ज्ञान:अंग्रेजों ने छीना शारीरिक कौशल से शस्त्र तक,सुना कभी मल्ल पुराण?
इंटरनेट पर एक तस्वीर देखा जिसमें जाने माने बॉक्सर मुहम्मद अली को किसी दुबले पतले से बूढ़े को उठाने की कोशिश कर रहे हैं। वो इस पतले से बूढ़े को हिला भी नहीं पाए थे! नहीं, ये कोई सुनी सुनाई बात नहीं है। ये अच्छी खासी प्रसिद्ध घटना है क्योंकि ये बूढ़े जॉनी कुलोन अपनी इसी कला के लिए अच्छे खासे विख्यात खुद भी थे। अपनी जवानी के दौर में वो खुद भी बॉक्सर थे (बहुत कम वजन वाली श्रेणी में)। रिटायर होने के बाद से वो अपनी इस कला का प्रदर्शन किया करते थे।
भारतीय लोगों (हिन्दू) के लिए ये कोई बड़ा अनोखा किस्सा नहीं है। ऐसी एक कहानी उन्होंने बचपन से ही सुन रखी होती है। रामायण के एक पात्र थे अंगद, जो कि दूत के रूप में रावण के दरबार में गए थे। कथा और उसके फिल्मी रूपों में भी सभी ने देखा-सुना होता है कि अंगद अपना पैर जमीन पर जमा देते हैं। राक्षसों को वो अपना पैर हिला देने की चुनौती देते हैं। एक एक करके बलशाली राक्षस असफल होते जाते हैं। अंत में जब रावण स्वयं आगे बढ़ता है तो वो कहते हैं, जाने दो, राजा मेरे पैर छुए अच्छा नहीं लगेगा!
हो सकता है कुछ लोग इसे काव्य की अतिशयोक्ति की तरह ही लेते आये हों। मल्ल युद्ध की कलाओं का भारत से फिरंगी दौर में ही विनाश हो जाने और फिर शेखुलर सरकारों के दौर में भी मल्लखंभ से लेकर थांग टा जैसी युद्ध कलाओं का पुनः जागरण न होने के कारण ये कोई आश्चर्य की बात भी नहीं। फिर सवाल ये भी है कि जहाँ सरकारें श्री राम का अस्तित्व न होने का हलफ़नामा डालती हो, पुष्पक विमान कहकर मजाक उड़ाने का बुद्धिजीवियों का शगल हो, वहाँ ऐसी छोटी मोटी सी चीज के सच-झूठ होने पर कोई शोध क्यों होता?
जो भी हो, इस तकनीक में जॉनी खुद को उठाने आये व्यक्ति की कलाई के पल्स पॉइंट और कंधे के पास की आर्टरी को दबाते थे। ऐसा करने के बाद व्यक्ति कितना भी बलशाली हो, उनका करीब 60 किलो का वजन उठा नहीं पाता। बाकी रामायण के वास्तविक होने, या न होने पर आप अपनी सोच रखने के लिए स्वतंत्र हैं। उसमें हम (अंगद जैसा) टांग अड़ाने का कोई इरादा नहीं रखते!

भारत में इस मल्लखंभ का अभ्यास बहुत पुराना है. पुराने जमाने में इसका प्रयोग एक कसरत की तरह होता था. कुश्ती लड़ने का अभ्यास करने वाले पहलवानों को शुरू से ही मल्लखंभ पर अभ्यास करवाया जाता था. यहाँ मल्ल पहलवान के लिए और खंभ उस गड़े हुए खूंटे के लिए इस्तेमाल होता है जिसपर पहलवान अभ्यास करता है. अब ये एक अलग विधा भी है लेकिन शुरू में इसका उद्देश्य पहलवान की पकड़ और उसके शारीरिक नियंत्रण, एकाग्रता जैसी चीज़ों को बढ़ाने के लिए होता था.

