विज्ञान: 50 लाख वर्ष पूर्व प्रलयंकर बाढ से भरा था भूमध्य सागर
50 लाख वर्ष पूर्व धरती पर आई प्रचंड बाढ, जलप्रलय से टूटा बांध और समुद्र भर गया
करीब 50 लाख वर्ष पूर्व अटलांटिक महासागर का पानी प्रचंड गति से भूमध्य सागर में प्रविष्ट हुआ था. यह धरती के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा और भयानक जल-प्रलय था.
Largest Flood in Earth History: क्या कभी सोचा है कि हमारी इस धरती पर एक ऐसा समय भी था जब दुनिया का एक बहुत बड़ा समुद्र पूरी तरह सूख चुका था और फिर अचानक एक ऐसी भयावह बाढ (Megaflood) आयी, जिसने मात्र कुछ वर्ष या फिर शायद कुछ ही महीनों में उसे दोबारा पानी से लबालब भर दिया? इस बाढ़ को मेगा फ्लड नाम दिया गया. विज्ञान जगत में एक बेहद चौंकाने वाला अनावरण है. ताजा रिसर्च में वैज्ञानिकों ने इस बात के पक्के सूत्र ढूंढ निकाले हैं कि 50 लाख साल पहले अटलांटिक महासागर का पानी एक प्रचंड गति से भूमध्य सागर में प्रविष्ट हुआ था. यह धरती के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा और भयानक जल-प्रलय था.
जिब्राल्टर के रास्ते कैसे मचा था हाहाकार?
आज से ठीक 50 लाख साल से थोड़ा अधिक समय पहले, अटलांटिक महासागर के पानी ने आज के स्ट्रेट ऑफ जिब्राल्टर के पास एक कमजोर कड़ी ढूंढ निकाली थी. इस वैज्ञानिक थ्योरी के अनुसार महासागर का पानी एक किलोमीटर ऊंची ढलान से इस गति से नीचे उतरा कि वह आज की सबसे तेज दौड़ती कार से भी कहीं अधिक गति से खाली पड़े मेडिटेरेनियन बेसिन की तरफ भागा. इस अनियंत्रित पानी ने अपने रास्ते में किसी गगनचुंबी इमारत जितनी गहरी खाई चीर दी थी.
तब भूमध्य सागर ज्यादातर सूखा हुआ और अत्यधिक नमकीन बेसिन था. लेकिन अटलांटिक से पानी की ऐसी बाढ उमड़ी कि उसने इस विशाल बेसिन को दो-तीन वर्षों या शायद सिर्फ कुछ ही महीनों में पूरा भर दिया. अपने चरम पर इस बाढ़ ने आज की आधुनिक अमेजन नदी से करीब हजार गुना अधिक पानी डिस्चार्ज किया था.
कम से कम, यह वही थीसिस है, जिसे इस रिसर्च से जुड़े एक वैज्ञानिक ने साल 2009 में जिब्राल्टर स्ट्रेट के पास खोजी गई पानी में एक घाटी के स्टडी से दुनिया के सामने रखी थी. उनका अनुमान था कि इस विशाल घाटी को इसी जल प्रलय ने तराशा था. कई वैज्ञानिकों की असहमतियों के बावजूद अगर यह थ्योरी सही सिद्ध होती है तो कथित जैंसलियन मेगाफ्लड (Zanclean Megaflood) धरती पर अब तक की सबसे बड़ी बाढ़ होगी.
लेकिन इतने बड़े और असाधारण दावों को सिद्ध करने को बेहद मजबूत प्रमाणों की जरूरत होती है. रिसर्च ने जैंसलियन युग के तलछटी की चट्टानों यानी Sedimentary Rocks की गहराई से जांच की है, जिससे यह पता चलता है कि कैसे पानी आधुनिक सिसिली और मुख्य धरती अफ्रीका के बीच के रास्ते से होकर गुजरा और भूमध्य सागर के पूर्वी आधे हिस्से को दोबारा पानी से आबाद कर दिया.
वैज्ञानिकों को कैसे लगा इस मेगाफ्लड का सूत्र?
