अरावली विवाद AtoZ-2:गहलौत राज ने खत्म की 25% पहाड़ियां,अब अमेरीकी विशेषज्ञ परिभाषा से संकट

अरावली पहाड़ियों की परिभाषा… 100 मीटर ऊंचाई का फॉर्मूला कहां से आया और क्यों विवादास्पद है

सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा मानी है. आसपास की जमीन से 100 मीटर ऊंची पहाड़ी ही अरावली मानी जाएगी. यह फॉर्मूला राजस्थान में 2003 से लागू है, जो अमेरिकी विशेषज्ञ रिचर्ड मर्फी के सिद्धांत पर आधारित है. पर्यावरणविदों का डर है कि इससे छोटी पहाड़ियां संरक्षण से बाहर हो जाएंगी और खनन बढ़ेगा. #SaveAravalli मुहिम तेज हो गई है.

अरावली रेंज की 100 मीटर की परिभाषा अमेरिकी विशेषज्ञ रिचर्ड मर्फी के सिद्धांत पर आधारित है.
शरत कुमार
नई दिल्ली, 22 दिसंबर 2025,सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में अरावली पहाड़ियों की एक समान परिभाषा को मंजूरी दे दी है. इसके अनुसार, आसपास की जमीन से 100 मीटर या उससे ज्यादा ऊंची कोई भी भू-आकृति ही अरावली पहाड़ी मानी जाएगी. ऐसी दो या ज्यादा पहाड़ियां अगर एक-दूसरे से 500 मीटर के दायरे में हैं, तो वे अरावली रेंज कहलाएंगी.

यह परिभाषा केंद्र सरकार की समिति की सिफारिश पर आधारित है, लेकिन इससे विवाद खड़ा हो गया है. पर्यावरणविदों का कहना है कि इससे अरावली का 90% से ज्यादा हिस्सा संरक्षण से बाहर हो सकता है, जबकि सरकार इसे पुरानी व्यवस्था का विस्तार बता रही है.

विवाद की जड़ें 2002 में
यह कहानी अप्रैल 2002 से शुरू होती है. सेंट्रल एम्पावर्ड कमिटी (सीईसी) को हरियाणा के कोट और आलमपुर में अरावली में अवैध खनन की शिकायत मिली. अक्टूबर 2002 में सीईसी ने खनन रोकने का आदेश दिया. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां कहा गया कि ऐसे खनन से अरावली का अस्तित्व खत्म हो जाएगा. 30 अक्टूबर 2002 को कोर्ट ने हरियाणा और राजस्थान समेत पूरे अरावली क्षेत्र में सभी तरह के खनन पर रोक लगा दी.

राजस्थान में इससे बड़ा संकट खड़ा हो गया. मार्बल, ग्रेनाइट और अन्य खनन उद्योग से जुड़े लाखों लोग बेरोजगार हो गए. तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार ने कोर्ट से अपील की कि चल रहे खनन को बंद न किया जाए, क्योंकि यह लोगों की आजीविका से जुड़ा है. दिसंबर 2002 में कोर्ट ने चल रहे खनन को फिर शुरू करने की अनुमति दे दी, लेकिन नई इकाइयों पर रोक लगा दी.

100 मीटर फॉर्मूला की शुरुआत
स्थायी हल के लिए गहलोत सरकार ने एक कमेटी बनाई. मई 2003 में कमिटी ने अमेरिकी भू-आकृति विशेषज्ञ रिचर्ड मर्फी के सिद्धांत को अपनाया, जिसमें समुद्र तल से 100 मीटर ऊंची पहाड़ी को ही पहाड़ माना जाता है. कमेटी ने मर्फी के अन्य सिद्धांतों (संरचनात्मक और क्षरण आधारित) को नजरअंदाज कर दिया.

अगस्त 2003 में गहलोत सरकार ने सभी जिलों को निर्देश दिया कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली जगहों पर खनन की संभावनाएं तलाशें. 2003 में वसुंधरा राजे सरकार आने के बाद इस फॉर्मूले को आगे बढ़ाया गया और खनन आवंटन शुरू हो गए.