अगर आयातित विचारधारा वालों और वेटिकन पोषित दल हित चिंतकों की मानें तो ब्राह्मण काम काज तो करते नहीं थे | ऐसे में उनका अंगरक्षक होना, या हथियारों और मल्ल युद्ध का शिक्षक होना तो संभव ही नहीं | फिर भी भारत में घूम कर देखें तो आज ज्येष्ठी मल्ल गुजरात, मैसूर, हैदराबाद और राजस्थान में होते हैं | बड़ोदा में आज भी कुछ ज्येष्ठी मल्ल अपने अखाड़े चलते हैं | ये मोधा ब्राह्मणों के कुल से होते हैं और पारंपरिक रूप से कृष्ण भक्त भी हैं | बारहवीं और तेरहवीं शताब्दी में जब इनका जिक्र आता है तो इन्हें आयुधजीवी ब्राह्मण बताया गया है | मतलब वो ब्राह्मण जो शस्त्रों के जरिये अपनी आजीविका चलाते हैं |
सोलहवीं शताब्दी तक भी इनके मल्ल होने का ही लिखा जाता है | आज भी गुजरात में अगर दो लोगों में गंभीर लड़ाई हो जाये, तो कहते हैं कि वो ज्येष्ठीमल्लों जैसा भिड गए | बारातों के रक्षकों और राजाओं, राजकुमारों के अंगरक्षकों के तौर पर इनका इतिहास बहुत पुराना है | अब इनकी कला धीरे धीरे लुप्त हो चली है इसलिए आपने शायद इनका जिक्र ना सुना हो | अब ना राजा रहे ना उनके अंगरक्षकों में ज्येष्ठीमल्ल नियुक्त होते हैं, इसलिए इन्हें प्रश्रय देने वाला कोई नहीं रहा | अब केवल मैसूर के दुर्गा पूजा उत्सव में ज्येष्ठीमल्ल नजर आते हैं |
इनकी लड़ाई का तरीका इसलिए ख़ास होता है क्योंकि इनके परंपरागत तरीके में सिर्फ सर और छाती पर वार किया जाता है | उस से नीचे प्रहार निषिद्ध है | अपने दाहिने हाथ में ये वज्रमुष्टि पहनते हैं | वही जिसे आम तौर पर Knuckle Duster कहा जाता है | शायद फिल्मों में आपने देखा होगा | पुराने ज़माने में ये भैंस की सींग, हाथी दांत, लकड़ी, लोहे सबसे बनता था | आज ये आम तौर पर सिर्फ लोहे का होता है | युद्धों में इस्तेमाल होने वाली वज्रमुष्टि मं, किनारे की तरफ धारदार नोक भी होती थी | ऐसे ही हथियार का जिक्र पुराने ग्रीक साहित्य में भी आता है |
अभ्यास के लिए हाथों को जकड़ लेने के कई तरीके ज्येष्ठीमल्लों को सिखाये जाते हैं | प्रहारों से सुरक्षा के लिए भी कई दावं पेंच हैं | इस युद्ध में घुटनों और कोहनी का भी इस्तेमाल होता है | अभ्यास या प्रदर्शन के लिए होने वाली लड़ाइयों में छाती से नीचे प्रहार नहीं किया जाता |
जिन पुराणों में इनका जिक्र है उनमे से एक है मल्लपुराण | पीढ़ी दर पीढ़ी आगे आते आते ये ग्रन्थ आज जरा लुप्तप्राय हो गया है लेकिन 1731 की इसकी एक देवनागरी में लिखी प्रति अभी भी ओरिएण्टल रिसर्च इंस्टिट्यूट, पुणे में देखी जा सकती है | इस ग्रन्थ में अन्य तरीकों के अलावा ज्येष्ठीमल्लों की कला का जिक्र भी है | वज्रमुष्टि के उनके इस्तेमाल का जिक्र भी पाया जाता है | ये शब्द ज्येष्ठ यानि सबसे बड़े, सबसे उत्तम से निकल कर आया है | कई अन्य हिन्दुओं के ग्रंथों की तरह ही मल्लपुराण में भी अठारह अध्याय हैं और ये कुश्ती के दाँव पेंच से लेकर, आहार विहार तक, हर चीज़ बताती है |
जो प्रमुख विधाएं मल्लपुराण में हैं, उनमें हैं :
रंगाश्रम – ये सीधा कुश्ती के दाँव पेंच हैं | विरोधी को पटकने से लेकर पटके जाने पर कैसे बचाव करें वो तरीके इस हिस्से में हैं |