यह खोज दरअसल उस कहानी का सबसे नया और रोमांचक मोड़ है जिसकी शुरुआत 19वीं सदी के आखिर में हुई थी. उस दौर में भूमध्य सागर के आसपास नमक से भरपूर चट्टानी टीलों का अध्ययन करने वाले भूवैज्ञानिकों को धीरे-धीरे इस बात का अहसास होने लगा था कि करीब 5 से 6 मिलियन यानी दस लाख साल पहले कुछ बहुत ही असामान्य घटा था.
यह हालिया हिमयुगों की ग्लेशियर प्रॉसेस से बहुत पहले की बात है. वह यह कि समंदर पूरी तरह सूख चुका था. वैज्ञानिकों ने उस कालखंड को मेसिनियन (Messinian) नाम दिया और इस सूखने की पूरी घटना को मेसिनियन सैलिनिटी संकट (Messinian salinity crisis) के रूप में जाना जाने लगा. 1970 के दशक में वैज्ञानिकों ने पहली बार भूमध्य सागर के तल में मेसिनियन युग की सेडिमेंटरी चट्टानों तक ड्रिलिंग करके नमूने जुटाए. उन्होंने 3 बेहद हैरान करने वाले खुलासे किए.
नमक की मीलों मोटी परत: उन्होंने समुद्र तल के नीचे कई किलोमीटर मोटी नमक की एक विशाल चादर पाई. इससे इस बात की पुष्टि हुई कि आज से लगभग 60 लाख साल पहले पर्यावरण में एक बहुत बड़ा फेरबदल हुआ था, ठीक उसी समय जब टेक्टोनिक प्लेट्स खिसकी थीं और समुद्र अटलांटिक महासागर से कटकर लगभग अलग-थलग पड़ गया था.
उथली झीलों के जीवाश्म: इस नमक की परत के ठीक ऊपर उन्हें उथली और कम नमकीन झीलों के जीवों के जीवाश्म वाले तलछट मिले. इससे यह संकेत मिला कि भूमध्य सागर का जलस्तर आज के स्तर से एक किलोमीटर से भी नीचे गिर गया था, और जैसे-जैसे ज्यादातर पानी भाप बनकर उड़ा, पीछे भारी मात्रा में नमक छूट गया. बेसिन के सबसे निचले हिस्सों में छोटी झीलों की एक सीरीज जरूर बची रही होगी, जिन्हें छोटी धाराएं अपेक्षाकृत ताजा और कम नमकीन बनाए रखती थीं. समुद्र तल के सिस्मिक सर्वे से भी इस बात की पुष्टि हुई कि कभी इस सूखे इलाके में नदियां बहती थीं.
गहरे समुद्र की तलछट की वापसी: नमक के ऊपर की चट्टानी परतें अचानक दोबारा सामान्य गहरे समुद्र की सेडिमेंट में बदल गई. आज हम यह अच्छी तरह जानते हैं कि इस भयंकर संकट से भूमध्य सागर की 11 प्रतिशत से भी कम समुद्री प्रजातियां जिंदा बच पाई थीं, जो यह बताने के लिए काफी है कि समुद्री जीवन पर इस आपदा का कितना गहरा और स्थाई असर पड़ा था. 1970 के दशक में संकट के इस अंत को ‘जैंसलियन फ्लड’ का नाम दिया गया, हालांकि तब तक वैज्ञानिक यह नहीं जानते थे कि इसके पीछे असल में क्या प्रॉसेस थी या सूखे बेसिन को दोबारा भरने में कितना वक्त लगा था?
एक और महाप्रलय: सिसिली और अफ्रीका के बीच का सैलाब
इस कड़ी में अगली बड़ी सफलता साल 2009 में हाथ लगी, जब जिब्राल्टर के रास्ते प्रस्तावित अफ्रीका-यूरोप सुरंग के लिए जुटाए गए जियोफिजिकल डेटा से यह संकेत मिला कि अटलांटिक महासागर और भूमध्य सागर के बीच की उस विशाल पानी के नीचे की खाई को किसी अचानक और महाप्रलयकारी बाढ़ ने ही चीरा होगा.
