मत: मोदी की अपील गहरी आर्थिक चुनौती की घंटी है, क्या कह रहे अर्थशास्त्री और राजनेता?

मोदी की अपील में क्या किसी गहरे आर्थिक संकट की आहट है?
नरेंद्र मोदी

पीएम मोदी ने कई ऐसे अपीलें की हैं, जिनमें बचत करने का आग्रह
लाल बहादुर शास्त्री ने 1965 में भोजन संकट और युद्ध के समय लोगों से सोमवार शाम स्वेच्छा से उपवास रखने की अपील की थी.

समाजवादी नेता मधु लिमये ने संसद में इसका समर्थन करते हुए कहा था कि कठिन समय में ‘स्वैच्छिक किफायत’ नागरिक कर्तव्य है और राजनीतिक वर्ग को केवल अपील करने के बजाय ख़ुद मिसाल पेश करनी चाहिए.

भारत के लिए विदेशी मुद्रा भंडार को संतुलित रखने की चुनौती हर सरकार के लिए रही है.

1990 में गल्फ़ वॉर शुरू हुआ और इसका सीधा असर भारत पर पड़ा. वैश्विक स्तर पर तेल की क़ीमतें बढ़ गईं और इसकी चपेट में भारत भी आ गया.

1990-91 में पेट्रोलियम आयात बिल दो अरब डॉलर से बढ़कर 5.7 अरब डॉलर हो गया. ऐसा तेल की क़ीमतें बढ़ने और आयात के वॉल्यूम में वृद्धि के कारण हुआ.

जब पीवी नरसिम्हा राव 21 जून 1991 में प्रधानमंत्री बने तो ऐसा लग रहा था कि भारत विदेशी क़र्ज़ तय तारीख़ पर नहीं चुका पाएगा और डिफ़ॉल्टर घोषित हो जाएगा.

भारतीय अर्थव्यवस्था
लेकिन पीवी नरसिम्हा राव ने वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के ज़रिए कई सुधारों को अंजाम दिया और भारतीय अर्थव्यवस्था में बुनियादी बदलाव की बदौलत चीज़ें नियंत्रित हो पाईं.

आज की तारीख़ में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 700 अरब डॉलर है. फिर भी पीएम मोदी ऐसी अपील क्यों कर रहे हैं?

क्या भारत पुरानी चुनौतियों से आज भी उबर नहीं पाया है?

दिल्ली स्थित ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के निदेशक अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि भारत के आयात-निर्यात का संतुलन अब भी पटरी पर नहीं आ पाया है.

अजय श्रीवास्तव कहते हैं, ”अब हमारी ऊर्जा ज़रूरतें ज़्यादा बढ़ी हैं. इलेक्ट्रॉनिक्स और सोने का आयात ज़्यादा बढ़ा है. ऐसे में 700 अरब डॉलर भी नाकाफ़ी साबित हो रहा है. पहले भी आयात निर्यात से ज़्यादा था और आज भी ऐसा ही है. इसीलिए समय-समय पर भारत के प्रधानमंत्री ऐसी अपील करते रहे हैं.”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीयों से ईंधन बचाने के लिए वर्क फ्रॉम होम अपनाने और सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करने की अपील की है. दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश बढ़ती ऊर्जा क़ीमतों से पैदा हो रहे आर्थिक संकट को रोकने की कोशिश कर रहा है.

ईरान पर अमेरिकी हमले के बाद यह पहली बार है, जब दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश के प्रधानमंत्री ने नागरिकों से ख़र्च में कटौती करने की अपील की है.

संकट कितना गहरा है?
भारतीय अर्थव्यवस्था

रुपया डॉलर की तुलना में 100 के क़रीब पहुँचने वाला है
छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें

यह अपील ऐसे समय आई है, जब कुछ दिन पहले ही उनकी पार्टी ने असम और पश्चिम बंगाल में बड़ी जीत हासिल की है. अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत का रूस से ऊर्जा आयात लगातार कम हुआ है.

भारत ने तेल की कमी पूरी करने के लिए अन्य देशों की ओर रुख़ किया है. मार्च में अमेरिका की ओर से आंशिक रूप से प्रतिबंधों में ढील देने के बाद भारत ने रूस से तेल ख़रीदना शुरू किया था और घरेलू रिफाइनरियों को स्थानीय खपत के लिए रसोई गैस उत्पादन को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया गया.

गल्फ़ के देशों में तनाव शुरू होने के बाद से भारतीय मुद्रा ‘रुपया’ एशिया की सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल रहा है. युद्ध शुरू होने के समय डॉलर के मुक़ाबले रुपया लगभग 91 था, जो अब गिरकर ऐतिहासिक स्तर 95 प्रति डॉलर से नीचे पहुँच गया है.

आर्थिक जगत के विश्लेषकों का मानना है कि मोदी जिन क्षेत्रों में किफ़ायत करने की अपील कर रहे हैं, उसका स्पष्ट संदेश है कि विदेशी मुद्रा भंडार यानी फॉरेक्स पर बने दबाव को कम करना है. यह भी कहा जा रहा है कि मोदी की अपील भारतीय अर्थव्यवस्था के बड़े संकट की ओर इशारा कर रही है.

