डिलिस्टिंग से हो रहा वनवासियों में एकत्रीकरण, कनवर्टिड ईसाई बेचैन
जिस प्रकार SC वर्ग हिन्दू सिख या बौद्ध धर्म के आलावे किसी धर्म अन्य धर्म ईसाई या मुसलमान को अपना लेता है तो उसका आरक्षण स्वतः समाप्त हो जाता है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले भी बार बार साबित करते हैं धर्म बदलने पर आरक्षण स्वतः समाप्त हो जाता है।
यह अनुच्छेद 341 की शक्ति से जारी किए गए सविधांन (अनुसूचित जाति ) आदेश 1950 से तय होता है।
जब ऐसा नियम SC वर्ग को है तो ST को क्यों नहीं? SC वर्ग की तरह नियम न होने के कारण हमारे खड़िया मुण्डा उराँव संथाल 33 जनजातीय जन ईसाई बन रहे हैं ?
हमारा अपना जो आदि पुराना धरम करम था लोग उसको क्यों इतनी बड़ी संख्या में छोड़ चुके हैं यही चिन्ता का विषय है।
कनवर्जन से जन्म शादी मरण संस्कार बदल जाता है भाई भाई से माँ अपने औलाद से अलग हो जाता है।
इतिहास पर गौर करें तो मालूम होता है कि बिरसा मुंडा तेलंगा खड़िया पंखराज साहब बाबा कातिक उराँव कनवर्जन के कड़े विरोधी थे । फिर हमारे समाज के कुछ इच्छाधारी नेता कनवर्जन का समर्थन क्यों कर रहें हैं।
इसाईयत और इस्लाम मानने वाले क्या चाहतें हैं कि सारे 33 जनजातीय ईसाई और मुस्लमान हो जाएं। कई गांव में सरना में पूजा करने वाला पहान पुजार तक नहीं है। कितना दुःखद है?
मुस्लमान , ईसाई बनाते खूब देखा है लेकिन हमारे लोगों को कभी किसी मन्दिरों में हिन्दू बनाते नहीं देखा है।
जाति हमारा परमानेंट है पार्टी हमारा परमानेंट नहीं है?
जिस जाति से हम संबंधित हैं जिस जाति के नाते हमें ST आरक्षण मिला है,उसकी धर्म संस्कृति उसके अधिकार सुरक्षित रहेंगे तो हमारा अधिकार भी बचा रहेगा। नहीं तो शिक्षा में नौकरी में चुनाव में सिर्फ हमें कुछ पार्टी वाले सिर्फ झुनझुना दिखाएंगे।
यादि पार्टी की बात करें तो BJP अपना टिकट 99% मूल जनजाति को देती है। लेकिन कांग्रेस.जे.एम.एम अपनी ST सीट पर 15% मूल जनजाति को टिकट दे रही है और 75% सीट इसाई मानने वालों को । आज भी गुमला सिसई कोलेबिरा सिमडेगा माण्डर जैसे जगहों से किसी सरना आदिवासी को टिकट नहीं मिला।
आज बाबा कार्तिक उराँव को पूजने वाले लोग उनके उस अधूरे बिल अधूरे काम को पूरा करने की बात की जा रही है तो कुछ हमारे ही सांसद विधायक और नया नया नव सिखवा नेता नेताईन लोग इस आन्दोलन को सिर्फ RSS BJP का एंगल दे रहे हैं।
रामेश्वर गीता राजेश केरकेट्टा प्रेम क्या चाहते हैं कनवर्जन न रुके।
नेतागिरी के चक्कर में दो माँ बाप के औलाद मत बनो।
मैं धर्मान्तरण का घोर विरोधी हूँ जो हमें अपने सरना मसना
देवीगुड़ी देवीमंडप सरहूल करम से अलग करेगा मैं उसका हमेशा विरोधी रहूँगा ।
सोशल मीडिया बेचैनी का उदाहरण
डीलिस्टिंग: ईसाई कनवर्टिड अनुसूचित जनजाति के लोग क्या आरक्षण परिधि से बाहर हो जाएंगे?
ईसाई वनवासी समुदाय
भारत के कई राज्यों में अनुसूचित जनजातियों के कुछ लोग धर्म के आधार पर आरक्षण के मुद्दे को लेकर एक दूसरे के सामने खड़े हो गए हैं.
वनवासी या अनुसूचित जनजाति के लोग धार्मिक विश्वास के आधार पर तो बंटे हुए हैं ही लेकिन डीलिस्टिंग की मांग ने उनके बीच इस अविश्वास को और बढ़ा दिया है.
ये सवाल उठता है कि डीलिस्टिंग क्या है, यह कैसे वनवासी समुदायों को प्रभावित कर रहा है और क्या इसका कोई राजनीतिक पहलू है, इन बातों को समझने के लिए हमने कुछ वनवासी इलाक़ों का दौरा किया.
