आधार नही,पासपोर्ट जैसे 16 अभिलेख नही तो क्या है नागरिकता प्रमाण?

PAN कार्ड, वोटर ID जैसे 16 अभिलेख दिये, HC ने कहा- इससे भारतीय नागरिकता सिद्ध नहीं

गुवाहाटी हाई कोर्ट ने कहा कि PAN कार्ड और वोटर आईडी आदि से भारतीय नागरिकता सिद्ध नहीं हो सकती. कोर्ट ने असम के एक व्यक्ति को विदेशी घोषित करते आदेश को चुनौती याचिका निरस्त कर दी.

PAN कार्ड, वोटर ID जैसे 16 दस्तावेज किए पेश, गुवाहाटी HC ने कहा- इससे भारतीय नागरिकता साबित नहीं होतीगुवाहाटी हाई कोर्ट की बड़ी टिप्पणीNDTV
एक अहम फैसले में, गुवाहाटी हाई कोर्ट ने एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने 16 दस्तावेज पेश किए थे, लेकिन उनमें से कोई भी यह साबित नहीं कर सका कि वह भारतीय नागरिक है. हाई कोर्ट ने कहा कि इस मामले में वे 16 अभिलेख याचिकाकर्ता को यह सिद्ध करने में मदद नहीं करते कि उसने ‘फॉरेनर्स एक्ट, 1964’ की धारा 9 में अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली है. यानी यह सिद्ध करना कि वह विदेशी नहीं, बल्कि भारतीय नागरिक है.

हमने वह आदेश देखा है, जिसमें कहा गया है कि अगर किसी व्यक्ति के विदेशी होने पर सवाल उठता है, तो नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी उसी व्यक्ति की होती है. यह आदेश 30 जून को जस्टिस कल्याण राय सुराना और शमीमा जहान की बेंच ने दिया था.

याचिकाकर्ता ने कोर्ट में पेश किए 16 दस्तावेज
आदेश में आगे कहा गया, ‘हालांकि याचिकाकर्ता ने 16 दस्तावेज पेश किए, लेकिन वे उसे यह साबित करने में मदद नहीं करते कि उसने धारा 9 के तहत अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली है कि वह विदेशी नहीं, बल्कि भारतीय नागरिक है.’

इस मामले में याचिकाकर्ता अमीनुल हक ने 1951 के नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन (NRC) की कॉपी जमा की थी, जिसमें उनके दादा-दादी और पिता के नाम दर्ज थे. साथ ही 1966 से 2017 तक की वोटर लिस्ट की सर्टिफाइड कॉपी, 1973 के जमीन खरीद के दस्तावेज, पैन कार्ड, वोटर ID और स्कूल का सर्टिफिकेट भी पेश किया था.

असम NRC का काम 2019 में पूरा हो गया था, लेकिन इसे अभी तक नोटिफाई नहीं किया गया है. यह तय करने के लिए यह मुख्य दस्तावेज़ होना था कि कौन असली भारतीय नागरिक है और कौन अवैध प्रवासी.

क्या है मामला?
यह मामला अमीनुल हक की याचिका से जुड़ा था, जिन्होंने गुवाहाटी के फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के 28 फरवरी 2019 के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उन्हें विदेशी घोषित किया गया था.

इस मामले में, पहले फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल और बाद में हाई कोर्ट में, हक ने दावा किया कि उनका परिवार पीढ़ियों से असम में रह रहा है. अपने दावे के समर्थन में, उन्होंने 1951 के NRC के हिस्से, 1966 और उसके बाद की वोटर लिस्ट, 1973 की जमीन की बिक्री का दस्तावेज, अपना पैन कार्ड, EPIC, स्कूल के सर्टिफिकेट और परिवार से जुड़े दस्तावेज पेश किए.

इसके अलावा, हक के पिता कोर्ट में पेश हुए और उन्हें अपना बेटा बताया. लेकिन कोर्ट ने कहा कि मान्य और प्रासंगिक दस्तावेजी सबूतों के बिना सिर्फ ज़ुबानी सबूत यह साबित करने के लिए काफी नहीं हैं कि दोनों के बीच कोई संबंध है.