स्तम्भाश्रम – मल्लखंभ नाम की जो विधा एक खम्भे पर जिमनास्ट जैसा आपने कभी देखा होगा, वो इसी हिस्से में है |
गोनितका – ये एक भारी भरकम छल्ला होता था तो कई किस्म की कसरतों में काम आता था | कई बार इसे गले और पीठ को मजबूत करने के लिए घंटों गले में टाँगे रखा जाता था |
प्रमदा – गदा और मुग्दर जैसे शस्त्रों के इस्तेमाल की कला इस हिस्से में है | मुग्दर लगभग सभी भारतीय अखाड़ों में अभी भी होता है |
कुंडकवर्तन – दंड बैठक जैसे बिना औजार के होने वाले कसरतों का वर्णन करता है |
उपाहोहाश्रम – किसी कठिन परिस्थिति, किसी दाँव में फंस जाने पर अपने को छुड़ाने की कला |
इस के हिसाब से प्रशिक्षण करीब दस वर्ष की आयु में शुरू होता था | शुरू में ताकत और लम्बे समय तक श्रम करने की विधा पर ध्यान होता था (बल-अतिबल) | बैठक और दंड, ख़ास तौर पर push up के भारतीय प्रकार पर जोर दिया जाता था | उसके बाद छात्र को मल्लखंभ पर अभ्यास करने दिया जाता था ताकि उसकी पकड़ और शरीर पर नियंत्रण बेहतर हो | दौड़ना और तैराकी भी इन अभ्यासों में शामिल था |
इसके बाद अखाड़े में ही दाँव पेंचों का अभ्यास शुरू होता था | अखाड़ा करीब दस गज के व्यास का गोल घेरा सा होता था, कभी कभी चौकोर भी होता था | लगभग हर तीसरे दिन अखाड़े में पानी छिड़का जाता था, मौसम के हिसाब से और तेल, छाछ जैसी चीज़ें भी मिटटी में डाल कर उसे नर्म रखने का विधान था |
ध्यान रहे कि जिन विधाओं पर किताबें लिखी जा सके उनके बनने में सदियाँ लगती हैं | ख़त्म होने में पांच दस साल | भारत चूँकि श्रुति की परम्पराओं पर चलता है और परिवार एक पेशे को आगे बढ़ाता है इसलिए ये युद्ध कलाएं अभी बची हुई हैं | अंग्रेजों के बनाये आर्म्स एक्ट के कारण भारत की सामरिक कलाओं का बहुत तेजी से लोप हुआ है | इन कलाओं को पुनर्जीवित करने में कोई बहुत से साल नहीं लगने वाले | कुंग फु और शाओलीन टेम्पल का नाम पिछले 30-40 साल में ही दुनियां के सामने आया है | ब्रूस ली से पहले कोई जुडो कराटे का नाम भी नहीं जानता था |
बाकी अब ये हमपर है कि हम इन भारतीय परम्पराओं को कितने दिन और जिन्दा रख सकते हैं |
खेलों में छिपा युद्धज्ञान
सन 1850 के दौर में जब अंग्रेजों को भयानक भारतीय प्रतिरोध का सामना करना पड़ा तो धीरे से उन्होंने एक आर्म्स एक्ट लागु कर दिया। इसका उन्हें फायदा ये हुआ कि भारतीय हथियार रखेंगे नहीं तो यहाँ कि शास्त्रों की परंपरा जाती रहेगी। फिर एक प्रशिक्षित सिपाही भी बिना प्रशिक्षण वाली सौ-दो सौ की भीड़ को रोक सकता था। इस तरह पिछले दो सौ सालों में शारीरिक श्रम की भारतीय परंपरा समाप्त हुई। युद्ध की जो विधाएं खेल में सिखा दी जाती थीं, धीरे धीरे उनका खात्मा हो गया।