कुछ लोग मांग कर रहे हैं कि जिन वनवासियों ने ईसाई या अन्य पंथ स्वीकारा है उन्हें अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर किया जाए. इसे डीलिस्टिंग कहा जा रहा है. इस मांग से वनवासी समुदाय में दरार पैदा हो रही है.
इस डीलिस्टिंग बहस के पीछे तो असल विषय आरक्षण है लेकिन इसका एक धार्मिक पक्ष भी है. यानी धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण. पिछले कुछ सालों में इस बहस के साथ धर्म कनवर्जन और घर वापसी जैसे विषय भी जुड़ गए हैं.
धार्मिक पहचान
छत्तीसगढ़, झारखंड
हमने झारखंड और छत्तीसगढ़ के उन क्षेत्रों का भ्रमण किया जहां ये दरार साफ़-साफ़ दिखती है. कोई भी ये महसूस कर सकता है कि वनवासियों की सामूहिक पहचान पर हिंदू या ईसाई होने की धार्मिक पहचान हावी हो रही है जिससे उनके बीच धार्मिक ध्रुवीकरण हो रहा है और इसका असर राजनीति पर भी पड़ रहा है.
हमारी यात्रा झारखंड की राजधानी रांची से शुरू हुई. यहां भी कुछ सालों से डीलिस्टिंग के विरोध या पक्ष में कई आंदोलन हुए हैं. लेकिन जैसे-जैसे हम जंगल के अंदर बढ़ते हैं यह बहस और साफ़ दिखती है.
रांची से दो से तीन घंटे दूर, झारखंड और छत्तीसगढ़ की सीमा के पास गुमला तहसील में टोटो गांव की आबादी 100 है.
यहां घने जंगलों में पीढ़ियों से वनवासी समुदाय रहते हैं और सदियों से अपनी परंपरा और संस्कृति संजोए हुए हैं.
यहां रहने वाले महेंद्र पुरव कहते हैं, “यह हमें बांटने की साज़िश है. अगर ईसाई और सरना वनवासी अलग कर दिए जाएं तो हम अल्पसंख्यक हो जाएंगे. वे हम पर सरना सनातन का लेबल लगाने की कोशिश करते हैं. मैं हिंदू नहीं हूं, मैं वनवासी हूं. मैं प्रकृति पूजक हूं.”
डीलिस्टिंग की बहस?
इसी गांव के नारायण भगत कहते हैं, “जो हमारे समुदाय से अलग हो गए वे हमारे रीति रिवाजों की इज़्ज़त नहीं करते. अगर वे हमारी संस्कृति की इज़्ज़त नहीं करते, हम उनका साथ कैसे दे सकते हैं?”
यहां हर कोई वनवासी है लेकिन आजकल ‘स्थानीय’ और ‘बाहरी’ भेद किया जा रहा है. वे एक दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े हैं और डीलिस्लिंग का मुद्दा उनके मतभेद और बढ़ा रहा है.
वनवासी इलाक़ों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में डीलिस्टिंग का मुद्दा उनकी संस्कृति, सामाजिक पहचान और उनके आर्थिक-राजनैतिक अधिकारों से जुड़ा हुआ है.
संविधान के प्रावधानों के मुताबिक़ भारत में अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के लिए अलग सूची है. अनुच्छेद 341 एससी और अनुच्छेद 342 एसटी से संबंधित है जो विभिन्न जनजातियों और जातियों को सूचीबद्ध करता है. हर समूह के लिए चयन का मापदंड बनाया गया है.
उनकी सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं, जीवनशैली, रीति रिवाजों और प्रथाओं के आधार पर उन्हें विभिन्न राज्यों में वर्गीकृत और सूचीबद्ध किया गया है.
एसटी का आरक्षण कोटा 77.5 प्रतिशत है. पांचवीं अनुसूची के अनुसार, कुछ आदिवासी बहुल इलाक़ों को विशेष दर्जा (अनुसूचित क्षेत्र) दिया गया है और छठवीं अनुसूची में पूर्वोत्तर के आदिवासी बहुल राज्यों को विशेष दर्जा और अधिकार दिया गया है.
इन राज्यों में एसटी समुदाय के लोगों को राजनीतिक सीटें आरक्षित हैं.
हाल के सालों में उन वनवासी समुदायों में ये मांग उठी है कि जिन लोगों ने ईसाई या इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लिया उन्हें एसटी की सूची से बाहर किया जाए. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएस) से जुड़े वनवासी कल्याण आश्रम और नवजाति सुरक्षा मंच से डीलिस्टंग की ज़ोरदार वकालत की जाती रही है.
सांस्कृतिक, धार्मिक, भाषाई और रीति रिवाजों के मद्देनज़र आदिवासियों को कैसे शामिल किया जाए और उनका स्वतंत्र वजूद कैसे बनाए रखा जाए, यह अंग्रेज़ों के ज़माने से चला आ रहा मुद्दा है. भारत के संविधान में इन समुदायों को स्वतंत्र अधिकार दिए गए हैं.
लेकिन देश के विभिन्न इलाक़ों में रहने वाले आदिवासी समुदाय के अंदर सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता ने अलग-अलग व्याख्याओं को जन्म दिया है. जंगल पर निर्भरता की वजह से अधिकांश वनवासी प्रकृति पूजक के रूप में जाने जाते हैं.
विवाद का विषय
हिंदू धर्म अपनाने वाले वनवासी समुदाय के लोग
इसलिए वे आदि धर्म के अनुयायी कहे जाते हैं. इनमें कुछ ने सदियों तक अपने धर्म का पालन किया. भारत के पूर्वोत्तर से लेकर सुदूर दक्षिण तक हर आदिवासी समुदाय के अपने रीति रिवाज और पूजा पद्धतियां हैं. उदाहरण के लिए झारखंड में वनवासी सरना धर्म की बात करते हैं.
कई वनवासी समुदायों ने ख़ुद को हिंदू मानते हुए हिंदू परंपराओं को आत्मसात कर लिया. इसकी वजह से हिंदू राष्ट्रवादी संगठन उन्हें हिंदू मानते हैं.
छत्तीसगढ़ और झारखंड में ईसाई संगठन एक सदी से सक्रिय हैं और यहां कई लोग पीढ़ियों से ईसाईयत पालन कर रहे हैं. कनवर्जन भारत में विवाद का विषय रहा है और ख़ासकर हिंदू राष्ट्रवादी संगठन इसका विरोध करते रहे हैं.
1967 में पहली बार डीलिस्टिंग का मुद्दा तत्कालीन कांग्रेस नेता कार्तिक उरांव ने उठाया था. इस पर संसद में भी बहस हुई लेकिन फिर यह मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया.
डीलिस्टिंग की मांग का नया चेहरा ‘जनजाति सुरक्षा मंच’ है, जिसे ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ में 2006 में स्थापित किया गया था.
क्या जन्म से जाति, जन्म से धर्म या आरक्षण का सवाल है?
डीलिस्टिंग के पक्षधर वनवासियों को हिंदू मानते हैं. लेकिन इसके विरोधियों का तर्क है कि वनवासियों का अपना स्वतंत्र धर्म, स्वतंत्र रीति रिवाज है और वे अपनी पसंद के किसी भी धर्म या पूजा पद्धति मानने को आज़ाद हैं. इसलिए अगर वे इस आज़ादी का इस्तेमाल करते हैं तो इससे उनका आरक्षण का अधिकार प्रभावित नहीं होना चाहिए.
डीलिस्टिंग के विरोधियों का दूसरा तर्क है कि आरक्षण किसी जाति या समुदाय के आधार पर दिया गया है, यानी यह जन्म से है. धर्म के आधार पर यह कैसे बदल सकता है? क्योंकि हमारा संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं देता.
ये सच है कि डीलिस्टिंग की मांग कनवर्जन प्रेरित है.
लेकिन इन विषयों पर बात करते हमें लगा कि डीलिस्टिंग की मांग में धार्मिक पहलू होने के साथ-साथ आर्थिक मुद्दा भी जुड़ा है.
आरक्षण का लाभ
वनवासी ईसाई समुदाय अन्य के मुक़ाबले कहीं आगे हैं.
डीलिस्टिंग की मांग करने वालों का कहना है कि ‘उन्हें’ आरक्षण का लाभ मिलता है ‘हमें’ नहीं.
शैक्षणिक और आर्थिक असमानता को ईसाई वनवासी नेता और समुदाय के सदस्य भी मानते हैं. लेकिन उनका तर्क है कि इसका कारण शिक्षा है. आरक्षण पाने के लिए शिक्षित होना ज़रूरी है और ईसाई वनवासियों की कुछ पीढ़ियों को मिशनरी शिक्षण संस्थाओं से शिक्षा मिली. हालांकि ये शिक्षण संस्थाएं सभी के लिए हैं. उनका तर्क है, “हमारे आरक्षण के अधिकार पर उन्हें बेचौनी क्यों है?”
पढ़ाई-लिखाई और नौकरी-चाकरी में पिछड़ गए वनवासियों का लगता है कि इसका हल आरक्षण है और उनके अनुसार सबसे पहले ईसाई वनवासियों को आरक्षण के लाभ से वंचित किया जाए.
इसे डीलिस्टिंग से हासिल किया जा सकता है. इस तरह यह विषय समुदाय में फैल रहा है और उन्हें आपस में बांट रहा है.
