त्विषा हत्या/आत्महत्या की सीबीआई जांच शुरु,दहेज उत्पीड़न की भी धारायें

त्विषा की मौत के बाद पूर्व जज गिरिबाला ने किन 46 प्रभावशाली लोगों को किया कॉल? अब फोकस अब डिजिटल सबूतों पर
Giribala Singh Call Records:त्विषा शर्मा केस में हर गुजरते दिन के साथ नए-नए खुलासे हो रहे हैं. अब त्विषा के परिजनों ने एक आवेदन पेश किया है जिसमें आरोप लगाया गया है कि त्विषा की मौत के बाद पूर्व जिला जज गिरिबाला सिंह ने 46 नंबरों पर कॉल किया था. इनमें कुछ नंबर जजों और जांच एजेंसियों से जुड़े अधिकारियों के हो सकते हैं. इस आवेदन के बाद भोपाल पुलिस ने कोर्ट में बताया है कि घटना से जुड़े मोबाइल नंबरों की सीडीआर (कॉल डिटेल रिकॉर्ड) और टावर लोकेशन सुरक्षित रखने के लिए टेलीकॉम कंपनियों को पत्र भेजा गया है. इसका मतलब ये है कि अब जांच का फोकस इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल सबूतों पर आ गया है…

46 कॉल्स के आरोप ने बढ़ाई सरगर्मी
दरअसल भोपाल की पूर्व जिला जज गिरिबाला सिंह की बहू त्विषा शर्मा की संदिग्ध मौत के मामले में परिजनों के एक दावे ने सबको चौंका दिया है. परिजनों ने कोर्ट में अर्जी देकर आरोप लगाया है कि त्विषा की मौत के ठीक बाद पूर्व जिला जज ने कई प्रभावशाली लोगों से संपर्क साधा था. परिजनों के मुताबिक जिन 46 नंबरों पर बातचीत की गई, उनमें से कुछ नंबर न्यायिक सेवा के बड़े अधिकारियों और जांच एजेंसियों के अफसरों के हैं. इस गंभीर आरोप के बाद ही पुलिस ने कोर्ट के सामने साफ किया कि वह सभी संबंधित फोन नंबरों की कॉल डिटेल्स और टावर लोकेशन को सुरक्षित कराने के लिए टेलीकॉम कंपनियों के संपर्क में है ताकि कोई भी डिजिटल सबूत मिटाया न जा सके.

सीबीआई की एंट्री के बाद जागी भोपाल पुलिस
दूसरी ओर इस पूरे घटनाक्रम में स्थानीय पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं. पुलिस ने कोर्ट को बताया कि त्विषा और उसके पति समर्थ के मोबाइल फोन सहित अन्य इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस जब्त कर लिए गए हैं. लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि यह जब्ती त्विषा की मौत के पूरे 13 दिन बाद सोमवार रात को की गई. पुलिस ने यह कदम तब उठाया जब सीबीआई  मामले में एफआईआर दर्ज कर चुकी थी. सीबीआई की कठोरता के बाद ही भोपाल पुलिस एक्टिव हुई और आरोपित समर्थ को स्पॉट वेरिफिकेशन यानी मौका मुआयना कराने के लिए उसके घर लेकर गई.

एम्स के वीडियो फुटेज मालखाने में जमा
डिजिटल सबूत सहेजने की कड़ी में पुलिस ने एम्स भोपाल से जुड़े जरूरी दस्तावेज और सबूत भी कब्जा लिए हैं. अस्पताल में त्विषा के पोस्टमार्टम और उसके शव को सुरक्षित रखने (प्रिजर्वेशन) की पूरी प्रक्रिया की जो वीडियो रिकॉर्डिंग की गई थी, उसके फुटेज अब पुलिस को मिल चुके हैं. पुलिस ने इन सभी महत्वपूर्ण फुटेज को साक्ष्य के तौर पर सरकारी मालखाने में जमा करा दिया है.

