ममता से बेकाबू हो रही है तृणमूल कांग्रेस? कब तक काबू रहेगी पार्टी और चुनाव चिन्ह?

लंबे समय बाद ममता का ‘स्ट्रीट फाइटर’ अवतार, लेकिन धरने में दिख गई TMC की दरार!
मंगलवार को लोगों ने ममता बनर्जी का वो पुराना अवतार देखा जब वे धरने देती थीं और आंदोलन करती थीं. BJP पर तृणमूल नेताओं पर हमला करने और पार्टी को डराने-धमकाने का आरोप लगाते हुए ममता धरने पर बैठीं और कहा कि वे पार्टी कैडर को मुश्किल हाल में नहीं छोड़ेंगी. हालांकि पार्टी में फूट की अटकलों के बीच इस विरोध प्रदर्शन में पार्टी के 80 में से केवल 8 विधायक ही शामिल हुए.
ममता के धरने में 8 विधायक ही शामिल हुए.
कोलकाता,02 जून 2026,पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लंबे समय बाद मंगलवार को अपने ‘स्ट्रीट फाइटर’ अवतार दिखीं. चुनाव हारने के बाद ममता बनर्जी ने कोलकाता में पहली बार बीजेपी के खिलाफ बड़ी रैली करने का दावा किया. अपने स्टाइल की राजनीति को लगभग 15 साल बाद फिर से शुरू करते हुए वे धरने पर बैठीं और अपने ही अंदाज में कहा कि वे तब तक नहीं मरेंगी जब तक उन्हें हटा नहीं लेती.

लेकिन टीएमसी को एकजुट रखने के लिए जूझ रहीं ममता को एक बार फिर से अपने सिपहसालारों के अविश्वास का सामना करना पड़ा. 80 विधायकों वाली टीएमसी के मात्र 8 विधायक ही ममता के साथ इस धरने में मौजूद रहे. यानी कि मात्र 10 फीसदी विधायक. जबकि इस धरने में उनके साथ 6 सांसद दिखे.

किन-किन विधायकों और सांसदों का मिला साथ

कोलकाता में धरने पर बैठीं ममता: शामिल हुए सिर्फ 8 विधायक

कोलकाता के धरमतल्ला में ममता के इस धरने में शामिल होने वाले विधायकों में सोभनदेब चट्टोपाध्याय, नान्या बंदोपाध्याय, मदन मित्रा, अशोक देब, असीमा पात्रा, बिमान बनर्जी, फ़िरहाद हकीम और कुणाल घोष शामिल थे.

जबकि सांसदों में डोला सेन,कल्याण बनर्जी, डेरेक ओ ब्रायन, समीरुल इस्लाम, मेनका गुरुस्वामी और नदीमुल हक शामिल थे.

धरने पर आया शुभेंदु का बयान

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने ममता के इस धरने पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि TMC के मुट्ठी भर नेता ही इसमें शामिल हुए. अधिकारी हुगली जिले के मशहूर तारकेश्वर मंदिर में पूजा-अर्चना करने के बाद पत्रकारों से बात कर रहे थे. उन्होंने कहा, “ममता बनर्जी के विरोध धरने में सिर्फ़ तीन सांसद और छह विधायक ही शामिल हुए. TMC की हालत अब बहुत दयनीय हो गई है. इसकी हालत फ़लता जैसी हो गई है.”

50 विधायक पार्टी तोड़ने की ताक में

इस बीच  TMC से निलंबित पार्टी प्रवक्ता रिजू दत्ता ने कहा कि नए TMC विधायकों का एक वर्ग चाहता था कि निष्कासित MLA ऋतब्रत बनर्जी विपक्ष के नेता बनें, ये लोग स्वयं को ‘असली तृणमूल कांग्रेस’ मानते हैं. रिजू दत्ता के अनुसार करीब 50 विधायक तृणमूल कांग्रेस को तोड़ने की फिराक में हैं.

ममता की हुंकार

तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी धरने में भाजपा पर खूब बरसीं. ममता ने आरोप लगाया कि BJP ने हाल ही में संपन्न पश्चिम बंगाल चुनावों में जीत हासिल करने क , 294 में से 177 सीटों पर वोटों की गिनती में “धांधली” की.