कनवर्जन से एससी आरक्षण रद्द हो जाता है तो एसटी आरक्षण का क्या होगा?
जनजाति सुरक्षा मंच का कहना है कि ईसाई या इस्लाम स्वीकार करने वाले वनवासियों को दोहरा लाभ मिल रहा है.
आरएसएस से जुड़े वनवासी कल्याण आश्रम के नेशनल ज्वाइंट जनरल सेक्रेटरी रामेश्वर राम भगत कहते हैं, “वनवासियों को 10 प्रतिशत भी लाभ नहीं मिल रहा. लेकिन कनवर्टिड दोहरा फ़ायदा उठा रहे हैं. उन्हें एसटी और अल्पसंख्यक दोनों का फ़ायदा मिल रहा है.”
वो हमें संगठन के जशपुर मुख्यालय में मिले, जहां 1956 में इसकी स्थापना हुई थी.
ईसाई वनवासी सामुदायिक नेता इन आरोपों का खंडन करते हैं. जशपुर के कुंकुरी इलाक़े में स्थित चर्च एशिया के सबसे बड़े गिरिजघरों में से एक माना जाता है. यहां की अधिकांश आबादी ईसाई है. यहां डॉक्टर फूलचंद कुजूर एक बड़ा अस्पताल चलाते हैं.
वो कहते हैं, “अल्पसंख्यकों के लिए कोई सरकारी योजना या अलग आरक्षण नहीं है. केवल कुछ शिक्षण संस्थाओं में ही अलग से सुविधाएं हैं. लेकिन वहां सभी लोग पढ़ते हैं. ईसाई या मुस्लिम को वहां कोई अलग योजना नहीं है. दोहरे फ़ायदे का तर्क सिर्फ़ भ्रम पैदा करने को दिया जाता है. किसी को दोहरा फ़ायदा नहीं मिल रहा.”
धर्म के आधार पर भारत में आरक्षण नहीं दिया जाता लेकिन डीलिस्टिंग की मांग करने वाले संविधान में संशोधन की मांग करते हैं.
उनका तर्क है कि जब कनवर्जन बाद अनुसूचित जाति को आरक्षण नहीं मिलता तो यह वनवासी जनजातियों पर क्यों नहीं लागू होता.
जनजाति सुरक्षा मंच के क्षेत्रीय संयोजक इंदर भगत कहते हैं, “डॉक्टर आम्बेडकर ने संविधान के अनुच्छेद 341 में एक प्रावधान बनाया था. हिंदू, जैन, बौद्ध आदि को छोड़ अगर कोई विदेश में पैदा हुए धर्म को स्वीकारता है तो उसे एससी आरक्षण छोड़ना होगा. यह 1956 से लागू है. हमारी मांग बिल्कुल यही है.”
इंदर भगत कहते हैं, “वो व्यक्ति अपनी परम्पराओं, रीति रिवाजों और जन्म से मिली पहचान छोड़ता है जो वास्तव में उसे आरक्षण अधिकार देता है, कनवर्जन से उसकी जन्मना पहचान भी छूट जाती है. अगर वो ख़ुद ही अपनी पहचान छोड़ता है तो उसे आरक्षण क्यों मिलना चाहिए जोकि उसकी पुरानी पहचान के आधार पर मिलती है. हमारी मांग है कि एसटी के अनुच्छेद 342 में संशोधन होना चाहिए और इसका आधार है अनुच्छेद 341.”
हिंदू धर्म का हिस्सा
लेकिन डॉक्टर फूलचंद कुजूर कहते हैं, “यह सूची धर्म के बजाय जनजाति के आधार पर बनी है. भारत सरकार का नियम है कि वनवासी कोई भी धर्म अपना सकते हैं. यह सर्कुलर में भी है. जनजाति सुरक्षा मंच के लोग एससी आरक्षण का हवाला देते हैं लेकिन वो इसलिए है कि अनुसूचित जातियां हिंदू धर्म का हिस्सा हैं. जबकि वनवासी हिंदू नहीं हैं.”
छत्तीसगढ़ और झारखंड में एक तरफ़ जनजाति सुरक्षा मंच डीलिस्टिंग का आंदोलन चला रहा है तो दूसरी तरफ़ क्रिश्चियन ट्राइबल फ़ेडरेशन ने इसके ख़िलाफ़ सड़क पर उतरनेे का फ़ैसला किया है.
विरोधियों का कहना है कि अगर यह लागू हुआ तो इसकी ज़द में पूरा वनवासी समुदाय आएगा. पांचवीं अनुसूची में मिली रियायतें ख़तरे में पड़ जाएंगी और कुल वनवासी आबादी घटेगी तो वनवासी डी-शेड्यूल (ग़ैर-अधिसूचित) हो जाएंगे.
