ज्ञान:अंग्रेजों के आने के पहले भारत में साक्षरता-दर थी 50%, जाते समय 13%

#अंग्रेजों_के_आने_के_पहले__मन्दिर_भारत_मे_शिक्षा_के_प्रधान_केन्द्र__थे लेकिन हमारी पाठ्यपुस्तक बताती हैं कि #आम_भारतीय_निरक्षर_थे। यह धारणा तब बदली जब #धरमपाल (1922-2006) ने #द_ब्यूटीफुल_ट्री लिखी, जिसने 1800 के दशक की शुरुआत से #ब्रिटिश_दस्तावेजों का उपयोग करके दिखाया कि पूर्व-ब्रिटिश शिक्षा काफी सार्वभौमिक थी, वास्तव में उस अवधि में यूरोप की तुलना में कहीं अधिक थी।

धर्मपाल बताते हैं कि प्रत्येक #गाँव के #मंदिर में एक #स्कूल जुड़ा होता था और सभी समुदायों के बच्चे इन स्कूलों में जाते थे। इसके अलावा, समृद्ध मंदिरों में अकादमियाँ थीं जहाँ अधिक उन्नत विषयों को पढ़ाया जाता था।

पुरातत्वविद् आर. नागास्वामी ने उससे पहले की उन्नत उच्च शिक्षा के प्रमाण प्रदान किए हैं। उन्होंने #कांचीपुरम जिले के उत्तिरामपुर में सुंदरवारा मंदिर की दीवारों पर 10वीं शताब्दी के शिलालेखों को खोजा है जिनपर स्थानीय विधानसभा और स्कूल और कॉलेज के प्रशासन का वर्णन है। यह मंदिर #पल्लव_शासन में 750 ई. के आसपास बनाया गया था, बाद में 1013 ई. में #राजेंद्र_चोल द्वारा और 1520 ई. में विजयनगर सम्राट #कृष्णदेवराय द्वारा पुनर्निर्मित किया गया था।

#वैदिक_महाविद्यालय के प्रशासन के वर्णन में #शिक्षक बनने के लिए आवश्यक योग्यताएँ शामिल हैं। बेहतर #प्रशासन के लिए, और संभवतः #भाई_भतीजावाद को खत्म करने के लिए, यह निर्धारित किया गया था कि शिक्षक गांव का मूल निवासी नहीं हो सकता।

शिक्षक को व्याकरण और विभिन्न दर्शनों, तर्कशास्त्र और व्युत्पत्तिविज्ञान में निष्णात होने के अतिरिक्त कम से कम एक वेद का अध्ययन करना आवश्यक था। उसे #गणितज्योतिष और #फलितज्योतिष को जानना आवश्यक था।

यह एक रोचक पहलू है कि शिक्षक को शुरू में तीन साल की अवधि के लिए नियुक्त किया गया था, जिसके अंत में यह मूल्यांकन किया गया था कि क्या नियुक्ति एक और कार्यकाल के लिए बढ़ाई जा सकती है। यह इस बात से मेल खाता है कि हमारे समय में विश्वविद्यालय की नियुक्तियाँ कैसे की जाती हैं। शिक्षक की आजीविका का प्रबंध गांव के लोगों द्वारा की जाती थी जो #ग्रामसभा द्वारा प्रशासित की जाती थी ।

जब अंग्रेज यहाँ पहुंचे, तो उनके शिक्षा-अधिकारियों ने अनुमान लगाया कि अकेले बंगाल में 1,00,000 स्कूल थे और लगभग 500 विद्यार्थियों के लिए एक स्कूल है, और आंकड़े अन्य प्रांतों के समान थे। ये संख्या बताती है कि साक्षरता-दर शायद 50 प्रतिशत थी। ब्रिटिश शासन के अंत में, साक्षरता-दर 12 प्रतिशत तक गिर गई थी।

#गुरुकुल से निकले थे विश्वस्तरीय #आर्किटेक्ट और #टेक्नोक्रेट। ये गुरुकुल #ब्राह्मण चलाते थे, लेकिन वे किसी #राजा के वेतनभोगी नौकर नहीं होते थे।

#मैकाले के पूर्व भारत के गुरुकुलों के बारे में एकत्रित किये गए डेटा को #धरमपाल जी ने अपनी पुस्तक #The_beautiful_Tree में संकलित किया है। उसके अनुसार उन गुरुकुलों में चारो वर्ण के छात्र शिक्षा प्राप्त करते थे। इन गुरुकुलों में शूद्र छात्रों की संख्या द्विज छात्रों से चार गुना अधिक थी।