कोलकाता में ममता बनर्जी के साथ धरने पर बैठे पार्टी के नेता
बनर्जी ने जोर देकर कहा कि वह “इन मुश्किल समय” में TMC कार्यकर्ताओं का साथ नहीं छोड़ेंगी. उन्होंने भ्रष्टाचार, डराने-धमकाने और वसूली के आरोपों में नेताओं की बड़े पैमाने पर हुई गिरफ्तारियों और हालिया विधानसभा चुनावों में TMC की हार के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं पर कथित तौर पर हुए अत्याचारों का ज़िक्र किया.

हालिया विधानसभा चुनावों में BJP की जीत के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं पर कथित हमलों के विरोध में मध्य कोलकाता में एक दिन के धरने पर बैठे TMC समर्थकों को संबोधित करते हुए ममता ने कहा कि BJP विरोधी पार्टियां जल्द ही देशव्यापी विपक्षी कार्यक्रम तैयार करेंगी.

TMC प्रमुख ने अगले हफ़्ते होने वाली INDIA गठबंधन की बैठक का ज़िक्र करते हुए कहा, “बहुत जल्द, सभी BJP विरोधी पार्टियां दिल्ली में मिलेंगी. कुछ दिन इंतजार कीजिए और हम जल्द ही अपनी देशव्यापी कार्ययोजना की घोषणा करेंगे.”

ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधा और कहा कि मोदी ने बंगाल को असामाजिक तत्वों और बुलडोज़र चलाने के शौकीन नेताओं के हाथों में छोड़ दिया है, जिससे राज्य अंधेरे की ओर धकेला जा रहा है.

शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता बनाने के समर्थन में TMC विधायकों के हस्ताक्षरों को लेकर हुए विवाद पर बोलते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि विधायकों ने संबंधित बैठक में लिए गए निर्णय के अनुसार ही पार्टी की बैठक में उपस्थिति दर्ज करने वाली पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए थे.

ममता ने कहा, “अगर विधानसभा अध्यक्ष को हस्ताक्षरों की प्रामाणिकता को लेकर कोई संदेह था, तो उन्हें उनका फोरेंसिक परीक्षण करवाना चाहिए था. BJP एक गंदा खेल खेल रही है.”

ममता ने कड़ी चेतावनी के साथ अपना भाषण समाप्त किया और यह कहा कि यह आंदोलन इतनी आसानी से शांत नहीं होगा. उन्होंने कहा कि धरना जारी रहेगा.

ममता की तृणमूल कांग्रेस में टूट… क्या बंगाल दोहराएगा महाराष्ट्र का शिवसेना-NCP मॉडल?

जब से बंगाल चुनाव के नतीजे आए हैं, तब से ही तृणमूल कांग्रेस के भीतर एक ऐसा तबका उभरकर सामने आया है, जिसने पार्टी लीडरशिप को लेकर नाराजगी जाहिर की है. आलम ये है कि अब टीएमसी की टूट की अटकलें लगनी शुरू हो गई हैं.

टीएमसी के कई विधायक अब ममता बनर्जी से अलग होना चाहते हैं.

  • टीएमसी में चुनाव नतीजों के बाद से पार्टी लीडरशिप और नेताओं में अविश्वास और बगावत की स्थिति बन गई है
  • पार्टी के फैसले सेंट्रलाइज्ड, बाहरी कंसल्टेंट्स तथा सर्वे सिस्टम पर अधिक निर्भरता बढ़ी है
  • विधायकों की पार्टी मीटिंग्स में कम भागीदारी और असहमति से संगठन में तनाव और टूटने की आशंका बढ़ी है•

पश्चिम बंगाल के राजनीतिक गलियारों में अब एक बड़ा राजनीतिक सवाल चुपचाप घूम रहा है कि क्या तृणमूल कांग्रेस धीरे-धीरे टूटने की ओर बढ़ रही है? क्या बंगाल में महाराष्ट्र जैसा पॉलिटिकल माहौल बन सकता है, जहां शिवसेना या NCP दो गुटों में टूट गई थी?