क्रिश्चियन ट्राइबल फ़ेडरेशन के प्रवक्ता डॉक्टर सीडी बखाला कहते हैं, “जल-जंगल-ज़मीन पर हमारे अधिकार हैं. अगर डीलिस्टिंग होती है तो हमें अपने ही जंगलों से बाहर कर दिया जएगा और हमारा वजूद ख़त्म हो जाएगा. इसीलिए हम विरोध कर रहे हैं. यह केवल ईसाइयों को ही नहीं बल्कि सभी वनवासियों और वनवासी इलाक़ों को प्रभावित करेगा.”
वो आगे कहते हैं, “अनुच्छेद 330 में हमें लोकसभा में प्रतिनिधित्व मिलता है, अनुच्छेद 332 में विधानसभा में. लेकिन अगर हमारा राज्य डी शेड्यूल हो जाता है तो सब कुछ छिन जाएगा. हम न तो गांव के मुखिया या सरपंच बन पाएंगे न विधायक न सांसद.”
अगर हमें बाहर किया जाएगा तो कहां जाएंगे?
मनीजर राम
हाल की पीढ़ियों में अच्छी ख़ासी संख्या में लोगों ने ईसाईयत अपनायी है. एक अनुमान के अनुसार जशपुर और इसके आसपास के इलाक़ों में 22 प्रतिशत आदिवासी आबादी ने ईसाईयत स्वीकारी है. डीलिस्टिंग की मांग से पैदा हुए ‘अंदरूनी’ और ‘बाहरी’ के बंटवारे से इन गांवों में तनाव बढ़ा है.
जशपुर ज़िले में सोगदा गांव में अधिकांश लोग हिंदू रीति रिवाज मानते हैं. विभाजन इतना बढ़ा कि जो लोग सदियों से जंगलों में साथ रहते आए हैं, अब अलग होने की बात करते हैं.
मनीजर राम कहते हैं, “हम प्रकृति पूजक हैं और मूर्ति पूजा भी करते हैं. जो ईसाईयत मानते हैं, वो उस तरीक़े से प्रार्थना नहीं करते हैं. तो हम एक साथ कैसे रह सकते हैं? उन्हें विदेशी धर्मों में फंसा लिया गया और वे ईसाई बन गए. इसीलिए वे हमसे अलग हैं.”
इस इलाक़े में मिलीजुली आबादी है. जनजातियां कई पीढ़ियों से जंगलों में रहती आई हैं और उनके बीच धर्म को लेकर कोई मुद्दा नहीं रहा. लेकिन गांव से अगर कोई धर्म के आधार पर डीलिस्टिंग का मुद्दा उठाता है तो इससे समस्या पैदा हो सकती है.
उसी गांव के सोहम राम कहते हैं, “हमें इसका दुख नहीं है. क्योंकि वे हमारी संस्कृति, हमारे धर्म से भटक गए. इसलिए हम किसी चीज़ से परेशान नहीं हैं. अगर वे लौटना चाहते हैं लौट सकते हैं, लेकिन जो भी गया वो लौटा नहीं.”
डीलिस्टिंग और धर्मांतरण
निवासी कुजूर
गांवों में ऐसी धारणा बहुत मज़बूत है. जशपुर से हम छत्तीसगढ़ जाते हैं. इस इलाक़े में अम्बिकापुर एक बड़ा केंद्र है, जहां ग्रामीण और शहरी इलाक़े हैं. यहां नया पाड़ा में केवल ईसाई रहते हैं.
निवासी कुजूर ने क़रीब दस सालों तक सरगुजा ज़िला पंचायत अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी निभाई है. पंचायती राज में आदिवासियों के लिए सीटें आरक्षित होने की वजह से वो इतने लंबे समय तक राजनीति में सक्रिय रहीं. उनके यहां हमारी मुलाक़ात कुछ ईसाई आदिवासी लोगों से हुई.
निवासी कुजूर ने कहा कि शहरों के मुक़ाबले ग्रामीण क्षेत्रों में डीलिस्टिंग और धर्मांतरण को लेकर भय का मौहाल है.
वो कहती हैं, “गांवों में ईसाई बनाम ग़ैर-ईसाई की बहस चल रही है. साफ़ कहें तो अगर आप आज़ाद हैं तो जो चाहें धर्म अपनाएं. हमारे संविधान ने अधिकार दिया है कि आप कोई धर्म अपनाएं. कोई भी दबाव नहीं डालता है.”