हालिया रिसर्च इसी बात पर मुहर लगाती है. माल्टा के वैज्ञानिक आरोन मिकालेफ के नेतृत्व वाली टीम के हिस्से के तौर पर, हमने उस क्षेत्र की खोज की जहां भूमध्य सागर के वेस्टर्न बेसिन को भरने वाला पानी आधुनिक अफ्रीका और इटली को जोड़ने वाली ऊंची जमीन की रिज यानी ‘सिसिली सिल से टकराया होगा. हमारे मन में एक ही सवाल घूम रहा था क्या इस बात का कोई सबूत है कि जब पूर्वी भूमध्य सागर भर रहा था, तब कोई दूसरा महा-सैलाब भी आया होगा?
इस नए पेपर के रिसर्च में शामिल जियोवानी बारेका (Giovanni Barreca), दक्षिणी सिसिली में ही पले-बढ़े हैं. उन्होंने बहुत पहले यह भांप लिया था कि तट के पास की निचली पहाड़ियां असल में ‘सिसिली सिल्ल’ का ही विस्तार हैं, जिसके ऊपर से होकर वह बाढ़ पश्चिम से पूर्व की तरफ बढ़ी होगी. उन्हें पूरा यकीन था कि इस इलाके में इतिहास के कई बड़े सुराग छिपे हो सकते हैं.
वाशिंगटन स्टेट से सिसिली की पहाड़ियों का कनेक्शन
जब हमारी टीम ने सिसिली के इस हिस्से का दौरा किया तो हमने पाया कि वहां की पहाड़ियां वाकई आम पहाड़ियों जैसी नहीं थीं. उनकी एक सीध में बनी और स्ट्रीमलाइन. अमेरिका के वाशिंगटन राज्य की उन पहाड़ियों से गजब की समानता रखती थीं. ये गर्त यानी डिप्रेशन से अलग होती है. वाशिंगटन की वे पहाड़ियां आखिरी हिमयुग के अंत में आई एक बाढ़ से तराशी गई थीं, जब एक ग्लेशियर के पीछे बनी विशाल ‘झील मिसौला’ का बांध टूट गया था और वह विनाशकारी तरीके से खाली हो गई थी.
अगर सिसिली की वे पहाड़ियां और गर्त भी किसी प्रलयकारी बाढ़ के थपेड़ों से बने थे, तो उन क्रेटर के आधार से कटा हुआ चट्टानी मलबा 50 लाख साल से भी अधिक समय बाद उन पहाड़ियों की चोटियों पर जमा हुआ मिलना चाहिए था. और ठीक वैसा ही हुआ! हमें उन पहाड़ियों की चोटियों पर बड़े-बड़े बोल्डर के आकार तक का उलझा हुआ और बिखरा हुआ चट्टानी मलबा मिला. ये वही चट्टानें थीं जो नीचे क्रेटर्स के अंदर और और अधिक अंदरूनी इलाकों में पाई जाती हैं.
अपने इस काम को पूरी तरह पुख्ता करने के लिए, हमने एक कंप्यूटर सिमुलेशन (मॉडल) तैयार किया कि कैसे बाढ़ का पानी ‘सिसिली सिल’ के किसी हिस्से को पार करते वक्त बहा होगा. इस मॉडल ने यह साबित कर दिया कि बाढ़ का पानी बिल्कुल उन्हीं दिशाओं में बहा होगा जैसी उन सुव्यवस्थित पहाड़ियों की बनावट है.
हकीकत में इस कंप्यूटर मॉडल ने यह चौंकाने वाला सच सामने रखा कि वे पहाड़ियां 40 मीटर या उससे अधिक गहरे पानी से तराशी गई थीं, जो 115 किलोमीटर प्रति घंटे यानी कि 71 मील प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ रहा था. हमने जिस एक खास इलाके का मॉडल तैयार किया, वहां 13 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी प्रति सेकंड की दर से पूर्वी भूमध्य बेसिन में उतरा था. इसे तुलना के लिए समझें कि आज की तारीख में अमेजन नदी का फ्लो महज 2 लाख क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड है.
