3 बार टला शपथ-ग्रहण:तमिलनाडू राज्यपाल क्यों नही बुला रहे विजय को? सुको का क्या है निर्देश

तमिलनाडु में खेला अभी खत्म नहीं, चेन्नई से पुडुचेरी तक रिसॉर्ट पॉलिटिक्स; क्या फिर पलटेगी बाजी?

तमिलनाडु चुनाव बाद हंग एसेम्बली से सरकार गठन को राजनीतिक उठापटक जारी है। सबसे बड़ी पार्टी टीवीके बहुमत से दूर है।

नई दिल्ली 09 मई 2026 । तमिलनाडू चुनाव के 4 मई को चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। सी जोसेफ विजय की पार्टी टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी लेकिन उसका सफर रोलरकोस्टर राइड बना है और अभी तक सरकार बनाने को बहुमत नहीं पा सकी है।

4 मई को तमिलनाडु विधानसभा चुनाव परिणाम घोषित होने के तुरंत बाद साफ हो गया कि सी जोसेफ विजय की पार्टी ‘तमिलगा वेट्री कझगम’ (TVK) 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन बहुमत को उसे अभी भी 10 विधायक चाहिए। तभी से पर्दे पीछे जोड़-तोड़ का खेल शुरू हो गया।

शुरू हुआ विधायकों के जोड़-तोड़ का खेल
एआईएडीएमके के दो वरिष्ठ नेताओं एस.पी. वेलुमणि और सी.वी. षणमुगम ने एडापड्डी के. पलानीस्वामी को बिना बताए अपनी पार्टी के 47 में से 33 विधायक तोड़कर टीवीके की मदद करने की कोशिशें शुरू कर दीं।

चेन्नई में अपने घर से ही अपनी चाल चलते वेलुमणि ने षणमुगम से मिलकर 33 विधायक अपने पाले में लाने की योजना बनाई। ऐसा करके वे दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा पार कर लेते और ‘दल-बदल विरोधी कानून’ (anti-defection law) से भी बच जाते।

तभी 4 मई रात ईपीएस ने डीएमके की युवा शाखा के नेता विधायक उदयनिधि स्टालिन से बातचीत शुरू की ताकि डीएमके और उसके सहयोगी दलों के 74 विधायकों के समर्थन से सरकार बने और विजय को मुख्यमंत्री बनने से रोक सके।

डीएमके नेताओं का एआईएडीएमके से गठबंधन का समर्थन
प्रस्ताव ने जल्द ही जोर पकड़ लिया। कई वरिष्ठ डीएमके नेताओं ने इसका समर्थन कर निवर्तमान मुख्यमंत्री एमके स्टालिन पर दबाव डाला कि वे अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी एआईएडीएमके से गठबंधन पर विचार करें।

इसके साथ ही 4 मई से 6 मई की दोपहर तक तीन दिन वेलुमणि और शनमुगम ने टीवीके नेताओं बुसी आनंद और आधव अर्जुन के साथ-साथ विजय के चुनावी रणनीतिकार जॉन अरोकियासामी से गहन बातचीत की।

टीवीके सामने शर्तें
उन्होंने जो मांगें रखीं, उनमें हर पांच विधायकों में एक मंत्री पद (जो कुल मिलाकर सात बनते हैं) और एक उपमुख्यमंत्री का पद था। 6 मई को कांग्रेस विधायक समर्थन पत्र लेकर टीवीके के पनैयूर कार्यालय पहुंचे तो  टीवीके की ओर से पूरी तरह चुप्पी छा गई।

VCK, CPI और CPM के विजय को समर्थन देने में लगातार टालमटोल के बाद टीवीके ने गुरुवार, 7 मई को अपनी चुप्पी तोड़ी और वेलुमणि-शनमुगम के नेतृत्व वाले समूह से बातचीत फिर शुरू की।

उसी दिन सुबह 11 बजे बुसी आनंद और विजय के दोस्त विष्णु रेड्डी, वेलुमणि से मिले और उनसे एक घंटे बातचीत की। लेकिन कुछ घंटों बाद,CPI और CPM ने विजय को अपने समर्थन की घोषणा की तो टीवीके ने वेलुमणि-षणमुगम के प्रस्ताव के प्रति फिर से ठंडा रवैया अपना लिया।