यह चर्चा अभी भी अंदाजे वाली लग सकती है, लेकिन तृणमूल कांग्रेस के अंदर हाल के घटनाक्रम ने ऐसे सवालों को नजरंदाज करना नामुमकिन बना दिया है. अब खुलेआम पॉलिटिकल गपशप, अंदरूनी अविश्वास, साफ बगावत, और लीडरशिप के कुछ हिस्सों और पार्टी के जमीनी स्तर के प्रतिनिधियों के बीच बढ़ती दूरी है. जाहिर है, इससे इस बात पर और ज्यादा पॉलिटिकल अंदाजे लगने लगे हैं कि क्या TMC को आखिरकार ऑर्गेनाइजेशनल टूट का सामना करना पड़ सकता है?

चुनाव नतीजों के बाद से बढ़ी नाराजगी!

2026 के विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद से यह बातचीत और तेज हो गई है. 4 मई को नतीजों के ऐलान के बाद से, कई सांसद, विधायक, पार्षद और जिला स्तर के नेताओं ने पार्टी लीडरशिप से नाराजगी जाहिर की है.

दिलचस्प बात यह है कि उनकी ज्यादातर बुराई मुख्य रूप से ममता बनर्जी पर नहीं, बल्कि अभिषेक बनर्जी और पार्टी स्ट्रक्चर के अंदर IPAC जैसे ऑर्गेनाइजेशन के बढ़ते असर पर की गई है. कई नेता अब खुलेआम कह रहे हैं कि तृणमूल कांग्रेस का पारंपरिक पॉलिटिकल कल्चर बदल गया है. उनके मुताबिक, फैसले लेने का तरीका तेजी से सेंट्रलाइज्ड हो गया है और यह कंसल्टेंट्स, सर्वे सिस्टम और बाहरी पॉलिटिकल स्ट्रेटजिस्ट पर बहुत ज्यादा निर्भर हो गया है. कई नेताओं को लगता है कि पार्टी और आम वर्कर्स के बीच ऑर्गेनिक पॉलिटिकल कनेक्शन कमजोर हो रहा है.

बैठकों में नहीं आ रहे विधायक?

ममता बनर्जी पार्टी विधायकों की मीटिंग्स बुला रही हैं, जहां ये अंदरूनी बेचैनी और ज्यादा साफ दिखी. रिपोर्ट्स बताती हैं कि एक मीटिंग से दूसरी मीटिंग में विधायकों के आने की संख्या धीरे-धीरे कम होती गई. पहली मीटिंग में काफी अच्छी हिस्सेदारी देखी गई, लेकिन दूसरी मीटिंग में अटेंडेंस कम हो गई और तीसरी मीटिंग में और भी कम हो गई. ऑफिशियली, कई गैर-हाजिर विधायकों ने हेल्थ प्रॉब्लम, पर्सनल एंगेजमेंट या सिक्योरिटी से जुड़े बहाने बताए. हालांकि, राजनीतिक तौर पर, कई जानकारों का मानना ​​है कि असली वजह अलग थी. कई विधायक अब मौजूदा लीडरशिप स्ट्रक्चर के करीब नहीं रहना चाहते थे.

पहली मीटिंग में ही, ममता बनर्जी ने कथित तौर पर विधायकों से खड़े होकर अभिषेक बनर्जी के लिए पब्लिकली सपोर्ट दिखाने को कहा. उस घटना से ही पार्टी लीडरशिप के अंदर अंदरूनी असहमति को लेकर बढ़ती घबराहट का पता चला.

इस बीच, असहमति जताने वालों पर  अनुशासनात्मक कार्रवाई ने तनाव और बढ़ा दिया है. लेजिस्लेटिव कम्युनिकेशन से जुड़े नकली सिग्नेचर के आरोप सामने आने के बाद दो विधायकों को पार्टी से निकाल दिया गया. हालांकि, निकाले गए नेताओं ने इन आरोपों से पूरी तरह इनकार किया और दावा किया कि कंप्यूटर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके उनके सिग्नेचर में डिजिटल तरीके से छेड़छाड़ की गई थी. उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी जानकारी के बिना डॉक्यूमेंट्स सर्कुलेट किए गए और उनके नाम से गलत कम्युनिकेशन दिखाए गए.

फर्जी साइन का विवाद क्या?