CBI की हाईटेक जांच तेज, Faro Focus से गिरिबाला के घर की 3D मैपिंग शुरू
हाई-प्रोफाइल त्विषा शर्मा मामले में CBI ने आरोपी सास गिरिबाला सिंह के घर की हाईटेक जांच शुरू कर दी है. Faro Focus 3D लेजर स्कैनर मशीन से घर और आसपास का डिजिटल नक्शा तैयार किया जा रहा है. एजेंसी ने घर के अंदर क्राइम सीन री-क्रिएशन भी किया है और हिरासत में पूछताछ की जरूरत बताई ।

CBI ने गिरिबाला सिंह के घर की हाईटेक जांच शुरू की.

हाई-प्रोफाइल त्विषा शर्मा मामले में जांच अब तकनीक के नए स्तर पर पहुंच गई है. सीबीआई ने आरोपित सास गिरिबाला सिंह के घर की हाईटेक मशीनों से जांच शुरू की है. एजेंसी Faro Focus  हाई-स्पीड 3D लेजर स्कैनर मशीन का उपयोग कर रही है, जिससे पूरे घर और उसके आसपास का डिजिटल नक्शा तैयार हो रहा है.  यह मशीन घटनास्थल  पूरी तरह से डिजिटली स्कैन कर एक सटीक 3D मॉडल तैयार करती है. इससे जांच एजेंसियों को यह समझने में मदद मिलती है कि घटना के समय स्थिति कैसी थी और किन-किन जगहों पर गतिविधियां हुई थीं. सीबीआई इस तकनीक से पूरे क्राइम सीन का पुनर्निर्माण कर रही है.

सीबीआई ने सिर्फ घर की मैपिंग ही नहीं की है, बल्कि अंदर और आसपास के क्षेत्र में क्राइम सीन री-क्रिएशन भी किया है. इसका उद्देश्य घटनाक्रम वैज्ञानिक तरीके से समझना और सबूत डिजिटली सुरक्षित करना है. इस हाई-प्रोफाइल केस की जांच सीबीआई कर रही है. एजेंसी ने हाईकोर्ट को बताया है कि उसे आरोपित सास गिरिबाला सिंह से हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता है. इसी आधार पर जांच एजेंसी ने उनकी जमानत निरस्त करने की भी मांग की है.

इधर राज्य सरकार ने भी हाईकोर्ट में पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और चोटों को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी दी है. सरकारी वकील ने बताया कि त्विषा शर्मा के शरीर पर कलाई, कोहनी और सिर समेत कई जगह चोटों के निशान मिले थे. कोर्ट ने सवाल किया कि क्या ये चोटें मौत से पहले लगी थीं. राज्य सरकार ने स्पष्ट किया कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के अनुसार कुछ चोटें एंटी-मॉर्टम यानी मृत्युपूर्व की थीं. सरकार ने कहा कि ये चोटें न तो मृत्यु बाद लग सकती थीं और न ही शव नीचे उतारते समय . संभावना है कि ये चोटें हाथापाई या संघर्ष में लगी होंगी.

सरकार ने अदालत में त्विषा शर्मा की बहन का बयान भी पढ़कर सुनाया. बयान के अनुसार, त्विषा की सास ने उसे घर बुलाकर 2 लाख रुपये मांगे थे जो उनकी जिद देख दे दिये गये. साथ ही यह भी कहा गया कि शादी में खर्च की गई रकम पर्याप्त नहीं थी. मामले में दहेज प्रताड़ना के आरोप हैं. पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 80(2), 85 और 3(5) में और दहेज निषेध अधिनियम में एफआईआर की है. एफआईआर में त्विषा के पति समर्थ सिंह और सास गिरिबाला सिंह नामांकित हैं.

हाईकोर्ट में पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और चोटों पर महत्वपूर्ण अनावरण

हाईकोर्ट  सुनवाई में बचाव पक्ष ने कहा कि ट्विशा को फंदे से लटकने के 20 मिनट के भीतर ही AIIMS भोपाल पहुंचाया गया था. पुलिस ने 13 मई से ही पूरा परिसर सील कर दिया था. बचाव पक्ष ने कहा कि गिरिबाला सिंह ने जांच में सहयोग कर जब्ती मेमो पर हस्ताक्षर भी किए थे. वहीं राज्य सरकार ने आरोप लगाया कि दो नोटिसों के बावजूद उन्होंने जांच में सहयोग नहीं किया और पुलिस के पहुंचने पर वह घर पर नहीं थीं. फिलहाल अदालत में मामले की सुनवाई जारी है और सीबीआई की हाईटेक जांच ने केस को और तकनीकी व वैज्ञानिक दिशा में मोड़ दिया है.