शिक्षा को किसी भी सभ्य समाज के बैभव और सभ्यता संस्कृति का आधार माना जाता है।

यदि शिक्षा को किसी समाज के वैभवशाली होने का आधार माना जाय तो भारत के उस विशाल वैभव का राज उस गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था के कारण ही थी। यह व्यवस्था जब तक भारत मे जीवित थी, किसी भी भारतीय को किसी विदेशी भूमि में जाकर गिरमिटिया मजदूर बनने की आवश्यकता नही पड़ी।

#Will_Durant अपनी पुस्तक #The_ Case_ For_India में उस वैभव के बारे में लिखता है: “मनुष्य के मस्तिष्क और हाथ से बनने वाली दुनिया की सबसे बहुमूल्यतम वस्तुएं, जिनका मूल्य या तो उनकी उपयोगिता के कारण है, या फिर उनकी सुंदरता के कारण, वे सब भारत मे हजारों वर्षों से निर्मित होती आयी थी, जब अंग्रेजो ने भारत की धरती पर कदम रखा। भारत मे दुनिया का विशालतम इंडस्ट्री थी। ईस्ट इंडिया कंपनी का उद्देश्य भारत के इस इंडस्ट्री से उतपन्न होने वाले वैभव को लूटना था”।

अभी हाल में भारत के विदेशमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर घोषणा किया कि मैकाले के पूर्वजों और वंशजों ने 45 ट्रिलियन डॉलर की लूट की।

उस लूट के प्रभाव से जो तबका सबसे अधिक प्रभावित हुवा उनके वंशजों को आज #दलित_आदिवासी_घुमन्तू जातियां आदि नामों से परिभाषित किया जा रहा है।
चल संपत्ति को लूट सकते थे, लेकिन अचल संपत्ति को कैसे लूटते। उनके माध्यम से लूटा गया भारतीयों को। उदाहरण स्वरूप 1806 में पुरी के मंदिर में उन्होंने एंट्री फीस रखी थी – 2 रुपये से दस रुपये तक। उसका वर्तमान मूल्य क्या होगा? लेकिन उन मंदिरों को वे अपने साथ नही ले जा सकते थे। वे मंदिर आज भी उस वैभव आर्किटेक्ट और टेक्नोक्रेसी का प्रमाण हैं।

भारत मे आज भी लाखों ऐसे मंदिर और भवन हैं, जिनका निर्माण हजारों वर्ष पूर्व इन्ही शूद्र या दलित कहे जाने वाले अर्चिटेक्ट्स के पूर्वजों ने किया था। उनका विकल्प आज भी उपलब्ध नहीं है विश्व में। वे ज्यामिति की आधुनिक कही जाने वाली #Fractal_Geometry के सिद्धांतों के अनुसार बनी हैं।

उस गुरुकुल व्यावस्था को नष्ट करने को ही भारत मे तथाकथित मैकाले शिक्षा पद्धति की नींव रखी गयी थी।
इस पद्धति से निकले भारतीय किसी भी रोजगार लायक न बचे, सिवा बाबू या एडवोकेट बनने के।

#धरमपाल गांधी के शिष्य थे।
गांधी ने 31 सितम्बर 1930 में इंग्लैंड में भारतीयों और अंग्रेजों को संबोधित करते हुए कहा – भारत आज जितना शिक्षित है, आज से 50 या 100 वर्ष पूर्व इससे कहीं अधिक शिक्षित था। अंग्रेजों में भारत के गुरुकुलों को नष्ट करके उस सुंदर वृक्ष को सुखा दिया।
भारत को सभ्यता सिखाने और शिक्षित करने का पाखंड रचने वाले अंग्रेजों को यह बात अखर गयी। ढाका के वाईस चांसलर फिलिप होदतोग ने गांधी को चुनौती दिया कि या तो अपनी बात को प्रमाणित करें या क्षमा मांगे।
गांधी ने कहा कि यदि मेरी बात गलत निकली तो मैं और जोर शोर से प्रचार करके क्षमा मांगूंगा। यह विवाद दूसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत तक चला। होदतोग ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गांधी के इस कथन की खिल्ली उड़ायी।

उनके शिष्य धरमपाल लंदन स्थित इंडियन आफिस लाइब्रेरी में भारत के संदर्भ में रखे अभिलेखों को एकत्रित करके भारत लाये और आज से 50 वर्ष पूर्व एक पुस्तक के रूप में उसे प्रकाशित किया #The_Beautiful_Tree.