पलानीस्वामी भी सक्रिय 
6 मई को, पलानीस्वामी भी सक्रिय हुए और उन्होंने एआईएडीएमके के सभी विधायकों को अपने कैंप ऑफिस बुलाया। वरिष्ठ नेताओं और पूर्व मंत्रियों से दिन भर चली गहन चर्चाओं के बाद वे वेलुमणि और षणमुगम की उन कोशिशों को नाकाम करने में कामयाब रहे, जिनमें वे पार्टी विधायकों को विजय के नेतृत्व में सरकार बनाने को एकजुट करना चाहते थे।

पलानीस्वामी टीवीके को कैसे भी “स्वैच्छिक समर्थन” देने के खिलाफ अपने रुख पर कायम रहे। उन्होंने पार्टी के उप महासचिव के.पी. मुनुसामी को यह सार्वजनिक रूप से ऐलान करने भेजा कि “एआईएडीएमके किसी भी हाल टीवीके को समर्थन नहीं देगी।”

रिसॉर्ट्स में पहुंचे एआईएडीएमके विधायक
एआईएडीएमके विधायकों को बाद में 6 मई को पुडुचेरी के रिसॉर्ट्स ले जा कर संचार के सभी माध्यम काट दिये गये। यह घटना पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता की मृत्यु के बाद सामने आए कुख्यात कूवाथुर रिसॉर्ट प्रकरण याद दिलाती है।

7 मई को, स्टालिन ने डीएमके विधायकों से विचार-विमर्श किया और निर्देश दिया कि पार्टी नेतृत्व अंततः जो भी निर्णय ले वे उसका पालन करें। गुरुवार सुबह सहयोगी दलों सीपीआई, सीपीएम और वीसीके से बैठक में ही स्टालिन ने डीएमके-समर्थित,एआईएडीएमके-नेतृत्व वाली सरकार बनाने का विचार रखा और उनका समर्थन मांगा।

कहा जाता है कि उन्होंने सहयोगी दलों से आग्रह किया कि वे कांग्रेस जैसे अचानक संबंध न तोड़ें,बल्कि डीएमके गठबंधन में ही बने रहें। सहयोगी दलों ने कहा कि वे इस पर विचार करेंगें।

गठबंधन के एक नेता ने कहा, “उन्होंने सहयोगी दलों से कहा कि वे उन्हें सूचित किए बिना कुछ भी न करें। वे उन्हें रोकेंगे नहीं।” शुक्रवार रात, वीसीके प्रमुख थोल थिरुमावलवन स्टालिन से उनके सेनोटैफ रोड स्थित आवास पर मिले, जिसका उद्देश्य संभवतः सौहार्दपूर्ण ढंग से अलग होने पर चर्चा थी।

विजय को रोकने पर जोर
हालांकि स्टालिन ने सार्वजनिक तौर पर यही कहा कि डीएमके मजबूत विपक्ष बना रहेगा, लेकिन विजय को सरकार बनाने से रोकने को पर्दे के पीछे बातचीत जारी रही। सहयोगी दलों की प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं थी।

जहां तक ईपीएस की बात है, वे विधायकों से मिलने के लिए पुडुचेरी गए और फिर शुक्रवार देर रात चेन्नई लौट आए। आखिरकार, द्रविड़ पार्टियों की योजनाएं परवान नहीं चढ़ पाईं, क्योंकि वामपंथी दलों ने इस प्रस्ताव में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई। उल्टे , वे वीसीके के करीब आ गए और टीवीके को समर्थन का फैसला किया। एक तरफ दोनों वामपंथी दलों ने अगली सरकार बनाने की टीवीके की कोशिश में उसे खुलकर समर्थन दिया,वहीं वीसीके ने ‘देखो और इंतजार करो’ नीति अपनाए रखी। पार्टी ने कहा कि अंतिम फैसला 9 मई सुबह घोषित होगा।

देर रात एक और घटनाक्रम दिखा,जब एएमएमके नेता टीटीवी दिनाकरन ने राज्यपाल अर्लेकर से मिल कर मांग की कि ईपीएस को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई जाए।

तीन बार राज्यपाल ने लौटाया, दो बार कैंसिल हुआ शपथ ग्रहण… तमिलनाडु में विजय की टीवीके के साथ अब तक क्या-क्या हुआ
टीवीके पार्टी को बहुमत को जरूरी 118 विधायकों का समर्थन नहीं मिल पाया, जिससे थलपति विजय का शपथ ग्रहण दो बार टल चुका. ऐसे तमिलनाडु में सरकार गठन पर सस्पेंस बना है.
टीवीके भले ही सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन बहुमत से 10 कदम की दूरी उसकी सत्ता की राह में सबसे बड़ी रोड़ा बनी है. स्पष्ट बहुमत और अभी तक अन्य दलों के स्पष्ट समर्थन न मिल पाने से सरकार नहीं बन पा रही है.