विदाई में सास गिरिबाला सिंह ने मांगे थे 2 लाख रुपये… ट्विशा शर्मा केस में CBI की FIR में खुलासा
भोपाल की मॉडल ट्विशा शर्मा केस में सीबीआई की एफआईआर से बड़ा खुलासा हुआ है. एजेंसी ने पूर्व जज गिरिबाला सिंह पर विदाई में ₹2 लाख मांगने का मामला दर्ज किया है.

भोपाल के ट्विशा शर्मा केस में नया खुलासा हुआ है. दिसंबर में ट्विशा की शादी में उनकी सास गिरिबाला सिंह ने विदाई में 2 लाख रुपये मांगे थे. यह बात मामले की जांच कर रही सीबीआई की FIR में पूर्व जज गिरिबाला सिंह के खिलाफ लगाए आरोपों में शामिल है. मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई कर सीबीआई जांच के आदेश दिए ।

CBI ने दर्ज की FIR
एजेंसी ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 80(2),85 और 3(5) के साथ-साथ दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 में मामला दर्ज किया है.

25 मई 2026 को दर्ज FIR के अनुसार, ट्विशा शर्मा की शादी 9 दिसंबर 2025 को समर्थ सिंह से हुई थी. ससुराल वालों पर शादी के बाद से ही दहेज को लेकर उसे परेशान करने का आरोप है. शिकायत में कहा गया है कि ट्विशा को लगातार मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा था. पति समर्थ सिंह और सास गिरिबाला सिंह को इस मामले में आरोपी बनाया गया है.

विदाई में मांगे 2 लाख रुपये
FIR के अनुसार, गिरिबाला सिंह ने विदाई के समय ट्विशा के परिवार से 2 लाख रुपये की मांगे थे, जिसे पीड़िता के परिवार ने उनकी जिद देख दे दिया था. CBI अब इस मामले में दहेज हत्या, उत्पीड़न, षड्यंत्र और अन्य संभावित अपराधों की जांच कर रही है.

33 वर्षीय ट्विशा मध्य प्रदेश के भोपाल में अपने ससुराल में फंदे से लटकी मिली थी. उसके परिवार ने उसके वकील पति समर्थ सिंह और पूर्व जज सास गिरिबाला सिंह पर दहेज उत्पीड़न और आत्महत्या को उकसाने का आरोप लगाया है. सिंह परिवार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए दावा किया है कि ट्विशा नशे की लत से जूझ रही थी.

सीबीआई करेगी आरोपित पति से पूछताछ
ट्विशा शर्मा का पति समर्थ सिंह उनकी मौत के बाद से ही फरार था. आखिरकार पिछले हफ्ते 10 दिनों तक कानून से बचते रहते पकड़ लिया गया. जैसे-जैसे इस मामले को लेकर लोगों में गुस्सा बढ़ता गया, मध्य प्रदेश सरकार ने केस सीबीआई को सौंप दिया.पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से ‘एंटीमॉर्टम हैंगिंग’ यानी, जिंदा रहते फांसी लगाने की पुष्टि हुई. इसके अलावा ट्विशा के शरीर पर चोट के निशान भी मिले, जिनके बारे में माना जा रहा था कि वे किसी भारी चीज या हमले से लगे थे. सीबीआई समर्थ सिंह की कस्टडी ले सकती है.

परिवार की मांग पर, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने पिछले हफ्ते AIIMS दिल्ली के डॉक्टरों की टीम से ट्विशा के शरीर का दूसरा पोस्टमॉर्टम करवाने का आदेश दिया था. परिवार ने पहले पोस्टमॉर्टम में कमियों का आरोप लगाया था.

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में स्वत: संज्ञान ले कहा कि दोनों परिवार ‘अकारण’ मीडिया के पास जा रहे हैं. चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और विपुल एम पंचोली की बेंच ने मीडिया से भी आग्रह किया कि वे इस मामले से जुड़ी खबरें देते समय संयम बरतें.

गिरिबाला सिंह की अग्रिम ज़मानत की चुनौतियों पर फैसला सुरक्षित, CBI को पक्षकार बनने की अनुमति

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और त्विशा शर्मा के माता-पिता की उन याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया, जिनमें त्विशा की सास गिरिबाला सिंह को दहेज हत्या के कथित मामले में दी गई अग्रिम ज़मानत को चुनौती दी गई। जस्टिस देव नारायण मिश्रा की सिंगल-जज बेंच ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। सुनवाई के दौरान, त्विशा के माता-पिता की ओर से पेश सीनियर वकील सिद्धार्थ लूथरा ने दलील दी कि भोपाल कोर्ट का वह आदेश, जिसमें ट्विशा की सास गिरिबाला (रिटायर्ड जज) को अग्रिम ज़मानत दी गई थी, जल्दबाजी में दिया गया। उन्होंने कहा कि यह आदेश तब पारित किया गया, जब गिरिबाला ने जांच में “एक दिन के लिए भी” सहयोग नहीं किया।
लूथरा ने ट्विशा की आत्महत्या से कुछ दिन पहले की WhatsApp चैट का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि इन चैट से कथित तौर पर यह पता चलता है कि त्विशा “घुटन महसूस कर रही थी” और उसने अपने माता-पिता से उसे वापस ले जाने की गुहार लगाई। उन्होंने दलील दी कि सेशंस कोर्ट ने इस बात पर गलत तरीके से ज़ोर दिया कि ‘मुख्य आरोप पति के खिलाफ थे’। उन्होंने कहा, “यह एक वाक्य संदर्भ से हटाकर लिया गया और अग्रिम ज़मानत देने का आधार बन गया… FIR अभी शुरुआती चरण में है… क्या इस चरण में कोर्ट द्वारा अग्रिम ज़मानत पर विचार करना जल्दबाजी नहीं है?… कोर्ट ने सभी चैट को नज़रअंदाज़ कर दिया और संदर्भ से हटाकर सिर्फ एक वाक्य को चुना और उसे अग्रिम ज़मानत देने का आधार बना लिया।”

अंत में उन्होंने यह दलील भी दी कि गिरिबाला का काफी रसूख है और जिस घर में यह घटना हुई, वह तीन दिनों तक उन्हीं के कब्ज़े में रहा। माता-पिता की ओर से पेश अन्य वकील अनुराग श्रीवास्तव ने भी गिरिबाला के रसूख पर ज़ोर देते हुए कहा कि पुलिस ने FIR दर्ज करने में देरी की। इस बीच गिरिबाला ने अग्रिम ज़मानत के लिए अर्जी दी। उन्होंने दलील दी, “12 तारीख (आत्महत्या की तारीख) के बाद से माता-पिता लगातार FIR दर्ज कराने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन 15 तारीख तक FIR दर्ज नहीं की गई। जबकि, ज़मानत की अर्जी 14 तारीख को ही दायर कर दी गई। क्या पुलिस के पास इतनी जांच करने का समय था कि भोपाल कोर्ट तथ्यों पर विचार करके ज़मानत दे पाता?”
वकील ने आगे कहा कि ससुराल वालों की पहुंच सभी वीडियोग्राफी और CCTV फुटेज तक है। उन्होंने कहा, “उन्होंने (ससुराल वालों ने) तुरंत स्थानीय पुलिस को सूचना नहीं दी, और मुर्दाघर को भी 12 मई के बजाय 13 मई को सूचित किया गया… उन्होंने अस्पताल को भी सूचना नहीं दी और न ही एम्बुलेंस बुलाई। मेडिकल पेशेवर उसके शव को तीसरी मंज़िल से नीचे ला सकते थे। उसके बचने की थोड़ी-बहुत संभावना हो सकती थी… वे उसके शव को अपने घर के सबसे नज़दीकी अस्पताल में ले जाने के बजाय AIIMS जैसे इतने दूर के अस्पताल में ले गए।”