इससे पहले फरवरी 2019 में, असम के कामरूप में एक फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने हक को विदेशी घोषित कर दिया था. उन्होंने हाई कोर्ट में अपील की. ​​हक ने कहा कि गरीबी के कारण वह गुवाहाटी में दिहाड़ी मजदूर के तौर पर काम कर रहे थे और अजारा पुलिस स्टेशन के तहत बोरबोरी गांव में किराए के मकान में रह रहे थे.

पासपोर्ट नहीं तो क्या होता है नागरिकता का असली डॉक्यूमेंट? जान लीजिए जवाब

Citizenship Docuement: विदेश मंत्रालय की तरफ से साफ किया गया है कि पासपोर्ट को नागरिकता का अभिलेख नहीं माना जा सकता है. पासपोर्ट एक यात्रा अभिलेख है, ऐसे में सवाल है कि आखिर नागरिकता का असली अभिलेख कौन सा है.

पासपोर्ट नहीं तो क्या है नागरिकता का असली अभिलेख?
नागरिकता अभिलेख को लेकर देश में कई बार बहस छिड़ती रही है. अब एक बार फिर इसे लेकर चर्चा है, क्योंकि विदेश मंत्रालय ने कहा है कि पासपोर्ट नागरिकता सिद्ध करने का अभिलेख नहीं है, ये सिर्फ एक यात्रा अभिलेख  है. फिलहाल इस विषय पर नई बहस शुरू हो गई है और विपक्ष के नेता सरकार पर हमलावर हैं. इसी बीच देशभर के लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल ये है कि अगर पासपोर्ट से भी नागरिकता सिद्ध नहीं हो सकती है तो आखिर इसे साबित करने का असली अभिलेख क्या है? आइए हम आपको इस सवाल का जवाब देते हैं.

पासपोर्ट के अलावा आधार या वोटर कार्ड भी नहीं आएंगे काम
पासपोर्ट को लेकर सरकार ने स्थिति साफ की है, लेकिन इससे पहले ये भी बताया जा चुका है कि आधार कार्ड या फिर वोटर पहचान कार्ड से नागरिकता सिद्ध नहीं हो सकती है. यानी ये अभिलेख आपकी पहचान तो बता सकते हैं, लेकिन नागरिकता सिद्ध करने को काफी नहीं हैं. हालांकि कई लोग यही मानते हैं कि ये सभी अभिलेख  नागरिकता सिद्ध कर सकते हैं.

नागरिकता पर संविधान
भारतीय संविधान में नागरिकता और इसके नियम उल्लेखित है. आर्टिकल 5 से 11 तक नागरिकता बताई गई है. इसमें ये साफ लिखित है कि जिस दिन 26 जनवरी 1950 को देश का संविधान बना, भारत में मौजूद हर व्यक्ति भारतीय नागरिक माना जाएगा,यदि जन्म भारत में हुआ हो. 1955 के कानून में तय शर्तों में बताया गया कि नागरिकता किसे मिलती है और कब खत्म होती है.

  • वंश के आधार पर नागरिकता
    1-जन्म के आधार पर नागरिकता
    2-रजिस्ट्रेशन के आधार पर नागरिकता
    3-नैचुरलाइजेशन के आधार पर नागरिकता
    4-किसी देश के भारत में शामिल होने पर नागरिकता

क्या है नागरिकता का असली अभिलेख?
भारतीय संविधान कहता है कि भारत में पैदा हर व्यक्ति भारतीय नागरिक है. इसी से आधिकारिक तौर पर नागरिकता सिद्ध करने का कोई एक अभिलेख नहीं है. क्योंकि जन्म को ही आधार माना गया है, ऐसे में लोग जन्म प्रमाण पत्र यानी बर्थ सर्टिफिकेट दिखाकर सिद्ध कर सकते हैं कि उनका जन्म भारत में हुआ है और इस दृष्टि से वो भारत के नागरिक हैं. जन्म प्रमाणपत्र ग्राम पंचायत, नगर निगम,नगर पालिका आदि स्थानीय निकाय से जारी होता है. जिनके पास बर्थ सर्टिफिकेट नहीं है, वो बाकी जरूरी अभिलेखों का सहारा लेकर इसे बना सकते हैं और फिर नागरिकता अभिलेख रूप में इसे सौंपा जा सकता है.