अजय श्रीवास्तव कहते हैं, ”फ़रवरी में तेल की क़ीमत 78 डॉलर प्रति बैरल था. ईरान पर हमले के बाद 126 डॉलर प्रति बैरल पहुँच गया. अभी क़रीब 105 और 110 डॉलर प्रति बैरल के क़रीब है. इसकी वजह भारत का आयात बिल काफ़ी बढ़ गया है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का तेल आयात बिल 176 अरब डॉलर हो गया जो कि और बढ़ेगा.”

“खाड़ी के देशों में क़रीब 90 लाख भारतीय कामगार हैं और वे कमाकर जो भारत भेजते थे, उस पर असर पड़ा है. तीसरा हमारे फॉरन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर हैं, उन्होंने काफ़ी पैसा भारतीय बाज़ार से निकाला है. हमारा व्यापार घाटा बढ़ रहा है, चालू खाता घाटा बढ़ रहा है और इसी वजह से रुपया भी एक डॉलर की तुलना में 100 के क़रीब पहुँच गया है. इसका एक ही उपाय है कि भारत निर्यात बढ़ाए और आयात कम करे.”

अर्थशास्त्री भारत के भुगतान संतुलन पर पश्चिम एशिया में युद्ध के असर को लेकर चिंतित हैं. पीएम मोदी की अपील के बाद शेयर मार्केट में दो दिनों से गिरावट जारी है.

मोदी ने भारतीयों से एक साल तक ग़ैर-ज़रूरी सोने की ख़रीद रोकने और छुट्टियों के साथ शादियों के लिए विदेश यात्रा से बचने की भी अपील की.

विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ता दबाव
राहुल गांधी

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का कहना है कि सरकार अपनी ज़िम्मेदारी लोगों पर थोप रही है
किसी भी देश की अर्थव्यवस्था कितनी मज़बूत है, उसका एक मानक यह भी है कि उस देश के केंद्रीय बैंक के पास कितना विदेशी मुद्रा भंडार है. विदेशी मुद्रा भंडार के रूप में दुनिया भर में अमेरिकी मुद्रा डॉलर, ईयू की मुद्रा यूरो और चीनी मुद्रा युआन शामिल हैं.

दरअसल, इन मुद्राओं में ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार होता है. यानी भारत गल्फ़ से तेल ख़रीदता है तो उसका भुगतान अपनी मुद्रा रुपए में नहीं बल्कि डॉलर में करना होता है. कई देश यूरो और युआन भी स्वीकार करते हैं.

विदेशी मुद्रा भंडार आता कहाँ से है? भारत जब सामान ख़रीदता है तो डॉलर में भुगतान करता है और बेचता है तो डॉलर ही लेता है. यानी आप बेचते ज़्यादा हैं तो डॉलर ज़्यादा आएंगे और ख़रीदते ज़्यादा हैं तो डॉलर ज़्यादा ख़र्च करने होंगे. ऐसे में कोई देश निर्यात ज़्यादा करता है तो उसका विदेशी मुद्रा भंडार भरा रहेगा और आयात ज़्यादा करता है, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव ज़्यादा रहेगा.

वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का व्यापार घाटा 333.2 अरब डॉलर का था. यानी भारत ने निर्यात की तुलना में आयात ज़्यादा किया. भारत अपनी ज़रूरत का 90 फ़ीसदी तेल आयात करता है, ऐसे में सबसे ज़्यादा डॉलर इसी पर ख़र्च होता है.

वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, निर्यात और आयात के बीच का अंतर जनवरी महीने में बढ़कर 34.68 अरब डॉलर हो गया था जबकि एक महीने पहले यह 25.05 अरब डॉलर था.

जनवरी में आयात सालाना आधार पर 19.2 प्रतिशत बढ़कर 71.24 अरब डॉलर हो गया जबकि निर्यात केवल 0.6 प्रतिशत बढ़कर 36.56 अरब डॉलर रहा.

ब्रिटिश अख़बार फाइनैंशियल टाइम्स से मुंबई स्थित एचडीएफसी सिक्योरिटीज़ के प्राइम रिसर्च प्रमुख देवार्ष वकील ने कहा, “कच्चे तेल की बढ़ती क़ीमतें और वैश्विक अस्थिरता भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर गंभीर दबाव डाल रही हैं. सोने के आयात और विदेशी यात्राओं पर खर्च कम करने से भारत अपने विदेशी मुद्रा भंडार को बचा सकता है.”

फाइनैंशियल टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ”युद्ध शुरू होने के बाद से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 5 प्रतिशत घटकर 690 अरब डॉलर रह गया है, क्योंकि भारतीय रिज़र्व बैंक रुपये की गिरावट को नियंत्रित करने के लिए डॉलर बेच रहा है.

ईरान

ईरान पर इसराइल और अमेरिका के हमले के बाद से होर्मुज स्ट्रेट से तेल आपूर्ति बुरी तरह से प्रभावित हुई है
तेल की आपूर्ति पर असर
एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की मुख्य अर्थशास्त्री माधवी अरोड़ा ने एफ़टी से कहा, “अब जबकि चुनाव ख़त्म हो चुके हैं, मोदी ईरान युद्ध से जुड़े आर्थिक मुद्दों पर अधिक यथार्थवादी तरीक़े से बात कर सकते हैं. इसका मतलब है कि नागरिकों को ईंधन क़ीमतों में बढ़ोतरी के लिए तैयार किया जा रहा है, जिसका बोझ अब तक सरकार और सरकारी तेल कंपनियां उठा रही थीं. अब तक इसका दर्द केवल तेल कंपनियां और सरकार झेल रही थीं. अब उपभोक्ताओं को भी इसमें शामिल होने का समय आ गया है. मेरा मानना है कि तीनों आर्थिक पक्षों को इसका बोझ उठाना होगा.”

मध्य-पूर्व संघर्ष के कारण भारत रसोई गैस की कमी और तेल की बढ़ती क़ीमतों से जूझ रहा है. यह संकट ऐसे देश के लिए बड़ी चुनौती है, जिसने पिछले साल 174 अरब डॉलर का तेल और गैस आयात किया था. भारत के प्राकृतिक गैस आयात का दो-तिहाई और कच्चे तेल के आयात का आधा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है.

दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी सऊदी अरब की अरामको ने चेतावनी दी है कि अगर होर्मुज स्ट्रेट बंद रहा तो पेट्रोल और विमान ईंधन का भंडार “ख़तरनाक रूप से निचले स्तर” तक पहुंच सकता है.

सऊदी अरामको के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमीन नासिर ने सोमवार को कहा कि ज़मीन पर मौजूद ईंधन भंडार तेज़ी से घट रहे हैं. पेट्रोल और जेट ईंधन जैसे रिफाइंड फ्यूल में सबसे तेज़ गिरावट देखी जा रही है.

उन्होंने कहा कि ईरान युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट लगभग बंद होने के बाद से दुनिया अब तक कुल एक अरब बैरल तेल आपूर्ति खो चुकी है. इसके अलावा, होर्मुज जितने सप्ताह बंद रहेगा, हर सप्ताह लगभग 10 करोड़ बैरल अतिरिक्त आपूर्ति का नुक़सान होगा.

पिछले 10 हफ़्तों में तेल क़ीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया है. अप्रैल के अंत में क़ीमतें 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं लेकिन बाद में घटकर लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गईं.

सोने से कैसा संकट?
सोना

सोना भारतीय रिज़र्व बैंक के विदेशी मुद्रा भंडार का भी अहम हिस्सा है
भारत दुनिया में सोने के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक है. भारतीय संस्कृति में सोने का विशेष महत्व है और इसे निवेश के एक सुरक्षित ज़रिए के रूप में भी देखा जाता है.

यह क़ीमती धातु भारतीय रिज़र्व बैंक के विदेशी मुद्रा भंडार का भी अहम हिस्सा है और मार्च के अंत तक देश के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग 17 प्रतिशत सोने के रूप में था.

विश्लेषकों का कहना है कि रुपये का भविष्य काफ़ी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि मध्य-पूर्व का संघर्ष किस दिशा में जाता है.

प्रधानमंत्री ने जो अपील की है क्या उसे लोग मान लेंगे या सरकार कुछ और क़दम उठाएगी? अजय श्रीवास्तव कहते हैं, ”देखिए प्रधानमंत्री ने वस्तुस्थिति बता दी है कि मुश्किल समय चल रहा है. ज़ाहिर है कि इसे लोग मान नहीं लेंगे. ऐसे में सरकार के पास कुछ और विकल्प हैं. जैसे सरकार कुछ हफ़्तों में तेल की क़ीमत बढ़ाएगी. सोने पर टैरिफ़ दो साल पहले 15 प्रतिशत हुआ करता, इसे बाद में छह प्रतिशत कर दिया गया था. अब इसे फिर से 10 या 15 प्रतिशत कर सकते हैं.”

अजय श्रीवास्तव कहते हैं, ”पिछले वित्त वर्ष का भारत का मर्चेंडाइज आयात बिल 775 अरब डॉलर का था. इसमें सबसे अधिक 175 अरब डॉलर कच्चे तेल का बिल था. इसके बाद इलेक्ट्रॉनिक्स का 116 अरब डॉलर का था. तीसरे नंबर पर 74 अरब डॉलर का गोल्ड था. इन तीनों के आयात का विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव सबसे ज़्यादा होता है. क्रूड गोल्ड में सरकार टैक्स बढ़ाकर खपत कम करना चाह रही है. इलेक्ट्रॉनिक्स में सरकार के पास अभी कुछ करने के लिए विकल्प नहीं है.”

पीएम मोदी के तेल-सोने वाले बयान पर उद्योगपति क्यों बोले- ‘बेहद ख़राब हालात के लिए रहें तैयार’
उदय कोटक और सुनील मित्तल

उदय कोटक और सुनील मित्तल ने पीएम मोदी के बयान पर प्रतिक्रिया दी है

देश में तेल और गैस के इस्तेमाल को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान के बाद मंगलवार को केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री ने देश में इसकी उपलब्धता को लेकर बयान दिया.

साथ ही तेल और गैस के मुद्दे पर भारत के उद्योग जगत की चर्चित हस्तियां अपनी राय ज़ाहिर कर रही हैं.

वहीं पीएम मोदी ने एक साल तक सोना न ख़रीदने की भी अपील की थी.

केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने सीआईआई के सालाना बिज़नेस सम्मेलन में कहा कि देश में वर्तमान में कच्चे तेल और एलएनजी का 60 दिनों और एलपीजी का 45 दिनों का स्टॉक है.

साथ ही इस दौरान उन्होंने कहा कि जहां एक ओर वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें लगभग दोगुनी हो गई हैं, वहीं भारत ने पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों को स्थिर रखा है.

पीएम मोदी और हरदीप पुरी के बयानों से इतर भारत के उद्योगपति की चर्चित हस्तियों ने भी भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर कई अहम बयान दिए हैं. एक उद्योगपति ने तो चेतावनी देते हुए कहा है कि भारत को ‘बेहद ख़राब’ हालात के लिए तैयार रहना चाहिए.

केंद्रीय मंत्री ने और क्या कहा?
हरदीप पुरी

हरदीप पुरी ने कहा है कि देश में तेल-गैस की कमी नहीं है
केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा है कि 60 दिनों के कच्चे तेल और एलएनजी और 45 दिनों के एलपीजी स्टॉक है और सप्लाई की कोई समस्या नहीं है.

उन्होंने कहा, “पश्चिम एशिया संघर्ष के दौरान एलपीजी का उत्पादन 75 हज़ार मिट्रिक टन से बढ़कर 90 हज़ार मिट्रिक टन हो गया है.”

इसके साथ ही पुरी ने कहा कि सरकार ने अब तक संकट को बेहद ज़िम्मेदारी से संभाला है और पूरे देशभर में ऊर्जा की निर्बाध उपलब्धता रही है.

रविवार को पीएम मोदी ने देशवासियों से अपील की थी कि वो पेट्रोल-डीज़ल की खपत कम करने, पब्लिक ट्रांसपोर्ट अपनाने की अपील की थी.

इस पर हरदीप सिंह पुरी ने एक्स पर लिखा, “प्रधानमंत्री ने नागरिकों को केवल यही सलाह दी है कि वे ऊर्जा की खपत को संयमित रखें, ताकि अर्थव्यवस्था पर कोई वित्तीय बोझ न पड़े.”

”जहाँ एक ओर वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें लगभग दोगुनी हो गई हैं, वहीं भारत ने पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों को स्थिर रखा है. साथ ही, एक लाख से अधिक पेट्रोल पंपों पर ईंधन की निरंतर उपलब्धता और 33.5 करोड़ परिवारों तक एलपीजी की लगातार आपूर्ति सुनिश्चित की है.”

कोटक महिंद्रा बैंक के संस्थापक और बैंकर उदय कोटक ने सीआईआई (कन्फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन इंडस्ट्री) के सालाना बिज़नेस सम्मेलन में चेताते हुए कहा कि ‘बेहद ख़राब हालात’ के लिए तैयार रहना चाहिए.

उन्होंने कहा, “हमें उम्मीद करनी चाहिए कि मुश्किल वक़्त न आए और न ही जारी रहे लेकिन हमें फिर भी बेहद ख़राब हालात के लिए तैयार रहना चाहिए.”

“किसी झटके का इंतज़ार करने से अच्छा है कि मुश्किल वक़्त के लिए तैयारी की जाए. कई तरह से प्रधानमंत्री ने ये बात कही.”

इसी दौरान टोकते हुए एक दर्शक ने उनसे पूछा कि मुश्कित वक़्त कैसा होगा? इस पर उदय कोटक ने कहा, “मुझे लगता है कि आप देखना शुरू करेंगे. बीते दो महीनों में मध्य पूर्व जंग का असर हमने अब तक नहीं देखा है. ख़ासकर के ऊर्जा दामों में फेरबदल को लेकर. यह बहुत भारी मात्रा में आने वाला है और उपभोक्ता ने अब तक उसका दबाव झेला नहीं है.”

“उस उपभोक्ता के बारे में सोचिए जिसकी सीमित आय है जिसको सीधे तौर पर ईंधन पर ख़र्च करना होगा और अप्रत्यक्ष रूप से उन उत्पादों पर ख़र्च करना होगा जो ईंधन से जुड़े हैं. झटका बस आ ही रहा है. मेरे पास कोई जवाब नहीं है जब तक कि ईरान जंग न रुके.”

वहीं उद्योगपति सुनील भारती मित्तल ने भी पीएम मोदी के बयान पर अपनी राय दी है.

उन्होंने सीआईआई के सम्मेलन में कहा, “यह मुश्किल समय है. देश शानदार रफ़्तार से आगे बढ़ता रहा है और साल दर साल 6-7 फ़ीसदी की दर से विकास करता रहा है. कुल मिलाकर हालात काफ़ी अच्छे दिख रहे हैं.”

“लेकिन कुछ परिस्थितियां ऐसी बनती हैं जो किसी के भी नियंत्रण से बाहर होती हैं. मध्य पूर्व में मौजूदा संकट, जिसका सामना हम सभी कर रहे हैं, वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं पर ज़बरदस्त दबाव बना रहा है और भारत भी इससे अलग नहीं है. दुनिया इस समय आर्थिक मोर्चे पर जिन मुश्किलों का सामना कर रही है, उनसे हम पूरी तरह बच नहीं सकते.”

सुनील मित्तल ने कहा, “उनका (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) संदेश बहुत काफ़ी गहरा था. मेरा मानना है कि उद्योग जगत को इसमें अपनी भूमिका निभानी चाहिए. हमारे यहां लाखों लोगों को रोज़गार मिला हुआ है. हम उनके संदेश को गंभीर और सार्थक तरीके से आगे बढ़ा सकते हैं. हमें सोने के आयात को लेकर इस जुनून से बाहर निकलना होगा. हमें अपनी ऊर्जा लागत कम करनी होगी. हमें तेज़ी से रिन्यूएबल एनर्जी इंडस्ट्री की तरफ़ बढ़ना होगा.”

“भारत में ज़्यादा खर्च करें, यहां ज़्यादा कैपेक्स करें. हमें ज़्यादा निवेश करने की ज़रूरत है. यह पीछे हटने का समय नहीं है, बल्कि अपने देश में निवेश बढ़ाने और पूरी ताक़त लगाने का समय है. आइए भारत में बनाएं और भारत की ज़रूरतों को भारत से पूरा करें.”

सोने को लेकर क्या कह रहे हैं विश्लेषक?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को सिकंदराबाद में एक जनसभा में विदेशी मुद्रा बचाने के लिए सोना न ख़रीदने की सलाह दी थी.

पीएम मोदी ने कहा था, “सोने की ख़रीद एक और पहलू है जिसमें विदेशी मुद्रा बहुत ख़र्च होती है. एक समय था जब संकट आता था तब लोग देशहित में सोना दान दे देते थे. आज दान की ज़रूरत नहीं है लेकिन देशहित में हमें यह तय करना होगा कि सालभर तक घर में कोई कार्यक्रम हो, हम सोने के गहने नहीं ख़रीदेंगे. सोना नहीं ख़रीदेंगे. विदेशी मुद्रा बचाने के लिए हमारी देशभक्ति हमें चुनौती दे रही है और हमें यह स्वीकार करके विदेशी मुद्रा बचानी होगी.”

इस पर ऑल इंडिया जेम एंड ज्वेलरी डोमेस्टिक काउंसिल के चेयरमैन राजेश रोकड़े ने पीएम मोदी की अपील का स्वागत किया. साथ ही इस उद्योग पर पड़ने वाले असर के बारे में बताया था.

उन्होंने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा, “मैं कहूंगा कि ये उद्योग बहुत बड़ा है. प्रधानमंत्री का जो कहना है वो राष्ट्रहित में सही है. प्रधानमंत्री जी आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत की बात कहते हैं. मैं एक अलग एंगल आपके सामने रखना चाहूंगा. सोना हमारी संस्कृति में घुल-मिल गया है और भारतीय संस्कृति में सोने की ज्वेलरी का एक अलग महत्व है.”

राजेश रोकड़े का बयान ग्राफ़िक्स में
राजेश रोकड़े ने कहा, “पीएम का ये कहना हो सकता है कि जो अनावश्यक सोना ख़रीदते हैं, जो निवेश की दृष्टि से सोना ख़रीदते हैं उन्हें बंद कर देना चाहिए. मैं भी इस बात से सहमत हूं.”

“अगर ज्वेलरी को किसी तह से ख़रीदना बंद करवा दिया जाता है तो निश्चित तौर पर जीडीपी में भी इस उद्योग का सात प्रतिशत का योगदान है, उसका असर पड़ेगा. इसके अलावा इस उद्योग में एक करोड़ से ज़्यादा लोग काम करते हैं, उन लोगों पर सीधा असर पड़ सकता है.”

“मेरा यही कहना रहेगा कि किसी भी तरह से ज्वेलरी पर रोक लगाना बेरोज़गारी का बड़ा सवाल खड़ा कर सकता है इसलिए निवेश के लिए सोना ख़रीदने पर रोक को मैं सही समझता हूं.”

ज्वेलरी कंपनी सेनको गोल्ड के एमडी सुवांकर सेन ने कहा, “उद्योग के नज़रिए से हम प्रधानमंत्री से यह अपील करना चाहते हैं कि सोने के आयात बिल को बढ़ाने की वजह सिर्फ़ ज्वेलरी की खपत नहीं है.”

“अगर आप वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के जनवरी से मार्च तिमाही के आंकड़े देखें, तो पाएंगे कि ज्वेलरी के लिए सोने की खपत या आयात कम है, जबकि निवेश के लिए सोने की मांग ज्यादा है. इसलिए हमारी प्रधानमंत्री से अपील है कि लोगों से सोना और ज्वेलरी नहीं ख़रीदने को कहने के बजाय इस पर विचार किया जाए कि आयात को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है.”

“हम जानते हैं कि हमारी अर्थव्यवस्था में तक़रीबन 20 हज़ार टन सोना मौजूद है, जो सालों से जमा होता आया है. यह मंदिरों, घरों, गोल्ड ईटीएफ़ में पड़ा है. पिछले कुछ वर्षों से हर कोई सोना ख़रीद रहा है क्योंकि इसकी क़ीमत लगातार बढ़ रही है. अगर हम इस सोने का इस्तेमाल करने के तरीक़े खोज सकें, तो आयात पर हमारी निर्भरता कम हो सकती है. मुश्किल समय में सख़्त फ़ैसलों की ज़रूरत होती है.”
पेट्रोल बचाने, सोना नहीं खरीदने की अपील के बाद प्रधानमंत्री मोदी पर उठ रहे हैं ये सवाल
नरेंद्र मोदी इमेज स्रोत,@BJP4India

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मौजूदा वैश्विक संकट की तुलना कोविड महामारी से कर रहे हैं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 10 मई की अपील के बाद देश में राजनीतिक गलियारे से लेकर कारोबारियों, किसान संगठनों, अर्थशास्त्रियों और सोशल मीडिया तक में बहस छिड़ गई है.

प्रधानमंत्री ने लोगों से पेट्रोल और डीज़ल की खपत कम करने, पब्लिक ट्रांसपोर्ट अपनाने, अनावश्यक विदेश यात्राओं से बचने, एक साल तक सोना न ख़रीदने, घर से काम करने और किसानों से रासायनिक खाद का इस्तेमाल 50 फ़ीसदी तक कम करने की अपील की है.

सरकार इसे मध्य-पूर्व में संकट के बीच “सामूहिक ज़िम्मेदारी” और “लॉन्ग टर्म एनर्जी सिक्योरिटी” की दिशा में क़दम बता रही है. लेकिन आलोचक इसे आर्थिक दबाव के संकेत और आम लोगों पर बोझ डालने की कोशिश मान रहे हैं.

11 मई को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई मंत्रियों के समूह की बैठक में सरकार ने कहा कि देश में किसी तरह की कमी नहीं है.

सरकार के अनुसार, भारत के पास 60 दिनों का कच्चा तेल, 60 दिनों का प्राकृतिक गैस और 45 दिनों का एलपीजी स्टॉक है और विदेशी मुद्रा भंडार 703 अरब डॉलर है.

सरकार ने यह भी कहा कि तेल कंपनियां रोज़ करीब 1,000 करोड़ रुपये का नुक़सान झेल रही हैं ताकि अंतरराष्ट्रीय क़ीमतों का पूरा बोझ देश के नागरिकों पर न पड़े.

वहीं विपक्ष ने पीएम मोदी की अपील की टाइमिंग पर सवाल उठाए हैं. विपक्षी नेताओं का सवाल है कि अगर मध्य-पूर्व संकट फ़रवरी से जारी था तो सरकार चुनाव ख़त्म होने तक का इंतज़ार क्यों कर रही थी?

दूसरी ओर कारोबारी संगठनों ने रोज़गार और मांग घटने की आशंका जताई है. किसान संगठनों ने खाद के इस्तेमाल में कमी की अपील पर चिंता जताई है.
सोशल मीडिया पर भी कई लोगों ने सवाल उठाए कि आम नागरिकों से ईंधन बचाने की अपील करने वाले नेताओं के ख़ुद के बड़े काफिले और रोड शो कैसे जारी हैं.

राहुल गांधी

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पीएम की अपील की आलोचना की है
विपक्ष का टाइमिंग पर सवाल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील के बाद विपक्ष का सबसे बड़ा सवाल इसकी टाइमिंग को लेकर है.

विपक्षी नेताओं का कहना है कि अगर मध्य-पूर्व में युद्ध और वैश्विक आर्थिक संकट फ़रवरी से जारी था, तो सरकार ने चुनाव ख़त्म होने के बाद ही लोगों से बचत और संयम की अपील क्यों की.

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने एक्स पर लिखा, “28 फ़रवरी को पश्चिम एशिया में जंग शुरू हुई लेकिन प्रधानमंत्री चुनाव प्रचार में व्यस्त रहे.’

उन्होंने सवाल किया कि जब सरकार पहले “स्थिति काबू में है” कह रही थी, तो अब अचानक लोगों से “ये मत करिये, वो मत ख़रीदें” जैसी अपीलें क्यों की जा रही हैं.

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी सवाल उठाया कि अगर ईंधन बचत इतनी ज़रूरी थी तो चुनाव प्रचार के दौरान “हज़ारों चार्टर हवाई यात्राएं” क्यों हुईं. उन्होंने कहा कि ऐसी अपीलों से बाज़ार में “डर, घबराहट और निराशा” फैल सकती है.

ऊर्जा सुरक्षा
विपक्ष का आरोप है कि सरकार आर्थिक दबाव का बोझ आम लोगों पर डाल रही है जबकि ख़ुद राजनीतिक वर्ग उसी तरह के सार्वजनिक संयम का पालन करता नहीं दिख रहा.

हालांकि भाजपा नेताओं ने इन आरोपों को ख़ारिज किया है.

भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने एक्स पर कहा कि पूरी दुनिया इस समय “अभूतपूर्व वैश्विक संकट” से गुज़र रही है और ऐसे समय में विदेशी मुद्रा और ऊर्जा संसाधनों के “समझदारी से इस्तेमाल” की अपील ज़िम्मेदार सरकार का कर्तव्य है.

उन्होंने कहा कि दुनिया के कई हिस्सों में ईंधन की क़ीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई है और भारत तुलनात्मक रूप से बेहतर स्थिति में है. बीजेपी का कहना है कि सरकार का उद्देश्य लोगों में घबराहट नहीं बल्कि सतर्कता पैदा करना है.

गृह मंत्री अमित शाह ने प्रधानमंत्री की अपील को “दूरदर्शी” बताते हुए कहा, “पेट्रोल-डीज़ल के उपयोग में संयम, वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा और केमिकल फर्टिलाइजर को छोड़ नेचुरल फ़ार्मिंग को अपनाने का उनका यह आह्वान भारत को आत्मनिर्भर और एनर्जी सिक्योर राष्ट्र बनाने का स्पष्ट रोडमैप है.”

अर्थशास्त्रियों की नज़र में ये अपील

अर्थशास्त्री और इंस्टीट्यूट ऑफ़ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ़ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष वेद जैन इसे सिर्फ़ एक सामान्य अपील नहीं मानते.

उनके अनुसार, “प्रधानमंत्री के संदेश का सार यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर इस समय एक बहुत बड़ा संकट मंडरा रहा है, जिसे ‘कोविड जैसी’ स्थिति के रूप में देखा जाना चाहिए.”

वेद जैन का कहना है कि अमेरिका-ईरान संघर्ष के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है और इसका सीधा असर भारत पर पड़ रहा है. उनका मानना है कि तेल, सोना और विदेश यात्रा कम करने की अपील विदेशी मुद्रा पर दबाव कम करने की कोशिश है.

हालांकि वे चेतावनी भी देते हैं, “अगर संकट लंबा चला तो सरकार को आगे चलकर पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतें बढ़ाने, सोने के आयात पर नियंत्रण और कुछ चीज़ों पर राशनिंग जैसे क़दम उठाने पड़ सकते हैं.”

सरकार का कहना है कि मौजूदा संरक्षण अभियान किसी तत्काल संकट की वजह से नहीं बल्कि लंबी अवधि की तैयारी के लिए है.

सरकार के मुताबिक़, भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा पेट्रोलियम उत्पाद निर्यातक है और घरेलू मांग पूरी की जा रही है. सरकार ने यह भी कहा है कि अभी घबराने की जरूरत नहीं है.

सोना कारोबार और मध्यम वर्ग की चिंता
सोना

सोना के आयात से भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता है
इस अपील से सबसे अधिक बेचैनी उन सेक्टरों में दिख रही है जिनकी रोज़ी-रोटी सीधे उपभोग पर निर्भर है.

इंदौर सराफा व्यापारी एसोसिएशन के पब्लिक रिलेशन ऑफिसर अजय लाहौटी ने प्रधानमंत्री के 10 मई के भाषण पर विरोध जताते हुए कहा, “देश के लिए हम खड़े हैं लेकिन इस चक्कर में अगर हमारे परिवार या हमारे कर्मचारियों के परिवार भूखे रह जाएंगे तो कैसे काम चलेगा?”

”ऐसी कोई भी अपील करने से पहले एक बार और सोचना चाहिए. प्रधानमंत्री जी ने समय-समय पर देशवासियों को बहुत सारी बातें कही हैं और हम सब उनकी बातों को मानते हैं लेकिन सोना न ख़रीदने वाली अपील से हमारा बहुत नुक़सान होगा”

रायपुर के सोना व्यापारी धरम भंसाली कहते हैं, “मिडिल क्लास पर इस अपील का सबसे बुरा असर पड़ने वाला है. हमारे यहां किसी भी समस्या में सोना ही तुरंत पैसे उपलब्ध कराने वाली वस्तु है. इसलिए छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा आदमी सोना ख़रीदकर कर रखना चाहता है. अब अगर ऐसे में साल भर सोना न ख़रीदने की अपील मान ली जाए तो न जाने कितनी शादियां नहीं होंगी, इस पेशे से जुड़े कितने लोग बेघर हो जाएंगे. राष्ट्रहित में पीएम मोदी की यह अपील अच्छी है लेकिन नागरिक हित में नहीं.”

कारोबारियों का कहना है कि सोना सिर्फ़ एक लग्ज़री वस्तु नहीं बल्कि बचत, शादी और संकट के समय नक़दी जुटाने का ज़रिया भी है. ऐसे में सोना न ख़रीदने की अपील का असर सिर्फ़ कारोबार पर नहीं बल्कि सामाजिक और घरेलू अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है.

कृषि

भारत में खेती किसानी का संकट लंबे समय से रहा है लेकिन हाल के वर्षों में कई कारणों से यह संकट और बढ़ा है
खाद, खेती और किसानों की आशंका
कृषि क्षेत्र में भी इस अपील को लेकर चिंता दिखाई दे रही है.

आरएसएस समर्थित भारतीय किसान संघ के मध्य प्रदेश अध्यक्ष कमल सिंह आंजना कहते हैं, “प्रधानमंत्री की अपील का देश की कृषि पर ख़तरनाक असर पड़ सकता है. देश में खाद की खपत बढ़ी है, क्योंकि सिंचाई का रकबा बढ़ा है. अब ऐसे में अगर किसान को यूरिया और डीएपी नहीं मिलेगी तो वो तो कंगाल हो जाएगा.”

उन्होंने पीएम मोदी की इस अपील की टाइमिंग पर भी सवाल उठाते हुए कहा, “यह समय ऐसा है, जब खाद की ज़रूरत बढ़ने वाली है. मध्य भारत के राज्यों में तो खाद के संकट पहले से मंडरा रहे हैं ऐसे में खाद का कम उपयोग करने की बात बाज़ार में उथल-पुथल पैदा करेगी.”

उन्होंने कहा, “अगर सरकार को लग रहा है तो वो खाद की क़ीमत बढ़ा दे क्योंकि वैसे ही किसान को कालाबाज़ारी के चलते खाद महंगी ही मिल रही है. लेकिन खाद की आपूर्ति बहुत महत्वपूर्ण हैं, वरना देश के खाद्यान्न भंडार के लिए बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी हो जाएगी.”

हालांकि सरकार का कहना है कि खाद का स्टॉक पर्याप्त है. सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 11 मई तक देश में कुल खाद भंडार 199.65 लाख टन था, जो पिछले साल की तुलना में अधिक है. सरकार ने कहा है कि यह खरीफ सीजन की ज़रूरत का 51 फ़ीसदी से ज़्यादा है.

सोशल मीडिया पर पीएम मोदी के कटौती और बचत के बयान पर तीखा विमर्श हो रहा है.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा, “मोदी जी ने कल जनता से त्याग मांगे – सोना मत ख़रीदो, विदेश मत जाओ, पेट्रोल कम जलाओ, खाद और खाने का तेल कम करो, मेट्रो में चलो, घर से काम करो. ये उपदेश नहीं – ये नाकामी के सबूत हैं.”

उन्होंने आगे लिखा, “12 साल में देश को इस मुकाम पर ला दिया है कि जनता को बताना पड़ रहा है – क्या ख़रीदें, क्या न ख़रीदें, कहाँ जाएं, कहां न जाएँ. हर बार ज़िम्मेदारी जनता पर डाल देते हैं ताकि ख़ुद जवाबदेही से बच निकलें.”

नरेंद्र मोदी
लेकिन सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया सिर्फ़ राजनीतिक व्यक्तियों तक सीमित नहीं है. बड़ी संख्या में लोग इस अपील को अपने रोज़मर्रा के आर्थिक संघर्षों के साथ जोड़कर देख रहे हैं.

प्रधानमंत्री के आधिकारिक हैंडल से पोस्ट किए गए इसी भाषण के वीडियो के नीचे कई लोगों ने सवाल किया कि जब आम नागरिकों से पेट्रोल और डीज़ल बचाने की अपील की जा रही है, तब उसी दिन बड़े राजनीतिक रोड शो और लंबी वीआईपी गाड़ियों के काफिले क्यों दिखाई दे रहे हैं.

एक एक्स यूज़र ने लिखा, “नागरिकों से त्याग करने को कहा जा रहा है, लेकिन सरकार की जवाबदेही कहाँ है?”

दूसरे यूज़र ने लिखा, “मोदी जी, यही बात सभी सांसदों, वीआईपी, नेताओं, नौकरशाहों और अधिकारियों से भी कहकर देखिए. सारे नियम सिर्फ़ आम नागरिकों के लिए ही क्यों हैं?”

सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने प्रधानमंत्री के भाषण के कुछ घंटे बाद हुए रोड शो की तस्वीरें और वीडियो साझा करते हुए सवाल उठाए कि ईंधन बचत की अपील और बड़े राजनीतिक काफिलों के बीच विरोधाभास क्यों दिखाई देता है.

हालांकि कुछ प्रतिक्रियाएं सरकार के पक्ष में भी थीं. कुछ यूज़र्स ने वर्क फ्रॉम होम, सार्वजनिक परिवहन और ऊर्जा बचत को व्यावहारिक कदम बताया. कुछ लोगों ने इसे पर्यावरण और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से ज़रूरी कहा.

लेकिन इस पूरी बहस के बीच एक बड़ा सवाल लगातार उभरता दिख रहा है.

क्या यह सिर्फ वैश्विक संकट के बीच एहतियाती अपील है, या फिर सरकार लोगों को आने वाले कठिन आर्थिक समय के लिए मानसिक रूप से तैयार कर रही है?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *