मत:डॉ. मनमोहन सिंह तिगडमी और भ्रष्ट कि सरल,ईमानदार
तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने भारतीय सैनिको की आत्महत्या पर संसद में बयान दिया था कि ” ऐसे छोटे मोटे हादसों का जिक्र संसद में ना किया करे ”.
मनमोहन के उस बयान के बाद मेरे मन में सबाल उठा कि आखिर देश के प्रधानमंत्री के पद पर बैठा इंसान अपने देश की सेनाओं के बारे में इतना संवेदनहीन कैसे हो सक्ता है … इसके बाद ये विचार आया कि इंसान संवेदनशील और खुश किसके प्रति होता है … फिर ध्यान गया कि इंसान कौन -कौन सी गुलामी का शिकार हो सकता है .. तब विचार आया कि गुलामी दो प्रकार की होती है ..एक . मानसिक गुलामी …दूसरी अहसानो में दब कर की जाने बाली गुलामी …..!!!
घटनाक्रम है इंदिरा गांधी के देश में लगाए गए आपातकाल (Emergency ) का ..उस समय भारत की रिजर्व बैक का पदेन निदेशक था डॉक्टर मनमोहन सिंह नाम का एक नौकरशाह ……..बर्ष 1977 जनता पार्टी की मोरारजी देसाई सरकार में एच ऍम पटेल देश के वित्तमंत्री थे और डाक्टर इन्द्रप्रसाद गोवर्धन भाई पटेल रिजर्ब बैंक आफ इण्डिया के गवर्नर …. उसी समय बैक आफ क्रेडिट एंड कामर्स इंटरनेशनल जिसका अध्यक्ष एक पाकिस्तानी था .. ने भारत में अपनी व्यावसायिक शाखा खोलने के लिये आवेदन दिया ….
जब रिजर्व बैक आफ इण्डिया ने उसके आवेदन की जांच की तो पता चला कि ये पाकिस्तानी बैंक काले धन को विदेशी बैंको में भेजता है जिसे मनी लांड्रिंग कहते है इसलिए इसको अनुमति नहीं दी गयी ………..
इस वीच रिजर्व बैक के गवर्नर आई जी पटेल को प्रलोभन मिला कि अगर वे इस बैंक को अनुमति देने में सहयोग करते है तो उनके ससुर और प्रख्यात अर्थशास्त्री ए.के.दासगुप्ता के सम्मान में एक अंतराष्ट्रीय स्तर की संस्था खोली जायेगी ..पर ईमानदार गवर्नर उस प्रलोभन में नहीं फंसे …इस वीच आई जी पटेल की सेवानिवृत्ति का समय पास आ चुका था। अंतिम दिनों में उनको पाकिस्तानी बैंक BCCI के मुम्बई प्रतिनिधि कार्यालय से एक फोन आया जिसमें उनसे निवेदन किया गया कि वे BCCI के अध्यक्ष आगा हसन अबेदी से एक बार मुलाक़ात कर ले … RBI के गवर्नर ने इसकी अनुमति दे दी लेकिन मुलाक़ात से एक दिन पहले उनके पास फोन आया कि अब मुलाक़ात की कोई जरुरत नहीं है क्योंकि जो काम मुंबई में होना था अब दो दिल्ली में हो चुका है .. साथ ही उनको बताया गया कि वे जल्दी ही सेवानिवृत्त होने बाले है …..!
समय 23-06-1980 के बाद का
इंदिरा गाँधी के पुत्र संजीव गाँधी उर्फ संजय गांधी की मृत्यु से खाली हुए शक्ति केंद्र पर राजीव गाँधी की पत्नी का कब्ज़ा … उस समूह में शामिल थे बी. के नेहरु जिन्हें पाकिस्तानी बैंक BCCI ने पहले से ही सम्मानित कर रक्खा था ………….!!
काल खंड 15-09-1982... भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर आई जी पटेल सेवानिवृत ..एक दिन बाद डॉक्टर मनमोहन सिंह भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर बने …..