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह उस कुल पानी का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा था, जो पहले जिब्राल्टर के रास्ते बहा था और फिर सिसिली के पास पूर्वी भूमध्य बेसिन में दाखिल हुआ था. यह खोज धरती के प्राचीन इतिहास के सबसे बड़े और रोमांचक रहस्यों में से एक पर से पर्दा उठाती है.
लाखों साल पहले धरती पर आया था सबसे प्रचंड सैलाब, जलप्रलय से टूटा बांध और समंदर भर गया
करीब 50 लाख साल पहले अटलांटिक महासागर का पानी एक प्रचंड रफ्तार से भूमध्य सागर में दाखिल हुआ था. यह धरती के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा और भयानक जल-प्रलय था.
क्या आपने कभी सोचा है कि हमारी इस धरती पर एक ऐसा दौर भी था जब दुनिया का एक बहुत बड़ा समंदर पूरी तरह सूख चुका था और फिर अचानक एक ऐसा भयावह सैलाब (Megaflood) आया, जिसने महज कुछ ही साल या फिर शायद कुछ ही महीनों में उसे दोबारा पानी से लबालब भर दिया? इस बाढ़ को मेगा फ्लड का नाम दिया गया. विज्ञान जगत में एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है. हालिया रिसर्च में वैज्ञानिकों ने इस बात के पुख्ता सुराग ढूंढ निकाले हैं कि आज से करीब 50 लाख साल पहले अटलांटिक महासागर का पानी एक प्रचंड रफ्तार से भूमध्य सागर में दाखिल हुआ था. यह धरती के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा और भयानक जल-प्रलय था.
जिब्राल्टर के रास्ते कैसे मचा था हाहाकार?
आज से ठीक 50 लाख साल से थोड़ा अधिक समय पहले, अटलांटिक महासागर के पानी ने आज के स्ट्रेट ऑफ जिब्राल्टर के पास एक कमजोर कड़ी ढूंढ निकाली थी. इस वैज्ञानिक थ्योरी के मुताबिक महासागर का पानी एक किलोमीटर ऊंची ढलान से इतनी रफ्तार से नीचे उतरा कि वह आज की सबसे तेज दौड़ती कार से भी कहीं अधिक रफ्तार से खाली पड़े मेडिटेरेनियन बेसिन की तरफ भागा. इस बेकाबू पानी ने अपने रास्ते में किसी गगनचुंबी इमारत जितनी गहरी खाई को चीरकर रख दिया था.
उस दौर में भूमध्य सागर ज्यादातर सूखा हुआ और अत्यधिक नमकीन बेसिन हुआ करता था. लेकिन अटलांटिक से पानी का ऐसा सैलाब उमड़ा कि उसने इस विशाल बेसिन को बमुश्किल दो-तीन सालों में और शायद सिर्फ कुछ ही महीनों के अंदर पूरी तरह भर दिया. अपने चरम पर इस बाढ़ ने आज की आधुनिक अमेजन नदी से करीब हजार गुना अधिक पानी का डिस्चार्ज किया था.
कम से कम, यह वही थीसिस है, जिसे इस रिसर्च से जुड़े एक वैज्ञानिक ने साल 2009 में जिब्राल्टर स्ट्रेट के पास खोजी गई पानी के अंदर की एक घाटी के स्टडी के दौरान दुनिया के सामने रखी थी. उनका अनुमान था कि इस विशाल घाटी को इसी जल प्रलय ने तराशा था. कई वैज्ञानिकों की असहमतियों के बावजूद अगर यह थ्योरी सही साबित होती है तो तथाकथित जैंसलियन मेगाफ्लड (Zanclean Megaflood) धरती पर दर्ज अब तक की सबसे बड़ी बाढ़ होगी.
लेकिन इतने बड़े और असाधारण दावों को साबित करने के लिए बेहद पुख्ता सबूतों की जरूरत होती है. हमारी रिसर्च ने जैंसलियन युग के तलछटी की चट्टानों यानी Sedimentary Rocks की गहराई से जांच की है, जिससे यह पता चलता है कि कैसे पानी आधुनिक सिसिली और मुख्य धरती अफ्रीका के बीच के रास्ते से होकर गुजरा और भूमध्य सागर के पूर्वी आधे हिस्से को दोबारा पानी से आबाद कर दिया.
