27 घंटे रेस्क्यू,7 मौतें,3 पकड़े.. सत्य निकेतन दुर्घटना बाद अब तक क्या-क्या?
27 घंटे रेस्क्यू, 7 मौतें और 3 पकड़े.. सत्य निकेतन दुर्घटना बाद अब तक क्या?
दिल्ली के सत्य निकेतन में एक इमारत ढहने से सात लोगों की मौत हो गई, जिनमें पांच छात्र बताए जा रहे हैं. 27 घंटे बाद सत्य निकेतन में रेस्क्यू ऑपरेशन खत्म हो गया है. दिल्ली पुलिस के अनुसार, इस हादसे में पांच लोग घायल हुए हैं, जिनमें तीन की हालत गंभीर बनी हुई है. हादसे में जान गंवाने वालों की पहचान भी सामने आ गई है. मृतकों की सूची में अभिषेक, युवराज सोनी, पवन, अर्पित, अक्षत सिंह यादव और सुरेंद्र सिंह के नाम शामिल हैं.

दुर्घटना: कब, कैसे हुआ?
रविवार दोपहर दिल्ली के सत्य निकेतन में यह दुर्घटना हुई . इसके तुरंत बाद स्थानीय लोगों ने रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू कर दिया था. मलबे के नीचे कई लोगों के फंसे होने की आशंका थी जिनमें कई छात्र भी शामिल थे. ब्लिंकिट ऑक्सीजन से भी लोगों तक मदद पहुंचाई जा रही थी. ग्रीन कॉरिडोर भी तैयार किया गया था. बाद में एनडीआरएफ भी मौके पर बुलाया गया. 27 घंटे बाद यह कठिन रेस्क्यू ऑपरेशन पूरा हो चुका है. मलबे के नीचे फंसे सभी लोगों को बाहर निकाल लिया गया है और मृतकों की संख्या बढ़कर सात हो गई है.
पुलि
स ने क्या कार्रवाई की?एमसीडी पर भी गाज
मामले में एमसीडी पर भी कार्रवाई हुई. डिप्टी कमिश्नर, सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर, एग्जीक्यूटिव इंजीनियर, असिस्टेंट इंजीनियर और जूनियर इंजीनियर समेत संबंधित अधिकारी सस्पेंड किये गए हैं. मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने खुद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर यह जानकारी दी है।
मुख्यमंत्री रेखा की घोषणा
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि दिल्ली में बिना अनुमति और खतरनाक स्थिति वाले सभी भवन तत्काल सील करने का आदेश दिया है. आसपास के ऐसे भवनों की भी गहन जांच हो रही है. नियमों का उल्लंघन मिलने पर सील समेत कठोर कार्रवाई होगी.
मामले में हाई कोर्ट ने भी दिल्ली सरकार, केंद्र सरकार, एमसीडी और दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा है. अगली सुनवाई 25 सितंबर को होगी.

भ्रष्टाचार का मलबा और छात्रों की मजबूरी… सत्य निकेतन दुर्घटना बाद ऑपरेशन ‘हॉस्टल डेथ’ में बड़ा अनावरण
सत्य निकेतन दुर्घटना बाद प्रशासन ने कार्रवाई की है लेकिन हमारी ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया कि दुर्घटनास्थल के आसपास ही कई ऐसी इमारतों में छात्रों को कमरे ऑफर हो रहे हैं, जिनकी सुरक्षा पर सवाल खड़े होते है.
दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में रविवार को इमारत गिरने से 7 लोगों की मौत ने राजधानी में छात्रों को उपलब्ध पीजी और किराये के कमरों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. दुर्घटना बाद सरकार और प्रशासन ने दिल्ली की इमारतों का स्ट्रक्चरल ऑडिट कराने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का दावा किया. लेकिन क्षेत्रीय सर्वेक्षण में दुर्घटना जगह के आसपास ही कई ऐसी इमारतों में छात्रों को कमरे ऑफर हो रहे हैं, जिनकी हालत सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े करती है।
दुर्घटना में बिल्डिंग मालिक 81 वर्षीय हरिराम गुप्ता राजस्थान के भिवाडी, उसकी पत्नी 75 वर्षीय उर्मिला गुप्ता, और बेटे 52 वर्षीय महेश गुप्ता गिरफ्तार किये गये हैं.
