चीन के मुकाबले US ने क्वाड बनाया और खुद ही खत्म कर दिया

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डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ अटैक ने काट दीं QUAD की जड़ें? चीन के खिलाफ भारत अब अकेला पड़ा? विशेषज्ञ राय
India US Trade Deal: भारत का स्ट्रैटजिक डॉक्ट्रिन अभी तक ‘मल्टी-अलाइंड’ रहा है और भारत ना तो एशिया में नाटो जैसा कोई सैन्य गठबंधन चाहता है और ना ही चीन या रूस जैसे तानाशाहों का विस्तार चाहता है। भारत समुद्री स्वतंत्रता और वर्चस्ववादी सिद्धांत के खिलाफ काम करता है, जिसमें सह-अस्तित्व की धारणा होती है।
वॉशिंगटन/नई दिल्ली 16 अगस्त 2025 : डोनाल्ड ट्रंप ने 25 प्रतिशत टैरिफ और रूसी तेल खरीदने को 25 प्रतिशत जुर्माना लगाकर भारत-अमेरिका संबंधों की नींव हिला दी है। कई एक्सपर्ट्स ने इसे दोनों देशों में स्ट्रैटजिक पार्टनरशिप का अंत तक मान लिया है। भारत और अमेरिका के कई एक्सपर्ट इस पर सहमत हैं कि डोनाल्ड ट्रंप के निर्णय आक्रामक हैं और इंडो-पैसिफिक में रणनीतिक दृष्टि से विनाशकारी सिद्ध हो सकते हैं। ट्रंप के निर्णय से ना सिर्फ भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों में भूकंप आ गया है, बल्कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिकी नेतृत्व वाली सबसे महत्त्वपूर्ण बहुपक्षीय पहल, QUAD (क्वाड) के भविष्य पर भी खतरों के बादल मंडरा रहे हैं। क्वाड में अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया हैं जिसे 21वीं शताब्दि में चीनी आक्रामकता संतुलन करने को 2007 में बनाया गया। लेकिन फिर कुछ सालों यह निष्क्रिय रहा । साल 2017 में एक बार फिर क्वाड एक्टिवेट किया गया और उसके बाद से डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने तक लगातार क्वाड देशों की बैठकें और शिखर सम्मेलन होते रहे। यहां तक कि डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने पर भी उनके प्रशासन ने सबसे पहले क्वाड की ही बैठक की, जिसमें चारों देशों के विदेश मंत्री शामिल हुए थे। लेकिन अब सबसे पहला सवाल क्वाड के भविष्य को लेकर ही हो रहे हैं, जिसकी बैठक इसी साल अंत तक भारत में होनी है।

डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों से QUAD के भविष्य पर गंभीर सवाल

इंडो-पैसिफिक में चीन के मुकाबले को  बना यह मंच, अब अपने ही संस्थापक देश की अस्थिर विदेश नीति से खतरे में है। डोनाल्ड ट्रंप अभी तक भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगा चुके हैं और तय है कि वो इसे और आगे ले जाएंगे। कहां तक पता नहीं। दूसरी तरफ जापान पर भी उन्होंने 15 प्रतिशत टैरिफ लगाया है, ऑस्ट्रेलिया पर स्टील/एल्युमिनियम टैक्स लगाकर उन्होंने साफ कर दिया है कि उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति से अमेरिका की ‘ग्लोबल स्ट्रैटजी’ गायब हो चुकी है। इकोनॉमिक नेशनलिज्म के रास्ते पर चलते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका की विदेश नीति इंडो-पैसिफिक से उतार दी है। डोनाल्ड ट्रंप अपने क्वाड सहयोगियों को ही दंडित कर रहे हैं, जिसका असर आपसी संबंधों पर नहीं, अमेरिकी विश्वास पर होगा, जिसकी भरपाई अगले कई दशकों नहीं हो सकती।

डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ वॉर के सामने अडिग भारत
डोनाल्ड ट्रंप पिछले दो महीने से लगातार भारत विरोधी बयान दे रहे हैं, लेकिन नई दिल्ली अभी भी धैर्यवान बना है। ट्रंप ने तीन दिनों में दो बार 25-25% टैरिफ घोषित किया तो भारतीय विदेश मंत्रालय ने प्रेस रिलीज में अपनी हित रक्षा की बात कही। भारतीय विदेश मंत्रालय के बयान से साफ है कि भारत सरकार ‘किसानों, MSME और भारत के उद्यमियों के हितों की रक्षा’ में अमेरिकी प्रेशर में नहीं आने वाला। प्रधानमंत्री मोदी ने भी किसानों को संबोधित करते हुए यही कहा है कि नुकसान होगा, लेकिन भारत नहीं झुकेगा। संदेश अभी तक साफ है कि भारत, आत्मनिर्भरता और रणनीतिक स्वायत्तता किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेगा, चाहे सामने दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था ही क्यों न हो। लेकिन दिल्ली का भरोसा टूट चुका,जिसे अमेरिका के अलग-अलग प्रशासन ने पिछले कम से कम 25 सालों में अथक मेहनत से बनाने की कोशिश की है।

भारत का स्ट्रैटजिक डॉक्ट्रिन अभी तक ‘मल्टी-अलाइंड’ रहा है। भारत ना तो एशिया में नाटो जैसा कोई सैन्य गठबंधन चाहता है और ना ही चीन या रूस की तरह कोई तानाशाही चाहता है। भारत समुद्री स्वतंत्रता और वर्चस्ववादी सिद्धांत के खिलाफ काम करता है, जिसमें सह-अस्तित्व की धारणा होती है। क्वाड का भी उद्देश्य यही था, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने अपने आर्थिक और रणनीतिक साझेदारों पर ही प्रहार किया है। इसीलिए सबसे पहला सवाल अब क्वाड के ही भविष्य पर है। भारत के दिग्गज स्ट्रैटजिस्ट ब्रह्मा चेलानी का भी यही मानना है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा है कि “अमेरिका-भारत तनाव क्वाड के भविष्य पर खतरा मंडरा रहा हैं। अगर ट्रंप भारत के प्रति अपने कठोर टैरिफ रुख पर कायम रह रूसी तेल आयात पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाने की धमकी आगे बढते हैं, तो इस साल भारत में प्रस्तावित क्वाड शिखर सम्मेलन, जिसमें ट्रंप को भाग लेना है, स्थगित हो सकता है। ट्रंप के अपमान और धमकियों ने नई दिल्ली में कड़वाहट और बढ़ा दी है, इसलिए द्विपक्षीय संबंध बचाने को एक व्यापारिक सफलता जरूरी हो गई है।”

इंडो-पैसिफिक में अमेरिका के भविष्य पर भी सवाल
इंडो-पैसिफिक में चीन काफी आक्रामकता से अपना विस्तार कर रहा है। BRI से वो पहले ही छोटे देशों को कर्ज जाल में बुरी तरह  फंसा चुका। श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश समते दर्जनों देश उदाहरण है। दक्षिण चीन सागर के देशों फिलीपींस, इंडोनेशिया, मलेशिया, ब्रूनेई और वियतनाम भी चीनी धमकियां बार-बार झेलते रहते हैं। इसी से 2017 में अमेरिका ने ही क्वाड फिर से सक्रिय किया था, ताकि ये प्लेटफॉर्म ‘नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था’ बनाए और चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का विकल्प बन सके। भारत इसमें स्वाभाविक रूप से था क्योंकि यह दक्षिण एशिया में सबसे बड़ा लोकतंत्र है और इसकी भौगोलिक स्थिति हिंद महासागर में रणनीतिक संतुलन बनाए रखने को काफी महत्वपूर्ण है। चीनी कारोबार को नियंत्रित करने वाले मलक्का स्ट्रेट पर भी भारत का ही कंट्रोल है और भारत के वर्चस्व वाले हिंद महासागर से ही चीन का 70 प्रतिशत से ज्यादा कारोबार होता है। इसी से भारत के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन भी भारत के बिना इंडो-पैसिफिक स्ट्रैटजी को सिर्फ पैसिफिक स्ट्रैटजी मानते हैं।

रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन ने कहा है कि “बिना भारत के इंडो-पैसिफिक सिर्फ पैसिफिक रह जाता है और अमेरिका नही चाहेगा कि वो सिर्फ अटलांटिक और पैसिफिक तक सीमित हो जाए। क्या वो एशिया को पूरी तरह से चीन को सौंपेगा। मुझे ऐसा नहीं लगता। अमेरिका के थिंक टैंक और जियो-पॉलिटिकल जानकारों की भी मौजूदा स्थिति पर नजर होगी। मेरा मानना है कि ये एक पासिंग फेज है। भारत और अमेरिका के संबंधों में बार-बार ऐसे मौके आए, जब अचानक संबंध बिगड़े हैं, जिन्हें सही करने में फिर कई साल लगे। 1998 में भारत के परमाणु परीक्षण बाद भी ऐसा हुआ था, जब अमेरिका ने आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे। 1971 भी उदाहरण है। इसीलिए मेरा मानना है कि उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। हमें धैर्य बनाए रखना चाहिए। चीजें फिर से सामान्य होंगी।” लेकिन फिर भी उनका मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप ने भारत और अमेरिका के संबंधों को अभूतपूर्व नुकसान पहुंचाया है। जब अमेरिका अपने ही साझेदारों को टैरिफ और प्रतिबंधों से धमका रहा है, तो इंडो-पैसिफिक में अमेरिकी नेतृत्व पर सवाल उठना लाजमी है।

दरक गया है QUAD का आधार, यानी भरोसा
डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति से परेशान ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज पीछे बीजिंग गये थे। ऑस्ट्रेलिया ने चीन से संबंध  सामान्य बनाने पर सहमति जता दी है। ऑस्ट्रेलिया को डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका पर भरोसा नहीं है। स्पष्ट है,ऑस्ट्रेलिया भी अपनी अर्थव्यवस्था बचाने में जुट गया है, जो काफी हद तक चीन निर्भर है। जापान ने अमेरिकी से निर्भरता घटाते हुए अपनी सेना बनाने का ऐलान कर दिया है। दक्षिण कोरिया से सैनिक घटाने की बात करके डोनाल्ड ट्रंप ने कोरियाई प्रायद्वीप में भी तनाव भड़का दिया है। दक्षिण कोरिया डरा हुआ है। हालांकि वो क्वाड का सदस्य नहीं है, लेकिन अमेरिका का करीबी सहयोगी तो है ही। क्वाड का मुख्य आधार था ‘आपसी विश्वास’। जिस पर डोनाल्ड ट्रंप लगातार हथौड़े चला रहे हैं। जापान के प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा ने सार्वजनिक रूप से अमेरिका की टैरिफ नीति को “निराशाजनक” बताया है । ऑस्ट्रेलिया भी अपने औद्योगिक हितों के नुकसान से परेशान है। लोवी इंस्टीट्यूट के जुलाई 2025 सर्वे में सिर्फ 36% ऑस्ट्रेलियाई और 15% जापानी नागरिक ही अब अमेरिका को भरोसेमंद रणनीतिक भागीदार मानते हैं और ये आंकड़े Quad के भविष्य के लिए खतरे की घंटी हैं।

कुल मिलाकर देखें तो Quad का अस्तित्व अब अमेरिका या यूं कहें सिर्फ और सिर्फ डोनाल्ड ट्रंप पर निर्भर है। अभी भी वापसी के रास्ते हैं, अगर ट्रंप अपनी नीतियां तत्काल बदलें। अगर डोनाल्ड ट्रंप धमकियों के डंडे से भारत पर वार करेंगें तो भारत मौन ही सही, लेकिन पलटवार करेगा। ऐसे में इस मंच का भविष्य संदेह के घेरे में है। भारत की स्थिति इस गठबंधन में अब निर्णायक है। भारत पीछे हटता है तो QUAD खत्म हो जाएगा। साफ है, इसका फायदा चीन को होगा। जो QUAD चीन को रोकने को खड़ा किया गया था, वह अब अमेरिकी नीतियों से खत्म होने को है। भारत इस पूरे समीकरण का सबसे महत्वपूर्ण खिलाड़ी है और अपने महत्वपूर्ण खिलाड़ी को गेम से बाहर बिठाकर, या उसे परेशान कर, या उस पर प्रेशर बनाकर अमेरिका इंडो-पैसिफिक गेम किसी भी हाल नहीं जीत सकता है।

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