रकार की नहीं बल्कि एक युवा प्रदर्शनकारी जैसी जिज्ञासा थी. मैं पहले भी कई बार जंतर-मंतर आ चुका हूं, यहां तक कि उस पहले दिन भी जब अभिजीत दिपके के नेतृत्व में CJP ने अपना आंदोलन शुरू किया था लेकिन इस बार मेरा इरादा यहां पत्रकार नहीं, बल्कि एक प्रदर्शनकारी की तरह पूरी रात बिताने का था.
आंदोलन जोशीले भाषणों और नारेबाजी को याद किए जाते हैं लेकिन जंतर-मंतर में पूरी रात बिताने के बाद मैंने महसूस किया कि किसी भी आंदोलन की नींव सिर्फ इन्हीं चीजों पर नहीं, बल्कि कई और छोटे-छोटे पहलुओं पर भी टिकी होती है.
प्रदर्शनकारियों की भीड़ उम्मीद से ज्यादा
प्रदर्शनस्थल की ओर जाते समय मुझे लगा था कि मंगलवार होने से वहां ज्यादा भीड़ नहीं होगी. आखिरकार, यह कामकाजी दिन था. सोचा था कि प्रदर्शनकारी कम होंगे, मंच लगभग खाली होगा और वॉलेंटियर्स वीकेंड का इंतजार कर रहे होंगे. लेकिन जंतर-मंतर पहुंचने के शुरुआती कुछ मिनटों ने मेरी इस धारणा को सही भी साबित किया. प्लास्टिक की अधिकांश कुर्सियों पर दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के जवान बैठे थे, जबकि कई कुर्सियां अब भी खाली पड़ी थीं.
वामपंथी छात्र संगठनों AISF, SFI और AISA के कुछ कार्यकर्ता गोल घेरा बनाकर बैठे धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे थे. मुख्य मंच पर CJP के प्रमुख चेहरे थे. तेज गर्मी में बीता लंबा दिन खत्म होने को था और जंतर-मंतर की हवा पसीने की गंध से भारी हो चुकी थी.
प्रदर्शनस्थल के प्रवेश द्वार पर दिल्ली पुलिस के एक जवान ने मुझे रोककर सुरक्षा जांच की, जिसे वे एंटी-सैबोटाज चेक कहते हैं. जब वह मेरा बैग जांच रहा था, तो मैंने उससे बातचीत शुरू कर दी. पूछा कि रोज सबसे ज्यादा भीड़ कब जुटती है. उसने बताया, ‘ठीक उसी समय, जब आप आए हैं…’
उन्होंने कहा, ‘सुबह 10 बजे के बाद यहां बहुत कम लोग रहते हैं लेकिन शाम 6 बजे तक इंतजार कीजिए, तभी लोग बड़ी संख्या में आते हैं.’ कई महीनों से जंतर-मंतर पर तैनाती ने उस पुलिसकर्मी को आंदोलनों की गतिविधियों का अच्छा पर्यवेक्षक बना दिया था. उसकी बात आधे घंटे में ही सच हो गई. जंतर-मंतर के बाहर का फुटपाथ लोगों से भरने लगा.
कुछ लोग सीधे दफ्तर से पहुंचे. कॉलेज के छात्र हाथों में लिपटे हुए बैनर लेकर समूहों में आए. बुजुर्ग पुरुष और महिलाएं भी यह कहते हुए पहुंचे कि वे अपने पोते-पोतियों की शिक्षा का भविष्य सुरक्षित करने के लिए आए हैं. जंतर-मंतर पर मौजूद हर व्यक्ति प्रदर्शन करने या इस्तीफे की मांग के लिए नहीं आया था.