दुर्घटना बाद भी जारी है पीजी का कारोबार
सत्य निकेतन में दुर्घटना के कुछ ही समय बाद हमारी टीम ने हादसे वाली जगह और आसपास के इलाकों में पीजी की स्थिति का जायजा लिया. करीब 100 मीटर की दूरी पर ‘साईं प्रॉपर्टीज’ के ब्रोकर धनराज ने हमें पांच मंजिला पीजी में कमरे दिखाए. करीब 8×10 फीट के इन कमरों का किराया बिना एसी के 9 से 12 हजार रुपये और एसी वाले कमरे का 18 से 20 हजार रुपये तक है.
कमरा लेने को महीने का एडवांस और 15 दिन का ब्रोकरेज देना होगा. साथ ही, कम से कम छह महीने का लॉक-इन पीरियड बताया गया. लेकिन किराये से ज्यादा चिंता इमारत की स्थिति पर है. सीढ़ियों पर पर्याप्त रोशनी नहीं थी. दीवारों पर सीलन और कई जगह पाइपलाइन से पानी बहता दिखा.
ब्रोकर ने कैमरे पर यह भी बताया कि सत्य निकेतन में इमारत गिरने पर कई छात्र पुराने पीजी छोड़कर नए कमरे तलाश रहे हैं.
50 गज के प्लॉट पर पांचवीं मंजिल!
हमारी टीम ने मोती बाग गांव की संकरी गलियों में भी पड़ताल की. यहां एक मकान में मालकिन वीरवती और उनके बेटे नवीन ने टीम को पांचवीं मंजिल पर बना कमरा दिखाया.
इलाके की गलियां इतनी संकरी हैं कि आपात स्थिति में दमकल या एंबुलेंस वहां समय पर पहुंच पाएगी या नहीं इसे लेकर सवाल उठते हैं. स्थानीय लोगों के अनुसार, कई पुराने मकानों में बाद में अतिरिक्त मंजिलें बनाई गई. ऐसे निर्माण में इमारत की मूल संरचना और नींव की क्षमता की जांच सबसे एक महत्वपूर्ण सवाल है.
299 मकानों में 200 से ज्यादा पीजी
इलाके के एक पुराने प्रॉपर्टी ब्रोकर ओम ने हमें सत्य निकेतन में पीजी के बड़े कारोबार के बारे में जानकारी दी. उनका दावा है कि इलाके में 299 मकान हैं और इनमें से 200 से ज्यादा मकानों में कमर्शियल पीजी हैं.
ओम के अनुसार, 15-20 साल पुराने मकानों की मूल संरचना पर बाद में अतिरिक्त मंजिलें खड़ी की गई . बालकनी और छज्जों को बढ़ाकर भी अतिरिक्त जगह बनाई गई. अगर ये दावे सही हैं, तो यह सिर्फ एक इमारत की सुरक्षा का मामला नहीं, बल्कि पूरे इलाके में भवन सुरक्षा और अवैध निर्माण की निगरानी पर बड़ा सवाल है.
दुर्घटना बाद MCD की कार्रवाई पर सवाल
सत्य निकेतन दुर्घटना बाद प्रशासन ने कार्रवाई और स्ट्रक्चरल ऑडिट की बात कही है. लेकिन सवाल यह है कि जिन इलाकों में लंबे समय से अतिरिक्त मंजिलें, पीजी और व्यावसायिक गतिविधियां चल रही हैं, वहां नियमित निगरानी क्यों नहीं हुई?
सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि क्या MCD को इन निर्माणों की जानकारी नहीं थी? और अगर जानकारी थी, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और अगर कार्रवाई हुई थी, तो उसके बावजूद ऐसे निर्माण और पीजी दोबारा कैसे संचालित होते रहे?
हॉस्टल की कमी के बीच छात्रों की मजबूरी
दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने को देश भर से छात्र राजधानी आते हैं. सीमित हॉस्टल सीटों से बड़ी संख्या में छात्रों को पीजी और किराये के कमरों का सहारा लेना पड़ता है.
महंगे किराये और सीमित विकल्पों के बीच छात्र अक्सर ऐसे कमरे चुनते हैं जिसकी कीमत किफायती हो और वह कॉलेज से नजदीक हो. ऐसे में वे इमारत की सरंचना की सुरक्षा की जांच ज्यादा नहीं करते. और इसी स्थिति का फायदा असुरक्षित या नियमों का उल्लंघन करने वाले पीजी संचालक उठाते हैं.
‘डेथ ट्रैप’ बनते पीजी पर कौन लगाएगा लगाम?