हालांकि नागरिकता कानून में कई बदलाव हुए हैं, जिनसे अब ये भी देखा जाता है कि नागरिकता सिद्ध करने वाला व्यक्ति किस साल पैदा हुआ है. इसको अलग-अलग क्राइटेरिया हैं.

जिन लोगों का जन्म 26 जनवरी 1950 से 1 जुलाई 1987 के बीच हुआ है, वो जन्म प्रमाण पत्र से ही नागरिकता सिद्ध कर सकते हैं. तब सिर्फ भारत में जन्म आधार पर ही मान्यता मिलती थी.
1 जुलाई 1987 से 3 दिसंबर 2004 के बीच भारत में जन्म लेने वाले लोगों को जन्म प्रमाणपत्र के साथ ये भी सिद्ध करना होगा कि उनके जन्म के समय उसके माता-पिता में से कोई एक भारतीय नागरिक था.
3 दिसंबर 2004 बाद जन्मे लोगों को बर्थ सर्टिफिकेट के साथ इस बात का भी प्रमाण देना पड़ता है कि माता-पिता दोनों ही भारतीय नागरिक हैं, वो अवैध प्रवासी (Illegal Migrant) नहीं हैं.
पूर्व विदेश सचिव ने किया एक्सप्लेन
पूर्व भारतीय विदेश सचिव निरुपमा मेनन राव ने इस पूरे मामले पर एक डीटेल्ड पोस्ट किया है. जिसमें उन्होंने बताया है कि पासपोर्ट कहां नागरिकता का एक प्रमाण है और कब इसे अकेला नागरिकता अभिलेख नहीं माना जाएगा. उन्होंने लिखा, “कानूनी तौर पर यह बात बिल्कुल सही है. पासपोर्ट, ‘पासपोर्ट अधिनियम’ (Passports Act) से जारी होता है, जबकि नागरिकता ‘नागरिकता अधिनियम, 1955’ (Citizenship Act, 1955) से तय होती है. एक कानून अभिलेख संभालता है और दूसरा आपकी विधिक श्रेणी । ज्यादातर भारतीयों के लिए, पासपोर्ट भारत सरकार से जारी सबसे भरोसेमंद अभिलेख है. इस पर ‘रिपब्लिक ऑफ इंडिया’ लिखा होता है, इसमें धारक की पहचान होती है, और पूरी दुनिया में इसे इसलिए स्वीकारा जाता है, क्योंकि विदेशी सरकारों को भरोसा होता है कि भारत ने इसे जारी करने से पहले नागरिकता की जांच की है. इसलिए, लोगों का यह पूछना बिल्कुल जायज है कि अगर पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, तो फिर क्या है?”

पूर्व विदेश सचिव निरुपमा मेनन राव ने आगे लिखा, “पासपोर्ट नागरिकता सिद्ध नहीं करता, ना ही यह वह अंतिम विधिक अभिलेख है जो अदालत में नागरिकता के  विवाद पर उसे तय करे. कई दूसरे लोकतांत्रिक देशों की तरह, भारत भी नागरिकता के कानून और पासपोर्ट के कानून को अलग-अलग रखता है. धोखाधड़ी, माता-पिता की पहचान से जुड़े विवाद या गलत तरीके से नागरिकता हासिल करने जैसे कुछ खास मामलों में, नागरिकता अधिनियम और अन्य प्रमाणों से नागरिकता सिद्ध करनी पड़ सकती है.यही वजह है कि कानून में पासपोर्ट को हर स्थिति में नागरिकता का आखिरी या पक्का प्रमाण नहीं माना जाता.”

Citizenship Proof Two Senior Supreme Court Lawyers Clear Up Confusion Regarding Passport
पासपोर्ट नागरिकता का पक्का प्रमाण क्यों नहीं है, सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठ वकीलों ने सारा कंफ्यूजन दूर किया
भारत में पासपोर्ट को नागरिकता का पुख्ता प्रमाण नहीं माने पर चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठ वकीलों ने इस पर कानूनी पक्ष सामने रखा है, जिससे सारा कंफ्यूजन दूर हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठ वकीलों हरीश साल्वे और सिद्धार्थ लूथरा ने पासपोर्ट और नागरिकता पर जो कानूनी पक्ष सामने रखा है, उससे सारा कंफ्यूजन दूर हो सकता है।

पासपोर्ट नागरिकता का पुख्ता प्रमाण क्यों नहीं?

