मत: क्या ब्राह्मण पुजारियों अर्चक वेदपाठी ब्राह्मणों को जनजातीय श्रेणी आरक्षण का समय आ गया?
छोड़ दो दंभ, पुजारियों को मिले ST स्टेट्स
१) ब्राह्मण पुजारियों अर्चक की स्थिति दयनीय है, वेदपाठी ब्राह्मणों की आर्थिक स्थिति दयनीय हैं।
उन्हें अपने रिश्तेदार, पत्नियां और मित्र पोंगापंथी और न जाने क्या क्या कह रहे हैं। यहां तक खुद ब्राह्मण होकर कॉमेडियन कपिल, चोटी,शिखा का मजाक उड़ाता हैं। इसलिए इन दोनों को scheduled tribe list में डाल दीजिए क्योंकि इस डिजिटल युग में अपनी वैदिक ट्राइबल प्रथाओं को चला रहे हैं।
यह दोनों कम्युनिटी अब अधिकांश ब्राह्मणों से भिन्न है, अधिकांश ब्राह्मण अब प्रात: मंदिर नहीं जाते, हां ऑमलेट जरूर चांप लेते है, शाम को संध्या आरती तो छोड़ो,दोस्तों में लिटिल लिटिल ले लेते है। इस पीने खाने के मामले में नॉर्थ के यादव जैन कई बार जाटों को भी मैने मर्यादित देखा हैं। यह कथित ब्राह्मण शास्त्र का श नहीं जानते, संस्कृत तो छोड़ो हिंदी या स्थानिक भाषा का ज्ञान नहीं रखते धोती, शिखा, खड़ाऊ, ठाकुर जी शालिग्राम क्या है यह पता नहीं। अधिकांश शहरों में सेट हो चुके है ,पैसे खूब कमा रहे है, मोटा आईटीआर भर रहे हैं इन सब को कैटेगरी के अनुसार
२) भूमिहार ब्राह्मण (लैंडओनर्स),
३) सेवक ब्राह्मण : ब्राह्मण सेवा प्रदाता
४) कौशल ब्राह्मण : कौशलयुक्त ब्राह्मण प्रोफेशनल की कैटेगरी में डाल दीजिए जिनके लिए आर्थिक आधार पर आरक्षण मौजूद हैं।
यह वर्गीकरण कोई हवाई नहीं है मनुस्मृति कहती हैं
अद्रोहेणैव भूतानामल्पद्रोहेण वा पुनः।
या वृत्तिस्तां समास्थाय विप्रो जीवेदनापदि॥4.2॥
ब्राह्मण किसी को बिना द्रोह किए अथवा दूसरे को थोड़ा कष्ट देकर (अल्प द्रोह) से बचकर निरापद जीवन निर्वाह-व्यतीत करे।
यात्रामात्र प्रसिद्ध्यर्थं स्वै: कर्मभिरगर्हितै:।
अक्लेशेन शरीरस्य कुर्वीत धनसञ्चयम् ॥4.3॥
दूसरों को अहित वाले कर्मों के द्वारा, शरीर को कष्ट देकर, केवल प्राणरक्षा के निमित्त धन-धान्य का संग्रह करे।
ऋृतामृताभ्यां जीवेत्तु प्रमृतेन वा।
सत्यानृताभ्यामपि वा न श्र्ववृत्तया कदाचन॥4.4॥
ब्राह्मण ऋृत या अमृत बिन मांगे से, मृत मांगने से या प्रमृत कृषि व्यापार से, सत्य से जीवन निर्वाह करे, परन्तु कुत्ते की वृत्ति का यानी धन के पीछे न पड़े।
सत्यानृतं तु वाणिज्यं तेन चैवापि जीव्यते।
सेवा श्ववृत्तिराख्याता तस्मात्तां परिवर्जयेत्॥4.6॥
सत्यानृत बिजनेस, इससे भी जीवन-निर्वाह करे। सेवा को कुत्ते की वृत्ति को कहते हैं। इसलिये इस वृत्ति को कभी नहीं करना चाहिये मगर आज 90% सर्विस इंडस्ट्री में हैं।
कुसूलधान्यको वा स्यात्कुम्भीधान्यक एव वा।
त्र्यहैहिको वाSपि भवेदश्वस्तनिक एव वा॥4.7॥