सत्य निकेतन दुर्घटना सवाल छोड़ गयी है कि क्या बड़ी दुर्घटना बाद ही प्रशासन जागेगा? आसपास की इमारतों में बिना पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था पीजी चल रहे हैं, अतिरिक्त मंजिलें बनी हैं और संकरी गलियों में बड़ी संख्या में छात्र रह रहे हैं।
सरकार के स्ट्रक्चरल ऑडिट के दावे के बीच अब असली परीक्षा यह होगी कि जांच सिर्फ कागजों तक सीमित रहती है या दिल्ली के उन तमाम पीजी और इमारतों तक पहुंचती है जहां छात्र हर दिन अपनी जान जोखिम में डालकर रह रहे हैं.
’50 हजार लिए,अब फोन बंद’,सत्य निकेतन दुर्घटना बाद ‘हॉस्टल डेज’ के दूसरे PG की लड़कियों को डरा रही दीवारें
दिल्ली में पढ़ने का सपना लेकर आईं फर्स्ट ईयर की स्टूडेंट्स डरी हुई हैं. हमने उसी हॉस्टल डेज के दूसरे PG की लड़कियों से बात की, जिसकी 5 मंजिला इमारत सत्य निकेतन में भरभराकर गिर गई.
“हमने 50 हजार रुपये दिए हैं… दो महीने की सिक्योरिटी, सितंबर का रेंट…अब हॉस्टल डेज PG संचालक हमारा फोन तक नहीं उठा रहा.फोन स्विच ऑफ है. हम अपना पैसा वापस चाहते हैं”
ये दर्द है दिल्ली यूनिवर्सिटी के मैत्रेयी कॉलेज में फर्स्ट ईयर की स्टूडेंट श्वेता का. श्वेता अकेली नहीं. जिस हॉस्टल डेज के हॉस्टल वाली 5 मंजिला बिल्डिंग रविवार को दिल्ली के सत्य निकेतन में भरभराकर गिरी, उसी की दूसरी बिल्डिंग में फर्स्ट ईयर स्टूडेंट्स अब डरी हुई हैं. दिल्ली आए एक महीना ही हुआ है. दुर्घटना आंखों के सामने देखी, अब अपने PG की दीवारें भी डराती हैं. सवाल सिर्फ डर का नहीं है- PG छोड़ें तो जाएं कहां और हजारों रुपये की सिक्योरिटी का क्या होगा?

हमने इन्हीं फर्स्ट ईयर के स्टूडेंट्स से बात की.
सत्या निकेतन की इमारतों का हाल बता रहा है कि, कभी भी दुर्घटना हो सकती है
“हमारी कोई सिक्योरिटी नहीं है, बस PG वालों की ही सिक्योरिटी फिक्स”
ऋचा अरोड़ा एक महीना पहले पंजाब से दिल्ली आईं और लेडी श्रीराम कॉलेज में BSc मैथ्स ऑनर्स कोर्स में एडमिशन लिया. आज वह डरी हुई हैं. वह भी श्वेता की तरह हॉस्टल डेज के ही गर्ल्स पीजी में हैं. हमसे उन्होंने कहा, “हमें सिर्फ डर नहीं है. हम मानसिक रूप से परेशान हैं.हमारे पैरेंट्स मुश्किलों में हमें इतनी दूर भेज रहे हैं तो दिल्ली को तो हमारा ध्यान रखना चाहिए था न. अगर यहां के PG ऑनर्स या फ्लैट मालिक बच्चे यहां रखने को भ्रष्टाचार से मंजूरी ले रहे हैं तो यह तो गलत है न.”
मैत्रेयी कॉलेज में सोशियोलोजी ऑनर्स फर्स्ट ईयर की स्टूडेंट श्वेता सिंह बताती हैं कि वह जिस PG में हैं,वह हॉस्टल डेज का ही PG है. श्वेता ने कहा, “उनकी कई बिल्डिंग हैं. अगर ये सारी भी सील होती हैं तो हमारा क्या होगा. इन्होंने हमसे दो महीने की सिक्योरिटी और सितंबर का रेंट भी ले लिया है. हम हर महीने 15 हजार देते हैं. साथ में बिजली का बिल और मेंटेनेंस. यानी उनके पास हमारे 50 हजार रुपए रखे हैं. अगर PG सील होने पर हमें बाहर निकाला जाता है या आज अपनी जान बचाने को हम खुद PG छोड़ते हैं तो वह रुपया तो हमारा नहीं मिलेगा न. जिसका यह PG था, वो यहां से जा चुका और फोन भी नहीं उठा रहा . उन्होंने अपना फोन ही स्विच्ड ऑफ कर दिया है. हम अपना पैसा वापस चाहते हैं.”