‘पासपोर्ट एक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’
भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा ने इंडिया टुडे को एक इंटरव्यू दिया है। इस इंटरव्यू में दोनों कानूनी विशेषज्ञों ने ताजा विवाद पर जो कुछ कहा है, उससे स्थिति साफ हो गई है और पता चल गया है कि लोगों को इस मसले पर किस वजह से दुविधा है।

कानूनी तौर पर पासपोर्ट आपके देश के भीतर नागरिकता साबित करने का दस्तावेज नहीं है। पासपोर्ट एक अंतरराष्ट्रीय परिपाटी है।
हरीश साल्वे,पूर्व सॉलिसिटर जनरल

‘पासपोर्ट विदेशों में भारतीय नागरिक होने का प्रमाण’
उन्होंने उदारहण देकर समझाया, ‘अगर मेरे पास भारतीय पासपोर्ट है और मैं यूनाइटेड किंगडम या फ्रांस जाता हूं; और मैं कहता हूं कि मैं भारतीय नागरिक हूं और पासपोर्ट दिखाता हूं, वे नहीं कह सकते कि मुझे भारतीय पासपोर्ट कैसे मिला? पासपोर्ट भारत से बाहर हमारे भारतीय नागरिक होने का पुख्ता प्रमाण है।’

नागरिकता के एक दस्तावेज में ही समाधान
उनके अनुसार, ‘भारत में मैं अपना नागरिकता कैसे साबित कर सकता, इसका जवाब इसमें है कि मुझे किस काम के लिए अपनी नागरिकता साबित करनी है।’ उन्होंने बताया, पासपोर्ट एक ऐसा दस्तावेज है, जो नागरिकता का प्रूफ भी बन सकता है। कुछ लोग इसे मान सकते हैं और कुछ कह सकते हैं कि उन्हें कुछ और दस्तावेज चाहिए। सब कुछ संदर्भ पर निर्भर करता है। इसे संदर्भ से अलग नहीं कर सकते। पासपोर्ट एक्ट नहीं कहता कि यह सभी काम के लिए नागरिकता का प्रमाण माना जाएगा। इसके लिए कानून की आवश्यकता है और जब इसकी चर्चा होती है तो राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) पर बहस छिड़ जाती है।’ समाधान यही है कि एक दस्तावेज होना चाहिए नागरिकता का। लेकिन, इसका नाम लेते ही ‘तरह-तरह के नैरेटिव’ शुरू हो जाते हैं।

‘पासपोर्ट गैर-नागरिकों को भी मिल सकता है’
इसी तरह से सुप्रीम कोर्ट के एक और सीनियर वकील सिद्धार्थ लूथरा का कहना है कि नागरिकता और पासपोर्ट दो अलग-अलग अधिनियमों से संचालित होते हैं। पासपोर्ट गैर-नागरिकों के लिए भी जारी किया जा सकता है और इसकी विभिन्न श्रेणियां होती हैं। पासपोर्ट नागरिकों को, कुछ खास श्रेणी के लोगों को और गैर-नागरिकों के लिए भी जारी हो सकता है।

भारतीय नागरिकता का दावा कौन कर सकता है
उन्होंने कहा कि उदाहरण के लिए कोई शरणार्थी के तौर पर भारत आता है, उसे भी पासपोर्ट दिया जा सकता है। इसका मतलब ये नहीं हुआ कि वह भारत का नागरिक हो जाएगा। नागरिकता, नागरिकता अधिनियम और भारतीय संविधान से तय होती है, जो कि चार तरह से मिलती है। कोई विदेशी भारत आकर रह जाए और नागरिकता के लिए आवेदन करे। जन्म भारत में हुआ हो। इसकी भी भिन्न श्रेणियां हैं। फिर माता-पिता भारतीय नागरिक हैं, या उनमें से कोई एक भारतीय नागरिक है।

नागरिकता संशोधन कानून लागू होने के बाद
भारत में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) लागू होने के बाद तो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न का शिकार होकर आए वहां के अल्पसंख्यकों (हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख, पारसी और ईसाई) को भी भारतीय नागरिकता मिल सकती है, बशर्ते कि वह 31 दिसंबर, 2014 से पहले भारत आ गया हो।

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