हबल स्पेस टेलीस्कोप की खोज:
हबल की नजर पड़ी तो कांपे वैज्ञानिक, 10 लाख सूर्यों जितनी गैस निगल गया महादैत्य
हबल की नजर पड़ी तो कांप उठे वैज्ञानिक, 10 लाख सूर्यों जितनी गैस निगल गया महादैत्य! गैलेक्सी से गायब हैं सारे तारे
वैज्ञानिकों ने ब्रह्मांड में पहली बार बिना तारों वाली एक रहस्यमय गैलेक्सी खोजी है, जिसे क्लाउड 9 नाम दिया गया है. यह धरती से 1.4 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर स्थित है. इसमें 10 लाख सूर्यों के बराबर गैस और 50 लाख सोलर मास का डार्क मैटर मौजूद है. इसके बावजूद यहां एक भी तारा नहीं बना. हबल और विशाल टेलीस्कोप के डेटा ने डार्क गैलेक्सी के वजूद की पुष्टि की है.
नई दिल्ली: वैज्ञानिकों का दावा है कि वे इंसानी इतिहास की पहली बिना तारों वाली गैलेक्सी की पुष्टि करने के बेहद करीब पहुंच चुके हैं. इस रहस्यमयी गैलेक्सी को क्लाउड 9 नाम दिया गया है. यह अनोखी संरचना धरती से करीब 1.4 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर स्पाइरल गैलेक्सी मेसियर 94 के पास मौजूद है. क्लाउड 9 में हाइड्रोजन गैस का एक विशाल भंडार भरा पड़ा है, जिसका वजन हमारे सूरज से 10 लाख गुना ज्यादा है. इसके साथ ही इसमें 50 लाख सोलर मास के बराबर रहस्यमयी डार्क मैटर भी मौजूद है. तारों के निर्माण के लिए जरूरी सभी चीजें मौजूद होने के बावजूद इस पूरी गैलेक्सी में एक भी तारा नहीं चमक रहा है. हबल स्पेस टेलीस्कोप के डेटा ने पुष्टि की है कि इस इलाके से रोशनी की एक किरण भी बाहर नहीं निकल रही है.
HiPOCAM द्वारा देखी गई संभावित तारा-रहित गैलेक्सी ‘क्लाउड-9’ का फोटो. (Image credit: Trjilo, et al, CC BY 4.0)
क्लाउड 9 क्या है और इसे फेल्ड गैलेक्सी क्यों कहा जा रहा है?
खगोल विज्ञान में एक सामान्य गैलेक्सी करोड़ों या अरबों तारों, गैस और धूल के विशाल बादलों से मिलकर बनती है. जब किसी गैलेक्सी में गैस और धूल का भारी भंडार होने के बावजूद तारे नहीं बन पाते, तो वैज्ञानिक उसे फेल्ड गैलेक्सी या स्टारलेस गैलेक्सी कहते हैं. क्लाउड 9 इसी श्रेणी का अब तक का सबसे सटीक और पुख्ता उदाहरण बनकर उभरा है.
इस संरचना का मुख्य हिस्सा डार्क मैटर से बना है. डार्क मैटर अंतरिक्ष का वह अदृश्य पदार्थ है, जो प्रकाश के साथ किसी भी तरह का इंटरैक्शन नहीं करता है. इसी वजह से इसे सामान्य टेलीस्कोप से सीधे तौर पर नहीं देखा जा सकता है.
क्लाउड 9 में भारी मात्रा में न्यूट्रल हाइड्रोजन गैस मौजूद है. सामान्य परिस्थितियों में यह गैस ठंडी होकर घनी हो जाती है और गुरुत्वाकर्षण के कारण नए तारों को जन्म देती है. क्लाउड 9 के मामले में यह पूरी प्रक्रिया अचानक रुक गई. पर्याप्त कच्चा माल होने के बाद भी यहां तारों की कोई आबादी नहीं पनप सकी.
बिना तारों वाली गैलेक्सी ‘क्लाउड 9’ का क्लोज-अप. (Image credit: Trjilo, et al)
हबल और दुनिया के सबसे बड़े टेलीस्कोप ने क्या देखा?
इस रहस्य से पर्दा उठाने के लिए स्पेन के इंस्टीट्यूटो डी एस्ट्रोफिजिका डी कैनरियास के वैज्ञानिकों ने एक बड़ी रिसर्च टीम बनाई. टीम के प्रमुख इग्नासियो ट्रूजिलो और उनके साथियों ने दुनिया के सबसे बड़े ऑप्टिकल टेलीस्कोप ग्रैन टेलीस्कोपियो कैनरियास का इस्तेमाल किया. इस टेलीस्कोप पर लगे अत्याधुनिक हाइपरकैम कैमरे की मदद से क्लाउड 9 की सबसे गहरी और स्पष्ट तस्वीरें ली गईं.