अपनी रूममेट इशिका के साथ जाह्नवी राणा
ऋचा का कहना है, “यहां हमारी कोई सिक्योरिटी नहीं है, बस PG चलाने वालों की ही सिक्योरिटी फिक्स है. आने के पहले ही दिन हमसे दो महीने रेंट सिक्योरिटी ले ली है और एक महीने का रेंट एडवांस में. यानी पहले ही दिन हम 45 हजार रुपए इनके हाथ में रख देते हैं. हर महीने कैश या ऑनलाइन इनको रेंट देते हैं. लेकिन वापस जाएंगे तो यह सिक्योरिटी हमें चेक में वापस करेंगे. कईयों को तो सिक्योरिटी मिलता भी नहीं. कहते हैं आपने पहले क्यों नहीं बताया या कह देते हैं कि आपने यह तोड़ा, वह तोड़ा.”

“हमें अपनी PG की दीवारों को देखकर डर लग रहा”
बिहार से एक महीने पहले दिल्ली आकर साक्षी ने भी मैत्रेयी कॉलेज में एडमिशन लिया. उन्होंने उसी PG में बेड लिया, जिसमें श्वेता और ऋचा रहती हैं. अब दुर्घटना के बाद उनके परिजन परेशान हैं. उन्होंने हमसे कहा, “कल से इसके बाद घर वाले परेशान हैं. एक महीने पहले ही तो मम्मी-पापा हमें यहां छोड़कर गए थे. हम अगर PG बदलें भी तो कहां जाएं. पूरे सत्य निकेतन में ही हर PG की यही हालत है. अगर हम दूर कहीं PG या फ्लैट लेते हैं तो हर दिन उतनी दूर से ट्रैवल करके कॉलेज आना मुश्किल होगा.”
श्वेता भी यही दोहराती हैं “हमें आए मुश्किल से महीना हुआ है और आते ही इस दुर्घटना ने हमें बहुत बड़े ट्रॉमा में डाल दिया है. हम इतनी दूर से आए और यहां आते ही एकदम डर चुके हैं. हमें अपनी PG की दीवारें देखकर डर लग रहा है. ऊपर से हम उसी हॉस्टल डेज की बिल्डिंग में रहते हैं जिसका दूसरा PG गिर चुका है.”
“दिल्ली आना सपना था लेकिन एक महीने में ट्रेजडी देख ली”
ऐसा नहीं है कि बच्चे सिर्फ हॉस्टल डेज से जुड़े PG के ही डरे हुए हैं. सत्य निकेतन में ही उसी गली के दूसरे PG में जाह्नवी राणा उत्तराखंड से आई हैं. वह भी फर्स्ट ईयर स्टूडेंट हैं. उन्होंने हमसे बात में कहा कि, “हमारे अंदर दिल तक डर बैठ चुका. हम इतनी दूर से दिल्ली पढ़ने आए. जब से खबर आई है, घर से पैरेंट्स बार-बार कॉल कर रहे हैं. अभी यहां वातावरण इतना बेकार है. हमें रात भर अपनी PG के बेड पर नींद नहीं आई. यह रात गुजरना हमारे लिए सबसे मुश्किल है।
इन स्टूडेंट्स को ये सिर्फ दुर्घटना नहीं, बल्कि दिल्ली में उनकी नई जिंदगी पर लगा बड़ा सवाल है. एक तरफ आंखों के सामने इमारत गिरने का डर है, दूसरी तरफ सुरक्षित जगह मिलने का भरोसा नहीं. कॉलेज के अपने हॉस्टल या तो हैं नहीं और हैं तो भी हर कोर्स में लगभग 2 सीटें. प्राइवेट PG में हजारों रुपये पहले ही जमा करने पड़ते हैं और अब दुर्घटना बाद PG छोड़ने पर अपना पैसा वापस मिलेगा या नहीं, इसकी भी गारंटी नहीं. दिल्ली में पढ़ने का सपना लेकर आए इन फर्स्ट ईयर स्टूडेंट्स के सामने आज सबसे बड़ा सवाल यही है- पढ़ाई और सपनों को घर से दूर आए इन बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?