दिलचस्प बात यह थी कि जंतर-मंतर पर मौजूद हर व्यक्ति आंदोलन का हिस्सा नहीं था. युवा जोड़े हाथों में हाथ डाले प्रदर्शनस्थल पर टहल रहे थे. वे कोई पोस्टर पढ़ने रुकते और फिर आगे बढ़ जाते. परिवार मुख्य मंच के पास तस्वीरें खिंचवा रहे थे. युवाओं के कुछ समूह भाषण सुनने से ज्यादा इंस्टाग्राम रील बनाने में व्यस्त दिखे .
दिल्ली के एक वर्ग के लिए जंतर-मंतर आज भी देश का वह प्रदर्शनस्थल है, जहां लोग सत्ता से जवाबदेही मांगने आते हैं लेकिन दूसरे वर्ग को यह चुपचाप एक ऐसी जगह बन चुका है, जहां लोग शाम बिताने, घूमने-फिरने और घर लौटने से पहले कुछ समय बिताने आते हैं. हालांकि, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) आंदोलन इसलिए अलग दिखता है क्योंकि इसने देश के अलग-अलग हिस्सों और विभिन्न विचारधाराओं से जुड़े लोगों को एक साथ आने का मंच दिया है.
सोनम वांगचुक के समर्थन में उमड़ रहे हैं लोग
जंतर-मंतर पर जिज्ञासा और आंदोलन के मिले-जुले माहौल के बीच एक ऐसा शख्स था, जिसके इर्द-गिर्द सब कुछ घूमता नजर आ रहा था. वह थे लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक.
मैं चुपचाप खड़ा लोगों की बातचीत सुनता रहा. सबसे ज्यादा जिस नाम का जिक्र सुनाई दे रहा था, वह था सोनम वांगचुक. लोग पूछ रहे थे, ‘कब तक भूख हड़ताल पर रहेंगे? हम उनके जैसे इनोवेटर को खो नहीं सकते.’
मंगलवार को वांगचुक की भूख हड़ताल का 17वां दिन था. उनकी सेहत को लेकर चिंताएं लगातार बढ़ रही थीं और विभिन्न क्षेत्रों की कई प्रमुख हस्तियां उनसे अनशन खत्म करने की अपील कर रही थीं. जंतर-मंतर पर मौजूद लोगों के बीच भी उनकी सेहत को लेकर गहरी चिंता साफ दिख रही थी.
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के दर्जनों वॉलेंटियर्स अलग-अलग जिम्मेदारियां संभाल रहे थे. छात्र संगठनों ने अपने-अपने कोने बना रखे थे लेकिन हर बातचीत आखिरकार एक ही नाम पर आकर खत्म होती थी सोनम वांगचुक. यह बात वहां तैनात सुरक्षाबलों के जवान भी महसूस कर रहे थे. बैरिकेड के पास खड़े रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के एक जवान ने मुझसे कहा, ‘लोग वांगचुक को देखने आ रहे हैं. भीड़ उन्हीं की वजह से है.’
वांगचुक के संबोधन ने भावुक कर दिया
बुधवार को सोनम वांगचुक की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल 18वें दिन में पहुंच गई. वह अब केवल इस आंदोलन का चेहरा नहीं रह गए थे, बल्कि लोगों के लिए इस आंदोलन की भावनात्मक ताकत बन चुके थे. कई दिनों से लगातार उपवास के कारण वांगचुक सार्वजनिक रूप से बोलने से बच रहे थे. ऐसे में जब शाम करीब 7 बजे यह खबर फैलने लगी कि वह लोगों को संबोधित करेंगे, तो पूरे प्रदर्शनस्थल पर उत्साह की लहर दौड़ गई.
कुछ ही मिनटों में अलग-अलग जगह बैठे लोग मंच के पास आकर जमा होने लगे. वॉलेंटियर्स ने अपनी बातचीत रोक दी. सैकड़ों मोबाइल फोन रिकॉर्डिंग के लिए हवा में उठ गए. यहां तक कि जो लोग यूं ही टहल रहे थे, वे भी वहीं रुक गए. मेरे बगल में खड़े एक युवा प्रदर्शनकारी ने कहा, ‘हमें नहीं पता था कि वह आज बोलेंगे. यह हमारे लिए एक सरप्राइज था.’
