ज्ञान:निहंग सिखों का कृपाण और तलवार रखना कानूनन सही है, भारतीय कानून और कोर्ट के फैसलों का पूरा सच
Can Nihang Sikhs Carry Any Weapon The Legal Difference Between Kirpan And Other Arms
क्या निहंग सिखों का कृपाण और तलवार रखा जाना कानूनन सही है, भारतीय कानून और कोर्ट के फैसलों से जानिए पूरा सच
भारत में सिखों का कृपाण रखना संविधान के अनुच्छेद 25 में धार्मिक स्वतंत्रता के रूप में स्पष्ट रूप से मान्यता प्राप्त है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि निहंग सिखों को हर तरह के हथियार रखने की छूट है। भारतीय कानून क्या कहते हैं…
निहंग सिखों को सिख समुदाय का एक पारंपरिक और सशस्त्र योद्धा वर्ग माना जाता है। इनकी शुरुआत की कड़ी 1699 में गुरु गोबिंद सिंह के खालसा पंथ की स्थापना से जुड़ी है। ये नीले रंग के वस्त्र, ऊंची और विशाल पगड़ी (दामला), तथा तलवार, भाला जैसे पारंपरिक शस्त्र धारण करते हैं। इसी से अक्सर सवाल होता है कि जब भारत में हथियार रखने पर शस्त्र अधिनियम, 1959 में नियंत्रण है, तो निहंग सिखों के हथियारों पर रोक क्यों नहीं लगती। लेकिन इसका कानूनी जवाब थोड़ा अलग है। भारत के संविधान ने कृपाण पहनने और धारण करने को सिख धर्म का हिस्सा माना है, लेकिन यह संवैधानिक सुरक्षा हर तरह के हथियार या हर मामले में इस्तेमाल की खुली छूट नहीं देती।
कृपाण कानूनी, लेकिन हर तलवार नहीं! निहंग सिखों के हथियारों पर क्या कहता है भारतीय कानून
भारत के संविधान में सिखों के कृपाण को लेकर क्या विशेष प्रावधान है?
दरअसल, सिख धर्म में 5 ककार खास माने गए हैं जिनमें – केश, कंघा, कृपाण, कच्छा और कड़ा। इन्हें सिख धर्म के लिए आर्टकिल ऑफ फेथ माना गया है।
एक बात यह भी है कि भारतीय संविधान के Article 25 में सभी व्यक्तियों को धर्म मानने, उसका पालन करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता दी गई है। हालांकि यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन है।
Article 25 की व्याख्या में विशेष रूप से कहा गया है कि सिख पंथ में कृपाण पहनना और धारण करना शामिल माना जाएगा। यानी कृपाण के मामले में संविधान ने एक स्पष्ट संवैधानिक मान्यता दी है। यही प्रावधान सिखों के धार्मिक अधिकार और सामान्य हथियार कानून में महत्वपूर्ण कानूनी आधार बनता है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसलों में Article 25 की इस व्याख्या का उल्लेख किया है। इसलिए केवल कृपाण धारण करने को सामान्य हथियार रखने के समान मानना कानूनी रूप से सही नहीं होगा।
क्या भारतीय शस्त्र अधिनियम में भी कृपाण को अलग छूट है?
सिखों के धार्मिक विश्वास और मान्यताओं को देखते हुए भारतीय शस्त्र अधिनियम, 1959 में भी कृपाण को लेकर विशेष व्यवस्था रही है। शस्त्र अधिनियम की व्यवस्था में सिखों के रखे या धारण की कृपाण को Section 4 से संबंधित प्रतिबंधों से छूट दी गई है। पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने Dilawar Singh v. State of Haryana में इसी कानूनी स्थिति को साफ करते हुए कहा था कि सिखों की पहनी या रखी गई कृपाण पर Section 4 में लाइसेंस की जरूरत नहीं है। ध्यान रखने वाली बात यह है कि यह कृपाण को है,तलवार को नहीं। इन फैसलों से साफ है कि कृपाण को लेकर जो कानून के सामने स्थिति है सामान्य तलवार या अन्य हथियार से अलग है।
सिख समुदाय के व्यक्तियों को धार्मिक आस्था के प्रतीक के रूप में कृपाण रखने को किसी लाइसेंस की आवश्यकता नहीं होती है और इसे आर्म्स एक्ट के प्रतिबंधों से बाहर रखा गया है। सिखों के कृपाण धारण करने और रखने पर यह छूट पूरे भारत में मान्य है।
शस्त्र अधिनियम, 1959 की धारा 4 की अनुसूची (2)
क्या निहंग सिख कोई भी तलवार या हथियार रख सकते हैं?