राज्य की ओर से पेश हुए एडवोकेट जनरल प्रशांत सिंह ने भी अग्रिम ज़मानत दिए जाने का विरोध करते हुए कहा कि भोपाल कोर्ट ने आरोपित के प्रस्तुत सभी बचाव दस्तावेज़ों पर विचार किया, जबकि जांच एजेंसी को FIR  बाद कोई भी सामग्री इकट्ठा करने का समय नहीं दिया गया। उन्होंने कहा, “इतने सारे दस्तावेज़, जिनमें उसकी (त्विशा की) दवाएँ और उसकी मानसिक स्थिति से जुड़े दस्तावेज़ भी शामिल हैं, जिन्हें एजेंसी ने इकट्ठा नहीं किया था, लेकिन कोर्ट ने उन पर विचार किया… ऐसा लगता है जैसे ट्रायल जज ज़मानत अर्ज़ी पर ही एक ‘मिनी-ट्रायल’ (छोटा मुकदमा) चला रहे हैं।” इसके अलावा, गिरिबाला के आचरण की ओर इशारा करते हुए AG ने कहा, “आरोपित को अग्रिम ज़मानत दी गई थी, और उसने 18 तारीख को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। उसने एक मृत व्यक्ति पर बेबुनियाद आरोप लगाए, जो उन आरोपों का जवाब नहीं दे सकता।” इसके अलावा, उन्होंने दावा किया कि वह ज़मानत की उस शर्त का पालन करने में विफल रही, जिसमें उसे जांच में सहयोग करना था; उसने तीन नोटिस पर भी पुलिस के सामने पेश होने से इनकार किया।”वह पेश नहीं हो रही है; वह मीडिया को संबोधित करने और अपनी कहानी को बड़े पैमाने पर फैलाने को स्वतंत्र है। लेकिन वह एजेंसी के साथ सहयोग नहीं कर रही है।”

