हिरासत और गिरफ्तारी में अंतर नही,24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने ले जाना होगा:सुको

मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की समय-सीमा ‘गिरफ्तारी’ से नहीं, ‘हिरासत’ में लिए जाने से शुरू होती है: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली 05 नवंबर 2026: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ‘गिरफ्तारी’ (Arrest) और ‘हिरासत’ (Detention) के बीच किए जाने वाला बनावटी अंतर खारिज किया। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की समय-सीमा, व्यक्ति को ‘हिरासत’ में लिए जाने के समय से शुरू होगी, न कि केवल उसकी ‘औपचारिक गिरफ्तारी’ के समय से। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने कहा, “यह मानना ​​कि 24 घंटे का समय केवल औपचारिक गिरफ्तारी से शुरू होता है, संविधान के अनुच्छेद 22(2) और BNSS की धारा 56 के संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ है।” Also Read – सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए टीम में काम करने की क्षमता भी अहम: CJI सूर्यकांत बोले- बढ़ती फाइलिंग के बीच कोर्ट अब T20 मैच खेल रहा कोर्ट ने कहा, “अनुच्छेद 22(2) में ऐसी किसी छूट की अनुमति नहीं है, जिसमें गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी द्वारा व्यक्ति को हिरासत में लेने के बाद की गई पूछताछ या जांच में लगे समय को 24 घंटे की अवधि से बाहर रखा जाए। यह अनुच्छेद 22 के खंड (2) के दायरे से बाहर है। संविधान में केवल एक ही अपवाद दिया गया है—गिरफ्तारी की जगह से मजिस्ट्रेट की अदालत तक पहुंचने में लगने वाला आवश्यक समय।” कोर्ट ने स्पष्ट किया, “इसलिए यह तर्क कि अनुच्छेद 22 के खंड (2) में 24 घंटे की अवधि ‘तलाशी और जब्ती’ (Search and Seizure) पूरी होने के बाद या गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी द्वारा दर्ज की गई गिरफ्तारी के समय से शुरू होती है, न केवल कानूनी रूप से गलत है, बल्कि पूरी तरह से असंवैधानिक भी है।”

कोर्ट ने इस विचार से असहमति जताई कि कुछ समय के लिए हिरासत में रखना ‘गिरफ्तारी’ नहीं है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी मौलिक अधिकार को अस्थायी रूप से निलंबित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने निर्देश दिया कि मजिस्ट्रेट को हिरासत में लिए जाने की तारीख और समय दर्ज करना चाहिए। साथ ही यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हिरासत में लिए जाने के समय से 24 घंटे की समय-सीमा का पालन किया गया या नहीं। ‘गिरफ्तारी’ और ‘हिरासत’ के बीच कोई अंतर नहीं
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिरासत और गिरफ्तारी के बीच कोई भी बनावटी अंतर करना संवैधानिक रूप से गलत है। अदालत ने ‘आर्यमन पटनायक’ मामले में उड़ीसा हाई कोर्ट, ‘अरुण के. थॉमस’ मामले में केरल हाईकोर्ट और ‘कन्नन’ मामले में मद्रास हाई कोर्ट के विचारों से असहमति जताई। इन मामलों में कहा गया कि गिरफ्तारी से पहले हिरासत में बिताए गए समय को संविधान के अनुच्छेद 22 में 24 घंटे की अवधि से बाहर रखा जा सकता है। अदालत ने माना कि ये फैसले संविधान के अनुच्छेद 22(2) में सही कानून को स्पष्ट नहीं करते हैं।

अदालत ने ‘बिस्वजीत मंडल’ मामले में केरल हाई कोर्ट के उस विचार को सही माना, जिसमें कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद 22(2) में किसी आरोपी को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की समय-सीमा उस पल से शुरू हो जाती है, जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर वास्तव में रोक लग जाती है—न कि उस समय से जब पुलिस औपचारिक रूप से गिरफ्तारी दर्ज करती है। अदालत ने गौर किया कि अनुच्छेद 22(2) में “हर वह व्यक्ति जिसे गिरफ्तार किया गया और हिरासत में रखा गया है” वाक्यांश का इस्तेमाल किया गया है। अदालत ने कहा कि “गिरफ्तार” (Arrested) और “हिरासत में रखा गया” (Detained) शब्दों को एक साथ और आपस में जुड़े हुए (Joint and Conjunctive) रूप में देखा जाना चाहिए। चूंकि ये शब्द आपस में जुड़े हुए हैं, इसलिए इनका अर्थ एक ही माना जाएगा। अदालत ने कहा, “ऐसा इसलिए है, क्योंकि संविधान ‘गिरफ्तारी’ से अलग किसी भी तरह की ‘हिरासत’ (Detention) को मान्यता नहीं देता है।” अदालत ने सवाल किया कि ‘गिरफ्तारी’ और ‘हिरासत’ के बीच कोई बनावटी फर्क करना बहुत बड़ी समस्या खड़ी कर सकता है। अगर हम शब्दों के ऐसे फेर में पड़ जाएं तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठेगा कि ‘जांच के लिए छोटी अवधि’ क्या है, या यह कौन तय करेगा कि कोई हिरासत उस छोटी अवधि से आगे बढ़ गई है? अदालत उन चार लोगों की अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिन्होंने NDPS Act में दर्ज एक मामले में त्रिपुरा हाईकोर्ट द्वारा जमानत खारिज किए जाने के फैसले को चुनौती दी थी। उन्हें 29 सितंबर 2025 को दोपहर 2 बजे तलाशी और जब्ती (Search and Seizure) की कार्रवाई के दौरान हिरासत में लिया गया, लेकिन आधिकारिक तौर पर उन्हें 30 सितंबर 2025 को सुबह 11 बजे गिरफ्तार दिखाया गया। अदालत ने फैसला सुनाया कि उन्हें 29 सितंबर को दोपहर 2 बजे से 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए। अदालत ने गौर किया कि उन्हें बिना किसी न्यायिक निगरानी (Judicial Oversight) के लगभग 18 घंटे तक हिरासत में रखा गया। इसे अनुच्छेद 22(2) का उल्लंघन मानते हुए अदालत ने उन्हें तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि हिरासत में होने वाली हिंसा की घटनाओं को देखते हुए, हिरासत पर उचित न्यायिक निगरानी होना बहुत जरूरी है। निष्कर्ष जस्टिस भुइयां ने फैसले के निष्कर्ष इस प्रकार बताए: 1. अनुच्छेद 22 में [मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने के लिए] 24 घंटे की समय-सीमा उस तारीख और समय से शुरू होगी, जब व्यक्ति को हिरासत में लिया गया (यानी जब उसकी स्वतंत्रता पर रोक लगी थी), न कि उसकी औपचारिक गिरफ्तारी के समय से। 2. यदि किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने से पहले 24 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में रखा जाता है, तो उसे तुरंत हिरासत से रिहा कर दिया जाना चाहिए। 3. 24 घंटे की समय-सीमा की गणना करते समय गिरफ्तारी की जगह से मजिस्ट्रेट की अदालत तक की यात्रा में लगने वाले आवश्यक समय को छोड़कर, किसी अन्य समय को इसमें से नहीं घटाया जा सकता। 4. ‘आर्यमा पटनायक’ मामले में उड़ीसा हाईकोर्ट, ‘कन्नन’ मामले में मद्रास हाईकोर्ट और ‘अरुण के. थॉमस’ मामले में केरल हाईकोर्ट के फैसले, अनुच्छेद 22(2) की व्याख्या के संबंध में सही कानून नहीं बताते हैं। 5. हिरासत में लेने वाले अधिकारी को न केवल अनुच्छेद 22(2) द्वारा अनिवार्य 24 घंटे की समय-सीमा का ध्यान रखना चाहिए, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि BNSS की धारा 58 के तहत मामले की परिस्थितियों को देखते हुए, हिरासत की अवधि 24 घंटे के भीतर भी ‘उचित समय’ से अधिक न हो। 6. व्यक्ति को पेश करते समय मजिस्ट्रेट का यह कर्तव्य है कि वह उस वास्तविक तारीख और समय को दर्ज करे जब व्यक्ति को हिरासत में लिया गया (यानी जब उसकी स्वतंत्रता पर रोक लगी थी)। साथ ही मजिस्ट्रेट को यह जांचना चाहिए कि क्या हिरासत में लेने के समय से 24 घंटे की समय-सीमा का पालन किया गया है या नहीं। यदि 24 घंटे की समय-सीमा का उल्लंघन हुआ है तो संबंधित व्यक्ति को तुरंत हिरासत से रिहा कर दिया जाना चाहिए। 7. व्यक्ति को पेश करते समय मजिस्ट्रेट को यह भी जांचना चाहिए कि क्या हिरासत की अवधि—भले ही वह 24 घंटे के भीतर हो—मामले की परिस्थितियों को देखते हुए ‘उचित समय’ से अधिक तो नहीं है। यदि मजिस्ट्रेट इस बात से संतुष्ट हैं कि व्यक्ति को उचित समय से अधिक अवधि तक हिरासत में रखा गया है, तो वे रिमांड देने से इनकार कर सकते हैं। त्रिपुरा हाईकोर्ट ने 11.03 किलोग्राम ‘याबा’ टैबलेट की बरामदगी से जुड़े मामले में गिरफ्तार चार आरोपियों को जमानत देने से इनकार किया। अदालत ने कहा कि जब मामला प्रतिबंधित पदार्थों की व्यावसायिक मात्रा (कमर्शियल क्वांटिटी) से जुड़ा हो तो जमानत देने से पहले NDPS Act की धारा 37 में दी गई दो सख्त शर्तों को पूरा करना अनिवार्य है। अदालत ने आरोपियों की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि गिरफ्तारी के दौरान BNSS की धारा 36 में निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ था। हाईकोर्ट ने ‘स्टेट ऑफ पंजाब बनाम सुखविंदर सिंह उर्फ ​​गोरा’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का हवाला दिया। इस फैसले में कहा गया था कि केवल लंबे समय तक जेल में बंद रहने के आधार पर NDPS अधिनियम में जमानत पर लगी कानूनी पाबंदियों को दरकिनार नहीं किया जा सकता।