रिसर्च टीम ने महज 2.36 घंटे के ऑब्जर्वेशन में इस क्षेत्र की ऐसी तस्वीरें हासिल कीं, जो पहले के किसी भी अध्ययन से 10 गुना ज्यादा गहरी थीं. तस्वीरों के नतीजों ने वैज्ञानिकों को पूरी तरह हैरान कर दिया. उस पूरे इलाके में तारों से निकलने वाले प्रकाश का नामोनिशान तक नहीं मिला.
रिसर्च टीम के लीडर इग्नासियो ट्रूजिलो ने कहा, ‘हमारी रिसर्च का सबसे हैरान करने वाला पहलू क्लाउड 9 की जगह पर दिखने वाला पूरी तरह खालीपन था. जब आप इतनी गहराई तक देखने वाली तस्वीर में कुछ नहीं देखते, जहां 10 लाख सोलर मास गैस होनी चाहिए, तो यह वाकई चौंकाने वाला होता है.’
उन्होंने आगे कहा, ‘ब्रह्मांड की ज्यादातर चीजें रोशनी का कोई न कोई निशान जरूर छोड़ती हैं. क्लाउड 9 से कोई रोशनी नहीं आती है. यह सन्नाटा ही हमारी खोज का सबसे बड़ा और ठोस सबूत है.’
वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया कि अगर वहां सबसे पुरानी और कम धातु वाली तारों की आबादी भी मौजूद होगी, तो भी उनका कुल भार 16,000 सोलर मास से ज्यादा नहीं हो सकता है. मौजूदा ऑब्जर्वेशन के आधार पर यह साबित होता है कि क्लाउड 9 पूरी तरह से तारों से विहीन है.
आखिर इतनी गैस होने के बाद भी तारे क्यों नहीं बन पाए?
वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि भारी मात्रा में गैस होने के बावजूद क्लाउड 9 तारे बनाने में नाकाम क्यों रहा. वैज्ञानिकों के पास इस विफलता को समझाने के लिए एक बेहद मजबूत वैज्ञानिक थ्योरी मौजूद है.
ब्रह्मांड में रिआयनाइजेशन के दौर के बाद अंतरिक्ष में अल्ट्रावायलेट बैकग्राउंड रेडिएशन का एक शक्तिशाली जाल फैल गया था. यह रेडिएशन फील्ड कम द्रव्यमान वाले डार्क मैटर हालोस में मौजूद गैस को बहुत ज्यादा तापमान तक गर्म कर देता है. जब गैस अत्यधिक गर्म हो जाती है, तो वह तेजी से ठंडी नहीं हो पाती है.
तारे बनने के लिए गैस का ठंडा और घना होना अनिवार्य होता है. जब गैस ठंडी नहीं हो पाती, तो वह सिकुड़कर तारों के रूप में बदल नहीं सकती है. सुपरकंप्यूटर सिमुलेशन के मुताबिक 5 अरब सोलर मास से कम द्रव्यमान वाले डार्क मैटर हालोस में गैस गर्म रहकर बिखर जाती है. क्लाउड 9 का डार्क मैटर हेलो इसी द्रव्यमान सीमा के भीतर आता है. इस वजह से यहां कभी तारे बनने की प्रक्रिया शुरू ही नहीं हो सकी.
क्या डार्क गैलेक्सी केवल थ्योरी या ब्रह्मांड की सच्चाई?
खगोलविद पिछले कई दशकों से यह थ्योरी दे रहे थे कि ब्रह्मांड में बिना तारों वाली डार्क गैलेक्सीज मौजूद हो सकती हैं. थ्योरी में मौजूद होने के बावजूद दशकों तक इनका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिल पा रहा था. इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि बिना तारों वाली चीज से कोई दृश्य प्रकाश नहीं निकलता है.
इन्हें खोजने का एकमात्र तरीका रेडियो तरंगों के जरिए न्यूट्रल हाइड्रोजन गैस के सिग्नल पकड़ना होता है. इसके बाद बेहद शक्तिशाली ऑप्टिकल टेलीस्कोप से यह जांचना जरूरी होता है कि वहां कोई धुंधला तारा तो नहीं छिपा है.
इग्नासियो ट्रूजिलो ने कहा, ‘गैस का होना लेकिन तारों का न होना और एक सामान्य वातावरण में स्थित होना, क्लाउड 9 को डार्क गैलेक्सी का सबसे मजबूत उम्मीदवार बनाता है.’ उन्होंने आगे समझाया, ‘स्टैंडर्ड कॉस्मोलॉजिकल मॉडल के मुताबिक स्टारलेस गैलेक्सी कोई अजीब अपवाद नहीं हैं, बल्कि यह ब्रह्मांड की एक सामान्य और स्वाभाविक सच्चाई हैं. असली चुनौती हमेशा से इन्हें अंतरिक्ष के अंधेरे में तलाशने की रही है.’
जेम्स वेब टेलीस्कोप से आगे क्या बड़ा खुलासा होने वाला है?
क्लाउड 9 पर हुए इस शोध को वैज्ञानिक पेपर arXiv पर सार्वजनिक कर दिया गया है. वैज्ञानिकों का कहना है कि आधिकारिक तौर पर पहली स्टारलेस गैलेक्सी घोषित करने से पहले कुछ और जांच की जरूरत होगी.
हबल टेलीस्कोप ने इस दिशा में बेहद मजबूत सबूत पेश किए हैं. भविष्य में अंतरिक्ष में मौजूद जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप इस खोज को अंतिम पुष्टि दे सकता है. अंतरिक्ष आधारित टेलीस्कोप से ली जाने वाली तस्वीरें व्यक्तिगत स्तर पर तारों को अलग-अलग करके देख सकती हैं. इससे किसी भी छिपे हुए बेहद धुंधले तारे की मौजूदगी को हमेशा के लिए नकारा जा सकेगा.
लाखों साल पहले धरती पर आया प्रचंड सैलाब, जलप्रलय से टूटा बांध और समंदर भर गया
करीब 50 लाख साल पहले अटलांटिक महासागर का पानी एक प्रचंड रफ्तार से भूमध्य सागर में दाखिल हुआ था. यह धरती के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा और भयानक जल-प्रलय था.
Largest Flood in Earth History: क्या आपने कभी सोचा है कि हमारी इस धरती पर एक ऐसा दौर भी था जब दुनिया का एक बहुत बड़ा समंदर पूरी तरह सूख चुका था और फिर अचानक एक ऐसा भयावह सैलाब (Megaflood) आया, जिसने महज कुछ ही साल या फिर शायद कुछ ही महीनों में उसे दोबारा पानी से लबालब भर दिया? इस बाढ़ को मेगा फ्लड का नाम दिया गया. विज्ञान जगत में एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है. हालिया रिसर्च में वैज्ञानिकों ने इस बात के पुख्ता सुराग ढूंढ निकाले हैं कि आज से करीब 50 लाख साल पहले अटलांटिक महासागर का पानी एक प्रचंड रफ्तार से भूमध्य सागर में दाखिल हुआ था. यह धरती के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा और भयानक जल-प्रलय था.
जिब्राल्टर के रास्ते कैसे मचा था हाहाकार?
आज से ठीक 50 लाख साल से थोड़ा अधिक समय पहले, अटलांटिक महासागर के पानी ने आज के स्ट्रेट ऑफ जिब्राल्टर के पास एक कमजोर कड़ी ढूंढ निकाली थी. इस वैज्ञानिक थ्योरी के मुताबिक महासागर का पानी एक किलोमीटर ऊंची ढलान से इतनी रफ्तार से नीचे उतरा कि वह आज की सबसे तेज दौड़ती कार से भी कहीं अधिक रफ्तार से खाली पड़े मेडिटेरेनियन बेसिन की तरफ भागा. इस बेकाबू पानी ने अपने रास्ते में किसी गगनचुंबी इमारत जितनी गहरी खाई को चीरकर रख दिया था.
उस दौर में भूमध्य सागर ज्यादातर सूखा हुआ और अत्यधिक नमकीन बेसिन हुआ करता था. लेकिन अटलांटिक से पानी का ऐसा सैलाब उमड़ा कि उसने इस विशाल बेसिन को बमुश्किल दो-तीन सालों में और शायद सिर्फ कुछ ही महीनों के अंदर पूरी तरह भर दिया. अपने चरम पर इस बाढ़ ने आज की आधुनिक अमेजन नदी से करीब हजार गुना अधिक पानी का डिस्चार्ज किया था.