AG ने त्विशा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत के कारणों का भी ज़िक्र किया। साथ ही बताया कि उसके सिर पर चोट का निशान मिला था। उन्होंने कहा, “यह दहेज हत्या का एक अनुमान है… उसके सिर पर चोट पहुंचाए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता… ये चोटें ‘एंटी-मॉर्टम’ (मौत से पहले की) हैं।” उन्होंने पोस्टमार्टम रिपोर्ट से आगे पढ़कर सुनाया, “नीले रंग के चोट के निशान (contusions) सामान्य प्रकृति के हैं और तीन दिन पुराने हैं। कोहनी से पहले के चोट के निशान मौत से कुछ ही समय पहले के हैं।” CBI को जांच सौंपी गई है। उसने भी कोर्ट को एक लिखित नोट सौंपा, जिसमें गिरिबाला से हिरासत में पूछताछ करने के कारणों का उल्लेख किया गया। गिरिबाला सिंह की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट नित्या रामकृष्णन ने दलील दी कि अभियोजन पक्ष और शिकायतकर्ता की ओर से लगाए गए कई आरोप “रिकॉर्ड के विपरीत” थे और “झूठे बयानों” पर आधारित थे। उन्होंने बताया कि त्विशा शर्मा 12 मई को रात करीब 10:30 बजे फंदे से लटकी मिली थीं और उन्हें बीस मिनट के अंदर ही AIIMS भोपाल ले जाया गया। रामकृष्णन ने दलील दी कि 13 मई की सुबह तक, पुलिस ने परिसर को अपने कब्ज़े में ले लिया था और एक बाथरूम तथा एक कमरे को छोड़कर पूरे घर को सील कर दिया था। उन्होंने कहा, “इसलिए यह कहना कि यह पूरी चीज़ हमारी हिरासत में थी, बिल्कुल गलत है।” सहयोग न करने के आरोपों को खारिज करते हुए सीनियर वकील ने कहा कि वह जांच एजेंसी के लिए हर समय उपलब्ध रहीं। उन्होंने 20-21 मई की रात करीब 2:30 बजे “बेहद बेवक़्त” भेजे गए नोटिसों का खुद जवाब दिया। उन्होंने कहा, “मुझे नहीं लगता कि सरकार को हाईकोर्ट के सामने झूठे बयान देने चाहिए।” साथ ही यह भी बताया कि उन्होंने अपना मोबाइल फ़ोन पुलिस को सौंप दिया और ज़ब्ती मेमो पर खुद हस्ताक्षर किए। रामकृष्णन ने आगे दलील दी कि यह तर्क कि गिरिबाला सिंह एक पूर्व न्यायिक अधिकारी होने के नाते जांच को प्रभावित कर सकती हैं, “पूरी तरह से अनुचित” है, खासकर इसलिए क्योंकि 13 मई के बाद सील किए गए इलाकों तक उनकी कोई पहुंच नहीं थी। मामले के गुण-दोष पर बात करते हुए रामकृष्णन ने दलील दी कि दहेज मृत्यु के मामलों में भी अग्रिम ज़मानत (Anticipatory Bail) दी जा सकती है। साथ ही दहेज मृत्यु से जुड़े प्रावधानों के तहत कानूनी अनुमान तभी लगाया जा सकता है, जब बुनियादी तथ्य स्थापित हो जाएं, “न कि केवल FIR में आरोप लगाने मात्र से।” अभियोजन पक्ष द्वारा पेश की गई WhatsApp चैट का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि शिकायतकर्ता पक्ष उन बातों का ऐसा अर्थ निकाल रहा था “जो वहां मौजूद ही नहीं था।” उनके अनुसार, चैट में सास के खिलाफ क्रूरता या दहेज की मांग का कोई आरोप नहीं था; इसके विपरीत, चैट से यह पता चलता था कि मृतका की शिकायतें उसके पति के खिलाफ थीं। रामकृष्णन ने दलील दी, “उसने स्पष्ट रूप से अपने पति पर आरोप लगाए।” उन्होंने चैट के उन हिस्सों का भी हवाला दिया, जिनमें कथित तौर पर त्विशा की मां ने अपनी बेटी को सलाह दी थी कि वह “अपनी सास को विश्वास में ले”; उन्होंने तर्क दिया कि अगर गिरिबाला सिंह दहेज की मांग कर रही होतीं तो ऐसी सलाह कभी नहीं दी जाती। ट्रायल कोर्ट के अग्रिम ज़मानत के आदेश का बचाव करते हुए रामकृष्णन ने कहा, “दुनिया में ऐसा कोई कानून नहीं है, जो यह कहता हो कि अग्रिम ज़मानत के मामलों में आप रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री को नहीं देख सकते।” सीनियर वकील ने यह भी कहा कि आरोपी परिवार ने त्विशा को आर्थिक मदद दी थी और उसे काफी बड़ी रकम ट्रांसफर की थी। उन्होंने दलील दी कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों से पता चलता है कि मृतक और उसके पति के बीच वैवाहिक जीवन में खुशहाली नहीं थी, न कि इसमें सास का कोई हाथ था। उन्होंने कहा, “इसका मतलब यह नहीं है कि मैं इसमें शामिल थी।” गर्भावस्था और मेडिकल फैसलों से जुड़े आरोपों पर रामकृष्णन ने कहा कि उस समय त्विशा अपने मायके वालों के साथ रह रही थी और गर्भावस्था को मेडिकल तरीके से खत्म करने का फैसला आखिरकार उसी ने लिया था। उन्होंने दलील दी, “तो आप यह कैसे मान सकते