लेकिन भारत के स्कॉलर्स ने इस पुस्तक को कूड़ेदान में डाल रखा था। यदा कदा कोई कोई बोलता था इसके बारे में। मैंने इस पुस्तक पर कई लेख लिखे हैं पिछले 7 वर्षों में।
इसको कूड़ेदान में डालने का क्या कारण है?
संविधान सम्मत सुविधाजनक जातिवादी राजनीति, एन्टी, एन्टी सवर्ण, ब्रम्हानिस्म, दलित राजनीति, ओबीसी राजनीति, द्रविड़ राजनीति यह पुस्तक स्वाहा कर देती है।

नरेंद्र मोदी ने इसका जिक्र किया है। यह बहुत बड़ी घटना है भारत के राजनीति में।
पहले उन्होंने बोलवाया – अंग्रेजों ने भारत से 45 ट्रिलियन डॉलर लूटे। आज उन्होंने कहा- कि इन गुरुकुलों में सभी कौमों को शिक्षा मिलती थी।
हिंट दिया कि इन स्कूलों में पढ़ने वाले शूद्र स्कॉलर्स की संख्या, तथाकथित द्विजों से चार गुना थी।
✍🏻डॉक्टर त्रिभुवन सिंह

भारतीय स्वाभिमान का चेहरा – धरमपाल

लेखक:- प्रशांत पोळ

वर्ष १९६०. ग्वालियर से दिल्ली जाती हुई एक खचाखच भरी ट्रेन. इस ट्रेन में तीसरे दर्जे का एक डिब्बा. एक ३८ वर्ष का, प्रौढ़ावस्था की ओर बढ़ता हुआ युवक उस भीड़ में डिब्बे के अंदर आने का प्रयास करता हैं. कुछ लोग उस भीड़ में भी उसे जगह देते हैं. लगभग एक दर्जन लोगों का यह समूह हैं. सात – आठ पुरुष और चार – पांच महिलाएं. प्रत्येक के पास कुछ सामान, कुछ डिब्बे और कुछ थोड़े बर्तन हैं. ये युवक इन लोगों से पूछता हैं, “आप सब कौन हो और कहाँ जा रहे हो…?” उन लोगों में मुखिया जैसा दिखने वाला वृद्ध उत्तर देता हैं कि वे सब पिछले ढाई महीने से तीर्थयात्रा को निकले हैं. अभी रामेश्वरम से आ रहे हैं. हरिद्वार जा रहे हैं. वहाँ से अपने गांव वापस जाएँगे. कुल 3 माह का कार्यक्रम हैं. उन बर्तनों में, डिब्बों में उनके खाने का समान, दाल, चावल, गेंहू आदि हैं. ये सारे लोग लखनऊ के पास दो गावों में से हैं.

युवक का कुतूहल जागृत होता हैं. वो पूछता हैं, “आप सब एक ही जाति के हैं, ना…?”
“अरे नहीं नहीं… एक जात के नहीं हैं हम. अलग – अलग जात के हैं”.
युवक आश्चर्य में. “यह कैसे संभव हैं ?”
“बाबूजी, यात्रा मे, तीर्थयात्रा में जात – पात ना होवे”. युवक और ज्यादा चकित. उसके अभी तक के अध्ययन और जानकारी के पूर्णतः विपरीत बात वह देख रहा हैं.

युवक फिर पूछता हैं, ‘बंबई देखी हैं?’ उत्तर आता हैं, ‘हां. वहाँ से गुजरे, लेकिन शहर नहीं देखा. उसमें क्या देखना?’ वही हाल मद्रास का और बाकी शहरों का भी.

फिर दिल्ली तक के प्रवास में अगले पांच – छह घंटे उन श्रध्दावान ग्रामीणों से उसकी गपशप होती हैं. भारतीय समाज के अंतरंग का, ग्रामीण आस्था का, उनके विश्वास का, उनके जीवन मूल्यों का एक अलग ही चेहरा उस युवक के सामने आता हैं….

ग्वालियर से दिल्ली का, वह छह – सात घंटों का प्रवास, उस युवक को झकझोर कर रख देता हैं. जीवन के 38 वर्षों के पश्चात, उस धरमपाल नामक युवक को अपने जीवन का लक्ष्य दिखने लगता हैं. पहली बार, अंग्रेजी हुकूमत को, उसके ही अभिलेखों के माध्यम से आईना दिखाने वाले, अंग्रेजों के झूठ का पर्दाफाश करने वाले, भारत में ब्रिटिश राज का वस्त्रहरण करने वाले धरमपाल का उदय होता हैं.

