CJP संस्थापक अभिजीत दिपके POCSO में फंसे, एड. रिंकी चटर्जी ने की Zero FIR
Abhijeet Dipke Case Understanding Zero Fir, Pocso And Jantar Mantar Protest Row
अभिजीत दिपके POCSO में फंसे, रिंकी चटर्जी के Zero FIR के बाद बड़ी मुश्किल में CJP फाउंडर, क्या होता है जीरो एफआईआर
जंतर-मंतर प्रदर्शन में एक नाबालिगों की भागीदारी को लेकर CJP संस्थापक अभिजीत दिपके के खिलाफ Zero FIR कराने का मामला उनके लिए बड़ी मुश्किल पैदा कर सकता है। शिकायत में POCSO Act, BNSS और BNS की विभिन्न धाराओं का उल्लेख है।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित प्रदर्शन के बाद कॉकरोच जनता पार्टी और उसके संस्थापक अभिजीत दिपके एक बड़ी मुश्किल में फंसते दिख रहे हैं। आमतौर पर दूसरों पर आरोप लगाने वाले अभिजीत दिपके के खिलाफ अधिवक्ता रिंकी चटर्जी की शिकायत पर Zero FIR दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि प्रदर्शन में एक नाबालिग की भागीदारी हुई, जिसके आधार पर POCSO Act और अन्य कानूनी प्रावधानों में कार्रवाई की मांग की गई है।
POCSO Zero FIR Against Abhijeet Dipke
Zero FIR क्या है और इस मामले में इसकी भूमिका क्यों अहम है?
Zero FIR ऐसी FIR होती है जिसे किसी भी पुलिस थाने में दर्ज किया जा सकता है, चाहे घटना उस थाने के अधिकार क्षेत्र में हुई हो या नहीं। इसका उद्देश्य संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर तत्काल कार्रवाई सुनिश्चित करना है। बाद में इसे संबंधित क्षेत्र के पुलिस थाने को स्थानांतरित किया जाता है। शिकायतकर्ता ने इसी व्यवस्था का उपयोग करते हुए मामला दर्ज कराया। इससे जांच शुरू करने में देरी नहीं होती। हालांकि Zero FIR दर्ज होना किसी व्यक्ति के दोषी होने का प्रमाण नहीं है। आगे की जांच और साक्ष्यों के आधार पर ही पुलिस निर्णय लेती है।
शिकायत में POCSO Act का उल्लेख क्यों किया गया?
गौरतलब है कि POCSO Act बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के लिए बनाया गया विशेष कानून है। और दिपके के खिलाफ की गई शिकायत का आधार प्रदर्शन में कथित रूप से एक नाबालिग की भागीदारी बताया गया है। शिकायत है कि कॉक्रोच जनता पार्टी के आंदोलन वाली जगह पर यौनांगो से जुड़ी अश्लील गालियों और भाषा का भरपूर प्रयोग हुआ। ऐसे में वहां नाबालिग या अल्प व्यस्क बच्चियों को कैसे आने दिया गया ? वहां उन्हें कौन लाया ? शिकायतकर्ता का दावा है कि इससे बाल संरक्षण संबंधी कानूनों का उल्लंघन हुआ। अभिजीत दिपके वहां आयोजक की भूमिका में थे। उनकी बड़ी भूमिका बनती है। वैसे यहां यह बताना सही होगा कि किसी मामले में POCSO Act की धाराएं लागू होंगी या नहीं, यह जांच के तथ्यों पर निर्भर करता है। केवल शिकायत में किसी कानून का उल्लेख हो जाने से उसका स्वतः लागू होना सिद्ध नहीं माना जाता।
अभिजीत दिपके का पक्ष क्या है?
इस बारे में टाईम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट कहती है कि अभिजीत दिपके ने सार्वजनिक रूप से इन मामलों को राजनीतिक प्रेरित कार्रवाई बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि विरोध प्रदर्शन करने वालों को चुनिंदा तरीके से निशाना बनाया जा रहा है। उनके अनुसार आंदोलन लोकतांत्रिक अधिकारों के दायरे में था। हालांकि उनके इन बयानों की स्वतंत्र पुष्टि न्यायिक स्तर पर नहीं हुई है। पुलिस ने मामले की जांच जारी रहने की बात कही है।
विरोध प्रदर्शन और बच्चों की भागीदारी पर कानून क्या कहता है?
भारत का संविधान शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है।
यदि किसी प्रदर्शन में बच्चों या नाबालिगों की सुरक्षा प्रभावित होने का आरोप लगे तो प्रशासन जांच कर सकता है।
प्रत्येक मामले के तथ्य अलग होते हैं। अदालतें भी परिस्थितियों के अनुसार निर्णय देती हैं।
प्रदर्शनों में नाबालिग की मौजूदगी अपने आप अपराध नहीं है; यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसके साथ क्या परिस्थितियां थीं और क्या लीगल फैक्टर मौजूद हैं।
इसलिए ऐसे मामलों में तथ्यात्मक जांच सबसे महत्वपूर्ण होती है।
क्या अभिजित दिपके की होगी गिरफ्तारी
ऐसे मामलों में जो POCSO से जुड़े हैं, सबसे पहले संबंधित पुलिस जांच शुरु करेगी और उपलब्ध साक्ष्यों का मूल्यांकन करेगी। जरूरत पड़ने पर संबंधित व्यक्तियों से पूछताछ की जा सकती है। मामला गंभीर होने पर या साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ या प्रभावित किए जाने की आशंका पर गंभीर मामलों में आरोपियों की गिरफ्तारी भी होती है। डिजिटल सामग्री, वीडियो और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान भी जांच का हिस्सा बन सकते हैं। अंतिम फैसला केवल अदालत ही दे सकती है। तब तक सभी आरोप जांच और न्यायिक परीक्षण के अधीन माने जाएंगे।