वैज्ञानिकों को कैसे मिला इस मेगाफ्लड का सूत्र?
यह खोज दरअसल उस कहानी का सबसे नया और रोमांचक मोड़ है जो 19वीं सदी के आखिर में शुरू हुआ था.उस दौर में भूमध्य सागर के आसपास नमक से भरपूर चट्टानी टीलों का अध्ययन करने वाले भूवैज्ञानिकों को धीरे-धीरे यह अनुभूति होने लगी थी कि 50-60 लाख साल पहले कुछ बहुत ही असामान्य घटा था.
यह अभी के हिमयुगों की ग्लेशियर प्रक्रिया से बहुत पहले की बात है.वह यह कि समंदर पूरी तरह सूख चुका था.वैज्ञानिकों ने उस कालखंड को मेसिनियन (Messinian) नाम दिया और इस सूखने की पूरी घटना को मेसिनियन सैलिनिटी संकट (Messinian salinity crisis) के रूप में जाना जाने लगा. 1970 के दशक में वैज्ञानिकों ने पहली बार भूमध्य सागर के तल में मेसिनियन युग की सेडिमेंटरी चट्टानों तक ड्रिलिंग करके नमूने जुटाए.उनसे 3 बेहद आश्चर्यजनक अनावरण हुए.
नमक की मीलों मोटी परत: उन्होंने समुद्र तल के नीचे कई किलोमीटर मोटी नमक की एक विशाल परत पाई.इससे पुष्टि हुई कि आज से 60 लाख साल पहले पर्यावरण में बहुत बड़ा फेरबदल हुआ,ठीक तब जब टेक्टोनिक प्लेट्स खिसकी और समुद्र अटलांटिक महासागर से कटकर अलग-थलग पड़ गया था.
उथली झीलों के जीवाश्म: इस नमक की परत के ठीक ऊपर उन्हें उथली और कम नमकीन झीलों के जीवों के जीवाश्म वाले तलछट मिले. इससे संकेत मिला कि भूमध्य सागर का जलस्तर आज के स्तर से एक किलोमीटर से भी नीचे गिर गया था,और जैसे-जैसे ज्यादातर पानी भाप बनकर उड़ा,पीछे भारी मात्रा में नमक छूट गया.बेसिन के सबसे निचले हिस्सों में छोटी झीलों की एक श्रृंखला जरूर बची रही होगी, जिन्हें छोटी धाराएं अपेक्षाकृत ताजा और कम नमकीन बनाए रखती थीं.समुद्र तल के सिस्मिक सर्वेक्षण से भी इस बात की पुष्टि हुई कि कभी इस सूखे इलाके में नदियां बहती थीं.
गहरे समुद्र की तलछट की वापसी: नमक के ऊपर की चट्टानी परतें अचानक दोबारा सामान्य गहरे समुद्र की सेडिमेंट में बदल गई. आज हम यह अच्छी तरह जानते हैं कि इस भयंकर संकट से भूमध्य सागर की 11 प्रतिशत से भी कम समुद्री प्रजातियां जिंदा बच पाई थीं, जो यह बताने के लिए काफी है कि समुद्री जीवन पर इस आपदा का कितना गहरा और स्थाई असर पड़ा था. 1970 के दशक में संकट के इस अंत को ‘जैंसलियन फ्लड’ का नाम दिया गया, हालांकि तब तक वैज्ञानिक यह नहीं जानते थे कि इसके पीछे असल में क्या प्रॉसेस थी या सूखे बेसिन को दोबारा भरने में कितना वक्त लगा था?
एक और महाप्रलय: सिसिली और अफ्रीका के बीच का सैलाब
इस कड़ी में अगली बड़ी सफलता साल 2009 में हाथ लगी, जब जिब्राल्टर के रास्ते प्रस्तावित अफ्रीका-यूरोप सुरंग के लिए जुटाए गए जियोफिजिकल डेटा से यह संकेत मिला कि अटलांटिक महासागर और भूमध्य सागर के बीच की उस विशाल पानी के नीचे की खाई को किसी अचानक और महाप्रलयकारी बाढ़ ने ही चीरा होगा.