भारत में इस मल्लखंभ का अभ्यास बहुत पुराना है। पुराने जमाने में इसका प्रयोग एक कसरत की तरह होता था। कुश्ती लड़ने का अभ्यास करने वाले पहलवानों को शुरू से ही मल्लखंभ पर अभ्यास करवाया जाता था। यहाँ मल्ल पहलवान के लिए और खंभ उस गड़े हुए खूंटे के लिए इस्तेमाल होता है जिसपर पहलवान अभ्यास करता है। अब ये एक अलग विधा भी है लेकिन शुरू में इसका उद्देश्य पहलवान की पकड़ और उसके शारीरिक नियंत्राण, एकाग्रता जैसी चीज़ों को बढ़ाने के लिए होता था। इसक पहला लिखित जिक्र हज़ार साल पहले (यानी 1135 सन् में) लिखी गई किताब मनासोल्लास में आता है। इसे सोमेश्वर चालुक्य ने लिखा था। धीरे धीरे बढती हुई ये विधा मराठा साम्राज्य के काल तक एक अलग ही विधा का रूप ले चुकी थी। मराठा काल आने तक इसमें खम्भे के अलावा बिना कहीं गाँठ लगी रस्सी का भी इस्तेमाल होने लगा था। पेशवा बाजीराव द्वित्तीय के काल में बलमभट्ट दादा ने इसमें खम्भे के अलावा रस्सी के इस्तेमाल को भली भांति लिपिबद्ध किया। उस दौर में बांस, लकड़ी की कमी की वजह से भी रस्सी का इस्तेमाल बढ़ने लगा था।
आज की तारिख में इसके तीन प्रकार होते हैं। एक सीधा मल्लखंभ पर, दूसरा थोड़े कम ऊँचे मल्लखंभ और कुछ झूलते हुए खम्भों पर और तीसरा रस्सी पर। एक खेल के तौर पर इसमें भाग लेने वाले खिलाड़ियों को चार श्रेणियों में बांटा जाता है रू
12 से कम आयुवर्ग
14 से कम आयुवर्ग
17/18 से कम आयुवर्ग
(17 स्त्रिायों के लिए और 18 पुरुषों के लिए)
17/18 से ऊपर का आयुवर्ग
विदेशी शासनों के दौरान काफी कुचले जाने के बाद भी ऐसे भारतीय खेल पूरी तरह ख़त्म नहीं हुए। अखाड़ों में इसे अभी भी गुरु शिष्य परंपरा के जरिये आगे बढ़ाया जाता है। ख़ास तौर पर महाराष्ट्र और हैदराबाद के इलाकों में इसके कई प्रशिक्षण केंद्र हैं। मल्लखंभ की राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं भी आयोजित होती हैं।
सन 2013 से ये मध्य प्रदेश का राजकीय खेल भी है। ये आम तौर पर देखा जाता है कि प्रतिस्पर्धा वाले खेलों में खिलाड़ी 25 की आयु तक आते आते खेल से संन्यास ले लेते हैं। 10-12 की उम्र में शुरू करने पर बढ़ती उम्र के साथ शारीरिक क्षमता भी बढ़ती है, 20 आते आते ये स्थायी और 25 के बाद तो घटती ही हैं। ऐसे में किसी भी खेल में प्रशिक्षण काफी कम उम्र में ही शुरू होता है। अगर विदेशी तरीके के जिमनास्ट को भी देखेंगे तो ओलंपिक के गोल्ड मैडल वाले खिलाड़ी अक्सर 15-18 आयु वर्ग के ही होते हैं।
लगभग सभी खेलों में प्रशिक्षण काफी कम उम्र यानि 18 से बहुत पहले शुरू हुआ रहता है। ऐसे में जब फिरंगियों के ज़माने के कानूनों पर चलने वाली अदालतें अपने तुगलकी फरमान में दही हांड़ी उत्सव में 18 से कम उम्र वालों के शामिल होने पर रोक लगाती हैं तो इसके नुकसान का अंदाजा लगाना कोई मुश्किल नहीं है। मल्लखंभ के अखाड़ों के मानव पिरामिड के विरोध की ये नीति और कुछ नहीं बस उसी औपनिवेशिक मानसिकता का परिचायक है।
✍🏻आनन्द कुमार जी की पोस्टों से संग्रहित
भारतीय शस्त्र अधिनियम,1878
ब्रिटिश भारत के वायसराॅय लॉर्ड लिटन की दमनकारी नीतियों में एक और प्रमुख कार्य, भारतीय शस्त्र अधिनियम,1878 था। सन् 1878 में ब्रिटिश पार्लियामेंट से पारित 11वें अधिनियम से किसी भारतीय नागरिक को बिना लाइसेंस शस्त्र/हथियार रखना अथवा उसका व्यापार दंडनीय अपराध बन गया। अधिनियम तोड़ने पर 3 वर्ष तक ज़ेल, अथवा जुर्माना या फिर दोनों, और यदि इसको छुपाया हो तो सात वर्ष तक ज़ेल, अथवा जुर्माना या दोनों दण्ड थे। इसमें भी भेदभाव था। यूरोपीय, ऐंग्लो-इण्डियन अथवा सरकार के कुछ विशेष अधिकारी अधिनियम मुक्त थे। स्पष्ट था कि ब्रिटिश भारत में भारतीय अविश्वसनीय थे।