कम से कम, यह वही थीसिस है, जिसे इस रिसर्च से जुड़े एक वैज्ञानिक ने साल 2009 में जिब्राल्टर स्ट्रेट के पास खोजी गई पानी के अंदर की एक घाटी के स्टडी के दौरान दुनिया के सामने रखी थी. उनका अनुमान था कि इस विशाल घाटी को इसी जल प्रलय ने तराशा था. कई वैज्ञानिकों की असहमतियों के बावजूद अगर यह थ्योरी सही साबित होती है तो तथाकथित जैंसलियन मेगाफ्लड (Zanclean Megaflood) धरती पर दर्ज अब तक की सबसे बड़ी बाढ़ होगी.
लेकिन इतने बड़े और असाधारण दावों को साबित करने के लिए बेहद पुख्ता सबूतों की जरूरत होती है. हमारी रिसर्च ने जैंसलियन युग के तलछटी की चट्टानों यानी Sedimentary Rocks की गहराई से जांच की है, जिससे यह पता चलता है कि कैसे पानी आधुनिक सिसिली और मुख्य धरती अफ्रीका के बीच के रास्ते से होकर गुजरा और भूमध्य सागर के पूर्वी आधे हिस्से को दोबारा पानी से आबाद कर दिया.
वैज्ञानिकों ने कैसे लगाया इस मेगाफ्लड का सुराग?
हमारी यह खोज दरअसल उस कहानी का सबसे नया और रोमांचक मोड़ है जिसकी शुरुआत 19वीं सदी के आखिर में हुई थी. उस दौर में भूमध्य सागर के आसपास नमक से भरपूर चट्टानी टीलों का अध्ययन करने वाले भूवैज्ञानिकों को धीरे-धीरे इस बात का अहसास होने लगा था कि करीब 5 से 6 मिलियन यानी दस लाख साल पहले कुछ बहुत ही असामान्य घटा था.
यह हालिया हिमयुगों की ग्लेशियर प्रॉसेस से बहुत पहले की बात है. वह यह कि समंदर पूरी तरह सूख चुका था. वैज्ञानिकों ने उस कालखंड को मेसिनियन (Messinian) नाम दिया और इस सूखने की पूरी घटना को मेसिनियन सैलिनिटी संकट (Messinian salinity crisis) के रूप में जाना जाने लगा. 1970 के दशक में वैज्ञानिकों ने पहली बार भूमध्य सागर के तल में मेसिनियन युग की सेडिमेंटरी चट्टानों तक ड्रिलिंग करके नमूने जुटाए. उन्होंने 3 बेहद हैरान करने वाले खुलासे किए.
नमक की मीलों मोटी परत: उन्होंने समुद्र तल के नीचे कई किलोमीटर मोटी नमक की एक विशाल चादर पाई. इससे इस बात की पुष्टि हुई कि आज से लगभग 60 लाख साल पहले पर्यावरण में एक बहुत बड़ा फेरबदल हुआ था, ठीक उसी समय जब टेक्टोनिक प्लेट्स खिसकी थीं और समुद्र अटलांटिक महासागर से कटकर लगभग अलग-थलग पड़ गया था.
उथली झीलों के जीवाश्म: इस नमक की परत के ठीक ऊपर उन्हें उथली और कम नमकीन झीलों के जीवों के जीवाश्म वाले तलछट मिले. इससे यह संकेत मिला कि भूमध्य सागर का जलस्तर आज के स्तर से एक किलोमीटर से भी नीचे गिर गया था, और जैसे-जैसे ज्यादातर पानी भाप बनकर उड़ा, पीछे भारी मात्रा में नमक छूट गया. बेसिन के सबसे निचले हिस्सों में छोटी झीलों की एक सीरीज जरूर बची रही होगी, जिन्हें छोटी धाराएं अपेक्षाकृत ताजा और कम नमकीन बनाए रखती थीं. समुद्र तल के सिस्मिक सर्वे से भी इस बात की पुष्टि हुई कि कभी इस सूखे इलाके में नदियां बहती थीं.
गहरे समुद्र की तलछट की वापसी: नमक के ऊपर की चट्टानी परतें अचानक दोबारा सामान्य गहरे समुद्र की सेडिमेंट में बदल गई. आज हम यह अच्छी तरह जानते हैं कि इस भयंकर संकट से भूमध्य सागर की 11 प्रतिशत से भी कम समुद्री प्रजातियां जिंदा बच पाई थीं, जो यह बताने के लिए काफी है कि समुद्री जीवन पर इस आपदा का कितना गहरा और स्थाई असर पड़ा था. 1970 के दशक में संकट के इस अंत को ‘जैंसलियन फ्लड’ का नाम दिया गया, हालांकि तब तक वैज्ञानिक यह नहीं जानते थे कि इसके पीछे असल में क्या प्रॉसेस थी या सूखे बेसिन को दोबारा भरने में कितना वक्त लगा था?