वांगचुक ने अपने संबोधन की शुरुआत उन लोगों का आभार जताते हुए की, जिन्होंने चुपचाप उनके साथ भूख हड़ताल में हिस्सा लिया. उन्होंने कहा, ‘हो सकता है कि हमारी भूख हड़ताल से तुरंत किसी का इस्तीफा न हो, लेकिन अगर इससे लोगों में जागरूकता आती है, तो हमारा उद्देश्य पूरा हो जाएगा.
उन्होंने कहा, ‘सिर्फ एक व्यक्ति के इस्तीफे से बहुत कुछ नहीं बदलता. जिस दिन जनता जाग जाएगी, उसी दिन भारत सरकार के हर विभाग में बदलाव दिखाई देगा. लगातार कई दिनों से उपवास पर होने के कारण उनकी ऊर्जा काफी कम हो चुकी थी इसलिए उन्होंने लगभग 10 मिनट तक ही लोगों को संबोधित किया.
वांगचुक की तरह कई और लोग भी भूख हड़ताल पर बैठे हैं
मंगलवार शाम वांगचुक के भाषण के बाद जब लोग मंच के आसपास से हटने लगे, तो मैंने उन प्रदर्शनकारियों की ओर जाना तय किया जो सुर्खियों और नारों से दूर चुपचाप अपना आंदोलन चला रहे थे. वहां करीब 10 प्रदर्शनकारी ऐसे थे, जो वांगचुक की तरह अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे थे.
जहां एक ओर सोशल मीडिया पर CJP के अभिजीत दिपके के कचौड़ी, नूडल्स और ब्रेड पकौड़ा खाते हुए वीडियो वायरल हो रहे थे, वहीं इन दूसरे अनशनकारियों की लगभग कोई चर्चा नहीं हो रही थी. उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से आए बहादुर सिंह मंगलवार को अपनी भूख हड़ताल के 14वें दिन में थे. एक पतले गद्दे पर पालथी मारकर बैठे बहादुर सिंह ने धीमी आवाज में बताया कि पांच मांगों ने उन्हें घर छोड़कर यहां आने के लिए मजबूर किया.
उन्होंने कहा, ‘मैं देश के लिए यहां आया हूं और जब तक अपनी मांगें पूरी नहीं करा लेता, तब तक घर वापस नहीं जाऊंगा.’ उनके बगल में लखनऊ से आए दीपक यादव बैठे थे, जिन्होंने बिना भोजन के 10 दिन पूरे कर लिए थे. उनके साथ तीन अन्य प्रदर्शनकारी भी थे, जिन्होंने हाल ही में अपना अनशन शुरू किया था.
बहादुर सिंह के तंबू के ठीक दाहिनी ओर आमीन, नेहा और मनीष बैठे थे, जो छात्र संगठन AISA से जुड़े हैं.। वे भी अपनी 17वें दिन की भूख हड़ताल जारी रखे हुए थे.
खाना बना सबसे बड़ा आकर्षण
चारों ओर आंदोलन की हलचल के बीच रात 10 बजे ठीक समय पर खाना पहुंचा और माहौल अचानक बदल गया. ऐसा लगा मानो भोजन ने पूरे आंदोलन को एक-दूसरे से जोड़ने का काम किया हो.
कुछ ही देर में वॉलेंटियर्स बड़े-बड़े स्टील के बर्तन लेकर भीड़ के बीच से गुजरने लगे. एक बर्तन में चावल थे, दूसरे में गाढ़ी सब्जी. डिस्पोजेबल प्लेटों के ढेर लगा दिए गए और देखते ही देखते बिना किसी शोर-शराबे के लोग कतार में लग गए. किसी को निर्देश देने की जरूरत नहीं पड़ी. ऐसा लग रहा था मानो सबने पिछले कई हफ्तों में यह व्यवस्था पहले से सीख ली हो.