कुसूलधान्यक-इतना अन्न इकट्ठा करे जिससे 3 वर्ष का या उससे भी अधिक समय तक घर का खर्च चल सके, अथवा कुम्भीधान्यक-एक साल के खर्च योग्य अन्न संचित करे, त्र्यहैहिक-3 दिन के लायक अन्न संचित करे अथवा अश्वस्तनिक-उतना ही अन्न संग्रह करे, जो अगले दिन के लिये न बचे, ऐसा ब्राह्मण गृहस्थ को होना चाहिये।
न लोकवृत्तं वर्तेत वृत्तिहेतोः कथञ्चन।
अजिह्मामशठां शुद्धां जीवेद् ब्राह्मणजीविकाम्॥4.11॥
जीविका के लिये अन्य लोगों की भाँति छल-प्रपञ्च आदि नीच वृत्ति का अवलम्बन न करे। झूंठी आत्म-प्रशंसा और दम्भ, कपट (fraud, guile) आदि त्यागकर ब्राह्मण की जो जीविका हो उसी से जीये।
नेहेतार्थन्प्रसङ्गेन न विरुद्धेन कर्मणा।
न विद्यमानेष्वर्थेषु नार्त्यामपि यतस्ततः॥4.15॥
गाने-बजाने की वृति से शास्त्र विरुद्ध कर्म से धन प्राप्त न करे। पास में धन हो या न हो, विपत्ति में जिस-तिस से अर्थात पतितों से द्रव्य न ले।
सर्वान्परित्यजेदर्थान्स्वाध्यायस्य विरोधिनः।
यथातथाSध्यापयस्तु सा ह्यस्य कृतकृत्यता॥4.17॥
वेद विरुद्ध सभी प्रकार की इनकम का त्याग कर जिस प्रकार हो वेद पढ़ाता हुआ परिवार के साथ अपनी जीविका चलाये।
अंत में
संतोषं परमास्थाय सुखार्थी संयतो भवेत्।
संतोषमूलं हि सुखं दुःखमूलं विपर्ययः॥4.12॥
ब्राह्मण सुख की इच्छा से परम् सन्तोष धारण कर मन को किसी ओर बहकने न दे, क्योंकि सन्तोष सुख का असन्तोष दुःख का मूल है।
इन सबको कोडिफाई करके लोकल अथॉरिटी जैसे एसडीएम तहसीलदार कास्ट सर्टिफिकेट पुरोहित ST या अर्चक ST या वैदिक ST जारी करें। अन्य ब्राह्मण जो आप लोग सिर्फ नाम के ब्राह्मण है अपना झूठा दंभ छोड़ करके अपने को अलग करे और अपनी विप्र बिरादरी का भला करें। वैसे भी इस वर्ग के गरीब EWS में आ जाएंगे।
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रही बात अन्य जातियों के द्वारा धार्मिक अनुष्ठान इत्यादि करने की तो
एक बिरादरी के भगवान वाल्मीकि जी
मछुआ बिरादरी की माता वाले वेदव्यास जी
अनजान बिरादरी के वशिष्ठ ऋषि और सत्यकाम
मछुआ बिरादरी की दादी वाले धृतराष्ट्र पाण्डु और सारे कौरव पांडव।
अहीर बिरादरी के माधव कृष्ण जो कहते है सर्व धर्मान त्यज्य माम एकम शरणम् व्रज।
हनुमानजी दक्षिण की घुमंतू बिरादरी से रहे।
मल्लिकार्जुन शिकारी बिरादरी से रहे।
खुद मनु महराज , शनिदेव और भद्रा
भी अपनी मां हिमालयराज दक्ष की पुत्री संध्या की हमशक्ल बॉडी डबल सुवर्णा की संताने है।
सो यह कोई प्रॉब्लम नहीं है वे सब धार्मिक कार्य करें क्योंकि अधिकांश ब्राह्मण अब हाई पैकेज के पीछे है और अगर अन्य जातियां अनुष्ठान करने लगे तो अनुष्ठान करने वाले कम नहीं होंगे।
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विश्व हिंदू परिषद ग़ैर ब्राह्मणों को दे रही पुजारी ट्रेनिंग