धरमपाल याने एक ज़िंदादिल फक्कड़ इंसान. गांधी के विचारों के प्रभाव में भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल. फिर गांधी की शिष्या मीराबेन के साथ हरिद्वार में ग्राम स्वराज के प्रयोग में भागीदारी. स्वतंत्रता के पश्चात ब्रिटेन और इज़राइल में. इज़राइल के सामुदायिक ‘किबुत्स’ का आकर्षण. इसलिए कुछ हफ्ते किबुत्स में बिताए. किन्तु यह मॉडेल अपने ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं चल सकेगा, इस निष्कर्ष पर पहुंचे. लंदन के ‘स्कूल ऑफ एकोनोमिक्स’ में  विद्यार्थी बने. वहीं पर ‘फिलीस अलेन फोर्ड’ से विवाह किया. और डेढ़ वर्ष के बाद, पत्नी के साथ वापस भारत.

फिर मीराबेन के साथ ऋषिकेश के पास ‘बापूग्राम’ सहकारी ग्रामीण प्रयोग में शामिल. तीन – चार वर्ष बाद, इस प्रयोग की असफलता से निराश होकर, परिवार समेत पुनः इंग्लैंड. तीन वर्ष वहां रहने के बाद पुनः भारत में वापसी. गांधी के कल्पना का भारत और जवाहर लाल नेहरू निर्माण कर रहे वो भारत… इन के बीच का अंतर देखकर दुखी. तभी वह ‘ग्वालियर – दिल्ली’ प्रवास की घटना होती हैं, और धरमपाल का मन उद्वेलित होता हैं. ‘इस ग्रामीण भारत को तो प्रधानमंत्री नेहरू जानते तक नहीं हैं. इनकी बात कौन करेगा..? अंग्रेजों ने भारतीयों के बारे में और विशेषतः भारतीय ग्रामीणों के बारे में जो अत्यंत अपमानजनक चित्र निर्माण किया हैं, उसे गलत कौन साबित करेगा..?’

बहुत कम लोग जानते हैं कि सन १९६२ में, चीनी युद्ध के समय, जवाहरलाल नेहरू की गलत नीतियों की जबरदस्त आलोचना करने के कारण नेहरू ने धरमपाल को दो महीने जेल में बंद रखा था. धरमपाल गांधीजी के अनुयायी अवश्य थे. लेकिन कांग्रेसी नहीं थे. सच्चे गांधीवादी और निर्भय थे. १९७५ – १९७७ आपातकाल में वे इंग्लैंड में थे इसलिए गिरफ्तारी से बच गए. अन्यथा इंदिरा गांधी की सरकार उन्हे छोड़ने वाली नहीं थी. वे इंग्लैंड से, भारतीय लोकतंत्र के समर्थन में आंदोलन चला रहे थे.

१९६२ में धरमपाल की पहली पुस्तक प्रकाशित हुई, ‘पंचायती राज’ पर. १९६३ से १९६५ के बीच उन्होने ‘तमिलनाडु राज्य अभिलेखागार’ में घंटों बैठ कर ब्रिटिश शासन के समय के अभिलेख छान मारे. किन्तु इसी बीच, १९६५ में उनके बेटे प्रदीप की लंदन में भीषण दुर्घटना हुई. इस कारण उन्हे, मद्रास का शोध कार्य छोड़कर लंदन जाना पड़ा. किन्तु लंदन जाना शायद ज्यादा ठीक रहा. वहां उन्होने British Colonial Archives में जाकर अपना शोध कार्य जारी रखा. इस शोधकार्य की मानो उन्हे धुन चढ़ गई थी. ‘ब्रिटिश राज में ध्वस्त हुई भारतीय व्यवस्थाएं’ इस विषय पर शोधकार्य उनका लक्ष्य बन गया था. १९६५ में उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित हुई – ‘अठारहवी शताब्दी में भारतीय विज्ञान और तकनीकी’. यह पुस्तक जबरदस्त थी. पूरे देश को हिलाने की ताकत रखने वाली थी. इस पुस्तक ने वे सारे मिथक दूर किए, जो अंग्रेजों ने और बाद में उनके पिट्टुओं ने बना रखे थे. तब तक यही बताया जाता था, यही सिखाया जाता था कि अंग्रेज़ आने से पहले भारतीय तो गंवार थे, अनाड़ी थे. उनको शिक्षित किया अंग्रेजों ने. उनको दुनिया दिखाई, अंग्रेजों ने.

धरमपाल ने अंग्रेजों के अभिलेखों के माध्यम से ही यह दिखला दिया कि अंग्रेज़ आने से पहले हम विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में कितने आगे थे और अंग्रेजों ने कैसे हमारी सारी ज्ञान परंपरा ध्वस्त की.