मैं भी चुपचाप लाइन में. आखिर एक रात को मैं भी कॉकरोच बन गया और सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो देखने के बाद मुझे भी इस खाने को लेकर उत्सुकता थी. हाथ में कागज की प्लेट और मैं बाकी लोगों की तरह अपनी बारी के इंतजार में था. जब मेरी प्लेट में चावल डाले गए, तो खाना परोसते वॉलेंटियर ने मुस्कुराते हुए कहा कि थोड़ा और ले लीजिए. खाना बेहद साधारण , चावल और हल्के मसालों वाली ग्रेवी लेकिन जमीन पर पालथी मारकर कागज की प्लेट में बैठकर खाने का स्वाद कुछ अलग ही था.
खाने का खर्च कौन उठा रहा है?
चावल खत्म हो गए, लेकिन किसी ने शिकायत नहीं की. वॉलेंटियर्स ने तुरंत बची ग्रेवी के साथ समोसे परोसने शुरू कर दिए और लोगों की कतार बिना रुके आगे बढ़ती रही. रात 11:30 बजे, जब सबको लगा कि भोजन समाप्त हो चुका है, तभी एक व्यक्ति सिर पर बड़ा स्टील का बर्तन लेकर पहुंचा. वह रिजवान था. सीलमपुर-जाफराबाद से मीठे चावल बनाकर लाए थे. हंसते हुए कहा, ‘मैंने दोपहर में मीठे चावल खाए थे. सोचा, आज रात मेरे ‘कॉकरोच’ भी मीठे चावल खाएं.’ मीठे चावलों के साथ आइसक्रीम के डिब्बे भी पहुंचे, जो कुछ ही मिनटों में खत्म हो गए. बच्चे उत्साह से दौड़ पड़े, जबकि बड़े लोग अपनी बारी का धैर्यपूर्वक इंतजार करते रहे. मुझे भी मिक्स्ड फ्रूट कैंडी आइसक्रीम मिली. 
बाद में CJP के कई वॉलेंटियर्स ने बताया कि लगभग हर दिन का भोजन समर्थकों के सहयोग से तैयार होता है. कोई आर्थिक मदद करता है, तो कोई अपने घर से खाना बनाकर लेकर आता है. बिस्कुट, पीने का पानी और दूसरी जरूरी चीजें भी पूरे दिन उपलब्ध रहती हैं, ताकि प्रदर्शन में आने वाला कोई भी व्यक्ति भूखा या प्यासा वापस न जाए. रात के खाने के दौरान हंसी-मजाक का माहौल था, लेकिन एक दृश्य मेरे मन में हमेशा के लिए बस गया.
करीब 9:30 बजे, जब लोगों के लिए खाना लगाया जा रहा था, तभी सोनम वांगचुक चुपचाप करवट बदलकर मंच के बैंकग्राउंड की ओर मुंह करके लेट गए और सो गए. सच कहूं तो मुझे नहीं पता कि उन्होंने ऐसा क्यों किया. क्या वे इसलिए मुड़ गए कि सामने लोग खाना खा रहे थे जब वे भूख हड़ताल पर हैं? यह सिर्फ मेरी एक धारणा है लेकिन ये मेरे लिए पूरी रात का सबसे मार्मिक दृश्य था.
अभिजीत दिपके पर उठे सवाल
रात्री भोजन बाद उत्तर प्रदेश से आए CJP के वॉलेंटियर हसन अली मिले. अली को वहां हर व्यक्ति जानता था. हर कुछ मिनट में कोई न कोई उनसे पीने का पानी, किसी बुजुर्ग को कुर्सी, मंच तक पहुंचने का रास्ता या कार्यक्रम की जानकारी पूछने आ जाता. वह हर सवाल का जवाब मुस्कुरा पूरे धैर्य से देते रहे.
मैंने उनसे पूछा कि अगर मुझे यहीं रात बितानी हो तो क्या व्यवस्था होगी. मेरे पास कंबल और जरूरी सामान देखकर उन्होंने कहा, ‘अगर आप अपना बिस्तर नहीं लाए होते तो हम आपको चादर का भी इंतजाम कर देते.’
उन्हें देखकर महसूस हुआ कि आंदोलन सिर्फ भाषणों से नहीं चलते. वे उन सैकड़ों गुमनाम वॉलेंटियर्स की मेहनत पर टिके हैं, जो बिना किसी पहचान या प्रशंसा लगातार काम करते रहते हैं. रात 11:30 बजे के बाद प्रदर्शन का माहौल बदल गए. लोग छोटे-छोटे समूहों में बैठकर अपनी-अपनी चर्चा में लग गए.
मैं भी अलग-अलग समूहों में घूम रहा था कि एक बातचीत ने मुझे रोक लिया. मैंने कुछ प्रदर्शनकारियों को CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके और संगठन के कुछ प्रमुख चेहरों की आलोचना करते सुना.
बुधवार की रात एक बजे. मुख्य मंच पर सन्नाटा था. सिर्फ सोनम वांगचुक सो रहे थे और कुछ स्वयंसेवक उनके पास बैठे थे लेकिन अभिजीत दिपके, सौरव दास, विजेता दहिया और आशुतोष रांका जो CJP के प्रमुख चेहरे माने जाते हैं. वहां नहीं थे. आधी रात को उनकी अनुपस्थिति चर्चा का विषय बन गई.
एक प्रदर्शनकारी ने कहा, ‘कम से कम उनमें से किसी एक को सोनम सर के साथ रहना था.’ समूह में बैठे एक बुजुर्ग ने टिप्पणी की, ‘ लगता है कि वे आंदोलन को लेकर उतने गंभीर नहीं हैं.’
सुबह होने से पहले जंतर-मंतर पर छाई खामोशी
जैसे-जैसे सुबह होने लगी. चर्चाओं की जगह धीरे-धीरे सन्नाटे ने ले ली. कुछ युवा प्रदर्शनकारी गद्दों पर लेट गए थे. कुछ अपने बैग के सहारे टिके शाम को बनाई इंस्टाग्राम रील्स बार-बार देख रहे थे. तभी एक दिलचस्प घटना हुई. करीब एक ही समय पर आसपास कई मोबाइल फोन से फिल्म ‘3 इडियट्स’ का गीत ‘कहां से आया था वो…’ बजने लगा.
फिल्म 3 इडियट्स की कहानी सोनम वांगचुक के जीवन और विचारों से प्रेरित मानी जाती है. फिल्म में आमिर खान का निभाया गया रैंचो (फुंसुख वांगडू) चरित्र भी वांगचुक से प्रेरित बताते है और संयोग से तब वांगचुक कुछ ही मीटर दूर सो रहे थे. करीब 2 बजे मैं भी अपना कंबल बिछाकर लेट गया.
सुबह चार बजे तक जंतर-मंतर पूरी तरह शांत हो चुका था. मंच की रोशनी धीमी पड़ गई थी. बैनरों की जगह अब कंबलों ने ले ली थी. कुछ कॉकरोच अब भी जागे थे. आंदोलन के गीत गुनगुना रहे थे, कुछ 20 जुलाई को प्रस्तावित संसद मार्च प्रदर्शन की तैयारी कर रहे थे. जब मैं पुलिस बैरिकेड पार कर उस दिल्ली में वापस लौटा, जो आखिरकार सो चुकी थी, तब मुझे लगा कि उस मंगलवार रात मैं सिर्फ कॉकरोच देखने वाला एक पत्रकार नहीं रह गया था. मैं खुद उनमें से एक बन गया था और यह रात शायद हमेशा मेरे साथ रहेगी.