इसलिए आज प्रस्तावित थलपति विजय का शपथ ग्रहण भी कैंसिल हो गया. ये दूसरी बार है जब विजय का शपथ ग्रहण कैंसिल हुआ. इससे पहले सात मई को भी उनका शपथ ग्रहण कैंसिल हो गया था. तब तो उनके समर्थक भी जुट गए थे, जिन्हें निराश होकर लौटना पड़ा था.

राज्यपाल ने तीन बार खाली हाथ लौटाया
इसके साथ ही थलपति विजय को राज्यपाल भी तीन बार लौटा चुके हैं. विजय उनके पास सरकार बनाने का दावा करते पहली बार पहुंचे थे, तब राज्यपाल ने उन्हें लौटा दिया था. असल में चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस ने टीवीके को समर्थन की बात कही थी. इससे कांग्रेस की जीती पांच सीटें मिलकर विजय के पास 113 विधायकों का समर्थन हो गया. लेकिन राज्यपाल ने उनसे सभी 118 विधायकों के समर्थन हस्ताक्षर लाने को कहा. यह सारा घटनाक्रम 4 मई से 6 मई तक हुए.

7 मईः पहली बार टला संभावित शपथ ग्रहण
7 मई को विजय राज्यपाल से लगातार दूसरे दिन मिले. राज्यपाल ने फिर 118 विधायकों का समर्थन दिखाने को कहा. इसी बीच विजय के शपथ ग्रहण की तैयारियां भी चल रही थीं और सात मई को शपथ की बात थी. लेकिन राज्यपाल के विवेकाधिकार से लिए गए फैसले के कारण विजय की शपथ का कार्यक्रम पहली बार टल गया. राज्यपाल ने उन्हें दूसरी बार भी लौटा दिया था.

8 मई को भी नहीं मिला राज्यपाल से न्योता
8 मई को भी टीवीके को राज्यपाल से सरकार बनाने का न्योता नहीं मिला. इससे पहले राज्यपाल के ‘118 हस्ताक्षर’ पर अड़े रहने को लेकर भी काफी चर्चाएं शुरू हो गईं. एक्सपर्ट ने कहा कि विजय की पार्टी टीवीके को फ्लोर टेस्ट का मौका मिलना चाहिए. फ्लोर टेस्ट विधानसभा में ही होना चाहिए न कि लोकभवन में. लेकिन 118 हस्ताक्षर वाली बात पर राज्यपाल की ओर से तर्क दिया गया था कि वह नहीं चाहते कि अस्थिर सरकार का गठन किया जाए, ताकि सरकार बनते ही उसके गिरने की नौबत आ जाए.

टीवीके ने किया जरूरी समर्थन पाने का दावा

इधर 8 मई शाम खबर आई कि थलपति विजय ने सरकार बनाने को समर्थन जुटा लिया है. कांग्रेस के पांच विधायकों का समर्थन था ही. इसके अलावा सीपीआई,सीपीएम और वीसीके के दो-दो विधायकों के टीवीके को समर्थन देने की बात सामने आई. इस तरह टीवीके ने दावा किया कि वह बहुमत के आंकड़े से अधिक समर्थन जुटा चुकी है. देर शाम इस लिस्ट में IUML के भी 2 विधायकों का समर्थन जुडा. इस तरह टीवीके की ओर से दावा हुआ कि अब उसके पास 121 हस्ताक्षर हैं.

9 मई को आई शपथ की अगली तारीख
इसी दावे के साथ फिर टीवीके ने सरकार बनाने का ऐलान किया और शपथ ग्रहण को 9 मई की तारीख भी सामने आ गई. अभी टीवीके समर्थक इसे सेलिब्रेट कर ही रहे थे कि सारे दावे एक-एक करके बुलबुला साबित होते गए । पता चला कि वीसीके और IUML का समर्थन अभी मिला ही नहीं है. इस तरह तमिलनाडु में विजय की राजनीतिक पारी फिर शुरू होने से पहले ही संकट में आ गई.