हैं कि उसके फैसले में किसी ने दखल दिया?” अपनी दलीलें जारी रखते हुए सीनियर वकील नित्या रामकृष्णन ने ज़ब्ती के रिकॉर्ड का हवाला दिया और दोहराया कि जांच अधिकारी उस पूरे समय के दौरान गिरिबाला सिंह के साथ मौजूद थे। उन्होंने असहयोग के आरोपों का खंडन करते हुए दलील दी, “पूरे दिन वे उसके साथ थे, और अब वे कह रहे हैं कि वह उपलब्ध नहीं थी।” WhatsApp पर हुई बातचीत का हवाला देते हुए रामकृष्णन ने आगे कहा कि घटना से कुछ दिन पहले भी मृतक ने अपनी सास को “एक प्यार भरा मैसेज” भेजा था। उन्होंने कहा, “मैं जो कह रही हूं, वह यह है कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि मैंने उसके साथ कोई क्रूरता की हो।” सीनियर वकील ने दहेज हत्या के मामलों में अग्रिम ज़मानत की वैधता का बचाव करते हुए सावित्री अग्रवाल और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य (2009) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया। इस आलोचना का ज़िक्र करते हुए कि FIR दर्ज होने से पहले ही अग्रिम ज़मानत मांगी गई थी। उन्होंने कहा: “क्या अपनी आज़ादी की रक्षा के लिए अदालत जाना कोई पाप है?” जांच को प्रभावित करने के आरोपों पर जवाब देते हुए रामकृष्णन ने कहा कि परिवार ने न केवल राज्य पुलिस के साथ, बल्कि 25 मई को CBI के आने के बाद उसके साथ भी सहयोग किया। मामले को लेकर मीडिया की बारीकी से जांच का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा, “हर कोई इस मामले को लेकर बहुत ज़्यादा चर्चा कर रहा है।”
गिरिबाला सिंह के वकील एनोश जॉर्ज ने भी दलील दी कि अगर शिकायतकर्ता ज़मानत मिलने के बाद के आचरण के आधार पर ज़मानत निरस्त करवाना चाहता है तो इसका सही उपाय ट्रायल कोर्ट के सामने है,न कि सीधे हाई कोर्ट के सामने। अग्रिम ज़मानत का विरोध करते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि मौजूदा कार्यवाही केवल ज़मानत निरस्तीकरण को नहीं है, बल्कि अग्रिम ज़मानत के आदेश को ही निरस्त करने को है। हालांकि FIR से पहले अग्रिम ज़मानत कानूनी रूप से मना नहीं हो सकता, लेकिन ट्रायल कोर्ट को एक गंभीर दहेज हत्या के मामले में राहत देने से पहले इंतज़ार करना चाहिए था, जिसमें “एक न्यायिक संस्था में काफ़ी ताक़त रखने वाला एक ताक़तवर व्यक्ति” शामिल है। मेहता ने दलील दी, “तथ्यों पर विचार करने को ट्रायल कोर्ट एक दिन इंतज़ार कर सकता था।” साथ ही कहा कि कोर्ट ने जिन आधारों पर भरोसा किया — जैसे कि आरोपित 63 वर्षीय महिला है और भोपाल में रहती है — वे बहुत ही सामान्य हैं। उन्होंने कहा, “अगर यही आधार हैं तो 90% मामलों में अग्रिम ज़मानत दी जानी चाहिए।” सॉलिसिटर जनरल ने आगे आरोप लगाया कि मीडिया से बातचीत और प्रेस कॉन्फ्रेंस से जनमत गढ़ा जा रहा है। उन्होंने दलील दी, “प्रेस कॉन्फ्रेंस पूरे आत्मविश्वास से की जाती हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस एक माहौल बनाती हैं और गवाहों को प्रभावित करती हैं।” मेहता ने यह सवाल भी उठाया कि क्या परिसर सील करने से पहले घटनास्थल पर सबूतों से छेड़छाड़ की गई। गिरिबाला सिंह के जांच अधिकारी को भेजे गए ईमेल का ज़िक्र करते हुए उन्होंने दलील दी कि प्रतिवादी,जो कानूनी रूप से प्रशिक्षित है,इससे पूरी तरह वाकिफ़ थी कि सामान्यत: सूर्यास्त बाद किसी महिला से पूछताछ नहीं होती। सबूत इकट्ठा करने को हिरासत में पूछताछ ज़रूरी है। मृतक ने अपनी सास के खिलाफ शिकायतें की थीं। 7 मई की एक चैट का ज़िक्र करते हुए मेहता ने दावा किया कि सास ने मृतका और उसके पति में “दरार पैदा कर दी थी” और वह इसको “ज़िम्मेदार” थी। मृतक के परिवार के सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों, जिनमें समुंदर सिंह, इदलराम और मंगला के मामले शामिल हैं, का हवाला दे तर्क दिया कि गंभीर अपराधों में चार्जशीट दाखिल होने के बाद भी अग्रिम ज़मानत निरस्त हो सकती है। जवाब में रामकृष्णन ने कहा कि यह वही थीं जिन्होंने घटना वाली रात पुलिस को इसकी जानकारी दी थी। सुनवाई के आखिर में कोर्ट ने CBI को तीसरे प्रतिवादी के तौर पर मामले में शामिल होने की इजाज़त दी और मामले पर अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया।
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