एक और महाप्रलय: सिसिली और अफ्रीका के बीच का सैलाब
इस कड़ी में अगली बड़ी सफलता साल 2009 में हाथ लगी, जब जिब्राल्टर के रास्ते प्रस्तावित अफ्रीका-यूरोप सुरंग के लिए जुटाए गए जियोफिजिकल डेटा से यह संकेत मिला कि अटलांटिक महासागर और भूमध्य सागर के बीच की उस विशाल पानी के नीचे की खाई को किसी अचानक और महाप्रलयकारी बाढ़ ने ही चीरा होगा.
हालिया रिसर्च इसी बात पर मुहर लगाती है. माल्टा के वैज्ञानिक आरोन मिकालेफ के नेतृत्व वाली टीम के हिस्से के तौर पर, हमने उस क्षेत्र की खोज की जहां भूमध्य सागर के वेस्टर्न बेसिन को भरने वाला पानी आधुनिक अफ्रीका और इटली को जोड़ने वाली ऊंची जमीन की रिज यानी ‘सिसिली सिल से टकराया होगा. हमारे मन में एक ही सवाल घूम रहा था क्या इस बात का कोई सबूत है कि जब पूर्वी भूमध्य सागर भर रहा था, तब कोई दूसरा महा-सैलाब भी आया होगा?
इस नए पेपर के रिसर्च में शामिल जियोवानी बारेका (Giovanni Barreca), दक्षिणी सिसिली में ही पले-बढ़े हैं. उन्होंने बहुत पहले यह भांप लिया था कि तट के पास की निचली पहाड़ियां असल में ‘सिसिली सिल्ल’ का ही विस्तार हैं, जिसके ऊपर से होकर वह बाढ़ पश्चिम से पूर्व की तरफ बढ़ी होगी. उन्हें पूरा यकीन था कि इस इलाके में इतिहास के कई बड़े सुराग छिपे हो सकते हैं.
वाशिंगटन स्टेट से सिसिली की पहाड़ियों का कनेक्शन
जब हमारी टीम ने सिसिली के इस हिस्से का दौरा किया तो हमने पाया कि वहां की पहाड़ियां वाकई आम पहाड़ियों जैसी नहीं थीं. उनकी एक सीध में बनी और स्ट्रीमलाइन. अमेरिका के वाशिंगटन राज्य की उन पहाड़ियों से गजब की समानता रखती थीं. ये गर्त यानी डिप्रेशन से अलग होती है. वाशिंगटन की वे पहाड़ियां आखिरी हिमयुग के अंत में आई एक बाढ़ से तराशी गई थीं, जब एक ग्लेशियर के पीछे बनी विशाल ‘झील मिसौला’ का बांध टूट गया था और वह विनाशकारी तरीके से खाली हो गई थी.
अगर सिसिली की वे पहाड़ियां और गर्त भी किसी प्रलयकारी बाढ़ के थपेड़ों से बने थे, तो उन क्रेटर के आधार से कटा हुआ चट्टानी मलबा 50 लाख साल से भी अधिक समय बाद उन पहाड़ियों की चोटियों पर जमा हुआ मिलना चाहिए था. और ठीक वैसा ही हुआ! हमें उन पहाड़ियों की चोटियों पर बड़े-बड़े बोल्डर के आकार तक का उलझा हुआ और बिखरा हुआ चट्टानी मलबा मिला. ये वही चट्टानें थीं जो नीचे क्रेटर्स के अंदर और और अधिक अंदरूनी इलाकों में पाई जाती हैं.
अपने इस काम को पूरी तरह पुख्ता करने के लिए, हमने एक कंप्यूटर सिमुलेशन (मॉडल) तैयार किया कि कैसे बाढ़ का पानी ‘सिसिली सिल’ के किसी हिस्से को पार करते वक्त बहा होगा. इस मॉडल ने यह साबित कर दिया कि बाढ़ का पानी बिल्कुल उन्हीं दिशाओं में बहा होगा जैसी उन सुव्यवस्थित पहाड़ियों की बनावट है.