मुख्य सुर्खियां ताजा खबरें सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट उपभोक्ता मामले जानिए हमारा कानून वीडियो राउंड अप अन्य LiveLaw English Home/जानिए हमारा कानून/Know The Law | गिरफ़्तारी के लिखित… Know The Law | गिरफ़्तारी के लिखित आधार न बताने के नतीजे: सुप्रीम कोर्ट ने समझाया Shahadat 26 Sept 2026 11:56 AM (8 mins read ) Share this सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फिर से कहा कि आरोपी का यह मौलिक और कानूनी अधिकार है कि उसे गिरफ़्तारी के आधार लिखित रूप में बताए जाएं, और गिरफ़्तार व्यक्ति को ये लिखित आधार बिना किसी अपवाद के और सामान्य प्रक्रिया के तहत दिए जाने चाहिए। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल चन्दुरकर की बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत यह ज़रूरत सिर्फ़ प्रक्रिया की औपचारिकता नहीं है, बल्कि एक ज़रूरी संवैधानिक सुरक्षा है जो सभी कानूनों के तहत गिरफ़्तारी पर लागू होती है, जिसमें भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) और विशेष कानून भी शामिल हैं। Also Read – एक्सप्लेनर: क्या होते हैं पीस बॉन्ड? किन परिस्थितियों में एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति से शांति बनाए रखने के लिए बांड भरवा सकते हैं? अनुच्छेद 22(1) में कहा गया कि किसी भी गिरफ़्तार व्यक्ति को गिरफ़्तारी के आधार बताए बिना हिरासत में नहीं रखा जाएगा (जितनी जल्दी हो सके आधार बताए जाने चाहिए) और उसे अपनी पसंद के वकील से सलाह लेने और बचाव करने के अधिकार से वंचित नहीं किया जाएगा। CrPC की धारा 50(1), जो BNSS की धारा 47 के समान है, इस सुरक्षा को कानूनी रूप देती है। इसके तहत गिरफ़्तार करने वाले अधिकारी को अपराध की पूरी जानकारी या गिरफ़्तारी के अन्य आधार तुरंत बताने होते हैं। Also Read – Know The Law | ट्रायल शुरू होने के बाद वाद-पत्र में संशोधन कब किया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने CPC के आदेश VI नियम 17 के तहत स्पष्ट किया कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि गिरफ़्तारी के आधार बताने का मकसद यह है कि गिरफ़्तार व्यक्ति गिरफ़्तारी का आधार समझ सके और वकील से सलाह ले सके, ताकि गिरफ़्तारी, पुलिस रिमांड या ज़मानत की अर्ज़ी को चुनौती दी जा सके। अपने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि यह जानकारी सही तरीके से और ऐसी भाषा में दी जानी चाहिए जिसे गिरफ़्तार व्यक्ति समझ सके। कोर्ट ने ‘मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य’ मामले में तय सिद्धांत का हवाला दिया। इस सिद्धांत के अनुसार, अगर पुलिस के पास गिरफ़्तारी का ठोस आधार बताने वाले दस्तावेज़ पहले से मौजूद हैं तो गिरफ़्तारी के समय आरोपी को गिरफ़्तारी के लिखित आधार ज़रूर दिए जाने चाहिए। Also Read – Know The Law | मोटर दुर्घटना का क्लेम कहां दायर किया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने बताया मिहिर शाह मामले के फैसले के अनुसार, एक अपवाद तब हो सकता है, जब तुरंत लिखित आधार देना व्यावहारिक न हो, जैसे कि शरीर या संपत्ति के खिलाफ़ अपराध जो ‘फ्लैग्रेंट डेलिक्टो’ (अपराध करते हुए रंगे हाथों पकड़े जाने) की स्थिति में किए गए हों। ऐसे मामलों में आधार शुरू में मौखिक रूप से बताए जा सकते हैं। लेकिन गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उचित समय के भीतर और किसी भी हाल में आरोपी को रिमांड के लिए मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने से कम से कम दो घंटे पहले दिए जाने चाहिए। Also Read – सुप्रीम कोर्ट ने मेथनॉल में एडिटिव्स मिलाने के महाराष्ट्र के नियमों को रद्द किया, ज़हरीली शराब से होने वाली मौतों को रोकने के लिए जारी किए नए निर्देश कानूनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने कहा: 1. इस बात पर ज़ोर दिया कि अनुच्छेद 22(1) के तहत सुरक्षा उपाय मौलिक सिद्धांत हैं, न कि केवल प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय। 2. इस तर्क को खारिज किया कि ऐसे उल्लंघन को केवल प्रक्रियात्मक चूक माना जा सकता है, जिसका कस्टडी की वैधता पर कोई असर नहीं पड़ेगा। साथ ही अनुच्छेद 22(1) का पालन न करने पर गिरफ्तारी को अवैध ठहराने से पहले आरोपी को नुकसान (prejudice) साबित करना होगा। कोर्ट ने कहा कि एक बार उल्लंघन हो जाने पर नुकसान या साबित करने योग्य नुकसान का सवाल ही नहीं उठता। 3. गिरफ्तारी के आधार न बताए जाने के कारण रिहाई और ज़मानत पर रिहाई के बीच अंतर स्पष्ट किया। अनुच्छेद 22(1) के तहत संवैधानिक ज़रूरत का उल्लंघन होने के कारण रिहा किए गए आरोपी को “ज़मानत पर रिहा” नहीं माना जाता, बल्कि उसे अवैध और असंवैधानिक हिरासत से रिहा किया जाता है। 