तेनुडीह के विनोद राम किसान हैं. खेत में हुई उपज उनकी आमदनी का मुख्य ज़रिया है. इसकी कमाई से उनकी और उनके परिवार की ज़रूरतें पूरी होती हैं. लेकिन, इन दिनों वे पूजा भी कराने लगे हैं. गांव के शिव मंदिर में उनकी भूमिका मुख्य पुजारी की है. यहां सुबह-शाम की आरती में गांव भर के लोग आते हैं.पूजा का काम अब विनोद राम के ज़िम्मे है. उन्होंने इसकी विधिवत ट्रेनिंग ली है.विनोद राम अनुसूचित जाति (एससी) से हैं. विनोद राम का गांव पलामू ज़िले के छतरपुर में है
उन्होंने बताया कि इस इलाक़े के वैसे कई लोगों ने पुजारी की ट्रेनिंग ली है, जो ब्राह्मण न होकर दूसरी जातियों के हैं.ट्रेनिंग बाद वे अपने-अपने गांवों में पुजारी मतलब ‘पंडित जी’ बन गए हैं.
गांव के दूसरे लोग इनकी पूजा में शामिल होतै हैं और इनके बताए मंत्र पढ़कर अपने घरों में पूजा कर रहे हैं.
मंदिर के सामने नाथ जी यादव
ऐसे लोगों में इसी थाना क्षेत्र के गांव सहरसवा के नाथजी यादव भी शामिल हैं.
तो क्या ये पूजापाठ की पारंपरिक ब्राह्मणवादी व्यवस्था को चुनौती है?
नाथजी यादव कहते हैं, “इसे आप चुनौती रुप में मत लें. यह तो एक तरह का सामाजिक समझौता है. इसमें मानवता निहित है.”
“हम समाज में रहते हैं. हर मानव को समान अधिकार है. हमारे पुजारी बनने पर किसी को क्यों एतराज होगा.”
वंचित वर्ग के पुजारी
रांची में विश्व हिंदू परिषद का दफ्तर
लेकिन वरिष्ठ पत्रकार मधुकर इसे नाटक बताते हैं. उनका कहना है कि जाति तोड़ने की पहल डॉक्टर राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण ने की थी.”अगर विश्व हिंदू परिषद सच में जाति तोड़ना चाहता है, तो उसे ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करना होगा, जहां दलित पुजारी और ब्राह्मण यजमान हो.”
और यहां सवाल ये भी उठता है कि क्या ब्राह्मण ग़ैर ब्राह्मणों की कराई गई पूजा को मानते हैं?
जवाब में नाथजी यादव कहते हैं, “हमारे गांव में ब्राह्मण है ही नहीं इसलिए ये पता नही चल सका कि ब्राह्मण हमारी पूजा स्वीकार करेंगे या नहीं.”
300 घरों वाले नाथजी यादव के गांव में अधिकतर लोग पिछड़ी और अनुसूचित जातियों के हैं.
चंद्रकांत रायपत, झारखंड में विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष
विहिप ने दिलाई ट्रेनिंग
इसी तरह विनोद राम के गांव में भी ज़्यादातर आबादी ऐसी ही जातियों की है.पुजारी की ट्रेनिंग पाकर मंदिरों के प्रमुख बने निर्मल राम, संजय दास गोस्वामी जैसे लोगों की भी यही सामाजिक स्थिति है.उनके गांवों में ज़्यादातर आबादी पिछड़ी, अनुसूचित और अनुसूचित जन जातियों की है.लिहाजा, ग्रामीण अपने वर्ग के किसी व्यक्ति के पुजारी बनने पर ख़ुश है.