मुन्ना तापो इस बात से इनकार करते हैं कि धर्मांतरण करने वाले वनवासी अपनी वनवासी संस्कृति और परम्पराओं को छोड़ रहे हैं।
राजनीतिक ध्रुवीकरण और चुनावों पर इसका असर
आदिवासी
तापो के अनुसार, “हम जन्म से मृत्यु तक वनवासी समुदाय के रीति रिवाजों और प्रथाओं को पालन करते हैं. हम सिर्फ़ आशीर्वाद लेने के लिए चर्च जाते हैं. जो लोग हम पर परम्पराओं को छोड़ने के आरोप लगाते हैं, मैं उन्हें चुनौती देता हूं कि वो बताएं की कौन सी परम्परा का हम पालन नहीं करते. मैं आपको सब कुछ बता सकता हूं.”
अनंत प्रकाश एक सीधा सवाल पूछते हैं, “अगर हमें एसटी श्रेणी से बाहर कर देंगे तो कहां रखेंगे? किस लिस्ट में? किस कैटेगरी में? हमारे लिए कहां जगह है…बताएं. हमें इन सवालों पर सोचने की ज़रूरत है.”
डीलिस्टिंग विषय अब राजनीतिक भी होता जा रहा है, जिसका चुनावी राजनीति पर सीधा असर है. झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और यहां तक कि पूर्वोत्तर के राज्यों में जहां अच्छी ख़ासी आबादी ईसाई है, ये आंदोलन और विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं. उत्तर महाराष्ट्र के नासिक और नंदुरबार जैसी जगहों पर ऐसे ही विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं.
अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम, मेघालय और नगालैंड जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में ईसाईयत अपनाने वाली जनजातियों की संख्या अधिक है. इसीलिए डीलिस्टिंग का मुद्दा इन राज्यों में मुखर है और यहां जनजातीय समुदायों में ध्रुवीकरण भी अधिक है.
वनवासियों को आरक्षण मिलना एक संवैधानिक अधिकार है और इसमें बदलाव का मतलब संविधान संशोधन करना होगा. इसलिए इस बात को लेकर आशंका है कि ये सच में होगा या नहीं. लेकिन अगर ये होता है तो ये अनुमान लगा पाना मुश्किल है कि यह लंबी प्रक्रिया कब पूरी होगी और कब इसकी घोषणा होगी.
रायपुर के वरिष्ठ पत्रकार आलोक पुतुल कहते हैं, “जिन वनवासी समुदायों में लोगों ने ईसाईयत स्वीकारी और जिन्होंने नहीं किया और जो लोग हिंदू धर्म का पालन करते हैं, उनके बीच रोज़ाना संघर्ष बढ़ता जा रहा है.”
आलोक पुतुल आगे कहते हैं, “इसका चुनावों पर साफ़ असर दिखता है. पिछले दो-तीन सालों में बस्तर जैसे क्षेत्रों में कई संघर्ष हुए हैं. हिंसा की कई ख़बरें सामने आई हैं. इसका चुनाव पर निश्चित असर होगा. और ओडिशा, मध्य प्रदेश और झारखंड में भी इस मुद्दे का असर पड़ेगा और आपको चुनावी नतीजों में इसका असर दिखेगा.”
वोटों में विभाजन हो चुका है. छत्तीसगढ़ के हालिया चुनावी नतीजों में डीलिस्टिंग, धर्मांतरण और घर वापसी जैसे मुद्दों का अच्छा ख़ासा असर देखने को मिला था. और भाजपा के नेता भी इस तथ्य को स्वीकार करने से नहीं हिचकते.
धर्म में वापसी की वकालत
प्रबल प्रताप सिंह जूदेव
प्रबल प्रताप सिंह जूदेव पूर्व जशपुर रियासत के शाही परिवार के वंशज हैं. उनके पिता दिलीप सिंह जूदेव भाजपा सांसद थे. वो कैबिनेट मंत्री भी रहे थे. प्रबल प्रताप सिंह भी भाजपा में हैं और उन्होंने हालिया चुनाव भी लड़ा है.
हालाँकि, यह पूर्व शाही परिवार, पहले पिता और अब पुत्र, घर वापसी से संबंधित कार्यक्रमों से जुड़े हुए हैं, यानी वे ईसाई वनवासियों की हिंदू धर्म में वापसी की वकालत करते हैं. इन हिंदू राष्ट्रवादी कार्यक्रमों को लेकर लगातार विवाद होता रहता है.
प्रबल साफ़ कहते हैं कि चाहे घर वापसी की बात हो या डीलिस्टिंग की, इससे चुनाव में भाजपा को फ़ायदा हुआ है.