…लेकिन इससे पहले ही गहरा गया संकट
इस तरह थलपति विजय जिन्हें शनिवार सुबह 11 बजे शपथ लेनी थी, उस पर सस्पेंस गहरा गया. 8 मई शाम को ही सूत्रों से नई जानकारी आई कि अभी दो महत्वपूर्ण पार्टियों का समर्थन पत्र नहीं आया है. VCK ने कहा है कि वो शनिवार को फैसला बताएंगे. उधर, IUML ने साफ कहा है कि वो DMK के साथ हैं विजय के साथ नहीं. इन सब के बीच प्रदेश के कांग्रेस विधायकों के देर रात बेंगलुरु पहुंचने की खबरें सामने आईं.

रात भर जारी रहा है ट्विस्ट एंड टर्न
शुक्रवार रात से शनिवार दोपहर तक तमिलनाडु की राजनीति में यही ट्विस्ट और टर्न जारी है. टीवीके की ओर से तय शपथग्रहण फिर कैंसिल हो चुका. विजय ने राज्यपाल को 116 विधायकों के समर्थन का पत्र दिया जिसमें TVK के 107 विधायक, कांग्रेस के 5 और CPI-CPM के 4 हैं. लेकिन सरकार बनाने को 118 विधायकों का समर्थन चाहिए. यानी 2 विधायक अभी भी कम हैं. 9 मई को तीसरी बार भी विजय ने राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर से मुलाकात की तो उन्होंने फिर से 118 हस्ताक्षरों मांगें. इस तरह थलपति विजय तीसरी बार भी राज्यपाल के पास से बैरंग लौटे हैं.

वीसीके का फंसा है पेच

वीसीके आज TVK को समर्थन पर फैसला करेगी. पार्टी चीफ थोल थिरुमावलवन ने कहा कि वह आज शाम 4 बजे पार्टी के आधिकारिक फैसला बतायेंगें. VCK प्रवक्ता केके. पावलन के अनुसार शुक्रवार को VCK की हाईलेवल कमिटी की बैठक हुई. इसमें पार्टी चीफ को अंतिम फैसला घोषित करने को अधिकृत किया गया था.
हालांकि CPI और CPI(M) पहले ही TVK को समर्थन देने का फैसला सार्वजनिक कर चुके, लेकिन VCK की औपचारिक घोषणा अब तक नहीं हुई है.

IUML का भी  समर्थन का खंडन
उधर, IUML ने भी शुक्रवार देर रात बयान में साफ किया कि उन्होंने विजय को समर्थन नहीं दिया. कुछ अखबारों में खबरें थीं कि IUML विजय को समर्थन दे रहा है. लेकिन ये गलत है.  बहुत सारे लोग उनके पास आए. विजय की पार्टी के भी महत्वपूर्ण लोग उनसे मिले. लेकिन IUML का साफ संदेश है कि वो कल भी DMK के साथ हैं, आज भी DMK के साथ हैं और कल भी DMK के साथ रहेंगे. यानी IUML का समर्थन विजय को नहीं बल्कि DMK को है.

दिनाकरण ने लगाए फर्जी समर्थन के आरोप
शनिवार को AMMK चीफ TTV दिनाकरन ने TVK पर अपने एकमात्र विधायक कामराज के समर्थन का फर्जी पत्र राज्यपाल को सौंपने का आरोप लगाया. चेन्नई में उन्होंने मीडिया से कहा कि ‘AMMK का एकमात्र विधायक NDA और AIADMK के साथ है और एडप्पडी के. पलानीस्वामी ही मुख्यमंत्री पद के सही दावेदार हैं.उन्होंने आरोप लगाया कि TVK नेताओं को लगा कि पहले फर्जी समर्थन पत्र दे देंगे और बाद में विधायक पर दबाव बनाकर समर्थन पा लेंगें.

दिनाकरन ने कहा कि उन्होंने इसमें राज्यपाल और पुलिस दोनों को शिकायत दी है. हालांकि TVK ने इन आरोपों को गलत बताते हुए वीडियो जारी किया और दावा किया कि AMMK विधायक कामराज ने स्वेच्छा से पार्टी को समर्थन का पत्र लिखा था.

पार्टी विधायक कामराज ने टीटीवी दिनाकरण के इस आरोप का खंडन किया. उन्होंने इससे इनकार किया कि वह लापता थे या विजय की पार्टी ने राज्यपाल को फर्जी दस्तावेज सौंपे थे. कामराज ने कहा कि वह हमेशा संपर्क में थे और पुडुचेरी से आने पर वे खुद राज्यपाल के सचिव से मिले थे. भ्रम इसलिए पैदा हुआ क्योंकि वह कई फोन इस्तेमाल करते हैं और उनमें से एक पर व्हाट्सऐप नहीं चलाते. कामराज ने यह भी कहा कि मीडिया और राजनीतिक गलियारों में फैल रही “झूठी” खबरों पर वह कानूनी सलाह लेंगे और औपचारिक शिकायत कराएंगे.