दरअसल, विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) की प्रांतीय इकाई ने अपने अभियान में झारखंड के 52 लोगों को पुजारी ट्रेनिंग दिलाई है.
झारखंड में पुजारियों की ट्रेनिंग
प्रशिक्षण शिविर
वीएचपी अब महिलाओं को भी ट्रेनिंग देने की योजना पर काम कर रहा है ताकि भविष्य में महिलाएं भी मंदिर संचालन कर सकें. विश्व हिंदू परिषद के झारखंड उपाध्यक्ष चंद्रकांत रायपत कहते हैं, “पुजारी की ट्रेनिंग देते वक़्त हमने जाति-बिरादरी की बात सोची ही नहीं.”
“ट्रेनिंग लेने वाले लोगों में ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य और शूद्र हर वर्ग है. इन्हें उनके गांव के लोगों ने ही चुनकर भेजा था.इसलिये, उनकी स्वीकार्यता को लेकर कोई परेशानी नहीं है.”
“ये सब लोग अपने-अपने गांवों में पहले से पूजा कराते थे. हमने सिर्फ़ उन्हें पूजा कराने की सही विधि बताई ताकि पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक मंदिर संचालन हो सके. अब हम हर ज़िले में ऐसे प्रशिक्षण शिविर लगवाएंगे.”
झारखंड में पुजारियों की ट्रेनिंग
शंकराचार्यों की सहमति
विश्व हिंदू परिषद के बिहार-झारखंड के क्षेत्रीय संगठन मंत्री केशव राजू ने बताया कि इसके लिए हमने शंकाराचार्यों से बातचीत की थी. “स्वामी जयेंद्र सरस्वती से भी बातचीत हुई. इसके बाद हमने हिंदुओं को पुजारी बनने की ट्रेनिंग देने पर सहमति बनाई.””देश में ब्राह्मण पुजारियों की भारी कमी है. गांवों में मंदिर तो बने हैं, लेकिन वहां पूजा नहीं हो पाती .इसलिए विहिप ने दूसरी जातीय जनों को पूजा प्रशिक्षण दिलाया है.आर्य समाज में भी दूसरे जातीयजन पुजारी हैं. बाबा रामदेव भी ब्राह्मण नहीं हैं, तो क्या हम उन्हें संत न मानें.”
झारखंड में पुजारियों की ट्रेनिंग
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
ऐसा नहीं है कि विहिप की इस पहल को लेकर कोई राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं हुई है.
झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य कहते हैं, “हमें विश्व हिंदू परिषद की मंशा का पता करना चाहिए. यह कहीं समाज को बाँटने की साज़िश तो नहीं है. हर धर्म के लोग अपने-अपने घरों में अपने आराध्य की पूजा करते हैं. इसको किसी ट्रेनिंग की ज़रूरत नहीं होती. ये संस्कार से आता है.विहिप का इतिहास समाज बाँटने वाला रहा है, इसलिए हमें ऐसे अभियानों से सतर्क रहने की ज़रूरत है.”
कांग्रेस नेता झारखंड के पूर्व मंत्री केएन त्रिपाठी कहते हैं कि विश्व हिंदू परिषद हिंदू धर्म की ठेकेदार नहीं है, जो ये तय करेगी कि कौन पुरोहित बने और कौन नहीं.
“विहिप को ये अधिकार किसने दिया कि वो पुरोहित ट्रेनिंग कराए. वह ख़ुद को हिंदू धर्म का ठेकेदार समझता है,लोग ऐसा नहीं मानते.”
“विहिप राजनीतिक स्वार्थ को सनातन धर्म नष्ट करने पर तुला है. लोग यह खेल समझते हैं.”