इसे कोर्ट के 2002 आदेश की अवमानना मानते हुए बंधुआ मुक्ति मोर्चा ने याचिका दायर की. अप्रैल 2005 में कोर्ट ने नए आवंटनों को बंद करने का आदेश दिया।

राजस्थान में दुरुपयोग और कोर्ट की चिंता
बाद में गहलोत सरकार के समय फिर खनन शुरू हुए. कुछ जगहों पर ऊंचाई मापने में गड़बड़ी हुई – अल्टीमीटर से जमीन से चोटी की ऊंचाई नापकर 160 मीटर की पहाड़ी को 80-90 मीटर दिखाया गया. इससे अलवर, सिरोही और उदयपुर में बड़े पैमाने पर खनन हुआ.

2010 में फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) और CEC की रिपोर्ट में पता चला कि राजस्थान में अवैध खनन जोरों पर है. अलवर में 2269 पहाड़ियों में से 25% गायब हो चुकी थीं. कई पहाड़ियां पूरी तरह खत्म हो गईं. कोर्ट ने केंद्र से अरावली की स्पष्ट परिभाषा मांगी.

केंद्र की 2025 सिफारिश और सुप्रीम कोर्ट का फैसला
नवंबर 2025 में केंद्र सरकार ने मर्फी फॉर्मूले को आगे बढ़ाते हुए कहा कि 100 मीटर ऊंचाई (लोकल रिलीफ से) वाली पहाड़ियां ही अरावली मानी जाएंगी. साथ ही, सबसे निचली कंटूर लाइन के अंदर का पूरा क्षेत्र (ढलान सहित) संरक्षित होगा. सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को इस परिभाषा को सभी राज्यों (राजस्थान, हरियाणा, गुजरात, दिल्ली) के लिए समान रूप से लागू कर दिया.

Aravalli Hills Definition

कोर्ट ने नए खनन पट्टे देने पर भी रोक लगा दी, जब तक पूरी अरावली के लिए सस्टेनेबल माइनिंग प्लान तैयार नहीं हो जाता. सरकार का कहना है कि राजस्थान में यह फॉर्मूला 2006 से लागू है और अब इसे पूरे क्षेत्र में एकसमान बनाया गया है, जिससे 90% से ज्यादा क्षेत्र संरक्षित रहेगा.लेकिन पर्यावरणविद और विपक्षी दल इसे अरावली की मौत की सजा बता रहे हैं, क्योंकि ज्यादातर छोटी पहाड़ियां (10-50 मीटर) अब संरक्षण से बाहर हो सकती हैं. इससे थार रेगिस्तान का फैलाव, भूजल स्तर गिरना और दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण बढ़ने का खतरा है.

अरावली भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला है, जो थार को रोकती है. उत्तर भारत की जलवायु को संतुलित रखती है. इस फैसले से #SaveAravalli अभियान तेज हो गया है. आने वाला समय बताएगा कि यह परिभाषा संरक्षण को मजबूत करती है या खनन को बढ़ावा देती है.

अरावली की पहाड़ियां : एक ‘प्रस्ताव’ से मची हलचल, कैसे अभियान बना इसके संरक्षण का मुद्दा?

यह अरावली पर्वत शृंखला क्या है और यह इतनी महत्वपूर्ण क्यों है? अरावली चर्चा में क्यों आ गया है? विशेषज्ञों का इस मामले में क्या कहना है? सियासी दलों की इस मामले में क्या कहना है? आइये जानते हैं…

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अरावली पर्वत शृंखला।
अरावली के पर्वत दुनिया में सबसे प्राचीन पर्वत शृंखलाओं में से एक हैं। हालांकि, इनसे जुड़ा एक ताजा मामला सोशल मीडिया पर अभियान का रूप ले रहा है। दरअसल, हुआ कुछ यूं कि हाल ही में इन पर्वतों के पास खनन की घटनाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका डाली गई। इस पर केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में एक जवाब दाखिल किया। इसी जवाब के बाद से देशभर में कुछ ऐसे घटनाक्रम हुए हैं, जिन्हें लेकर अरावली शृंखला चर्चा के केंद्र में आ गई। इतना ही नहीं अरावली के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ‘सेव अरावली कैंपेन’ यानी अरावली बचाओ अभियान तक चल पड़ा है। इस मामले में राजनीति भी होने लगी है।

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर यह अरावली पर्वत शृंखला क्या है और यह इतनी महत्वपूर्ण क्यों है? अरावली चर्चा में क्यों आ गया है? विशेषज्ञों का इस मामले में क्या कहना है? सियासी दलों की इस मामले में क्या कहना है? आइये जानते हैं…
क्या है अरावली पर्वत शृंखला, इतनी महत्वपूर्ण क्यों?
कहा जाता है कि पृथ्वी पर अरावली पर्वत शृंखला दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत शृंखला है। यह करीब दो अरब साल पुरानी है और भारत में सबसे पुरानी है। यह हिंद-गंगीय मैदानी इलाकों को रेगिस्तानी रेत से बचाने के लिए एक अहम पारिस्थितिकी बैरियर की तरह काम करता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर यह पर्वत शृंखला न होती तो भारत का उत्तरी क्षेत्र रेगिस्तान में तब्दील होना शुरू हो गया होता। हालांकि, इस शृंखला के चलते ही थार रेगिस्तान अपने उत्तर की तरफ (हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश) तक नहीं फैल पाया।

इतना ही नहीं अरावली थार रेगिस्तान और बाकी क्षेत्र के बीच जलवायु को संतुलित करने में भी अहम भूमिका निभाता है। इसके अलावा पूरे क्षेत्र में जैव विविधता और भूजल के प्रबंधन में भी यह शृंखला बेहद अहम हैं। इसके चलते ही दिल्ली से गुजरात का करीब 650 किलोमीटर का क्षेत्र प्राकृतिक तौर पर विभिन्नता बरकरार रखने के लिए महत्वपूर्ण है। यह रेंज चंबल, साबरमती और लूनी जैसी नदियों का स्रोत भी है। इसमें बालू के पत्थर, चूना पत्थर, संगरमरमर और ग्रेनाइट का भी भंडार है। इसके अलावा लेड, जिंक, कॉपर, सोना और टंगस्टन जैसे खनिज भी इस पर्वत शृंखला में पाए जाते हैं।

अरावली के अस्तित्व पर संकट: दिल्ली के अदृश्य प्रहरी की सुरक्षा में सेंध, शहर के हवा-पानी और भविष्य पर खतरा
अरावली के दोहन की कहानी भी इन भंडारों की वजह से ही शुरू होती है। ऐतिहासिक तौर पर अरावली से बड़ी मात्रा में खनन होता रहा है। हालांकि, बीते चार दशक में यहां से पत्थर और रेत का खनन बढ़ा है। अब आलम यह है कि अरावली के खनन की वजह से वायु गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित होती है और यह आसपास के राज्यों में एक्यूआई खराब करती है। इतना ही नहीं खनन की वजह से आसपास के भूजल पर फर्क पड़ रहा है। इन स्थितियों के चलते अलग-अलग समय पर अरावली के अलग-अलग क्षेत्रों में खनन अवैध किया गया है।

2025
मार्च: में समिति ने साफ किया कि पर्यावरणीय तौर पर संवेदनशील इलाकों में खनन पूरी तरह रोका जाना चाहिए। इसके अलावा पत्थर तोड़ने की इकाइयों पर भी सख्त नियम लागू करने का प्रस्ताव दिया गया। समिति ने कहा कि जब तक सभी राज्यों में अरावली रेंज की पूरी मैपिंग नहीं कर ली जाए और इसके प्रभाव की रिपोर्ट न पूरी हो जाए, तब तक खनन के नए पट्टे न दिए जाएं और पुराने पट्टे नवीनीकृत न हों।

जून: केंद्र सरकार ने हरित दीवार परियोजना शुरू की। इसके तहत अरावली रेंज में आने वाले चार राज्यों के 29 जिलों में इन पर्वतों के आसपास पांच किलोमीटर का जंगल वाला इलाका बनाया जाएगा, जो बफर की तरह काम करेगा। सरकार का कहना था कि यह पहल 2030 तक 2.6 करोड़ हेक्टेयर खराब भूमि को फिर से उपजाऊ बनाया जा सकेगा।
अब ऐसा क्या हुआ कि चर्चा में आ गई अरावली शृंखला?
सुप्रीम कोर्ट ने पाया है कि अरावली पर्वत शृंखला की पहचान के लिए अलग-अलग राज्य अलग मानक रख रहे हैं। यहां तक कि विशेषज्ञ समूह भी अलग मानकों से अरावली पर्वत को परिभाषित कर रहे हैं। इनमें फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (एफएसआई) शामिल है। दरअसल, 2010 में एफएसआई ने कहा था कि अरावली शृंखला में उन्हें ही पर्वत माना जाएगा, जिनकी ढलान तीन डिग्री से ज्यादा हो। ऊंचाई 100 मीटर के ऊपर हो और दो पहाड़ियों के बीच की दूरी 500 मीटर हो। हालांकि, कई ऊंची पहाड़ियां भी इन मानकों पर नहीं थीं।

सुप्रीम कोर्ट ने इसके बाद पर्यावरण मंत्रालय, एफएसआई, राज्यों के वन विभाग, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) और अपनी समिति के प्रतिनिधियों को लेते हुए एक और समिति बनाई। इस समिति को अरावली की परिभाषा तय करने की जिम्मेदारी दी गई। आखिरकार 2025 को इस समिति ने सुप्रीम कोर्ट को अपनी रिपोर्ट भेजी। सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को इस समिति की रिपोर्ट को स्वीकार किया, जिसमें कहा गया कि अब सिर्फ 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली पर्वत शृंखला का हिस्सा माना जाएगा। इस मामले में कोर्ट की तरफ से नियुक्त एमिकस क्यूरी के. परमेश्वर ने आपत्ति जताई थी और कहा था कि यह परिभाषा काफी संकीर्ण है और सभी पहाड़ियां, जिनकी ऊंचाई 100 मीटर से कम है, वह खनन के लिए योग्य हो जाएंगी। इससे पूरी शृंखला पर असर पड़ेगा। हालांकि, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्य भाटी ने तर्क दिया कि एफएसआई के पुराने मानक अरावली के और बड़े क्षेत्र को पर्वत की परिभाषा से बाहर करते हैं। ऐसे में समिति की 100 मीटर की पहाड़ियों को पर्वत शृंखला मानने का तर्क काफी बेहतर है।

इन सभी तर्कों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वत शृंखला पर बेहतर प्रबंधन योजना तैयार करने के निर्देश जारी किए। इस योजना के तहत उन क्षेत्रों को पहले से तय किया जाएगा, जहां खनन को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाएगा। इसके अलावा उन क्षेत्रों को भी पहचाना जाएगा, जहां सिर्फ सीमित या नियमित ढंग से ही खनन को मंजूरी मिल पाए। हालांकि, कोर्ट ने फिलहाल खनन के लिए नए पट्टे देने पर प्रतिबंध बरकरार रखा है।

अगर लागू होते हैं मानक तो अरावली के कितने हिस्से पर पड़ेगा असर?
अरावली के कुल 800 किलोमीटर से अधिक के दायरे में से 550+ किलोमीटर का क्षेत्र राजस्थान में आता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली सिर्फ ऊंचाई का विषय नहीं, बल्कि एक संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र है। सरकारी और तकनीकी अध्ययनों के अनुसार राजस्थान में मौजूद अरावली की करीब 90 प्रतिशत पहाड़ियां 100 मीटर की ऊंचाई की शर्त पूरी नहीं करतीं। इसका मतलब यह हुआ कि राज्य की केवल 8 से 10 प्रतिशत पहाड़ियां ही कानूनी रूप से ‘अरावली’ मानी जाएंगी, जबकि शेष लगभग 90 प्रतिशत पहाड़ियां संरक्षण कानूनों से बाहर हो सकती हैं।
पर्यावरणविदों का मानना है कि यह लड़ाई केवल अदालत या सरकार तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज की साझा जिम्मेदारी है। अरावली का नुकसान स्थायी हो सकता है, क्योंकि एक बार पहाड़ कटे और जलधाराएं टूटीं तो उन्हें वापस लाने में सदियां लग जाती हैं। इसी कारण जनजागरण और सवाल उठाना आज भविष्य को सुरक्षित करने की जरूरत बन गया है।

क्या कहते हैं सरकारी विभाग के अफसर?
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) के पूर्व महानिदेशक दिनेश गुप्ता ने बताया कि साल 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की एक कमेटी अरावली में खनन एक्टिविटी की सीमा निर्धारण को लेकर बनाई थी। मैं जीएसआई डीजी के तौर इस कमेटी का सदस्य था। 2008 में कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट दी थी कि अरावली में 100 मीटर कंटूर लेवल नॉन अरावली कंसीडर किया जाए, बाकी को अरावली का हिस्सा माना जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस रिपोर्ट को स्वीकार भी किया था। इसके बाद पर्यावरण से जुड़े कार्यकर्ताओं के विरोध के चलते यह मामला आगे नहीं बढ़ा। इस मामले में जैसे बयान आ रहे हैं वे बहकाने वाले हैं। ऐसा नहीं है कि अरावली पर खनन होने से रेगिस्तान को बढ़ावा मिलेगा। रेगिस्तान के बढ़ने के कई दूसरे कारण होते हैं।
कैसे राजनीतिक गलियारों में पहुंचा पूरा मामला?
अब इस मुद्दे को लेकर पर्यावरणविदों से लेकर विपक्ष एक बड़ी मुहिम की ओर चल पड़ा है। ‘सेव अरावली’ कैंपेन देश भर में शुरू हो चुका है। राजस्थान में इस कैंपेन की अगुवाई पूर्व सीएम अशोक गहलोत कर रहे हैं। गहलोत ने चिंता जताई कि जब अरावली के रहते हुए स्थिति इतनी गंभीर है, तो अरावली के बिना स्थिति कितनी वीभत्स होगी, इसकी कल्पना भी डरावनी है। अरावली को जल संरक्षण का मुख्य आधार बताते हुए उन्होंने कहा कि इसकी चट्टानें बारिश के पानी को जमीन के भीतर भेजकर भूजल रिचार्ज करती हैं। अगर पहाड़ खत्म हुए, तो भविष्य में पीने के पानी की गंभीर किल्लत होगी, वन्यजीव लुप्त हो जाएंगे और पूरी इकोलॉजी खतरे में पड़ जाएगी।

गहलोत ने कहा कि वैज्ञानिक दृष्टि से अरावली एक निरंतर शृंखला है। इसकी छोटी पहाड़ियां भी उतनी ही अहम हैं जितनी कि बड़ी चोटियां। अगर दीवार में एक भी ईंट कम हुई, तो सुरक्षा टूट जाएगी। अरावली कोई मामूली पहाड़ नहीं, बल्कि प्रकृति की बनाई हुई ‘ग्रीन वॉल’ है। यह थार रेगिस्तान की रेत और गर्म हवाओं (लू) को दिल्ली, हरियाणा और यूपी के उपजाऊ मैदानों की ओर बढ़ने से रोकती है। यदि ‘गैपिंग एरिया’ या छोटी पहाड़ियों को खनन के लिए खोल दिया गया, तो रेगिस्तान हमारे दरवाज़े तक आ जाएगा और तापमान में अप्रत्याशित वृद्धि होगी। ये पहाड़ियां और यहां के जंगल एनसीआर और आसपास के शहरों के लिए फेफड़ों का काम करते हैं। ये धूल भरी आंधियों को रोकते हैं और प्रदूषण कम करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
दूसरी तरफ भाजपा इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस पर सियासत करने के आरोप लगा रही है। अलवर से भाजपा सांसद और केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने एक कार्यक्रम में कहा कि अशोक गहलोत के कार्यकाल में वर्ष 2002 में 1968 की लैंड रिफॉर्म रिपोर्ट पेश की गई थी और अब वे इस मामले में ज्ञापन दे रहे हैं।

इस बीच कुछ भाजपा के नेताओं ने भी अब सरकार की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजस्थान में भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री राजेंद्र राठौड़ ने बयान दिया है कि सरकार को अरावली के मामले में सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटिशन दायर करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अरावली की परिभाषा को केवल ऊंचाई के तकनीकी पैमाने तक सीमित न किया जाए। निचली पहाड़ियां, रिज संरचनाएं और जुड़े हुए भू-भाग भी पारिस्थितिक रूप से उतने ही महत्वपूर्ण हैं। यदि कानूनी मान्यता का दायरा बहुत संकीर्ण हो गया तो संरक्षण के प्रयास कमजोर पड़ सकते हैं और पिछले तीन दशकों में बनी पर्यावरणीय सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। सरकार को पुनर्विचार याचिका डालनी चाहिए।

अरावली आपने कभी नहीं देखा… तो 3डी नक्शों में देखिए पर्वत श्रृंखला
अरावली संकट के बीच इस पर्वत श्रृंखला की सैटेलाइट तस्वीरें सामने आई हैं. इन सैटेलाइट तस्वीरों में मानवीय गतिविधियों को उजागर करती हैं. अरावली पर्वत श्रृंखला के पर्वत शिखरों का चित्रण और मानवीय गतिविधियों पर सैटेलाइट जांच में क्या संकट सामने आया?

अरावली पर्वत श्रृंखला संकट में

अरावली पर्वत श्रृंखला इन दिनों नाजुक परिस्थितियों और खतरों को लेकर चर्चा में है.इस पर्वत श्रृंखला की कई पहाड़ियां झाड़ियों से ढंकी हैं,लेकिन खनन और निर्माण से बिना किसी सुरक्षा के छोड़ दी जा रही हैं.ऑनलाइन उपलब्ध अधिकांश नक्शे इस पर्वत श्रृंखला के वास्तविक फैलाव,ऊंचाई में इसके सूक्ष्म बदलावों के साथ ही जमीन पर हो रहे घटनाक्रम सही तरीके से नहीं दिखाते. ओपन सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT) ने इमर्सिव 3डी डेटा, सैटेलाइट इमेजरी और स्थानिक पैटर्न का इस्तेमाल कर अरावली संकट समझने की कोशिश की है.

हिमालय जैसी विशाल पर्वत श्रृंखलाओं के विपरीत,अरावली मुख्य रूप से निम्न कटक या रिज से बनी है,जिनकी ऊंचाई अक्सर कुतुब मीनार से भी कम होती है.सौ मीटर की समान कट ऑफ रेंज के कारण अरावली का बड़ा हिस्सा प्रोटेक्शन से वंचित है.हालांकि, सरकार की सिफारिशों के बाद कोर्ट ने अरावली को लेकर एक नई परिभाषा स्वीकार की.इस परिभाषा के अनुसार वह कोई भी भू-आकृति जो आसपास की भूमि या स्थानीय रिलीफ संरचना से कम से कम 100 मीटर या 328 फीट ऊंची हो,अरावली पहाड़ी है.

इसी परिभाषा में यह भी कहा गया है कि एक-दूसरे से 500 मीटर की दूरी के भीतर स्थित दो या अधिक ऐसी पहाड़ियों और उनके बीच की भूमि को मिलाकर अरावली पर्वत श्रृंखला माना जाएगा. अरावली संकट पर सरकार ने भी रविवार को बयान जारी किया. इसमें सरकार की ओर से कहा गया कि नई परिभाषा का उद्देश्य नियमन को मजबूत करना, अस्पष्टता को कम करना और एकरूपता लाना है. सरकार ने यह भी कहा कि राज्यों में खनन को समान रूप से नियंत्रित करने के लिए एक एकल परिभाषा जरूरी थी.

OSINT टीम ने यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के ओपनटोपोग्राफी रिसर्च सेंटर से प्राप्त हाई रिजॉल्यूशन ऊंचाई के डेटा का उपयोग कर माउंट आबू से नई दिल्ली तक 670 किलोमीटर के विस्तार में अरावली पर्वत श्रृंखला का मानचित्र तैयार किया. अरावली की ऊंचाई कुछ सौ मीटर की साधारण पहाड़ियों से लेकर 1700 मीटर से भी अधिक ऊंचे शिखर तक जाती है, जबकि अधिकांश हिस्सा समुद्र तल से 300 से 900 मीटर की ऊंचाई के बीच ही स्थित है.

यह समझने के लिए कि अरावली की पहाड़ियां कैसे बदल रही हैं, मानचित्र का विश्लेषण कर दिल्ली,हरियाणा और राजस्थान के आसपास के क्षेत्रों को शहरी क्षेत्र,वनस्पति और जल निकायों में वर्गीकृत किया गया.पर्यावरणविद लंबे समय से यह विषय उठा रहे हैं.सेंटिनल-2 सैटेलाइट से मिले डेटा का उपयोग कर लैंड यूज लैंड कवर (LULC) मानचित्र तैयार किया गया,जो दर्शाता है कि भूमि का उपयोग किस प्रकार किया जा रहा है और इसे स्थानिक विश्लेषण उपकरणों से पूर्व-निर्धारित श्रेणियों के आधार पर वर्गीकृत किया गया.

