TMC में भी भगदड़? कार्यकर्ता थामने लगे भगवा झंडा,बंगाल हार ये है ममता बनर्जी का संकट

पहले भागे अधिकारी, अब नेता भी छोड़ रहे ममता बनर्जी का साथ; राज चक्रवर्ती का राजनीति से ही संन्यास 

राज चक्रवर्ती ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘मेरी राजनीतिक यात्रा  2021 में शुरु हुई थी। अगले 5 साल मैंने खूब काम किया। पूरी भावना के साथ विधायक के तौर पर जनता के लिए काम करने का प्रयास किया। यह अध्याय 2026 में समाप्त हो गया । इसी के साथ अब राजनीतिक यात्रा भी खत्म होती है।’

कोलकाता 07 मई 2026:  बंगाल की सत्ता से तृणमूल कांग्रेस की विदाई होते ही उन अधिकारियों ने पाला बदल लिया या सुर बदल गए, जो कभी टीएमसी के करीबी होते थे। यही नहीं अब नेता भी टीएमसी का साथ छोड़ रहे हैं। दीदी की बुलाई नवनिर्वाचित विधायकों की पहली बैठक से ही नौ विधायक गायब रहे। कुछ नेताओं ने तो सीधे टीएमसी लीडरशिप को ही टारगेट किया और कहा कि उनका जमीन से कनेक्शन टूट गया है, जिससे ऐसे नतीजे दिखे हैं। इसी कड़ी में बैरकपुर सीट से पूर्व विधायक और फिल्ममेकर राज चक्रवर्ती भी टीएमसी का साथ छोड़ गये। उन्होंने तो यहां तक कहा कि राजनीति मेरे लिए नहीं है। इसलिए मैं अब पॉलिटिक्स ही छोड़ रहा हूं।

यहाँ राज चक्रवर्ती के ट्वीट का हिंदी अनुवाद दिया गया है:
​राज चक्रवर्ती @iamrajchoco
​”2021 में मेरे राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई थी। लोगों ने मुझे काम करने का अवसर दिया।
​अगले पाँच वर्षों तक मैंने उसी तरह एक विधायक की जिम्मेदारी निभाने की पूरी कोशिश की।
​वह अध्याय 2026 में समाप्त हो गया।
​और इसके साथ ही मेरे राजनीतिक जीवन का सफर भी समाप्त हो गया।”

​राज चक्रवर्ती @iamrajchoco
​”जीवन में जब भी मुझे कोई जिम्मेदारी मिली, मैंने उसे पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ निभाया।
​मैंने अपना सब कुछ (अपना सर्वश्रेष्ठ) देने की कोशिश की है।
​एक निर्देशक के रूप में, फिल्मों के माध्यम से मैंने हमेशा लोगों का मनोरंजन करने और उन्हें खुशी देने का प्रयास किया है।
​कभी जीत मिली, तो कभी हार का सामना करना पड़ा।”

अब इन्ही राज चक्रवर्ती के हार के पहले के तेवर देखिये-

राज चक्रवर्ती का यह बयान ऐसे समय आया, जब पिछले कुछ दिनों से कई पूर्व मंत्री और टीएमसी के नेता ही खुला लीडरशिप पर सवाल उठा चुके। इन नेताओं का कहना है कि टीएमसी संगठन में अहंकार आ गया था और वे जमीन से कट चुके थे। इसी से ऐसा नतीजा दिखा है। राज चक्रवर्ती ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘मेरी राजनीतिक यात्रा 2021 में शुरु हुई थी। जनता ने मुझे काम करने का अवसर दिया। फिर 5 साल तक मैंने खूब काम किया। पूरी भावना से विधायक के तौर पर जनता के लिए काम करने का प्रयास किया। यह अध्याय 2026 में समाप्त हो गया है। इसी के साथ अब राजनीतिक यात्रा भी खत्म होती है।’

टीएमसी के एक सांसद और ऐक्टर देव ने भाजपा को जीत पर बधाई दे उसकी जीत को जनादेश करार दिया है। उनका यह रुख टीएमसी से अलग है, जिसमें ममता बनर्जी ने चुनाव में गड़बड़ी के आरोप लगाए और इस्तीफा देने से ही इनकार कर दिया था। यही नहीं, देव ने भाजपा को बधाई देते हुए यह अपील भी की कि बंगाल में ऐसा प्रशासन चलाएं कि समाज में आपसी सौहार्द बढ़े।

टीएमसी के अभिनेता-सांसद देव ने भाजपा को चुनाव जीत पर बधाई दी और उम्मीद जताई कि अब कलाकारों को काम करने की आजादी मिलेगी।

अभिनेता से टीएमसी सांसद बने देव ने बुधवार को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत पर बधाई दी और आशा व्यक्त की कि नई सरकार बंगाली फिल्म उद्योग में कलात्मक स्वतंत्रता और एकता की रक्षा करेगी।
पिछले कुछ वर्षों में कोलकाता के फिल्म जगत में इस बात को लेकर विवाद चल रहा है कि टीएमसी से जुड़े कुछ लोग यह नियंत्रित करते हैं कि किसी प्रोजेक्ट में कौन अभिनय करेगा, निर्देशन करेगा या तकनीशियन के रूप में काम करेगा। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा,
“बंगाल में नई सरकार बनाने का जनादेश प्राप्त करने पर भाजपा को बधाई। मुझे पूरी उम्मीद है कि सरकार हमारे राज्य की प्रगति, शांति और विकास के लिए काम करेगी और यह सुनिश्चित करेगी कि जनता की आवाज सुनी जाए।”
सार्वजनिक जीवन और फिल्म उद्योग से अपने दोहरे जुड़ाव को रेखांकित करते हुए, उन्होंने बंगाली सिनेमा जगत में कलात्मक स्वतंत्रता और एकता की रक्षा करने की अपील की।
​​टीएमसी नेता ने कहा,कि “मैं नई सरकार से विनम्र निवेदन करता हूं कि वह बंगाली फिल्म उद्योग में प्रतिबंधों और विभाजन की संस्कृति को अतीत की बात बनाकर एकता और कलात्मक स्वतंत्रता की भावना को कायम रखे।”
आरोप है कि सिनेमा उद्योग को शक्तिशाली राज्य मंत्री अरूप के भाई स्वरूप बिस्वास के नेतृत्व वाले एक गिरोह द्वारा चलाया जा रहा था। तकनीशियन संघ चलाने वाले बिस्वास पर आरोप है कि उन्होंने अनिर्बन भट्टाचार्य जैसे कई बंगाली फिल्म अभिनेताओं को उनके काम करने के तरीके की आलोचना करने पर प्रोजेक्ट मिलने से रोका।
बिस्वास की कथित “मनमानी” से कई बार अदालती मुकदमें हुए और अभिनेताओं ने ‘बंद’ भी  आयोजित किए ।
देव ने अपने पोस्ट में सिनेमा को बंगाल की सबसे मजबूत सांस्कृतिक पहचानों में से एक बताया और इस बात पर जोर दिया कि इसका विकास “आपसी सम्मान, सह-अस्तित्व और सामूहिक प्रगति” पर निर्भर करता है।
घाटाल सांसद ने अपने निर्वाचन क्षेत्र में बाढ़ की समस्या से निपटने के लिए लंबे समय से लंबित बुनियादी ढांचे की मांग की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा ,
“मैं घाटाल मास्टर प्लान को पूरा करने के लिए नई सरकार के समर्थन और सहयोग की उम्मीद करता हूं – यह घाटाल के लोगों का एक लंबे समय से संजोया हुआ सपना और आवश्यकता है,” ताकि बार-बार आने वाली बाढ़ की समस्या का समाधान हो सके।
घाटाल मास्टर प्लान राज्य की कम से कम 10 प्रमुख नदियों के नदी तल की खुदाई और तटबंधों को मजबूत करने की एक विशाल परियोजना है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह परियोजना राजनीतिक विचारों से परे है और कहा, “यह जीवन की रक्षा, आजीविका सुनिश्चित करने और घाटाल के लोगों को वह भविष्य देने के बारे में है जिसके वे हकदार हैं।”
देव ने बाद में पत्रकारों से कहा कि उनका इरादा अपने अभिनय करियर पर ध्यान केंद्रित करने का है, साथ ही वे पर्दे के पीछे से बंगाली फिल्म उद्योग को अपना समर्थन देना जारी रखेंगे।
भाजपा की शानदार जीत पर पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए टीएमसी नेता ने कहा कि अपनी पार्टी की हार के बावजूद, उन्हें फिल्म उद्योग के लिए सकारात्मक परिणाम नजर आते हैं। उन्होंने कहा,
“अब उद्योग में कोई किसी पर प्रतिबंध नहीं लगा पाएगा। निर्माताओं पर अनावश्यक नियमों का बोझ नहीं पड़ेगा। काम सुचारू रूप से होगा, काम की मात्रा बढ़ेगी और बाहर से भी अवसर मिलेंगे।”
दल-बदल की अटकलों को खारिज करते हुए देव ने कहा कि उनका भाजपा में शामिल होने का कोई इरादा नहीं है।
उन्होंने कहा, “मैं शुरू से ही राजनीति में आना नहीं चाहता था। मैं ममता बनर्जी के कहने पर इसमें आया। ऐसा नहीं है कि मैं राजनीति के बिना नहीं रह सकता।” उन्होंने आगे कहा,
“मैंने हमेशा सबके साथ काम किया है – चाहे वो मिथुन चक्रवर्ती हों, रूपा गांगुली हों, रुद्रनील घोष हों, सोहिनी सरकार हों या अनिर्बन भट्टाचार्य। मैं पहले एक अभिनेता हूं, टॉलीवुड का हिस्सा हूं, और उसके बाद ही एक राजनेता हूं।”
गांगुली और घोष ने भाजपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव जीता है, जबकि चक्रवर्ती कुछ साल पहले भाजपा में शामिल हुए थे।