इसका लीगल नजरिए से जवाब है – नहीं। कृपाण को संवैधानिक और वैधानिक सुरक्षा को हर प्रकार के शस्त्र पर लागू नहीं किया जा सकता। एक बात यह भी है कि Article 25 की व्याख्या कृपाण धारण करने के अधिकार को सिख धर्म से जोड़ती है, न कि किसी एक विशेष सिख संप्रदाय तक सीमित करती है। इसलिए इस कानूनी सुरक्षा का मूल आधार निहंग पहचान नहीं बल्कि कृपाण से जुड़ी सिखों की पहचान है।
दिल्ली हाई कोर्ट के आधिकारिक नियम संकलन में भी कहा गया है कि किसी वस्तु का धार्मिक इस्तेमाल मात्र उसे शस्त्र अधिनियम, 1959 के दायरे से बाहर नहीं करता। उसी न्यायिक सामग्री में निहंग सिखों के इस्तेमाल किए जाने वाले कुछ भाला, बर्छी को हथियार माना गया था। यानी किसी हथियार का धार्मिक या पारंपरिक इस्तेमाल अपने आप कानूनी छूट नहीं देता।
इसलिए बड़ी तलवार, भाला, बर्छी या अन्य शस्त्र की वैधता उसके स्वरूप, लागू कानून, क्षेत्रीय प्रशासनिक नोटिफिकेशन और इस्तेमाल की परिस्थितियों के आधार पर जांची जा सकती है। निहंग परंपरा में कई पारंपरिक शस्त्र दिखाई दे सकते हैं, लेकिन हर शस्त्र को कृपाण मान लेना कानूनी रूप से उचित नहीं होगा।
इसलिए किसी निहंग व्यक्ति के पास मौजूद हर तलवार या हथियार को केवल धार्मिक प्रतीक बताकर स्वतः कानून से छूट नहीं माना जा सकता। वास्तविक विवाद में पुलिस और अदालत को हथियार की प्रकृति तथा लागू कानूनी प्रावधानों की जांच करनी होगी।
सिखों के कृपाण और अन्य हथियार के मामले जो अदालत पहुंचे
लाईव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार हाल में एक मामले में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने फैसला दिया कि कृपाण का उपयोग किसी व्यक्ति को चोट पहुंचाने को किया गया, तो उसका परीक्षण साक्ष्यों के आधार पर होगा। सिख धर्म के अनुयायियों को कृपाण धारण करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी भी परिस्थिति में आपराधिक आरोप स्वतः समाप्त हो जाएं।
साल 2021 के एक मामले में भी पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में निहंग समूह से जुड़े आरोपियों पर आग्नेयास्त्रों और शस्त्र अधिनियम, 1959 की धाराओं के आरोप दर्ज होने का उल्लेख है, जिससे यह स्पष्ट है कि धार्मिक पहचान किसी व्यक्ति को आपराधिक कानून से पूर्ण छूट नहीं देती।
टाईम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार भी जनवरी 2026 में पटियाला की एक अदालत ने अप्रैल 2020 के दौरान पटियाला की सब्जी मंडी में पुलिस पार्टी (एएसआई हरजीत सिंह) पर हमले के बाद हुई झड़प के मामले में 5 निहंग सिखों को सजा सुनाई। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश हरिंदर कौर सिद्धू की अदालत ने शस्त्र अधिनियम, 1959 और सरकारी ड्यूटी में बाधा डालने व हमला करने के अपराध में सजा दी।
कानून कहता है – छूट ‘हर तरह के हथियार’ को नहीं
बात साफ है …कि भारतीय कानून में कृपाण को सामान्य हथियार से अलग कानूनी दर्जा इसलिए मिला है क्योंकि संविधान के Article 25 की व्याख्या और शस्त्र अधिनियम, 1959 में सिखों द्वारा धारण किए गए कृपाण के लिए विशेष प्रावधान मौजूद है। लेकिन यह छूट ‘हर तरह के हथियार’ के लिए नहीं है और न ही किसी आपराधिक इस्तेमाल को संरक्षण देती है। निहंग सिखों की पारंपरिक तलवारें या अन्य शस्त्र अलग कानूनी जांच के अधीन हो सकते हैं। इसलिए यह कहना सही होगा कि कि भारत में कृपाण को धार्मिक अधिकार के कारण विशेष संरक्षण मिला है, न कि निहंग सिखों को हथियारों के मामले में पूरी राहत।