हालिया रिसर्च इसी बात पर मुहर लगाती है. माल्टा के वैज्ञानिक आरोन मिकालेफ के नेतृत्व वाली टीम के हिस्से के तौर पर, हमने उस क्षेत्र की खोज की जहां भूमध्य सागर के वेस्टर्न बेसिन को भरने वाला पानी आधुनिक अफ्रीका और इटली को जोड़ने वाली ऊंची जमीन की रिज यानी ‘सिसिली सिल से टकराया होगा. हमारे मन में एक ही सवाल घूम रहा था क्या इस बात का कोई सबूत है कि जब पूर्वी भूमध्य सागर भर रहा था, तब कोई दूसरा महा-सैलाब भी आया होगा?
इस नए पेपर के रिसर्च में शामिल जियोवानी बारेका (Giovanni Barreca), दक्षिणी सिसिली में ही पले-बढ़े हैं. उन्होंने बहुत पहले यह भांप लिया था कि तट के पास की निचली पहाड़ियां असल में ‘सिसिली सिल्ल’ का ही विस्तार हैं, जिसके ऊपर से होकर वह बाढ़ पश्चिम से पूर्व की तरफ बढ़ी होगी. उन्हें पूरा यकीन था कि इस इलाके में इतिहास के कई बड़े सुराग छिपे हो सकते हैं.
वाशिंगटन स्टेट से सिसिली की पहाड़ियों का कनेक्शन
जब टीम ने सिसिली के इस हिस्से का भ्रमण किया तो पाया कि वहां की पहाड़ियां वाकई सामान्य पहाड़ियों जैसी नहीं थीं.उनकी एक सीध में बनी और स्ट्रीमलाइन.यें अमेरिका के वाशिंगटन राज्य की उन पहाड़ियों से गजब की समानता रखती थीं.ये गर्त यानी डिप्रेशन से अलग होती है.वाशिंगटन की वे पहाड़ियां आखिरी हिमयुग के अंत में आई एक बाढ़ से तराशी गई थीं,जब एक ग्लेशियर के पीछे बनी विशाल ‘झील मिसौला’ का बांध टूट गया था और वह विनाशकारी वेग से रिक्त हुई थी.
अगर सिसिली की वे पहाड़ियां और गर्त भी किसी प्रलयकारी बाढ़ के थपेड़ों से बने थे,तो उन क्रेटर के आधार से कटा हुआ चट्टानी मलबा 50 लाख साल से भी अधिक समय बाद उन पहाड़ियों की चोटियों पर जमा मिलना चाहिए था.और ठीक वैसा ही मिला! हमें उन पहाड़ियों की चोटियों पर बड़े-बड़े बोल्डर के आकार का उलझा और बिखरा हुआ चट्टानी मलबा मिला. ये वही चट्टानें थीं जो नीचे क्रेटर्स के अंदर और और अधिक आंतरिक क्षेत्रों में मिलती हैं.
इसे पूरी तरह पुष्ट करने को,हमने एक कंप्यूटर सिमुलेशन (मॉडल) तैयार किया कि कैसे बाढ़ का पानी ‘सिसिली सिल’ के किसी हिस्से को पार करते बहा होगा.इस मॉडल ने यह सिद्ध कर दिया कि बाढ़ का पानी बिल्कुल उन्हीं दिशाओं में बहा होगा जैसी उन सुव्यवस्थित पहाड़ियों की बनावट है.
यथार्थ में इस कंप्यूटर मॉडल ने यह चौंकाने वाला सच बताया कि वे पहाड़ियां 40 मीटर या उससे अधिक गहरे पानी से तराशी गई थीं, जो 115 किलोमीटर प्रति घंटे यानी कि 71 मील प्रति घंटे गति से दौड़ा था.जिस एक विशेष क्षेत्र का मॉडल तैयार किया,वहां 130 लाख क्यूबिक मीटर पानी प्रति सेकंड की दर से पूर्वी भूमध्य बेसिन में उतरा था.इसे तुलना को समझें कि अमेजन नदी प्रवाह 2 लाख क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड है.