सरकार बनाने के न्योते को बिहार मामले में SC ने क्या कहा था?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल को सरकार बनाने के लिए सबसे बड़ी पार्टी या गठबंधन को आमंत्रित करना होता है, और वह बहुमत जुटाने के तरीके की जांच नहीं कर सकता।

टीवीके प्रमुख थलापति विजय।

चुनाव बाद सरकार बनाने को सबसे बड़ी पार्टी या चुनाव बाद बने गठबंधन को आमंत्रित करने के अलावा राज्यपाल के पास कोई और विकल्प नहीं होता । वह यह जांच नहीं कर सकता कि सबसे बड़ी पार्टी या गठबंधन ने बहुमत का समर्थन कैसे जुटाया है।
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठों ने 1994 के ऐतिहासिक एस.आर. बोम्मई फैसले से लेकर 2006 के रामेश्वर प्रसाद फैसले तक लगातार यही व्यवस्था दी है।

फैसले में की गई यूपीए सरकार की कड़ी आलोचना
रामेश्वर प्रसाद फैसले में यूपीए सरकार की कड़ी आलोचना की गई थी। आलोचना बिहार विधानसभा भंग करने और राष्ट्रपति शासन लगाने को की गई थी। यह फैसला तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह की उस रिपोर्ट पर आधारित था, जिसमें कहा गया था कि जेडीयू और भाजपा में चुनाव-पूर्व कोई गठबंधन नहीं था और उनका एक साथ आना विधायकों की खरीद-फरोख्त (हॉर्स-ट्रेडिंग) की बू देता था।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
बोम्मई फैसले का हवाला देते हुए, 2006 के फैसले में बहुमत ने कहा था, “अगर ऐसे मनगढ़ंत अनुमानों के आधार पर किसी राजनीतिक पार्टी को चुनाव बाद सरकार बनाने का दावा करने से रोकने वाले कदम को सही मान लिया जाए तो यह हमारा लोकतांत्रिक ताना-बाना ही खत्म कर देगा।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “अगर विधायकों के बहुमत के समर्थन वाली पार्टी को सरकार बनाने का दावा करने से रोकने को ‘हॉर्स-ट्रेडिंग’ (विधायकों की खरीद-फरोख्त) के मनगढ़ंत दावे आधार बनाये जाते हैं तो लोकतंत्र कहां रहेगा।

बहुमत तो सदन के पटल पर ही साबित करना होगा’
अदालत ने कहा था, “अगर चुनाव बाद दो या ज्यादा पार्टियां साथ आती हैं तो ऐसी गैर-कानूनी बातों के आधार पर बहुमत का उनका दावा नकारना मुश्किल हो सकता है। ये ऐसे पहलू हैं जिन्हें राजनीतिक पार्टियों पर छोड़ देना ही बेहतर है, जिन्हें बेशक अपने लिए अच्छे और नैतिक मानक तय करने चाहिए, लेकिन किसी भी हाल आखिरी फैसला मतदाताओं और विधायिका पर ही छोड़ना होगा, जिसमें विपक्ष के सदस्य भी शामिल होते हैं।”

सरकार बनाने का दावा करने वाली पार्टी या गठबंधन को जिस ‘फ्लोर टेस्ट’ (बहुमत परीक्षण) का सामना करना होता है, उस पर जोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में राष्ट्रपति शासन निरस्त कर दिया था और कहा था, “अंततः बहुमत सदन के पटल पर ही सिद्ध करना होगा।”

बोम्मई मामले में एक बेंच ने चुनी सरकारें बर्खास्त करने या विधिवत चुनी विधानसभा भंग करने को राज्यपाल की शक्तियों के दुरुपयोग के प्रति सावधान किया था, “इस शक्ति की विशालता ही—जो विधिवत गठित सरकार बर्खास्त कर और विधिवत चुनी विधानसभा भंग करके किसी राज्य की जन इच्छा निरस्त करती है—इसके बार-बार उपयोग या दुरुपयोग (जैसा भी मामला हो) के विरुद्ध  चेतावनी है। शक्ति के हर दुरुपयोग के अपने परिणाम होते हैं, जो शायद तुरंत स्पष्ट न हों, लेकिन वर्षों बाद एक विकराल रूप में सामने आते हैं।”

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