हकीकत में इस कंप्यूटर मॉडल ने यह चौंकाने वाला सच सामने रखा कि वे पहाड़ियां 40 मीटर या उससे अधिक गहरे पानी से तराशी गई थीं, जो 115 किलोमीटर प्रति घंटे यानी कि 71 मील प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ रहा था. हमने जिस एक खास इलाके का मॉडल तैयार किया, वहां 13 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी प्रति सेकंड की दर से पूर्वी भूमध्य बेसिन में उतरा था. इसे तुलना के लिए समझें कि आज की तारीख में अमेजन नदी का फ्लो महज 2 लाख क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड है.
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह उस कुल पानी का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा था, जो पहले जिब्राल्टर के रास्ते बहा था और फिर सिसिली के पास पूर्वी भूमध्य बेसिन में दाखिल हुआ था. यह खोज धरती के प्राचीन इतिहास के सबसे बड़े और रोमांचक रहस्यों में से एक पर से पर्दा उठाती है.
लाखों साल पहले धरती पर आया था सबसे प्रचंड सैलाब, जलप्रलय से टूटा बांध और समंदर भर गया, जानिए
करीब 50 लाख साल पहले अटलांटिक महासागर का पानी एक प्रचंड रफ्तार से भूमध्य सागर में दाखिल हुआ था. यह धरती के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा और भयानक जल-प्रलय था.
क्या आपने कभी सोचा है कि हमारी इस धरती पर एक ऐसा दौर भी था जब दुनिया का एक बहुत बड़ा समंदर पूरी तरह सूख चुका था और फिर अचानक एक ऐसा भयावह सैलाब (Megaflood) आया, जिसने महज कुछ ही साल या फिर शायद कुछ ही महीनों में उसे दोबारा पानी से लबालब भर दिया? इस बाढ़ को मेगा फ्लड का नाम दिया गया. विज्ञान जगत में एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है. हालिया रिसर्च में वैज्ञानिकों ने इस बात के पुख्ता सुराग ढूंढ निकाले हैं कि आज से करीब 50 लाख साल पहले अटलांटिक महासागर का पानी एक प्रचंड रफ्तार से भूमध्य सागर में दाखिल हुआ था. यह धरती के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा और भयानक जल-प्रलय था.
जिब्राल्टर के रास्ते कैसे मचा था हाहाकार?
आज से ठीक 50 लाख साल से थोड़ा अधिक समय पहले, अटलांटिक महासागर के पानी ने आज के स्ट्रेट ऑफ जिब्राल्टर के पास एक कमजोर कड़ी ढूंढ निकाली थी. इस वैज्ञानिक थ्योरी के मुताबिक महासागर का पानी एक किलोमीटर ऊंची ढलान से इतनी रफ्तार से नीचे उतरा कि वह आज की सबसे तेज दौड़ती कार से भी कहीं अधिक रफ्तार से खाली पड़े मेडिटेरेनियन बेसिन की तरफ भागा. इस बेकाबू पानी ने अपने रास्ते में किसी गगनचुंबी इमारत जितनी गहरी खाई को चीरकर रख दिया था.
उस दौर में भूमध्य सागर ज्यादातर सूखा हुआ और अत्यधिक नमकीन बेसिन हुआ करता था. लेकिन अटलांटिक से पानी का ऐसा सैलाब उमड़ा कि उसने इस विशाल बेसिन को बमुश्किल दो-तीन सालों में और शायद सिर्फ कुछ ही महीनों के अंदर पूरी तरह भर दिया. अपने चरम पर इस बाढ़ ने आज की आधुनिक अमेजन नदी से करीब हजार गुना अधिक पानी का डिस्चार्ज किया था.
कम से कम, यह वही थीसिस है, जिसे इस रिसर्च से जुड़े एक वैज्ञानिक ने साल 2009 में जिब्राल्टर स्ट्रेट के पास खोजी गई पानी के अंदर की एक घाटी के स्टडी के दौरान दुनिया के सामने रखी थी. उनका अनुमान था कि इस विशाल घाटी को इसी जल प्रलय ने तराशा था. कई वैज्ञानिकों की असहमतियों के बावजूद अगर यह थ्योरी सही साबित होती है तो तथाकथित जैंसलियन मेगाफ्लड (Zanclean Megaflood) धरती पर दर्ज अब तक की सबसे बड़ी बाढ़ होगी.
लेकिन इतने बड़े और असाधारण दावों को साबित करने के लिए बेहद पुख्ता सबूतों की जरूरत होती है. हमारी रिसर्च ने जैंसलियन युग के तलछटी की चट्टानों यानी Sedimentary Rocks की गहराई से जांच की है, जिससे यह पता चलता है कि कैसे पानी आधुनिक सिसिली और मुख्य धरती अफ्रीका के बीच के रास्ते से होकर गुजरा और भूमध्य सागर के पूर्वी आधे हिस्से को दोबारा पानी से आबाद कर दिया.
वैज्ञानिकों ने कैसे लगाया इस मेगाफ्लड का सुराग?
हमारी यह खोज दरअसल उस कहानी का सबसे नया और रोमांचक मोड़ है जिसकी शुरुआत 19वीं सदी के आखिर में हुई थी. उस दौर में भूमध्य सागर के आसपास नमक से भरपूर चट्टानी टीलों का अध्ययन करने वाले भूवैज्ञानिकों को धीरे-धीरे इस बात का अहसास होने लगा था कि करीब 5 से 6 मिलियन यानी दस लाख साल पहले कुछ बहुत ही असामान्य घटा था.
यह हालिया हिमयुगों की ग्लेशियर प्रॉसेस से बहुत पहले की बात है. वह यह कि समंदर पूरी तरह सूख चुका था. वैज्ञानिकों ने उस कालखंड को मेसिनियन (Messinian) नाम दिया और इस सूखने की पूरी घटना को मेसिनियन सैलिनिटी संकट (Messinian salinity crisis) के रूप में जाना जाने लगा. 1970 के दशक में वैज्ञानिकों ने पहली बार भूमध्य सागर के तल में मेसिनियन युग की सेडिमेंटरी चट्टानों तक ड्रिलिंग करके नमूने जुटाए. उन्होंने 3 बेहद हैरान करने वाले खुलासे किए.
नमक की मीलों मोटी परत: उन्होंने समुद्र तल के नीचे कई किलोमीटर मोटी नमक की एक विशाल चादर पाई. इससे इस बात की पुष्टि हुई कि आज से लगभग 60 लाख साल पहले पर्यावरण में एक बहुत बड़ा फेरबदल हुआ था, ठीक उसी समय जब टेक्टोनिक प्लेट्स खिसकी थीं और समुद्र अटलांटिक महासागर से कटकर लगभग अलग-थलग पड़ गया था.
उथली झीलों के जीवाश्म: इस नमक की परत के ठीक ऊपर उन्हें उथली और कम नमकीन झीलों के जीवों के जीवाश्म वाले तलछट मिले. इससे यह संकेत मिला कि भूमध्य सागर का जलस्तर आज के स्तर से एक किलोमीटर से भी नीचे गिर गया था, और जैसे-जैसे ज्यादातर पानी भाप बनकर उड़ा, पीछे भारी मात्रा में नमक छूट गया. बेसिन के सबसे निचले हिस्सों में छोटी झीलों की एक सीरीज जरूर बची रही होगी, जिन्हें छोटी धाराएं अपेक्षाकृत ताजा और कम नमकीन बनाए रखती थीं. समुद्र तल के सिस्मिक सर्वे से भी इस बात की पुष्टि हुई कि कभी इस सूखे इलाके में नदियां बहती थीं.
गहरे समुद्र की तलछट की वापसी: नमक के ऊपर की चट्टानी परतें अचानक दोबारा सामान्य गहरे समुद्र की सेडिमेंट में बदल गई. आज हम यह अच्छी तरह जानते हैं कि इस भयंकर संकट से भूमध्य सागर की 11 प्रतिशत से भी कम समुद्री प्रजातियां जिंदा बच पाई थीं, जो यह बताने के लिए काफी है कि समुद्री जीवन पर इस आपदा का कितना गहरा और स्थाई असर पड़ा था. 1970 के दशक में संकट के इस अंत को ‘जैंसलियन फ्लड’ का नाम दिया गया, हालांकि तब तक वैज्ञानिक यह नहीं जानते थे कि इसके पीछे असल में क्या प्रॉसेस थी या सूखे बेसिन को दोबारा भरने में कितना वक्त लगा था?
एक और महाप्रलय: सिसिली और अफ्रीका के बीच का सैलाब
इस कड़ी में अगली बड़ी सफलता साल 2009 में हाथ लगी, जब जिब्राल्टर के रास्ते प्रस्तावित अफ्रीका-यूरोप सुरंग के लिए जुटाए गए जियोफिजिकल डेटा से यह संकेत मिला कि अटलांटिक महासागर और भूमध्य सागर के बीच की उस विशाल पानी के नीचे की खाई को किसी अचानक और महाप्रलयकारी बाढ़ ने ही चीरा होगा.