काल खंड 14-01-1980 इंदिरा गाँधी फिर से देश की प्रधानमंत्री बनी । केंद्रीय सत्ता के अज्ञात और अनाम समूह ने पाकिस्तानी बैंक BCCI के अध्यक्ष आगा हसन अबेदी को विश्वास दिलाया कि डाक्टर मनमोहन सिंह ही भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर बनेंगें। शायद इसीलिये अध्यक्ष आगा हसन अबेदी ने आई जी पटेल से मुम्बई में अपनी मुलाक़ात केंसिल की थी ….!
कालखंड सन 1983 …..भारतीय गुप्तचर एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस बिंग के विरोध के बावजूद पाकिस्तानी बैंक BCCI को मुम्बई में पूर्ण व्यावसायिक शाखा खोलने की अनुमति मिली जिसका मुख्यालय लंदन में था………….!
पाकिस्तानी मूल के नागरिक आगा हसन अबेदी की भारत के वित्त मंत्रालय में घुसपैठ का अंदाज इस बात से लगाए कि उसको पहले ही सूचना मिल गयी थी कि मनमोहन ही भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर होगे … इस वीच डाक्टर मनमोहन सिंह की बेटी की बिदेश में पढ़ाई के लिये छात्रवृत्ति की व्यवस्था ………!
15-09-1982 मनमोहन सिंह भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर बने ..इस पद पर उनको तीन साल का कार्यकाल पूरा करना था लेकिन इस बीच बोफोर्स कांड सामने आया और डाक्टर मनमोहन सिंह ने अज्ञात कारणों से समय से पहले रिजर्व बैंक के गवर्नर का पद छोड़ अपनी पोस्टिंग योजना आयोग में करवाई …!
काल खंड बोफोर्स दलाली कांड के खुलासे के बाद का …. लोकसभा चुनाव के बाद वी.पी. सिंह देश के प्रधानमंत्री बने .. लेकिन इससे पहले ही डाक्टर मनमोहन सिंह नाम के नौकरशाह ने भारत छोड़ जिनेवा की राह पकड़ी और सेक्रेटरी जनरल एंड कमिश्नर साऊथ कमीशन जिनेवा में पद ग्रहण किया …………!
काल खंड 10-11-1990.……. कांग्रेस के समर्थन/ बैशाखियों से चंद्रशेखर भारत के प्रधानमंत्री बने … इसी दौर में फिर से डॉक्टर मनमोहन सिंह ने जिनेवा की नौकरी छोड़ भारत की ओर रुख किया और राजीव गाँधी के समर्थन से बनी चंद्रशेखर सरकार में प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार का पद ग्रहण किया .इसी वीच देश में भुगतान संकट की स्थिति पैदा हुई और डाक्टर मनमोहन की सलाह पर भारत का कई टन सोना इंग्लैण्ड की बैंको में गिरवी रखना पड़ा .. जिसकी बदनामी आई प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के हिस्से में ………..!
कालखण्ड नरसिंह राव के प्रधानमंत्री बनने के समय का …………..कांग्रेस की अल्पमत सरकार ने झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के पांच सदस्यों सहित कई सांसदों को खरीद कर अपनी सरकार बचाई .. सरकार बचाने के इस रिश्वती खेल को नाम मिला ‘’झारखण्ड मुक्ति मोर्चा रिश्बत कांड’’ जिसका केस भारत की अदालत में भी चला और कुछ सांसदों को जेल जाना पड़ा ………..इसी सरकार में डाक्टर मनमोहन सिंह नाम का नौकरशाह भारत का बित्त मंत्री बना….!