पूर्व मंत्री रबींद्रनाथ घोष ने तो सीधे फूट वाली बात कही कि ममता पर दबाव डालते हैं अभिषेक
उन्होंने कहा कि मैं हमेशा से महसूस करता था कि पार्टी में दो धड़े हो गए हैं। एक खेमा दीदी का है और दूसरा ग्रुप अभिषेक बनर्जी का है। उनका कहना है कि अभिषेक अकसर दीदी पर दबाव डालते थे और अपने फैसले मनवा लेते थे। इस तरह टीएमसी में अब आपसी कलह बढ़ गई है और कई नेता लीडरशिप को ही टारगेट कर रहे हैं। इसी तरह पूर्व क्रिकेटर और मंत्री रहे मनोज तिवारी ने भी आरोप लगाए हैं। उन्हें 2026 के चुनाव में टिकट नहीं मिला था और अब वह कह रहे हैं कि उनसे टिकट के बदले में करोड़ों रुपये मांगे गये थे। इस तरह टीएमसी में अब अंतर्कलह खुलेआम हो गई है। ममता बनर्जी से ज्यादा उनके भतीजे अभिषेक पर इशारों में निशाने सध रहे हैं।

Crisis In Trinamool Congress After Defeat In West Bengal Election Mamata Banerjee May Face Split In Tmc
कहीं TMC में पड़ न जाए फूट, कार्यकर्ता थामने लगे भगवा झंडा, बंगाल में हार के बाद ममता बनर्जी फंसी बड़ी संकट में
ममता बनर्जी 15 साल शासन के बाद अब फिर केंद्र और बंगाल में विपक्ष में पहुंच गई हैं। लंबी सत्ता  बाद बंगाल में चुनावी हार के बाद उनकी पार्टी को राजनीतिक संकट पैदा हो गया है। कार्यकर्ताओं के पाला बदलने, पार्टी की फूट की आशंका, नेतृत्व की कमी उन्हें परेशान कर सकती है।