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह उस कुल पानी का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा था, जो पहले जिब्राल्टर के रास्ते बहा था और फिर सिसिली के पास पूर्वी भूमध्य बेसिन में प्रविष्ट हुआ था.यह खोज धरती के प्राचीन इतिहास के सबसे बड़े और रोमांचक रहस्यों में से एक पर से पर्दा उठाती है.
कैसे हुआ था महासागरों का निर्माण
अधिकांश वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी के आंतरिक भाग से लगातार ‘गैसों के निकलने’ के कारण अरबों वर्षों में धीरे-धीरे महासागरों में गैस का संचय हुआ है। पृथ्वी का तापमान 212 डिग्री फारेनहाइट से नीचे गिरने तक पानी गैस के रूप में मौजूद था।
महासागरों का निर्माण
हमारा ग्रह पृथ्वी अंतरिक्ष से नीला दिखाई देता है। क्योंकि, पृथ्वी की सतह पर प्रचुर मात्रा में जल की उपस्थिति है। पृथ्वी की सतह का दो-तिहाई भाग (लगभग 71%) महासागरों से ढका हुआ है। पृथ्वी पर पांच महासागर हैं, अर्थात् आर्कटिक महासागर, अटलांटिक महासागर, हिंद महासागर, प्रशांत महासागर और दक्षिणी महासागर। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि महासागरों का निर्माण कैसे हुआ? यदि नहीं, तो यह इस लेख के माध्यम से हम इस बारे में जानेंगे।
पृथ्वी के आंतरिक भाग से लगातार ‘गैस निकलने’ के कारण अरबों वर्ष पहले महासागरों का निर्माण शुरू हुआ। पृथ्वी का तापमान 212 डिग्री फारेनहाइट से नीचे गिरने तक पानी गैस के रूप में मौजूद था। आइये पृथ्वी की सतह पर महासागरों के निर्माण के दो संभावित तरीकों पर नजर डालें।
जल वाष्प और संघनन
लगभग 4.5 अरब वर्ष पहले पृथ्वी पर कहीं भी तरल जल मौजूद नहीं था। पृथ्वी इतनी गर्म थी कि चट्टानें पिघल गयीं (वे तरल हो गयीं)। जब ज्वालामुखी विस्फोट हुआ, तो गैसों में से एक भाप (जलवाष्प) के रूप में बाहर निकली। जैसे-जैसे पृथ्वी ठंडी होती गई, जलवाष्प संघनित होकर लाखों वर्षों तक पृथ्वी की सतह पर बरसती रही। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि इसी कारण से पृथ्वी की सतह पर पानी आया।
धूमकेतु, क्षुद्रग्रह और उल्कापिंड
धूमकेतु बर्फ और धूल के विशाल टुकड़े हैं,जो तारों और अन्य ग्रहों के निर्माण के बाद बचे रह गए थे। क्षुद्रग्रह बड़े चट्टान होते हैं,जिन्हें ग्रहिका या लघु ग्रह के नाम से जाना जाता है। ग्रहों और तारों के निर्माण के समय ये पीछे छूट गये।
जब कोई क्षुद्रग्रह पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करता है,तो उसे उल्का कहा जाता है। सामान्यत:उल्काएं पृथ्वी के वायुमंडल से गुजरते समय जल जाती हैं,लेकिन कभी-कभी कुछ टुकड़े बच जाते हैं। इन टुकड़ों को उल्कापिंड कहा जाता है। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि महासागरों में शेष पानी धूमकेतुओं,क्षुद्रग्रहों और उल्काओं से आया है।
कार्बोनेसियस कोंड्राईट(एक प्रकार का उल्कापिंड) में बहुत सारा पानी होता है। बीते वर्षों में वैज्ञानिकों ने पाया था कि कार्बोनेसियस कोंड्राइट्स में पाया जाने वाला पानी पृथ्वी पर मिलने वाले पानी के समरुप है।
जैसे ही पानी पृथ्वी की सतह पर विशाल गड्ढों में बह गया,महासागर अस्तित्व में आ गए और गुरुत्वाकर्षण बल के कारण पानी ग्रह से बाहर नहीं जा सका।
तो, विज्ञान मानता है कि ऐसे महासागरों का निर्माण हुआ था।