बाद के घटनाक्रम में कभी देश के वित्त मंत्री रहे प्रणव मुखर्जी के सचिब के रूप में प्रणब मुखर्जी के आधीन काम करने बाले इस नौकरशाह की ताकत और तिकडमो का अंदाज तो लगाईये कि उन्ही प्रणब मुखर्जी को इस नौकरशाह को प्रधानमंत्री के नीचे वित्त मंत्री के रूप में काम करना पड़ा ……… इनके खाते में शेयर बाजार का सबसे बड़ा घोटाला भी दर्ज है जिसे हर्षद मेहता कांड के नाम से जाना जाता है जिसमे देश की जनता को खरबों रुपये का चूना लगा था उस समय डॉक्टर मनमोहन सिंह देश के वित्त मंत्री हुआ करते थे … बाद के समय 2009 में इनकी सरकार बचाने के लिये एक बार फिर एक कांड हुआ जिसे देश .. कैश फार वोट ‘.. नाम के घोटाले के रूप में जनता है ….. इन सब बातो के बाबजूद अगर देश के ज्यादातर नेता समाजसेवी .. बुद्धिजीवी और अन्ना जैसे अनशनकारी इनको व्यक्तिगत रूप से ईमानदार होने का सार्टिफिकेट देते है और भारत का मीडिया भी इनको मिस्टर क्लीन की उपाधि देता है … तो इसे भारत का दुर्भाग्य कहा जाए या बिडंबना इसका निर्णय आप स्वयं करे ……!
मनमोहन सिंह ने क्या गलतियां कीं?
वे कौन सी बातें हैं जो मनमोहन सिंह ने गलत कीं लेकिन नरेन्द्र मोदी ने सही कीं?
मंत्रिमंडल में प्रधानमंत्री बराबरी के लोगों में प्रथम होता है। अटल बिहारी वाजपेयी के आने तक भारत में भी यही स्थिति थी।
लोगों को यह समझना होगा कि प्रधानमंत्री का पद एक राजनीतिक पद है। प्रधानमंत्री इसलिए होते हैं क्योंकि उनके पास एक निश्चित मात्रा में राजनीतिक पूंजी होती है।
उस समय तक हर प्रधानमंत्री के पास यह थी, सिवाय शायद इंद्र कुमार गुजराल के, लेकिन वे भी कमोबेश शीर्ष पर बने रहने में कामयाब रहे।
मनमोहन सिंह पहले ऐसे व्यक्ति थे जिनके पास कोई राजनीतिक पूंजी नहीं थी। वे सरकारी सेवा से रिटायर होने वाले थे, और शायद रिटायरमेंट के बाद शैक्षणिक करियर की ओर बढ़ रहे थे, इससे पहले कि 1991 में नरसिम्हा राव ने उन्हें वित्त मंत्रालय का प्रमुख चुना। विपक्ष ने उन्हें निराशा की ओर धकेल दिया। वास्तव में उन्हें उन 5 वर्षों में जीवित रहने में मदद करने के लिए एबी वाजपेयी और पीवी नरसिम्हा राव जैसे दो बुद्धिमान लोगों की आवश्यकता थी। कांग्रेस ने उन्हें लोकसभा चुनाव के लिए खड़ा किया, जहां वे हार गए।
मनमोहन सिंह असम से राज्यसभा सांसद थे। राज्यसभा की सदस्यता के लिए एक शर्त राज्य में आवासीय पता होना है (मुझे नहीं पता कि इसमें बदलाव किया गया है या नहीं)। मनमोहन सिंह का पता “सी/ओ हेमप्रवा सैकिया” था, जो असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री की पत्नी थीं। हालांकि, विपक्षी सदस्यों ने इसे ज्यादा मुद्दा नहीं बनाया।
वह कांग्रेस में थे, एक अच्छे शांत सदस्य, जिन्होंने पार्टी में किसी भी तरह की खलबली नहीं मचाई और अंदर ही अंदर दुश्मनी नहीं फैलाई। फिर 2004 हुआ, कांग्रेस अध्यक्ष ने अपनी “अंतरात्मा की आवाज” के बारे में बात की, और यह मृदुभाषी सरदार प्रधानमंत्री बन गया। वह अपनी स्थिति के लिए पूरी तरह से पार्टी हाईकमान के ऋणी थे, उनके पास कोई राजनीतिक पूंजी नहीं थी, इसलिए वह पृष्ठभूमि से ड्राइविंग के लिए खुले थे।