विश्लेषण से यह पता चला कि पिछले आठ साल में जिन जिलों में अरावली फैली है,वहां निर्मित क्षेत्र 1600 वर्ग किलोमीटर से अधिक बढ़ा है.इन इलाकों में ग्रीन बेल्ट लगातार कम हुआ है.वनस्पति क्षेत्र 11392 वर्ग किलोमीटर से घटकर अब 7521 वर्ग किलोमीटर रह गया है.यह सब एक दशक से भी कम समय में हुआ.यह विश्लेषण यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के रिमोट सेंसिंग डेटा पर आधारित और 2017 से 2025 के बीच के ग्रीष्मकालीन महीनों पर केंद्रित है, जिससे बादलों के प्रभाव को न्यूनतम रखा जा सके.

इस पूरे विषय के केंद्र में है दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक की पारिस्थितिकी में बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप.मौजूदा रिपोर्ट्स और अध्ययनों के आधार पर, हमने सैटेलाइट इमेजरी की जांच कर उन क्षेत्रों की पहचान की,जहां मानव गतिविधियों ने स्पष्ट रूप से नुकसान किया है.ऐसा ही एक स्थान हरियाणा की बकरीजा पहाड़ी भी है,जहां खनन ने धरती की सतह पर गहरे घाव बना दिए हैं और जो कभी एक नीची पहाड़ी थी,उसे लगभग मिटा दिया गया है.

इंडियन जर्नल ऑफ एप्लाइड रिसर्च में प्रकाशित एक अध्ययन ने रामलवास पहाड़ियों में भूजल स्तर में गिरावट को खनन गतिविधियों को एक कारण बताया है.रिपोर्ट के अनुसार,ग्रामीणों का दावा है कि खनन कार्य निर्धारित गहराई से अधिक किया जा रहा है और 200 फीट तक गहरे गड्ढे बिना किसी सुरक्षा उपाय के खुले छोड़ दिए गए हैं.सैटेलाइट इमेजरी में जमीन में खोदे गए खुले गड्ढे और उनमें दिखाई देता भूजल स्पष्ट रूप से नजर आता है.पत्थर निकालने के बाद,पानी से भरे कई गड्ढे खनन बंद होने के बाद भी ढंके नहीं गए.

दक्षिण-पश्चिम हरियाणा के राजावास गांव के पास हमने एक छोटी रिज चिन्हित की,जहां पहाड़ी की एक ढलान को वनों की कटाई और खनन ने पूरी तरह उजाड़ दिया है.यह स्थान उन कई दर्ज और बिना दर्ज स्थानों में से एक है,जो अब अरावली के भविष्य को लेकर चल रही लड़ाई का केंद्र बन चुके हैं.राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों के एक पूर्व अध्ययन ने अरावली पारिस्थितिकी तंत्र की मानवीय हस्तक्षेप के प्रति संवेदनशीलता रेखांकित की थी.

समान भूमि-उपयोग गतिशीलता विश्लेषण का उपयोग करते हुए किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि 1979 से 2019 के बीच अनियंत्रित खनन,शहरीकरण और वनों की कटाई के कारण अरावली पहाड़ी क्षेत्र का लगभग आठ प्रतिशत हिस्सा समाप्त हो गया. राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 1975 से 2019 के बीच की सैटेलाइट तस्वीरों और भूमि-उपयोग मानचित्रों का अध्ययन कर ये अनुमान लगाए.उनका शोध पत्र “अरावली पर्वत श्रृंखला की भूमि-उपयोग गतिशीलता का आकलन” 2023 में जर्नल Science Earth Informatics में प्रकाशित हुआ था.

इसमें निष्कर्ष निकाला गया कि जैसे-जैसे अधिक पहाड़ियां समतल होती जाएंगी,थार मरुस्थल के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की ओर विस्तार का रास्ता खुल जाएगा.शोधकर्ताओं के विश्लेषण में जो आंकड़े मिले थे,उनके अनुसार,अध्ययन की 44 वर्षों की अवधि में 5772.7 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र समतल हो गया था,जो अरावली क्षेत्र का लगभग आठ प्रतिशत है.रिपोर्ट के मुताबिक,यदि यही रुझान जारी रहा तो 2059 तक अरावली के कुल क्षेत्रफल का 16360 वर्ग किलोमीटर या लगभग 22 प्रतिशत हिस्सा समाप्त हो सकता है.

 

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