प्रबल प्रताप ने बताया, “चुनावी नतीजे साफ़ दिखाई दे रहे हैं. वनवासी समुदायों ने भाजपा को महत्वपूर्ण समर्थन दिया है. उनका मानना है कि उनके पूर्वज हिंदू थे. उनके पूजा के तौर तरीक़े, उनकी संस्कृति, उनके रिश्ते, राष्ट्रवादी विचारधाराओं से उनका संबंध- ये सभी जुड़े हुए हैं और वे जनजातीय मुद्दों का समर्थन करते हैं. आपने देखा होगा कि सरभुज और बस्तर जैसे इलाक़े जहां जनादेश महत्त्वपूर्ण है. बिना इन इलाक़ों के समर्थन के कोई भी पार्टी सरकार नहीं बना सकती. इन दोनों जगहों पर भाजपा ने बहुत कुछ हासिल किया. ”
आदिवासी
भाजपा स्पष्ट रूप से राजनीतिक फ़ायदे पर अपना ध्यान केंद्रित किए हुए है. इसलिए उन्होंने ‘जनजाति सुरक्षा मंच’ के संयोजक भोजराज नाग को लोकसभा चुनाव के लिए बस्तर के कांकेर से अपना उम्मीदवार बनाया है.
इस बारे में कांग्रेस का आधिकारिक पक्ष अभी घोषित नहीं है, लेकिन उसके नेताओं का कहना है कि बीजेपी दोहरी बातें कर रही है और ध्रुवीकरण की साज़िश रच रही है.
कांग्रेस नेता शैलेश नितिन त्रिवेदी के अनुसार, “नागालैंड और मिज़ोरम ऐसे राज्य हैं जहां ईसाई धर्म व्यापक रूप से माना जाता है. आज़ादी के पहले से ही. यहां तक कि बीजेपी समर्थक और कार्यकर्ता भी वहां ईसाई हैं. इसलिए, बीजेपी एकतरफ़ा नज़रिये की वकालत कर रही है. विभिन्न राज्यों में आदिवासी समुदायों में दरार डालकर वे राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रही है.”
राजनीति एक तरफ़ कर दें तो भी भारत के आदिवासियों को दो हिस्सों में बांटने वाले एक ऐतिहासिक मुद्दे के कारण उनमें गहरी दरार पैदा हो गई है.
परंपरा, संस्कृति, धर्म और विरासत के नाम पर भारत के आदिवासी दो ख़ेमों में बंट गए हैं.
सरना समाज को “डीलिस्टिंग” से क्या फायदे हैं ?
१. ग्राम प्रधान ,पाहन ,महतो ,पड़हा राजा ,इत्यादि, सिर्फ सरना आदिवासी बनेंगे । आज अनुमानित 30-40 % पारंपरिक पद पर धर्मांतरित आदिवासी हैं
२. उपरोक्त होने से ग्राम प्रधान , पाहन , महतो , पाइनभरा , इत्यादि , पदों का सामाजिक और धार्मिक जिम्मेदारी – दोनों का पालन होगा । इससे सरना परंपरा मजबूत होगा
३. गाँव में सरना आदिवासी को ‘पेसा कानून’ का ताक़त मिलने से आदिवासी को जल-जंगल-ज़मीन पर अधिकार मिलेगा
४. जल-जंगल-ज़मीन पर ताक़त मिलने से आय बढ़ेगा , रोज़गार मिलेगा तथा ज़मीन लूट पर भी नियंत्रण होगा
५. कनवर्टिड वनवासी डीलिस्ट होंगे तो ईसाई पाहन के क़ब्ज़े में पहनाई ज़मीन अपने आप गाँव को वापिस मिलेगी
६. ‘आरक्षण’ का लाभ केवल सरना वनवासी को मिलने लगेगा । युवा सरना वनवासी को नौकरी मिलेगा । अभी अनुमानित 90 % आरक्षण का लाभ धर्मांतरित वनवासी पा रहा है
७. जो बेटी गैर-सरना बाहरी से शादी करेगी उसका भी डीलिस्टिंग हो जाएगा
८. ⭐️डीलिस्टिंग से वनवासी संख्या बढ़ेगा क्यूंकि उसके बाद तेजी से घर वापिसी होगा
👉🏽👉🏽 इससे साबित होता है कि डीलिस्टिंग से सरना परम्परा और सरना समाज मजबूत होगा क्यूंकि –
-⭐️धर्म बचेगा
⭐️पैसा, कानून की ताक़त मिलेगी
⭐️जल-जंगल-ज़मीन पर अधिकार मिलेगा
⭐️अधिकार बढ़ने से गाँव में रोज़गार बढ़ेगा , पलायन रुकेगा
⭐️ज़मीन लूट नियंत्रण होगा
⭐️बेटी बचेगी – क्यूंकि उसको बाहरी से शादी करने से डिलिस्ट होने का खतरा रहेगा
⭐️आरक्षण से नौकरी मिलेगा – अभी धर्मांतरित वनवासी ही नौकरी का फायदा ले रहे हैं
⭐️सरना का जन संख्या बढ़ेगा – क्यूंकि घर वापिसी बढ़ेगी
👉🏽👉🏽 इसीलिए जो सरना वनवासी अपना समाज और धर्म से प्यार करता है – वह मजबूती से डिलिस्टिंग का समर्थन करें :-
विदेशी ईसाईयत का ज़हर बस सनातन को ही शिकार करता हैं , उसी में सबसे आसान शिकार हैं वनवासी हिंदू।
क्योंकि ये ज़हर हम पे बहुत अच्छा असर करता हैं
मुसलमान या कोई और धर्म पर नहीं।
क्यों ??
क्योंकि दूसरे धर्म वाले लोग अपने धर्म को अच्छे से निभाते हैं
और हम दूसरों के धर्म में घुस जाते हैं।
विदेशी धर्म का ज़हर किसी राजनीति पार्टी से काम नहीं है ।
राजनीति में लोग अपना वोटर बढ़ाते हैं और
विदेशी धर्म वाले – लोगों को धर्मांतरित करा के जनसंख्या ।
और एक बात
वनवासियों को ईसाइयों ने शिक्षा दिया है कहने वाली Jyotsana Kerketta बताए कि वनवासियों का
कनवर्जन कौन कराया और क्यों ??
वनवासियों को शिक्षा ही देना था तो बिना convert कराए देते तो हम भी उनको अच्छा और नेक दिल वाले लोग मानते ।
Convert कराना ज़रूरी था क्या
बिना convert हुवे हम शिक्षा ग्रहण नहीं कर सकते थे क्या?
हो तो सब कुछ सकता था
लेकिन “Christian Community
वाले लोग किसी का अच्छा करने से ज़्यादा ध्यान
धर्म परिवर्तन कराने में दिया ।
और ऐसा ध्यान दिया कि
आज हालात ऐसे हो गया है वनवासी
धर्मांतरित वनवासी से लड़ रहा हैं ।
और हिन्दू Christian बने हिंदू से लड़ रहा हैं।
लोग तो सब अपने हैं
लेकिन हमारे में से ही कुछ लोग विदेशी धर्मों का ज़हर पी लिये हैं
और यही ज़हर आगे बढ़ाते जा रहे हैं
यानी कि convert हुवे लोग आज
दूसरों को convert कराते जा रहे हैं।
शुरू शुरू में लोग यही काम करने के लिए विदेशों से आते थे
लेकिन अब वो वही से बैठ के अपना सारा घटिया चाल चल रहे हैं ।
मुझे गर्व होता हैं हमारे झारखण्ड की बेटी बेटा
Nesha Oraon , Nisha Kumari Bhagat , Pradip Toppo , Soma Oraon, सन्नी टोप्पो उरांव इनके जैसे सैकड़ों
भाईयों बहनों पर।
जो अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहे हैं और कामयाब भी हो रहे हैं
🙏जय जोहार 🙏 🙏 जय झारखण्ड 🙏 जय सरना 🙏
🙏 जय श्री राम 🙏
✍️ Rajan Kumar Bjp
अध्यक्ष B.R.L.G. GROUP RANCHI JHARKHAND
#Hemant Soren
#Jharkhand Mukti Morcha
#Narendra Modi
#Aditya Sahu
#BJP Jharkhand
Bharatiya Janata Party (BJP)
Rahul Gandhi
Indian National Congress
मने चर्च हम लोग को बुड़बक बनाता है ।
लोग बनता भी है , सरना धर्म?
जरा बताओ तो कौन सा धर्म है ?
सरना एक पुजा स्थल है !
तो गर पुजा स्थल के नाम पर धर्म का नाम दिया गया तो ।
***जाहेर स्थान,जाहेर धर्म।
***मंडा पूजा स्थल,मने मंडा धर्म।
***मांरग बूरू,एक पुजा स्थल है,तो मांरग धर्म।
असल में हिन्दू सनातनी पढ़ता लिखता है नहीं।
चर्च पैसा दे दे कर हिन्दू सनातन धर्म के लोगों को झुठ फैलाने के लिए नौकरी पर रखा है।
रहा सवाल वनवासी हिंदू नहीं है अरे थोड़ा इतिहास पढ़ो वनवासी तो शुद्ध हिंदू है।
सरना और सनातन में गर तुलना करो तो सरना वाले तो विशुद्ध रूप से शुद्ध सनातनी है ।
पृथ्वी और सुर्य के मेल के दिन , 100%
सनातनी वनवासी,नया वर्ष मनाते हैं।। सरहुल।। वर्ष प्रतिपदा।
( हां इसी दिन चर्च वाले कनवर्टिड भी इसी आयोजन में हेल कर गंध मचाते हैं) वो पूजा पाठ में नहीं शामिल होते, नाचने जरूर पहुंच जाते हैं।
90% हिन्दू,31 दिसंबर को ।
30% सनातनी हिन्दू वर्ष प्रतिपदा।
सिंह बोंगा, सुर्य की पूजा।
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