हालिया रिसर्च इसी बात पर मुहर लगाती है. माल्टा के वैज्ञानिक आरोन मिकालेफ के नेतृत्व वाली टीम के हिस्से के तौर पर, हमने उस क्षेत्र की खोज की जहां भूमध्य सागर के वेस्टर्न बेसिन को भरने वाला पानी आधुनिक अफ्रीका और इटली को जोड़ने वाली ऊंची जमीन की रिज यानी ‘सिसिली सिल से टकराया होगा. हमारे मन में एक ही सवाल घूम रहा था क्या इस बात का कोई सबूत है कि जब पूर्वी भूमध्य सागर भर रहा था, तब कोई दूसरा महा-सैलाब भी आया होगा?
इस नए पेपर के रिसर्च में शामिल जियोवानी बारेका (Giovanni Barreca), दक्षिणी सिसिली में ही पले-बढ़े हैं. उन्होंने बहुत पहले यह भांप लिया था कि तट के पास की निचली पहाड़ियां असल में ‘सिसिली सिल्ल’ का ही विस्तार हैं, जिसके ऊपर से होकर वह बाढ़ पश्चिम से पूर्व की तरफ बढ़ी होगी. उन्हें पूरा यकीन था कि इस इलाके में इतिहास के कई बड़े सुराग छिपे हो सकते हैं.
वाशिंगटन स्टेट से सिसिली की पहाड़ियों का कनेक्शन
जब हमारी टीम ने सिसिली के इस हिस्से का दौरा किया तो हमने पाया कि वहां की पहाड़ियां वाकई आम पहाड़ियों जैसी नहीं थीं. उनकी एक सीध में बनी और स्ट्रीमलाइन. अमेरिका के वाशिंगटन राज्य की उन पहाड़ियों से गजब की समानता रखती थीं. ये गर्त यानी डिप्रेशन से अलग होती है. वाशिंगटन की वे पहाड़ियां आखिरी हिमयुग के अंत में आई एक बाढ़ से तराशी गई थीं, जब एक ग्लेशियर के पीछे बनी विशाल ‘झील मिसौला’ का बांध टूट गया था और वह विनाशकारी तरीके से खाली हो गई थी.
अगर सिसिली की वे पहाड़ियां और गर्त भी किसी प्रलयकारी बाढ़ के थपेड़ों से बने थे, तो उन क्रेटर के आधार से कटा हुआ चट्टानी मलबा 50 लाख साल से भी अधिक समय बाद उन पहाड़ियों की चोटियों पर जमा हुआ मिलना चाहिए था. और ठीक वैसा ही हुआ! हमें उन पहाड़ियों की चोटियों पर बड़े-बड़े बोल्डर के आकार तक का उलझा हुआ और बिखरा हुआ चट्टानी मलबा मिला. ये वही चट्टानें थीं जो नीचे क्रेटर्स के अंदर और और अधिक अंदरूनी इलाकों में पाई जाती हैं.
अपने इस काम को पूरी तरह पुख्ता करने के लिए, हमने एक कंप्यूटर सिमुलेशन (मॉडल) तैयार किया कि कैसे बाढ़ का पानी ‘सिसिली सिल’ के किसी हिस्से को पार करते वक्त बहा होगा. इस मॉडल ने यह साबित कर दिया कि बाढ़ का पानी बिल्कुल उन्हीं दिशाओं में बहा होगा जैसी उन सुव्यवस्थित पहाड़ियों की बनावट है.
हकीकत में इस कंप्यूटर मॉडल ने यह चौंकाने वाला सच सामने रखा कि वे पहाड़ियां 40 मीटर या उससे अधिक गहरे पानी से तराशी गई थीं, जो 115 किलोमीटर प्रति घंटे यानी कि 71 मील प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ रहा था. हमने जिस एक खास इलाके का मॉडल तैयार किया, वहां 13 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी प्रति सेकंड की दर से पूर्वी भूमध्य बेसिन में उतरा था. इसे तुलना के लिए समझें कि आज की तारीख में अमेजन नदी का फ्लो महज 2 लाख क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड है.
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह उस कुल पानी का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा था, जो पहले जिब्राल्टर के रास्ते बहा था और फिर सिसिली के पास पूर्वी भूमध्य बेसिन में दाखिल हुआ था. यह खोज धरती के प्राचीन इतिहास के सबसे बड़े और रोमांचक रहस्यों में से एक पर से पर्दा उठाती है.