2004 के यूपीए मंत्रिमंडल की एक विशेषता यह थी कि इसमें कांग्रेस के मंत्री पराजित राजनेता या बिना जनाधार वाले लोग थे। शिवराज पाटिल हार गए, उन्हें गृह मंत्री और राज्यसभा सदस्य बनाया गया। वे अच्छे कपड़े पहनते थे, लेकिन देश के दूसरे सबसे महत्वपूर्ण पद पर रहने के बावजूद वे बेहद अयोग्य निकले। उन्होंने खुले तौर पर कहा कि “मैं प्रधानमंत्री से ज्यादा पार्टी हाईकमान के प्रति जवाबदेह हूं”। दूसरे थे पीएम सईद । लोकसभा में हारने के बावजूद उन्हें मंत्री बनाया गया। एक और थे अर्जुन सिंह । वे लगातार चार चुनाव हार गए थे, लेकिन वफादारी और पूर्व में दी गई सेवाओं के कारण उन्हें मंत्री बनाया गया। फिर पी चिदंबरम थे। प्रतिभाशाली, स्पष्टवक्ता, लेकिन राजनीतिक रूप से हल्के , जिन्हें शिवगंगा में अपनी सीट जीतने के लिए डीएमके या एआईएडीएमके के समर्थन की जरूरत थी, बावजूद इसके कि वे इसी धरती के पुत्र थे। मैं यहां यह कहना चाह रहा हूं कि इनमें से किसी भी व्यक्ति का कोई राजनीतिक कद नहीं था।
इसके विपरीत, गठबंधन दलों के मंत्री ऐसे लोग थे जो राजनीति के उतार-चढ़ाव से गुजरे थे, ज़मीनी स्तर पर उनकी पकड़ थी और उनके पास राजनीतिक पूंजी थी, भले ही एक छोटे से क्षेत्र में, लेकिन उनके पास थी। ये वे लोग थे जो मतदाताओं के कारण अपनी स्थिति के लिए ऋणी थे, जिन्होंने जीत और हार का सामना किया था और जो लगातार उन लोगों के साथ जुड़े हुए थे जिन्होंने उन्हें चुना था।
इसलिए हमारे सामने एक बहुत ही असामान्य स्थिति थी। सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के पास शक्तिशाली विभागों के बावजूद कैबिनेट में सबसे कमज़ोर सदस्य थे। गठबंधन के सदस्य के पास काफ़ी मज़बूत सदस्य थे। कोर कमज़ोर था। इसका मूल रूप से मतलब था कि कैबिनेट का कोई सदस्य प्रधानमंत्री को अपने काम से मतलब रखने के लिए कह सकता था, जैसा कि ए राजा ने किया था।
जब 2जी घोटाला सामने आया, तो प्रधानमंत्री पूरी तरह से अप्रस्तुत और असहाय नजर आए। वे लगातार हो रहे हमलों का सामना करने में असमर्थ थे, और 2012 में एक वेबसाइट को दिए गए साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि वे व्यक्तिगत रूप से बेदाग हैं। बात यह है कि विपक्ष में किसी को भी उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर संदेह नहीं था। उन्होंने ऐसा आभास दिया कि वे किसी दबाव में आ गए हैं। अपने दूसरे कार्यकाल के मध्य तक वे एक लंगड़े की तरह हो गए थे।
जब प्रस्तावित अध्यादेश को उत्तराधिकारी ने फाड़ दिया तो उन्हें अपनी गलती सुधारने का मौका मिला। यह राजनीतिक रूप से असुविधाजनक हो सकता है, लेकिन मुद्दा यह है कि यह कैबिनेट का फैसला था और किसी को भी इसका इतनी बेशर्मी से अपमान करने का अधिकार नहीं था। अगर मनमोहन सिंह ने विरोध में इस्तीफा दे दिया होता या उत्तराधिकारी के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई होती, तो वे सार्वजनिक रूप से सम्मान में बढ़ जाते। उन्होंने सार्वजनिक रूप से चुप रहना ही बेहतर समझा।
इसलिए 2014 आते-आते प्रधानमंत्री पद की प्रतिष्ठा में भारी गिरावट आ चुकी थी, जो किसी भी सरकार के लिए खतरनाक है। मनमोहन सिंह को व्यापक रूप से ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा गया, जिसने देश के सर्वोच्च राजनीतिक पद की गरिमा और प्रतिष्ठा को कम करने में बड़ी भूमिका निभाई थी।
हालांकि, यह पूरी तरह से बुरा नहीं था। महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए, जैसा कि किसी भी सरकार में होता है। मनमोहन सिंह का सबसे बेहतरीन समय भारत-अमेरिका परमाणु समझौते का बचाव करना था।
यह एक लंबी पोस्ट है, इसलिए मैं मोदी वाला भाग छोटा रखूंगा।
नरेंद्र मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री पद की छवि को सुधारने के लिए बहुत कुछ किया है। वे बराबरी वालों में सबसे आगे हैं, शायद दूसरों से ज़्यादा बराबरी वाले, लेकिन कैबिनेट सिस्टम ऐसा ही होना चाहिए। केंद्र मजबूत होना चाहिए, पकड़ में आना चाहिए।
शर्म अल शेख में मनमोहन सिंह द्वारा की गई बड़ी भूल क्या थी?
क्या मनमोहन सिंह भारत के अब तक के सबसे खराब प्रधानमंत्री हैं?
आपके दृष्टिकोण से पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने कार्यकाल के दौरान कौन सी सबसे बड़ी गलतियां कीं? वे क्या हैं और उन्होंने ये गलतियां क्यों कीं?
क्या मनमोहन सिंह एक कमजोर प्रधानमंत्री थे?
भारत के प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल के दौरान आप सबसे महत्वपूर्ण घटना क्या मानते हैं?
मनमोहन सिंह विद्वान हैं और उन्होंने नरसिम्हा राव के कार्यकाल में भी इसी तरह का प्रदर्शन किया था, जिससे भारत आर्थिक रूप से बहुत बड़ा देश बन गया। लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल सभी पहलुओं से बेहद निराशाजनक और अभावग्रस्त रहा है।
अपने मंत्रालय को नियंत्रित करने के बजाय, उन्हें अपने मंत्रियों द्वारा नियंत्रित किया जा रहा है, जो पहले कांग्रेस अध्यक्ष को रिपोर्ट करते थे, न कि उन्हें। उन्होंने अपने मंत्रालय पर अपना अधिकार नहीं जमाया।
जब एक सांसद (राहुल गांधी) ने कैबिनेट द्वारा पारित अध्यादेश को फाड़ दिया, तो उन्होंने अपमान को निगल लिया और परिणामस्वरूप अपनी कुर्सी के प्रति जनता का सम्मान खो दिया। उन्हें अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए था।
जब इतने सारे घोटाले
AS WE ALREADY KNOW , “TO NOT GET CRITICISED ONE MUST NOT DO ANYTHING.”
………..To do blunders at least he needed to move , needed to work , needed to act , which he did not do .
SO NO WORK NO BLUNDER , NO ACTION NO BLUNDER.
CONCLUSION : no blunders created by him , since he did not even existed in Indian politics.
As a Tamilian, I will say not a simple mistake, but a colossal genocide of Tamilian origin people has been done by the Manmohan Government in connivance with our own DMK Tamilian CM. Manmohan Singh Government was sitting pretty with the crucial support of the DMK. When the Sri Lankan ethenic war was going on and helpless Tamilian people were fighting a loosing battle and dying every day at the hands of Sri Lankan forces, Manmohan and our Tamilian CM could have invaded the north Sri Lanka which is ethnically the Tamil region and given it to Tamils. It would have taken just over a few hours .

