शरज़ील इमाम की विचारधारा से ना लड़े तो…….

(शरज़ील को कठोरतम सज़ा मिलनी चाहिए किन्तु यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि उसे सज़ा देना ऐसा है जैसे भड़काऊ भाषण के मामले में लाउडस्पीकर ज़ब्त कर लिया जाये और लाउडस्पीकर पर मुक़दमा चलाया जाये। शरज़ील इमाम ने अपनी ओर से कुछ नहीं कहा है। उसने तो वही कहा है जो इस्लाम के प्रवर्तक ने मुस्लिम उम्मा को सिखाया है।)

शरज़ील इमाम पकड़ कर दिल्ली ले आया गया और राज्य व्यवस्था, समाज, राजनैतिक लोगों ने चैन की साँस ली। शरज़ील इमाम अब कुछ साल अदालतों में मुक़दमों के दौरान एड़ियां रगड़ेगा फिर सज़ा काटेगा। सामान्यतः ऐसे मामलों में यही होता है और इसके बाद काल का प्रवाह आगे बढ़ जाता है मगर शरज़ील के मामले में ऐसा नहीं है। शरज़ील को कठोरतम सज़ा मिलनी चाहिए किन्तु यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि उसे सज़ा देना ऐसा है जैसे भड़काऊ भाषण के मामले में लाउडस्पीकर ज़ब्त कर लिया जाये और लाउडस्पीकर पर मुक़दमा चलाया जाये।

शरज़ील इमाम ने अपनी ओर से कुछ नहीं कहा है। उसने तो वही कहा है जो इस्लाम के प्रवर्तक ने मुस्लिम उम्मा को सिखाया है। अल्लाह की तौहीद, उसकी नमाज़, नमाज़ में एक ऊँगली उठा कर गवाही देना कि अल्लाह एक है, अल्लाह का अंतिम पैग़ंबर मुहम्मद को मानना, रोज़ा, ज़कात, हज का पाबंद होना । साथ ही उतनी ही उद्विग्नता से इन बातों को न मानने वालों को काफ़िर मानना और उनकी हत्या करना, जीवन भर जिहाद करना हर मुसलमान बचपन से सीखता है। यह अलग बात है कि अब सभ्य समाज के विभिन्न देशों में बनाये गए क़ानूनों के दबाव में वो ऐसा कर नहीं पाता मगर उसका शिक्षण, चिंतन यही होता है।

क़ुरआन की कुछ आयतें इस पर प्रकाश डालने के लिये पर्याप्त हैं। हदीसें ऐसी बातों से भरी हुई हैं। स्वयं मुहम्मद के जीवन में ऐसी घटनाओं का बाहुल्य है। इसके ज्ञान के लिये Ali Sina साहब की किताब Understaing Muhammad पढ़नी चाहिये। यह किताब, उसका हिंदी, उर्दू अनुवाद नैट पर फ़्री उपलब्ध है।

ओ मुसलमानों तुम ग़ैर मुसलमानों से लड़ो. तुममें उन्हें सख्ती मिलनी चाहिये { 9-123 }
और तुम उनको जहां पाओ क़त्ल करो { 2-191 }
काफ़िरों से तब तक लड़ते रहो जब तक दीन पूरे का पूरा अल्लाह के लिये न हो जाये { 8-39 }
ऐ नबी ! काफ़िरों के साथ जिहाद करो और उन पर सख्ती करो. उनका ठिकाना जहन्नुम है { 9-73 और 66-9 }
अल्लाह ने काफ़िरों के रहने के लिये नर्क की आग तय कर रखी है { 9-68 }
उनसे लड़ो जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं, न आख़िरत पर; जो उसे हराम नहीं समझते जिसे अल्लाह ने अपने नबी के द्वारा हराम ठहराया है. उनसे तब तक जंग करो जब तक कि वे ज़लील हो कर जज़िया न देने लगें { 9-29 }
मूर्ति पूजक लोग नापाक होते हैं { 9-28 }जो कोई अल्लाह के साथ किसी को शरीक करेगा, उसके लिये अल्लाह ने जन्नत हराम कर दी है. उसका ठिकाना जहन्नुम है { 5-72 }
तुम मनुष्य जाति में सबसे अच्छे समुदाय हो, और तुम्हें सबको सही राह पर लाने और ग़लत को रोकने के काम पर नियुक्त किया गया है { 3-110 }

शरज़ील इमाम और अन्य मुसलमान जिस पुस्तक क़ुरआन को ईश्वरीय पुस्तक मानते हैं और उससे प्रभावित हैं यह उसकी पंक्तियाँ हैं। प्रथम विश्व युद्ध के समय तुर्की ने 15 लाख से अधिक आर्मेनियन ईसाइयों को इस्लाम की दृष्टि में काफ़िर होने के कारण मार डाला। 1890 में अफ़ग़ानिस्तान के क्षेत्र काफ़िरिस्तान के काफ़िरों को जबरन मुसलमान बनाया गया और उसका नाम नूरिस्तान रख दिया गया। विश्व भर में 1500 वर्षों से की जा रहीं ऐसी अनंत घटनाओं के प्रकाश में स्पष्ट है कि इस्लाम उन सबसे, जो मुसलमान नहीं है, नफ़रत करता है और उन्हें मिटाना चाहता है।

यह काम बिना सभ्य चिंतन को नष्ट किये नहीं हो सकता । अतः इस्लाम धर्मान्तरित लोगों से उनकी सबसे बड़ी थाती “सोचने की स्वतंत्रता” छीन लेता है। धर्मान्तरित मुसलमान अपने पूर्वजों, अपनी धरती के प्रति आस्था, अपने लोगों के प्रति प्यार, अपने इतिहास के प्रति लगाव से इस हद तक दूर चले जाते हैं कि वो अपने अतीत, अपने मूल समाज से घृणा करने लगता हैं। उसमें ये परिवर्तन इस हद तक आ जाता है कि वो अरब के लोगों से भी स्वयं को अधिक कट्टर मुसलमान दिखने की प्रतिस्पर्धा में लग जाता है।

शरज़ील इमाम और CAA, NRC के विरोध में किये जा रहे धरने में हो रहे भाषणों से स्पष्ट है कि यह सत्य है। चलिये शरज़ील यानी लाउडस्पीकर तो पकड़ लिया मगर लाउडस्पीकर के भेजे में कुफ़्र, ईमान, काफ़िर वाजिबुल क़त्ल. क़िताल फ़ी-सबीलिल्लाह, जिहाद फ़ी-सबीलिल्लाह घुसड़ने बल्कि रात-दिन लगातार घुसड़ने की 1500 साल से चलती आ रही योजना का क्या होगा ? उसे चुनौती दिए बिना शरज़ील इमाम बनने बंद कैसे होंगे ? इस विचारधारा को चुनौती देने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है।

तुफ़ैल चतुर्वेदी

सोशल मीडिया पर 29 जनवरी 2020

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