यह मामला पार्टी को और भी शर्मनाक हो गया क्योंकि नकली सिग्नेचर और हेरफेर किए गए लेटर के आरोप जल्द ही एक राजनीतिक विवाद में बदल गए. अंदरूनी तालमेल, संगठनात्मक पारदर्शिता और खुद लेजिस्लेटिव पार्टी के कामकाज को लेकर सवाल उठने लगे.

18 मई को अभिषेक बनर्जी ने कथित तौर पर विधानसभा के प्रमुख सचिव को एक पत्र लिखा था. बाद में 20 मई को एक और पत्र भेजा गया, जिसमें कहा गया कि विपक्षी विधायकों की एक मीटिंग हुई थी, जिसमें ज्यादातर विधायकों ने शोभनदेव मुखोपाध्याय को विपक्ष का नेता बनाने के समर्थन में हाथ उठाए थे. हालांकि, विवाद इसलिए खड़ा हो गया क्योंकि बाद में कई विधायकों ने दावा किया कि वे न तो ऐसी किसी मीटिंग में  थे और न ही किसी प्रस्ताव पर साइन किए थे. इससे गंभीर सवाल उठे. अगर दस्तखत वाकई नकली थे तो असल में कितने विधायक थे? क्या प्रस्ताव सच में पास हुआ था? या सिस्टम में कहीं कोई हेराफेरी हुई थी?

आखिरकार मामला CID तक पहुंच गया, और खबर है कि मुख्यमंत्री ने भी माना कि कई विधायकों से पूछताछ हो रही है. इस पूरे मामले ने पार्टी के अंदर अविश्वास की भावना को और गहरा कर दिया.

राजनीतिक तौर पर जरूरी बात यह है कि बगावत अब कुछ खास लोगों तक ही सीमित नहीं है. बेचैनी का वातावरण दिखने लगा है. कुछ नेताओं ने चुपचाप पार्टी मीटिंग्स से पूरी तरह बचना शुरू कर दिया है. दूसरे डर, दबाव और ऑर्गनाइजेशन में खुलकर अपनी राय न बता पाने के बारे में ऑफ द रिकॉर्ड बोल रहे हैं.

इससे साफ बड़ी पॉलिटिकल बहस शुरू हो गई है. अगर नाराजगी बढ़ती रही, तो क्या बंगाल में कोई अलग पॉलिटिकल प्लेटफॉर्म बन सकता है? जरूरी नहीं कि वह BJP हो, और जरूरी नहीं कि वह कांग्रेस जैसी कोई दूसरी ताकत हो, बल्कि शायद एक ऐसा तीसरा राजनीतिक मंच हो जिसे खुद असंतुष्ट तृणमूल नेताओं ने बनाया हो.

पहले भी देखे हैं ऐसे उदाहरण

भारतीय राजनीति में ऐसे उदाहरण पहले भी देखे गए हैं. दशकों से कांग्रेस के कई क्षेत्रीय गुटों में बंटने से लेकर महाराष्ट्र में शिवसेना और NCP से जुड़े हालिया घटनाक्रमों तक, अब पार्टियों में फूट पड़ना असंभव नहीं माना जाता. बंगाल ने भी अपने पूरे इतिहास में कई बार राजनीतिक समीकरणों में बदलाव देखे हैं.

अभी के लिए, ज्यादातर चर्चाएं मात्र राजनीतिक ‘हवाबाजी’ हैं, यानी बिना किसी पक्के सबूत की अटकलें. लेकिन ये अटकलें इसलिए लगाई जा रही हैं, क्योंकि पार्टी  अस्थिरता के आंतरिक संकेतों को अब नजरंदाज करना मुश्किल होता जा रहा है.

तृणमूल कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चिंता सिर्फ बगावत नहीं, बल्कि लोगों की नजर में पार्टी की छवि है. जब कोई सत्ताधारी पार्टी अंदर से बंटी दिखने लगती है, तो संगठन के भीतर और  मतदाताओं में भी शंकाएं फैलने लगती हैं. तब पार्टी के अधिकार, नेतृत्व के उत्तराधिकार, वैचारिक दिशा और सांगठनिक अनुशासन को लेकर सवाल उठने लगते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *