गैर-नागरिक मतदाता कैसे, सुको बिहार मतदाता सूची स्पेशल इंटेंसिव रिविजन टाइमिंग पर सजग,आयोग से जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में मतदाता सूचियों का स्पेशल इंटेंसिव रिविजन कराने की टाइमिंग पर सवाल उठाया है.
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बिहार विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के तहत 66.16 फीसदी गणना फॉर्म इकट्ठे हो गए हैं, जबकि फॉर्म जमा करने की अंतिम समय सीमा में 15 दिन और बची है.
बिहार वोटर लिस्ट रिवीजन मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान आधार कार्ड और निर्वाचन कार्ड को वोटर पहचान के लिए निर्धारित 11 दस्तावेजों में शामिल ना किए जाने का मुद्दा उठा. हालांकि, निर्वाचन आयोग की पैरवी करते हुए सीनियर एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने साफ किया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक आधार कार्ड सिर्फ पहचान पत्र है यानी व्यक्ति की तस्दीक करता है लेकिन उसके योग्य वोटर होने की गारंटी नहीं देता.
निर्वाचन आयोग से जुड़े टॉप सूत्रों के मुताबिक, आधार नंबर डालने का प्रावधान तो विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR अधिसूचना के पेज 16 में है. आयोग के मुताबिक, ये अधिसूचना 19 पेज की है. आखिरी तीन पेज ही आम वोटरों के लिए जरूरी फॉर्म वाले हैं. 16 नंबर पेज से फॉर्म शुरू होता है, उसमें सबसे ऊपर बाईं तरफ नाम पता और EPIC यानी इलेक्शन फोटो आइडेंटिफिकेशन कार्ड नंबर भरना होता है. उसके नीचे फोटो लगानी होती है, उससे ठीक नीचे के कॉलम में जन्मतिथि, आधार नंबर और मोबाइल नंबर भरने होते हैं.
‘सवाल और विवाद बेमानी…’
चुनाव आयोग का कहना है कि जब मतदाता ये जानकारी देगा तो जाहिर है, आयोग की टीम उसकी भी तस्दीक समुचित प्रमाण के साथ करेगी ही. ऐसे में ये सवाल और विवाद ही बेमानी है कि आधार और वोटर आईडी को शामिल क्यों नहीं किया गया?
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में 66.16 फीसदी गणना फॉर्म इकट्ठे हो गए हैं, जबकि फॉर्म जमा करने की अंतिम समय सीमा में 15 दिन और बची है. बिहार के निर्वाचकों की सक्रिय भागीदारी के बीच 77,895 बूथ लेवल अधिकारी 20,603 विशेष रूप से नियुक्त अतिरिक्त बीएलओ और अन्य चुनाव पदाधिकारियों, लगभग 4 लाख वॉलेंटियर्स जुटे हैं. इनके अलावा सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के 1.56 लाख बूथ लेवल एजेंट के अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप 66.16 फीसदी गणना फॉर्म इकट्ठे हो चुके हैं. निर्वाचकों के पास फॉर्म जमा करने के लिए अभी भी 15 दिन बचे हैं.
24 जून, 2025 को एसआईआर अनुदेश जारी होने के बाद से, पिछले 16 दिनों में आज गुरुवार शाम 6.00 बजे तक 5,22,44,956 गणना फॉर्म एकत्र किए जा चुके हैं. ये बिहार के कुल 7,89,69,844 (करीब 7.90 करोड़) मौजूदा निर्वाचकों के गणना फॉर्म के 66.16 फीसदी है. एसआईआर कवायद शुरू होने के बाद से पिछले 16 दिनों में 7.90 करोड़ फॉर्म मुद्रित किए गए. उनमें से करीब 98% फॉर्म (7.71 करोड़) निर्वाचकों को वितरित किए गए.
सु्प्रीम कोर्ट चुनावी राज्य बिहार में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के कदम को चुनौती याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है. इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिहार में मतदाता सूचियों का स्पेशल इंटेंसिव रिविजन कराने के चुनाव आयोग के कदम में लॉजिक है, लेकिन कोर्ट ने विधानसभा चुनावों से कुछ महीने पहले होने वाली इस प्रक्रिया के समय पर सवाल उठाया.
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा कि उसने बिहार में मतदाता सूची के SIR इतनी देर से क्यों शुरू किया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एसआईआर प्रक्रिया में कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन इसे आगामी चुनाव से महीनों पहले शुरू किया जाना चाहिए था.
‘प्रक्रिया समस्या नहीं’
जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि वोटर लिस्ट में नॉन-सिटिजन्स के नाम न रहें, यह सुनिश्चित करने के लिए गहन प्रक्रिया के माध्यम से मतदाता सूची को शुद्ध करने में कुछ भी गलत नहीं है. अदालत ने कहा, “आपकी (चुनाव आयोग की) प्रक्रिया समस्या नहीं है, बल्कि समय की समस्या है.”
‘यह पूरी तरह से मनमाना’
याचिकाकर्ताओं के वकील ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि अब जबकि चुनाव कुछ ही महीने दूर हैं चुनाव आयोग कह रहा है कि वह 30 दिनों में पूरी मतदाता सूची का एसआईआर करेगा. उन्होंने कहा कि वे आधार को मान्य नहीं करेंगे और माता-पिता के दस्तावेज भी मांग रहे हैं. वकील का कहना है कि यह पूरी तरह से मनमाना और भेदभावपूर्ण है.
‘चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था’
चुनाव आयोग के वकील ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जिसका मतदाताओं से सीधा संबंध है और अगर मतदाता ही नहीं हैं तो हमारा अस्तित्व ही नहीं है. आयोग किसी को भी मतदाता सूची से बाहर करने का न तो कोई इरादा रखता है और न ही कर सकता है, जब तक कि आयोग को कानून के प्रावधानों द्वारा ऐसा करने के लिए बाध्य न किया जाए. हम धर्म, जाति आदि के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकते.
‘प्रक्रिया और समय चुनौती’सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के वकील से कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि अदालत के समक्ष जो मुद्दा है वह लोकतंत्र की जड़ों और मतदान के अधिकार से जुड़ा है. याचिकाकर्ता न केवल चुनाव आयोग के इस कार्य को करने के अधिकार को चुनौती दे रहे हैं, बल्कि इसकी प्रक्रिया और समय को भी चुनौती दे रहे हैं.
ECI का वोटर लिस्ट में संशोधन का आदेश
बता दें कि पिछले महीने चुनाव आयोग ने बिहार की मतदाता सूची में संशोधन का आदेश देते हुए कहा था कि पिछले 20 साल में बड़े पैमाने पर नाम जोड़ने और हटाने से डुप्लिकेट एंट्रीज की संभावना बढ़ गई है. इस कदम की विपक्ष, खासकर कांग्रेस और आरजेडी ने तीखी आलोचना की थी.
भारत में गैर-नागरिकों को भी वोट देने का अधिकार कैसे मिल जाता है? जानें कहां है असली कठिनाई
स्पेशल इंटेसिव रिवीजन (SIR) से चुनाव आयोग गैर-नागरिकों को वोटर लिस्ट से बाहर करने की कोशिश कर रहा है,वहीं फॉर्म 6 की कमियों की आलोचना हो रही है.फॉर्म 6 में आवेदकों को यह सिद्ध करने को कोई प्रपत्र देने की जरूरत नहीं है कि वे भारतीय हैं.वोटर बनने को सिर्फ जन्मतिथि और पते का प्रमाणपत्र और घोषणा ही काफी है.
बिहार में वोटर लिस्ट की जांच पर राजनीतिक बवाल (सांकेतिक तस्वीर)
नई दिल्ली,09 जुलाई 2025,चुनाव आयोग की तरफ से पूरे देश में मतदाता सूची पुनरीक्षण के निर्णय ने बड़े राजनीतिक हलचल को जन्म दे दिया है, जिसकी शुरुआत बिहार विधानसभा चुनाव से पहले हो रही है. चुनाव आयोग मतदाता सूची से गैर-नागरिक हटाना चाहता है. इससे यह सवाल उठता है कि आखिर गैर-नागरिक भारत के मतदाता बन कैसे गए? इस सवाल का जवाब फॉर्म 6 में छिपा है.
चुनाव आयोग की तरफ से जारी फॉर्म 6 का इस्तेमाल 18 साल या उससे ज्यादा उम्र के भारतीयों के लिए अपने निवास क्षेत्र में वोटर के रूप में रजिस्ट्रेशन कराने के लिए किया जाता है.
वोटर लिस्ट की जांच पर बवाल
एक ओर चुनाव आयोग स्पेशल इंटेसिव रिवीजन (SIR) के ज़रिए गैर-नागरिकों को वोटर लिस्ट से बाहर करने की कोशिश कर रहा है, वहीं फॉर्म 6 की खामियों की आलोचना हो रही है. फॉर्म 6 में आवेदकों को यह साबित करने के लिए कोई दस्तावेज़ देने की जरूरत नहीं है कि वे भारतीय हैं. सिर्फ जन्मतिथि और पते का प्रूफ और डिक्लेरेशन ही काफी है.
फॉर्म 6 के प्रावधान मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 में दिए गए हैं. एसआईआर के एक हिस्से के रूप में चुनाव आयोग बिहार में घर-घर जाकर सर्वेक्षण कर रहा है. भारत में वोटर लिस्ट का इतना गहन रिवीजन पिछली बार 2003-2004 में हुआ था. तब से सिर्फ समरी रिवीजन ही हुए हैं. समरी रिवीजन वोटर लिस्ट का एक नियमित अपडेट है, जबकि एसआईआर (विशेष जांच रिपोर्ट) मतदाता सूचियों के वेरिफिकेशन और क्लीनअप को एक ज्यादा विस्तृत रिवीजन है.
अवैध अप्रवासी बन गए वोटर
विपक्षी दल और कार्यकर्ता मामले को सुप्रीम कोर्ट ले गये हैं, लेकिन यह कांग्रेस ही थी, जिसने 2024 में महाराष्ट्र में चुनावों के बाद वोटर लिस्ट पर सवाल उठाया था. सिर्फ भारत के नागरिकों को ही देश की दिशा तय करने का अधिकार होना चाहिए और इसके लिए यह सुनिश्चित करना होगा कि अवैध अप्रवासियों को वोट देने का अधिकार न मिले.
तत्कालीन गृह राज्य मंत्री किरेन रिजिजू ने 2016 में संसद को बताया था कि भारत में दो करोड़ बांग्लादेशी अवैध अप्रवासी हैं. अवैध आव्रजन से देश के दर्जनों जिलों की डेमोग्राफी बदल गई है. वोटर लिस्ट में चोरी-छिपे घुस आए अवैध प्रवासियों से छुटकारा पाने को मतदाता सूचियों का समय-समय पर गहन रिवीजन जरूरी है. लेकिन सबसे ज़रूरी बात यह सुनिश्चित करना है कि गैर-नागरिक वोटर ही न बन पायें।
मोतिहारी में सर्वे के दौरान चुनाव आयोग के अधिकारी
एक पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ने बताया कि सिर्फ फॉर्म 6 ही नहीं, बल्कि पूरी चुनावी प्रक्रिया पर पुनर्विचार की जरूरत है, क्योंकि दशकों से देश में अवैध प्रवासियों की बाढ़ आ गई है.
नए वोटर रजिस्ट्रेशन में फॉर्म 6 और आधार लिंक
बिहार में वोटर लिस्ट की गहन जांच में, चुनाव आयोग ने 24 जून को 11 दस्तावेजों की एक सूची जारी की, जिनमें से एक का इस्तेमाल नागरिकता साबित करने को किया जाएगा. सूची में पहचान पत्र या पेंशन भुगतान आदेश, जन्म प्रमाण पत्र, पासपोर्ट, मैट्रिकुलेशन प्रमाण पत्र, निवास, जाति या वनाधिकार प्रमाण पत्र 11 दस्तावेजों में शामिल हैं.
सूची आधार कार्ड, पैन और ड्राइविंग लाइसेंस नहीं हैं, जिनका इस्तेमाल आमतौर पर पूरे भारत में पहचान प्रमाण के रूप में किया जाता है. कारण यह है कि आधार या अन्य दस्तावेज पहचान प्रमाण तो हैं, लेकिन नागरिकता सिद्ध नहीं करते. हालांकि, आधार एक ऐसा दस्तावेज है जिसका इस्तेमाल फॉर्म 6 में किया जा सकता है.
नहीं मांगा जाता नागरिकता प्रमाणपत्र
राजनीतिक रणनीतिकार और टिप्पणीकार अमिताभ तिवारी कहते हैं, ‘नया वोटर बनने कौ भरा जाने वाला फॉर्म 6 किसी भी नागरिकता संबंधी दस्तावेज़ की मांग नहीं करता है. इसको सिर्फ नागरिकता के डिक्लेरेशन की जरूरत होती है.’ एसेंडिया स्ट्रैटेजीज के संस्थापक तिवारी ने बताया, ‘जन्मतिथि और पते के प्रमाण के तौर पर आधार दिया जा सकता है. इसलिए, उस पूरे दस्तावेज [फॉर्म 6] में आधार का जिक्र छह बार किया गया है. नागरिक का जिक्र दो बार किया गया है.’
चुनाव आयोग की एसआईआर प्रक्रिया के 11 दस्तावेजों की सूची और समय के संबंध में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, जिसके बारे में विपक्ष का कहना है कि यह बिहार में चुनाव के करीब है. राजनीतिक दलों ने एसआईआर में आधार जैसे दैनंदिन प्रपत्र शामिल न करने पर सवाल उठाया है.
आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने मांग की कि राशन और मनरेगा कार्ड के अलावा आधार को एसआईआर को जन्म स्थान प्रमाण के रूप में इजाजत होनी चाहिए. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार के कई जिलों में आधार सबसे अधिक उपलब्ध दस्तावेजों में से एक है.
भारत में वोटर कैसे बनें?
वार्षिक सुधार या समरी रिवीजन के अलावा, हर चुनाव से पहले नए मतदाता जोड़ने कौ बड़े स्तर पर कैंपेन चलता है. बूथ स्तरीय अधिकारियों (बीएलओ) को फॉर्म 6 को निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) को सौंपना होता है, जो अंतिम सूची पर फैसला लेते हैं.
चुनावों से पहले, राजनीतिक दलों के ब्लॉक-स्तरीय एजेंट (बीएलए) भी इस प्रक्रिया में शामिल हो जाते हैं, इस प्रोत्साहन के साथ कि आवेदकों को वोटर रजिस्टर करने में मदद करने से उनकी पार्टी की संभावनाएं बढ़ेंगी. विशेषज्ञों का कहना है कि पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं को जोड़ने की प्रक्रिया एक सेल्स-टारगेट जॉब का रूप ले लेती है.
एक पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, ‘जब 1952 में फॉर्म 6 शुरू किया गया था, तो किसी ने भी इतने बड़े पैमाने पर अवैध प्रवासियों के आने की कल्पना नहीं की थी.”यह सभी को पता है कि गैर-नागरिक चुनावी प्रक्रिया में शामिल होने को आधार इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होने बताया कि आधार संख्या मतदाता के इलेक्ट्रॉनिक इलेक्टोरल फोटो पहचान पत्र (ईपीआईसी) से जोड़ना, किसी व्यक्ति की डुप्लिकेट और एक से ज्यादा वोटिंग एंट्री को हटाने की एक कोशिश है.
वोटर्स की नागरिकता की जांच क्यों जरूरी?
सरकार ने मतदाता धोखाधड़ी को रोकने को आधार का इस्तेमाल करने की कोशिश की है, लेकिन फॉर्म 6 से मतदाता के रूप में रजिस्टर करने कौ इसी का इस्तेमाल करने से गैर-नागरिकों को वोटर लिस्ट में शामिल होने का मौका मिल सकता है.
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि वोटर लिस्ट में गैर-नागरिकों के नाम आने से रोकने को तरीके और साधन विकसित करने होंगे. ‘इसके बाद, फॉर्म 6 संशोधित करना होगा. सिर्फ फॉर्म 6 ही नहीं, बल्कि पूरी चुनावी प्रक्रिया पर गौर करना होगा ताकि गैर-नागरिकों को चुनावी प्रक्रिया में शामिल होने से रोका जा सके.’
आधार की मदद से रजिस्ट्रेशन आसान
विडंबना यह है कि आधार की मदद से वोटर रजिस्ट्रेशन कराना कठिन नहीं है, इस बात की ओर खुद आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने इशारा किया था, जब उन्होंने एसआईआर की आलोचना की थी. उन्होंने पूछा, ‘मेरी पत्नी, जो पहले दिल्ली में मतदाता थी, ने शादी के बाद बिहार में आधार कार्ड के आधार पर अपना वोटर आईडी कार्ड बनवाया. फिर, बिहार में एसआईआर को जरूरी दस्तावेजों की लिस्ट से आधार कार्ड को क्यों बाहर रखा गया है?’
6 जुलाई को टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग ने माना है कि आधार कार्ड न तो जन्मतिथि,न ही जन्म स्थान और न ही नागरिकता का प्रमाण है.एक अन्य पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त अशोक लवासा से जब पूछा गया कि क्या एसआईआर प्रक्रिया को नागरिकता साबित करने को आधार कार्ड पर्याप्त है,तो उन्होंने कहा,कि ‘यहां तक कि आधार अधिनियम भी यह नहीं कहता कि आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण है.’
इस विवाद के बीच, भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) के सीईओ भुवनेश कुमार ने कहा कि आधार कभी भी पहली पहचान नहीं रहा है. भुवनेश कुमार ने नकली आधार कार्ड इंडस्ट्री पर लगाम लगाने के लिए UIDAI की ओर से उठाए गए कदमों पर भी बात की.
ज्यादा वोटर्स बनाने का दबाव
वोटर लिस्ट का गहन रिवीजन जरूरी है ताकि मतदान को पहले से रजिस्टर्ड लोगों की प्रामाणिकता की पुष्टि की जा सके. लेकिन वोटर्स को रजिस्टर करने से पहले पूरी तरह से जांच की जानी चाहिए. भारत, जो अवैध आव्रजन की बड़ी समस्या से जूझ रहा है, वोटर्स के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया में ढिलाई नहीं बरत सकता.
पहली बार वोटर्स के नॉमिनेशन में ‘कमजोर मानदंड’ की ओर इशारा करते हुए अमिताभ तिवारी कहते हैं कि ‘क्योंकि ईसीआई और अन्य निकायों पर हमेशा ज्यादा से ज्यादा मतदाताओं को शामिल करने का दबाव रहता है’, इसलिए एंट्री पॉइंट पर ही सिस्टम को कड़ा किया जाना चाहिए. उनका कहना है कि पहली बार मतदाता बनने वालों के लिए सिर्फ डिक्लेरेशन ही नहीं, बल्कि नागरिकता का प्रमाण भी अनिवार्य होना चाहिए.
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट बिहार में चुनाव आयोग की रिवीजन प्रोसेस पर विचार कर रहा है, लेकिन यह सही समय है कि भारत मतदाता रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया मजबूत बनाए, ताकि गैर-नागरिकों को इसके भाग्य का फैसला करने से दूर रखा जा सके.