इस के बाद तो धरमपाल के शोध कार्य की, अध्ययन की और उन के निष्कर्षों के आधार पर सप्रमाण पुस्तक लिखने की शृंखला ही प्रारंभ हो गई. १९८० से वे वर्धा के समीप, सेवाग्राम में रहने लगे. १९८३ में उनकी चर्चित पुस्तक प्रकाशित हुई – ‘The Beautiful Tree’. अंग्रेज़ आने से पहले भारत की शिक्षा व्यवस्था कितनी समृध्द थी, परिपक्व थी और अंग्रेजों ने इस पूरी व्यवस्था को कैसे ध्वस्त किया, इसका वर्णन विस्तार से इस पुस्तक में हैं.

किन्तु दुर्भाग्य से धरमपाल के इस महान कार्य की जानकारी बहुत कम लोगों को (अपने देश में) थी. धरमपाल कट्टर गांधीवादी होने के बावजूद भी, तत्कालीन काँग्रेस सरकारों ने उनकी कोई सुध नहीं ली. इस का कारण था. धरमपाल मानते थे कि नेहरू की नीतियाँ गांधीवाद के विरोध में थी. इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाकर लोकतंत्र की हत्या की, इसलिए वे इंदिरा गांधी के भी विरोध में लिखते – बोलते थे.

कानपुर और मद्रास आईआईटी के कुछ छात्रों के पढ़ने में धरमपाल की लिखी हुई कुछ पुस्तकें आई. उन्होने उस साहित्य पर विमर्श को एक छोटा समूह बनाया, जिसमे कानपुर और मद्रास आईआईटी के छात्र थे. इस समूह का नाम रखा गया – Patriotic and People-Oriented Science and Technology (PPST) group. इस समूह ने १९८० – १९८१ में धरमपाल साहित्य पर काफी हलचल खड़ी की. इसी दौरान गोवा के पर्यावरण कार्यकर्ता क्लौड़े अल्वारिस ने धरमपाल के साहित्य के बारे में लिखना प्रारंभ किया. गुजरात की शिक्षाविद सुश्री इन्दुमति ताई काटदरे के हाथ में, उनके मद्रास प्रवास के दौरान धरमपाल का साहित्य आया. इतने समृध्द और सप्रमाण साहित्य को देखकर इन्दुमति ताई ने उसे गुजराती, मराठी और हिन्दी में अनुवाद कर के प्रकाशित करने की योजना बनाई. धीरे – धीरे धरमपाल साहित्य पर देश में, विश्वविद्यालय में चर्चा और विमर्श होने लगे. मैं जब ‘विनाशपर्व’ पुस्तक पर काम कर रहा था, तब मैंने धरमपाल साहित्य अनेक बार पढ़ा. उस साहित्य के कुछ अंश पुस्तक में भी लिए.

अटल बिहारी बाजपेयी सरकार ने पहली बार धरमपाल को पशुधन बोर्ड अध्यक्ष बनाकर उनका सम्मान किया था. देश का दुर्भाग्य रहा कि गांधीवादी विचारधारा के सच्चे अर्थों में अनुयायी, उस विचारधारा को जीवन में लाने का प्रयास करने वाले फक्कड़ कार्यकर्ता और ब्रिटिश पुरालेख और कागजातों का गहन अध्ययनकर्ता इतिहास संशोधक, धरमपाल को काँग्रेस ने ना कभी अपना माना और ना ही उनका सम्मान किया. उल्टे नेहरू ने तो उन्हे दो महीने जेल में रखा था…!

आज उनके जन्मशताब्दी वर्ष की समाप्ति हो रही हैं. भारतीय स्वाभिमान को निर्भयता से विश्व के सामने लाने वाले इस सच्चे गांधीवादी को मेरे विनम्र श्रध्दासुमन..!
✍🏻प्रशांत पोळ
#धरमपाल #Dharampal
धरमपाल जी ने अनेक पुस्तकों का लेखन किया हैं. उन में से कुछ महत्वपूर्ण हैं –
अंग्रेज़ी में
– साइंस एण्ड टेक्नालॉजी इन एट्टींथ सेंचुरी (Indian Science and Technology in the Eighteenth Century)
– द ब्यूटीफुल ट्री (The Beautiful Tree)
– सिविल डिसआबिडिएन्स एण्ड इंडियन ट्रेडिशन (Civil Disobedience and Indian Tradition)
– डिस्पाइलेशन एण्ड डिफेमिंग ऑफ़ इंडिया (Despoliation and Defaming of India)
– अंडरस्टेंडिंग गाँधी (Understanding Gandhi)
हिन्दी में
– भारतीय चित्त मानस और काल
– भारत का स्वधर्म

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