अधिनियम का मुख्य उद्देश्य भारतीयों को हथियार रखने से रोककर ब्रिटिश शासन का बढ़ता प्रतिरोध दबाना और विद्रोह की आशंका समाप्त करना था। अधिनियम आजादी बाद भी लागू रहा।
अधिनियम ने भारतीयों को हथियार रखने को लाइसेंस लेने को बाध्य किया, जबकि यूरोपीय और यूरेशियाई लोगों को इससे छूट थी।
जनता में रोष:
अधिनियम भारतीयों के असंतोष का प्रमुख कारण बना और राष्ट्रीय नेताओं ने इसका पुरजोर विरोध किया। महात्मा गांधी ने इसे ब्रिटिश शासन के सबसे काले कृत्यों में से एक बताया।
औपनिवेशिक नीति का हिस्सा:
अधिनियम वायसराय लॉर्ड लिटन की दमनकारी नीतियों का एक और उदाहरण था, जिसने भारतीयों के बीच ब्रिटिश शासन के प्रति बढ़ती नाराजगी में योगदान दिया।
प्रतिस्थापन:
स्वतंत्रता के बाद, 1959 में एक नया शस्त्र अधिनियम इसका प्रतिस्थापन बना.
नवीन शस्त्र (संशोधन) विधेयक, 2019
गृह मंत्री अमित शाह ने 29 नवंबर, 2019 को लोकसभा में शस्त्र (संशोधन) विधेयक, 2019 पेश किया। विधेयक शस्त्र अधिनियम, 1959 में संशोधन है। इसका उद्देश्य प्रति व्यक्ति लाइसेंस प्राप्त आग्नेयास्त्रों की संख्या कम घटाना और अधिनियम में कुछ अपराधों में दंड बढ़ाना है। इसमें अपराधों की नई श्रेणियां भी हैं।
आग्नेयास्त्र प्राप्त करने को लाइसेंस: अधिनियम में, कोई भी आग्नेयास्त्र लेने, रखने या ले जाने को लाइसेंस आवश्यक है। एक व्यक्ति अधिकतम तीन आग्नेयास्त्रों का लाइसेंस ले सकता है (कुछ अपवाद, जैसे लाइसेंस प्राप्त आग्नेयास्त्र डीलरों को)। विधेयक में अनुमत आग्नेयास्त्रों की संख्या तीन से घटकर एक है। इसमें उत्तराधिकार या विरासत आधार पर लाइसेंस भी शामिल हैं। विधेयक अतिरिक्त आग्नेयास्त्र निकटतम पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी या निर्दिष्ट लाइसेंस प्राप्त आग्नेयास्त्र डीलर के पास जमा करने को एक वर्ष की समयावधि देता है। स्वामी सशस्त्र बल सदस्य है, तो आग्नेयास्त्र इकाई शस्त्रागार में जमा किया जा सकेगा। एक वर्ष अवधि समाप्त होने के 90 दिनों में अतिरिक्त आग्नेयास्त्रों का लाइसेंस निरस्त हो जाएगा।
विधेयक में आग्नेयास्त्र लाइसेंस की वैधता अवधि तीन वर्ष से बढ़ाकर पांच वर्ष हो गयी है।
आग्नेयास्त्र प्रतिबंध : अधिनियम में बिना लाइसेंस आग्नेयास्त्र निर्माण, बिक्री, उपयोग, हस्तांतरण, रूपांतरण, परीक्षण या प्रूफिंग पर प्रतिबंध है। यह बिना लाइसेंस आग्नेयास्त्रों की नली छोटा करने या नकली आग्नेयास्त्रों को आग्नेयास्त्रों में बदलना भी प्रतिबंधित करता है। बिना लाइसेंस आग्नेयास्त्र प्राप्त करने या खरीदने, और बिना लाइसेंस एक श्रेणी के आग्नेयास्त्रों को दूसरी श्रेणी में बदलना भी प्रतिबंधित करता है। यह राइफल क्लबों या संघों के सदस्यों को केवल पॉइंट 22 बोर राइफलों या एयर राइफलों के बजाय निशाने के अभ्यास को किसी भी आग्नेयास्त्र के उपयोग की अनुमति देता है।
सजा बढाई : विधेयक में कई अपराध संबंधित सजा संशोधन है। अधिनियम यें सजा निर्दिष्ट है: (i) बिना लाइसेंस वाले आग्नेयास्त्रों का व्यापार,उनका निर्माण, खरीद, बिक्री, हस्तांतरण, रूपांतरण है, (ii) बिना लाइसेंस आग्नेयास्त्र का आकार छोटा करना या रूपांतरण और (iii) प्रतिबंधित आग्नेयास्त्र आयात या निर्यात। इन अपराधों को सजा तीन साल से सात साल के बीच, जुर्माने के साथ। विधेयक में सजा बढ़ाकर सात साल से आजीवन कारावास और जुर्माना भी है।
अधिनियम में बिना लाइसेंस प्रतिबंधित गोला-बारूद पाने, रखने या ले जाने पर पाँच से दस साल कैद और जुर्माना है। विधेयक में सजा बढ़ाकर सात से 14 साल कैद और जुर्माने किया गया है। अदालत कारण बताकर सात साल से कम सजा भी दे सकती है।
अधिनियम में बिना लाइसेंस प्रतिबंधित आग्नेयास्त्रों (उनके निर्माण, बिक्री और मरम्मत सहित) के व्यापार पर सात साल से आजीवन कारावास और जुर्माने तक की सज़ा है। विधेयक न्यूनतम सज़ा सात साल से बढ़ाकर 10 साल करता है। यदि प्रतिबंधित हथियारों और गोला-बारूद से किसी की मृत्यु हो जाती है, उनमें सज़ा मौजूदा मृत्युदंड से बढ़ाकर मृत्युदंड या आजीवन कारावास और जुर्माना किया गया है।
नए अपराध : विधेयक में नए अपराध जुड़े हैं। इनमें शामिल हैं: (i) पुलिस या सशस्त्र बलों से जबरन बंदूक छीनना( 10 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की कैद और जुर्माना) , (ii) उत्सव में बंदूकों का इस्तेमाल जिससे मानव जीवन की सुरक्षा को खतरा हो( दो साल तक कैद या एक लाख रुपये तक जुर्माना, या दोनों) । उत्सव में बंदूक चलाना, सार्वजनिक समारोहों, धार्मिक स्थलों, विवाह समारोहों या अन्य समारोहों में गोला-बारूद चलाना बंदूकों का दुरुपयोग संदर्भित करता है।
विधेयक संगठित अपराध सिंडिकेट और अवैध तस्करी अपराध भी परिभाषित करता है। “संगठित अपराध” का तात्पर्य किसी व्यक्ति के, सिंडिकेट सदस्य के रूप में या उसकी ओर से, आर्थिक या अन्य लाभ प्राप्त करने को हिंसा या जबरदस्ती जैसे गैरकानूनी तरीकों का उपयोग करके, गैरकानूनी गतिविधि है। संगठित अपराध सिंडिकेट दो या दो से अधिक व्यक्तियों को संगठित अपराध करने को संदर्भित करता है। अधिनियम का उल्लंघन करते हुए, सिंडिकेट के किसी सदस्य के आग्नेयास्त्र या गोला-बारूद रखने पर 10 साल से लेकर आजीवन कारावास और जुर्माना हो सकता है। यह सजा किसी भी व्यक्ति पर लागू होगी जो बिना लाइसेंस वाले आग्नेयास्त्र (इसके निर्माण या बिक्री सहित) व्यापार करता है, बिना लाइसेंस आग्नेयास्त्र को परिवर्तित करता है, या सिंडिकेट से बिना लाइसेंस आग्नेयास्त्रों का आयात-निर्यात करता है।
विधेयक में अवैध तस्करी की परिभाषा में भारत में या भारत से बाहर आग्नेयास्त्रों या गोला-बारूद का व्यापार, भंडार और बिक्री शामिल है, जहाँ आग्नेयास्त्र या तो अधिनियम के अनुसार चिह्नित नहीं हैं या अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं। अवैध तस्करी को 10 साल से लेकर आजीवन कारावास और जुर्माने तक की सज़ा संभव है।
आग्नेयास्त्रों की ट्रैकिंग: केंद्र सरकार अवैध निर्माण और तस्करी का पता लगाने, जांच करने और विश्लेषण करने के लिए निर्माता से क्रेता तक आग्नेयास्त्रों और गोला-बारूद को ट्रैक करने के नियम बना सकती है।
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