4. इस बात पर ज़ोर दिया कि गिरफ्तारी के आधार बताने की ज़रूरत किसी खास कानून तक सीमित नहीं है। अनुच्छेद 22(1) सभी मामलों में लागू होता है, जिसमें BNS और विशेष कानूनों के तहत गिरफ्तारियां भी शामिल हैं। कोर्ट ने कहा कि यह किसी खास कानून तक सीमित नहीं है और इस सुरक्षा को कमज़ोर करने की किसी भी कोशिश से सख्ती से निपटा जाना चाहिए। 5. कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन न केवल गिरफ्तारी को, बल्कि उसके बाद की रिमांड को भी अमान्य कर देता है। कोर्ट ने कहा कि बाद में चार्जशीट दाखिल करना या संज्ञान लेने का आदेश उस गिरफ्तारी को वैध नहीं बना सकता जो शुरू से ही असंवैधानिक थी। कोर्ट का यह निष्कर्ष गिरफ्तारी के आधार बताने से जुड़े पिछले फैसलों की समीक्षा के बाद निकला। इसने मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य और मेघालय राज्य बनाम सोनम रघुवंशी के मामलों में अपने पिछले फैसलों से बनी स्थिति को भी स्पष्ट किया और कहा कि मिहिर राजेश शाह का मामला इस मुद्दे पर बाध्यकारी कानूनी स्थिति को दर्शाता है। मिहिर शाह मामले के फ़ैसले में कहा गया कि गिरफ़्तारी की वजहें लिखित में बताई जानी चाहिए और वे हालात भी बताए गए, जिनमें कुछ समय के लिए ज़बानी जानकारी दी जा सकती है। साथ ही, ये वजहें उस भाषा में बताई जानी चाहिए जो आरोपी को समझ आती हो। सोनम रघुवंशी मामले में आरोपी को 9 जून, 2025 को गिरफ़्तार किया गया और गिरफ़्तारी की वजहें उसी दिन उसे बता दी गईं। उसकी आपत्ति यह थी कि वजहों में धारा 103(1) के बजाय BNS की धारा 403(1) का ज़िक्र किया गया था। एक समान बेंच ने इसे साफ़ तौर पर टाइपिंग की गलती माना। सोनम रघुवंशी मामले के फ़ैसले में एक समान बेंच ने गिरफ़्तारी की वजहें बिल्कुल न बताने और अपर्याप्त वजहें बताने के बीच फ़र्क किया। बेंच ने कहा कि वजहें बिल्कुल न बताने से गिरफ़्तारी अमान्य हो जाएगी, जबकि अपर्याप्त वजहों के मामले में यह देखना होगा कि आरोपी को इससे क्या नुकसान हुआ। बेंच ने यह भी कहा कि वजहें बताने की ज़रूरत को पूरा न करने और उसके बाद आरोपी को रिहा करने से जांच एजेंसी को जांच के मक़सद से आरोपी को दोबारा गिरफ़्तार करने से नहीं रोका जा सकेगा। मौजूदा मामले में कोर्ट ने कहा कि सोनम रघुवंशी मामले का फ़ैसला मिहिर राजेश शाह मामले के फ़ैसले से “अलग राय वाला लग सकता है”। हालाँकि, कोर्ट ने कहा कि सोनम रघुवंशी मामले का फ़ैसला मौजूदा कानूनी स्थिति को तय नहीं करता। कोर्ट ने बताया कि सोनम रघुवंशी मामले में गिरफ़्तारी मिहिर राजेश शाह मामले से पहले ही हो गई। कोर्ट ने कहा, “इसलिए मिहिर राजेश शाह मामले का फ़ैसला ही सही कानूनी स्थिति बताता है और सही कानून तय करता है जो बाध्यकारी है। यह इस कोर्ट द्वारा सालों से विकसित कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप है।” इसके बाद कोर्ट ने वे सुरक्षा उपाय बताए, जिनका पालन किसी ऐसे आरोपी को दोबारा गिरफ़्तार करने की कोशिश के दौरान किया जाना चाहिए, जिसे अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन के कारण रिहा किया गया हो। मिहिर शाह मामले के फ़ैसले के अनुसार, अगर किसी व्यक्ति को इसलिए रिहा किया जाता है, क्योंकि गिरफ़्तारी के कारण नहीं बताए गए और जांच एजेंसी को अभी भी कस्टडी की ज़रूरत है, तो उसे संबंधित मजिस्ट्रेट के पास एक अर्ज़ी देनी होगी। इस अर्ज़ी में कस्टडी की ज़रूरत और कारणों के साथ-साथ यह भी बताना होगा कि शुरू में गिरफ़्तारी के कारण क्यों नहीं बताए गए। इस मामले में कोर्ट ने मिहिर शाह मामले के फ़ैसले में दी गई सुरक्षा को और मज़बूत किया। कोर्ट ने कहा – 1. जांच एजेंसी को सबसे पहले आरोपी को गिरफ़्तारी के लिखित कारण बताने होंगे। उसके बाद ही वह कस्टडी या दोबारा गिरफ़्तारी के लिए संबंधित मजिस्ट्रेट के पास अर्ज़ी दे सकती है। 2. अर्ज़ी में दोबारा गिरफ़्तारी के कारण, कस्टडी में पूछताछ की ज़रूरत और इस बात का स्पष्टीकरण होना चाहिए कि जब आरोपी को पहली बार गिरफ़्तार किया गया, तब गिरफ़्तारी के कारण क्यों नहीं बताए गए। 3. अर्ज़ी पर तुरंत ऊपर के अधिकारी की मंज़ूरी भी होनी चाहिए। इस ज़रूरत का मकसद “किसी भी तरह की गड़बड़ी या मिलीभगत को रोकना” और यह पक्का करना है कि ऊपर के अधिकारी को पता हो कि नीचे के अधिकारी ने संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन किया। 4. मजिस्ट्रेट को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए तेज़ी से, यानी एक हफ़्ते के अंदर, अर्ज़ी पर विचार करना चाहिए। दोबारा गिरफ़्तारी का फ़ैसला उसी अधिकारी की मर्ज़ी पर नहीं छोड़ा जा सकता जिसने अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन किया था। इसे “न्यायिक मंज़ूरी” मिलनी चाहिए। 5. मजिस्ट्रेट दोबारा गिरफ़्तारी की इजाज़त तभी दे सकते हैं, जब वे इस बात से संतुष्ट हों कि पहली बार गिरफ़्तारी के कारण न बताने के पीछे सही वजहें थीं, बाद में कारण बता दिए गए, और फिर भी आरोपी को दोबारा गिरफ़्तार करने की ज़रूरत है। 6. शुरुआती उल्लंघन के लिए ज़िम्मेदार अधिकारी के ख़िलाफ़ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की जानी चाहिए, और जांच किसी दूसरे अधिकारी को सौंपी जानी चाहिए। Case Details: Jaskaran Jeet Singh Deol v. State of Punjab | Crl.A. No. 4234/2026 Diary No. 35041/2026 अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें Tags Know The LawArrestPolicePolice ArrestSupreme Court Shahadat Next Story एक्सप्लेनर: क्या होते हैं पीस बॉन्ड? किन परिस्थितियों में एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति से शांति बनाए रखने के लिए बांड भरवा सकते हैं? Amir Ahmad 31 Oct 2026 12:56 PM (10 mins read ) Share this दिल्ली हाईकोर्ट ने पिछले सप्ताह ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की नेता नेहा बोरा की याचिका खारिज की। याचिका में उन्होंने 16 अक्टूबर को मंडी हाउस में विरोध प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए जाने के बाद स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) द्वारा जारी उस नोटिस को चुनौती दी, जिसमें उन्हें जांच के दौरान शांति बनाए रखने के लिए 10,000 रुपये का व्यक्तिगत बांड और एक जमानतदार देने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि नोटिस SEM की व्यक्तिपरक संतुष्टि पर आधारित था। मजिस्ट्रेट ने प्राप्त जानकारी, तीन जनरल डायरी प्रविष्टियों, 17 अक्टूबर 2026 की कलंदर (केस फाइल) और तीन गवाहों के बयानों की जांच की थी। कोर्ट के अनुसार, यह प्रक्रिया भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 और 130 की आवश्यकताओं को पूरा करती है। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि शांति भंग होने की आशंका पर राय बनाते समय SEM को किसी तथ्य-जांच प्राधिकरण की तरह विस्तृत जांच करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि यह कार्रवाई निवारक होती है, दंडात्मक नहीं। शो-कॉज नोटिस जारी किए जाने के शुरुआती चरण में हाईकोर्ट SEM की जगह लेकर उसकी व्यक्तिपरक संतुष्टि की जांच नहीं कर सकता। यह मामला BNSS के तहत शांति बनाए रखने के लिए बांड भरवाने की प्रक्रिया और उन परिस्थितियों को समझने का अवसर देता है, जिनमें एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट इस शक्ति का इस्तेमाल कर सकते हैं। पीस बॉन्ड एक निवारक उपाय है, जिसका उद्देश्य ऐसे व्यक्ति को संभावित रूप से शांति भंग करने से रोकना है। इसके लिए किसी FIR या अपराध का दर्ज होना जरूरी नहीं है। किन परिस्थितियों में जारी हो सकता है नोटिस? BNSS की धारा 126 के तहत यदि एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को सूचना मिलती है कि कोई व्यक्ति शांति भंग कर सकता है, तो वह उससे कारण बताने के लिए कह सकता है कि उससे शांति बनाए रखने का बांड क्यों न भरवाया जाए। धारा 127 के तहत मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति से एक वर्ष तक अच्छे आचरण के लिए बांड भरवाने का कारण बताने को कह सकता है। यह प्रावधान तब लागू होता है, जब मजिस्ट्रेट को सूचना मिले कि कोई व्यक्ति भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152, 196, 197 या 299 के तहत दंडनीय सामग्री का प्रसार कर रहा है, ऐसा करने का प्रयास कर रहा है या उसमें सहायता कर रहा है। इसमें किसी जज के खिलाफ मानहानिकारक या आपराधिक धमकी वाली सामग्री और अश्लील सामग्री का प्रसार भी शामिल है। धारा 128 के तहत यदि मजिस्ट्रेट को सूचना मिले कि कोई व्यक्ति संज्ञेय अपराध करने के उद्देश्य से अपनी मौजूदगी छिपाने का प्रयास कर रहा है, तो उससे शांति बनाए रखने का बांड भरने के संबंध में कारण बताने को कहा जा सकता है। वहीं, धारा 129 के तहत यदि किसी व्यक्ति के आदतन अपराधी होने की सूचना मिलती है, तो एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट उससे तीन वर्ष तक अच्छे आचरण के लिए बांड भरने का कारण बताने को कह सकता है। BNSS की धारा 130 के अनुसार, मजिस्ट्रेट को लिखित आदेश के जरिए शो-कॉज नोटिस जारी करना होगा। इसमें प्राप्त सूचना का सार, बांड की राशि, उसकी वैधता की अवधि और जमानतदारों की संख्या बतानी होगी। जमानतदारों की पर्याप्तता और उपयुक्तता पर भी विचार किया जाना चाहिए। नोटिस जारी होने के बाद क्या प्रक्रिया होती है? यदि नोटिस पाने वाला व्यक्ति अदालत में मौजूद है, तो धारा 131 के तहत धारा 130 का आदेश उसे पढ़कर सुनाया जाएगा। यदि वह चाहे तो आदेश का सार उसे समझाया भी जाएगा। यदि व्यक्ति अदालत में मौजूद नहीं है, तो धारा 132 के तहत मजिस्ट्रेट उसे समन जारी करेगा। यदि वह हिरासत में है, तो उसे अदालत में पेश करने के लिए उस अधिकारी को वारंट जारी किया जाएगा, जिसकी हिरासत में वह है। धारा 133 के अनुसार, ऐसे प्रत्येक समन या वारंट के साथ धारा 130 के आदेश की प्रति भी दी जानी चाहिए। धारा 134 मजिस्ट्रेट को यह अधिकार देती है कि वह व्यक्ति की व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दे और उसे वकील के माध्यम से पेश होने की अनुमति प्रदान करे। मजिस्ट्रेट की जांच और अंतरिम बांड इसके बाद धारा 135(1) के तहत मजिस्ट्रेट उस सूचना की सत्यता की जांच करेगा, जिसके आधार पर कार्यवाही शुरू की गई। जरूरत पड़ने पर वह अतिरिक्त साक्ष्य भी ले सकता है। यह जांच समन मामलों में सुनवाई और साक्ष्य दर्ज करने की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार की जाएगी। धारा 135(3) के तहत मजिस्ट्रेट लिखित कारण दर्ज करने के बाद व्यक्ति को जांच पूरी होने तक शांति बनाए रखने के लिए अंतरिम बांड भरने का निर्देश दे सकता है। यदि व्यक्ति बांड नहीं भरता है, तो जांच पूरी होने तक उसे हिरासत में भी रखा जा सकता है। हालांकि, धारा 127, 128 या 129 के तहत किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्यवाही शुरू नहीं की गई है, तो उसे अच्छे आचरण के लिए बांड या जमानत बांड भरने का निर्देश नहीं दिया जा सकता। बांड की शर्तें भी धारा 130 के शो-कॉज नोटिस में बताई गई शर्तों से अधिक कठोर नहीं हो सकतीं। धारा 135(6) के अनुसार, जांच शुरू होने की तारीख से छह महीने के भीतर पूरी होनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है, तो छह महीने की अवधि समाप्त होने पर कार्यवाही समाप्त हो जाएगी, जब तक कि मजिस्ट्रेट विशेष कारण दर्ज कर जांच जारी रखने का निर्देश न दे। इस प्रकार, विशेष परिस्थितियों में छह महीने से आगे भी जांच जारी रह सकती है। हालांकि, धारा 135(7) के तहत सेशन जज जांच जारी रखने के ऐसे निर्देश को रद्द कर सकता है, यदि उसे लगे कि बताए गए कारण विशेष कारण नहीं हैं या वे विकृत हैं। जांच पूरी होने के बाद क्या होता है? यदि जांच के बाद यह साबित हो जाता है कि शांति बनाए रखने के लिए बांड भरवाना जरूरी है, तो मजिस्ट्रेट धारा 136 के तहत अंतिम आदेश पारित करेगा। बांड की राशि और अवधि शो-कॉज नोटिस में बताई गई राशि और अवधि से अलग नहीं हो सकती। बांड की राशि तय करते समय मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखना होगा और राशि अत्यधिक नहीं होनी चाहिए। यदि संबंधित व्यक्ति बच्चा है, तो बांड केवल उसके जमानतदारों द्वारा निष्पादित किया जाएगा। इसके विपरीत, यदि जांच में यह साबित नहीं होता कि शांति बनाए रखने के लिए बांड जरूरी है, तो धारा 137 के तहत मजिस्ट्रेट रिकॉर्ड में इस आशय की प्रविष्टि करेगा। यदि व्यक्ति केवल जांच के उद्देश्य से हिरासत में है, तो उसे रिहा करने का निर्देश दिया जाएगा। यदि वह हिरासत में नहीं है, तो उसे कार्यवाही से मुक्त कर दिया जाएगा। क्या मजिस्ट्रेट जमानतदार को अस्वीकार कर सकता है? BNSS की धारा 140 के तहत मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति द्वारा पेश किए गए जमानतदार को स्वीकार करने से इनकार कर सकता है। वह पहले से स्वीकार किए गए जमानतदार को भी अयोग्य मानते हुए अस्वीकार कर सकता है। हालांकि, ऐसा करने से पहले मजिस्ट्रेट को स्वयं जमानतदार की उपयुक्तता की जांच करनी होगी या अपने अधीनस्थ किसी मजिस्ट्रेट से जांच कराकर रिपोर्ट मंगानी होगी। पीस बॉन्ड के आदेश को कैसे चुनौती दी जा सकती है? यदि जांच पूरी होने तक अंतरिम स्तर पर SEM किसी व्यक्ति को पीस बॉन्ड भरने का निर्देश देता है, तो इस आदेश को BNSS की धारा 438 के तहत सेशन कोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका के जरिए चुनौती दी जा सकती है। यह तर्क दिया जा सकता है कि ऐसा आदेश अंतरिम है और उसके खिलाफ पुनरीक्षण नहीं किया जा सकता। हालांकि, अदालतों ने माना है कि जब मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति को जमानतदारों के साथ बांड भरने का निर्देश देता है, तो इससे उसके अधिकारों पर पर्याप्त प्रभाव पड़ता है और आदेश को केवल अंतरिम नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने अमर नाथ एवं अन्य बनाम हरियाणा राज्य (1977) मामले में कहा था कि ऐसा आदेश जो आरोपी के अधिकारों को काफी हद तक प्रभावित करता है, उसे पुनरीक्षण पर रोक लगाने के उद्देश्य से अंतरिम आदेश नहीं माना जा सकता। इसी फैसले का अनुसरण करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने अंकपुट्टास्वामी एवं अन्य बनाम पापेगौड़ा एवं अन्य (1978) मामले में कहा था कि याचिकाकर्ताओं को पीस बॉन्ड भरने का कारण बताने के लिए जारी सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट के आदेशों को पुनरीक्षण में चुनौती दी जा सकती है। वहीं, BNSS की धारा 414 के तहत जांच पूरी होने के बाद धारा 136 के अंतर्गत शांति या अच्छे आचरण के लिए सुरक्षा देने का निर्देश मिलने पर, या धारा 140 के तहत किसी जमानतदार को अस्वीकार किए जाने के आदेश से असंतुष्ट व्यक्ति सेशन कोर्ट में अपील कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने मजिस्ट्रेट की शक्तियों पर क्या कहा है? इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला मधु लिमये बनाम सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट, मुंगेर (1970) है। सात जजों की संविधान पीठ ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 144 और उसके अध्याय 8 के प्रावधानों की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी थी। ये प्रावधान अब क्रमशः BNSS की धारा 163 और अध्याय 9 यानी धाराओं 125 से 143 में शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) से (d) के तहत मौलिक अधिकारों पर उचित प्रतिबंध माना था। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता केवल कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही सीमित की जा सकती है, मजिस्ट्रेट की मनमर्जी से नहीं। कोर्ट ने कहा था कि जांच वास्तव में शुरू किए बिना और साक्ष्यों के आधार पर प्रथम दृष्टया संतुष्टि दर्ज किए बिना किसी व्यक्ति को अंतरिम बांड भरने का निर्देश देना और उसे हिरासत में भेजना अवैध है। मजिस्ट्रेट को शुरुआती चरण में भी यह सुनिश्चित करना होगा कि संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कार्यवाही शुरू करने के लिए प्रथम दृष्टया मामला मौजूद है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि व्यक्ति को वकील के जरिए अपना पक्ष रखने का अधिकार है और वह इसके लिए उचित समय भी मांग सकता है। मजिस्ट्रेट के लिए जांच शुरू किए बिना मामले को स्थगित करना और इस बीच बांड न भरने के कारण व्यक्ति को जेल भेजना उचित नहीं है। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2018 में अल्दानिश रेन बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) मामले में इस फैसले का अनुसरण किया था। डिवीजन बेंच ने कहा था कि स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को रिमांड की मांग पर अपना दिमाग लगाना होगा और यह देखना होगा कि न्यायिक हिरासत का आदेश वास्तव में जरूरी है या नहीं। कोर्ट ने SEM द्वारा बिना विचार किए एक जैसे प्रारूप वाले आदेश पारित करने की आलोचना भी की थी। बांड की राशि के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में इस्तकार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में कहा था कि CrPC के अध्याय 8 के प्रावधान, जो अब BNSS के अध्याय 9 में हैं, केवल निवारक प्रकृति के हैं और उनका इस्तेमाल सजा देने के साधन के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। बांड का उद्देश्य सरकारी खजाना बढ़ाना नहीं, बल्कि संभावित शांति भंग को रोककर सार्वजनिक शांति और व्यवस्था बनाए रखना है। क्या पीस बॉन्ड भरने के बाद उसी घटना को लेकर FIR दर्ज हो सकती है? पीस बॉन्ड की कार्यवाही और FIR दर्ज करना दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। पीस बॉन्ड निवारक प्रकृति का है, जबकि एफआईआर किसी संज्ञेय अपराध की जांच शुरू करने का आधार बनती है। इसलिए पीस बॉन्ड भरने के बाद भी बाद की घटना या अपराध के संबंध में FIR दर्ज की जा सकती है। दोनों प्रक्रियाओं के अलग उद्देश्य होने के कारण ऐसी स्थिति में दोहरे दंड के सिद्धांत का तर्क अपने आप लागू नहीं होता। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने 2026 में बृज लाल एवं अन्य बनाम केंद्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर एवं अन्य मामले में कहा था कि CrPC की धाराओं 107 और 117 के तहत कार्यवाही, जो अब BNSS की धाराओं 126 और 136 के अनुरूप हैं, निवारक प्रकृति की हैं, जबकि FIR के बाद शुरू होने वाली कार्यवाही दंडात्मक प्रकृति की होती है। हालांकि, केवल बाद में FIR दर्ज हो जाने से यह साबित नहीं हो जाता कि पीस बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन हुआ है। मद्रास हाईकोर्ट ने 2026 में राम कुमार बनाम तमिलनाडु राज्य मामले में कहा था कि FIR संज्ञेय अपराध की सूचना देकर जांच शुरू कराती है, लेकिन वह अपने आप में ठोस साक्ष्य नहीं है। इसी तरह, केवल FIR दर्ज होना निवारक बांड की शर्तों के उल्लंघन को निर्णायक रूप से साबित नहीं कर सकता। इसके लिए मजिस्ट्रेट को स्वतंत्र रूप से संतुष्ट होना होगा कि पीस बॉन्ड का उल्लंघन हुआ। अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें Tags Peace BondMagistrateApprehension Of Breach Of Peace Amir Ahmad Similar Posts एक्सप्लेनर: क्या होते हैं पीस बॉन्ड? 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गिरफ्तारी और हिरासत में कोई अंतर नहीं: SC ने कहा कि 24 घंटे की घड़ी तब शुरू होती है जब आजादी पर रोक लगाई जाती है

कोर्ट ने कहा 24 घंटे में सर्च और सीजर के लिए हिरासत में लिए गए व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए.

अपनी आजादी के बचाव के उपायों को मजबूत करने वाले एक फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को “गिरफ्तारी” और “हिरासत” के बीच का अंतर निरस्त कर दिया. कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक हिरासत में रखने के खिलाफ संवैधानिक सुरक्षा उसी समय लागू हो जाती है जब किसी व्यक्ति को हिरासत में लिया जाता है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करने में 24 घंटे की सीमा को औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज होने तक टाला नहीं जा सकता. कोर्ट ने आगाह किया कि ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 22(2) के अधिदेश को कमजोर करेगा.

जस्टिस उज्जवल भुईयां और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर की पीठ ने कहा कि यह विचार कि 24 घंटे केवल औपचारिक गिरफ्तारी से शुरू होते हैं, बीएनएसएस के अनुच्छेद 22(2) और 56 के संवैधानिक जनादेश के विपरीत है. पीठ ने यह स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 22(2) गिरफ्तार करने वाले प्राधिकारी द्वारा बंदी की गिरफ्तारी से पहले पूछताछ या जांच में लगने वाले समय को छोड़ने की अनुमति नहीं देता है.

पीठ ने कहा कि संविधान में सिर्फ एक छूट दी गई है, वह है गिरफ्तारी की जगह से मजिस्ट्रेट की अदालत तक की यात्रा के लिए जरूरी समय. पीठ ने कहा कि किसी मौलिक अधिकार को कुछ समय के लिए सस्पेंड नहीं किया जा सकता, और इस बात को मानने से इनकार कर दिया कि थोड़े समय के लिए हिरासत में रखना गिरफ्तारी नहीं है.

पीठ ने मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि वे हिरासत की तारीख और समय रिकॉर्ड करें और यह पता करें कि हिरासत के समय से 24 घंटे का समय पूरा हुआ है या नहीं. पीठ ने कहा कि हिरासत और गिरफ्तारी के बीच बनावटी अंतर करने की कोई भी कोशिश संवैधानिक रूप से टिकने लायक नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 22(2) में “हर व्यक्ति जिसे गिरफ्तार किया गया है और हिरासत में रखा गया है” अभिव्यक्ति का प्रयोग किया गया है और “गिरफ्तार” तथा “हिरासत में लिया गया” अभिव्यक्तियों को संयुक्त एवं संयुक्त के रूप में देखा जाना चाहिए.

पीठ ने ये बातें चार लोगों की अर्जी पर दिए गए फैसले में कहीं. इन लोगों ने एनडीपीएस एक्ट के तहत एक मामले में त्रिपुरा हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसमें उन्हें जमानत देने से मना कर दिया गया था. अपील करने वालों को 29 सितंबर, 2025 को दोपहर 2 बजे सर्च और सीजर के तहत हिरासत में लिया गया था. हालांकि, उन्हें औपचारिक रूप से 30 सितंबर, 2025 को सुबह 11 बजे अरेस्ट किया हुआ दिखाया गया.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उन्हें 29 सितंबर को दोपहर 2 बजे से 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए था.

पीठ ने कहा कि आर्टिकल 22 के हिसाब से 24 घंटे का समय, हिरासत में लिए गए व्यक्ति की हिरासत की तारीख और समय से शुरू होगा, न कि उसकी औपचारिक गिरफ्तारी के समय से. पीठ ने कहा कि अगर मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने से पहले व्यक्ति की हिरासत 24 घंटे से ज़्यादा रहती है, तो उसे तुरंत हिरासत से रिहा कर दिया जाएगा.

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