ममता बनर्जी भवानीपुर और बंगाल में चुनाव हारने पर भी सीएम पद से इस्तीफा देने को राजी नहीं हुई।। टीएमसी चीफ का आरोप है कि भाजपा ने चुनाव आयोग और केंद्रीय सुरक्षा बलों से चुनाव में धांधली की है। चुनाव परिणाम में तृणमूल कांग्रेस के आंकड़े घटे हैं, मगर नैतिक जीत भाजपा की नहीं हुई। बंगाल चुनाव में टीएमसी ने 8% वोट और 135 विधानसभा सीटें गंवा दी। चुनाव में ममता बनर्जी के हाथ से सिंगूर भी निकल गया, जहां आंदोलन के बाद 15 साल पहले उन्होंने आंदोलन से सत्ता की नींव रखी थी। राजनीतिक जीवन में सबसे बड़ी हार के बाद उनकी चुनौतियां बढ़ गईं हैं।
mamata tmc crisis.
चुनाव हारने के बाद ममता बनर्जी के सामने खड़ी हैं कई राजनीतिक चुनौतियां

टीएमसी कार्यकर्ताओं ने भी उड़ाए गेरूआ गुलाल
पश्चिम बंगाल के ट्रेंड में चुनाव हारने वाली पार्टी के सामने जनाधार के साथ जमीन पर कार्यकर्ताओं को खोने का खतरा रहता है। 2011 में टीएमसी की जीत के बाद ऐसा ही हुआ। लेफ्ट समर्थक लाल झंडा थामने वाले गुट टीएमसी में चले गए। 4 मई को भाजपा की जीत के बाद कई इलाकों में टीएमसी कार्यकर्ताओं ने रातों रात भगवा गुलाल उड़ाना शुरू कर दिया। अब सवाल यह है कि क्या ममता इतनी बड़ी हार के बाद अपनी पार्टी बचा पाएंगी। 2026 के चुनाव में टीएमसी पर तोलाबाजी, कट मनी और करप्शन के आरोप लगे थे। ग्राउंड पर जनता के बीच टीएमसी शासन के दौरान करप्शन बड़ा विषय रहा। स्कूल भर्ती घोटाला ने इस धारणा को और मज़बूत किया कि सत्ता में बैठी टीएमसी रोजगार के मौके छीन रही है। रही सही कसर आरजी कर रेप केस ने पूरी कर दी।

काबा-मदीना के चक्कर में 8 जिलों में साफ हुई टीएमसी
टीएमसी ने रोजगार भत्ते देकर नौकरी के विषय को ठंडा करने की कोशिश की, मगर बंगाल से पलायन के आंकड़े के सामने यह लॉलीपॉप ही सिद्ध हुआ। चुनाव प्रचार में सयोनी घोष के काबा-मदीना वाला गाना और खुद ममता बनर्जी का मुसलमानों को लेकर दिए गए बयान ने ध्रुवीकरण को हवा दे दी। बहुसंख्यक हिंदू वोट एकजुट हुआ और भाजपा दोनों चरणों में जीत गई। भाजपा ने कुल 8 जिलों अलीपुरद्वार, जलपाईगुड़ी, कलिम्पोंग, दार्जिलिंग पुरुलिया, बांकुड़ा, पूर्वी बर्दवान और झाड़ग्राम में टीएमसी का सफाया कर दिया। कूच बिहार में तृणमूल कांग्रेस को केवल एक सीट मिली। भाजपा ने पहले चरण में जिन 152 सीटों पर मतदान हुआ, उनमें से उसने 109 सीटें जीतीं। दूसरे चरण की घोषित 141 सीटों में से 98 सीटें अपने नाम कीं।

भाजपा कर सकती है बंगाल में महाराष्ट्र वाला खेल
ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ा खतरा पार्टी के बिखरने का है। लेफ्ट के सत्ता से बाहर होने के बाद जो टीएमसी के पक्ष में आए थे, वह भाजपा में जा सकते हैं। रसूख और दबंगई से बूथ मैनेजमेंट करने वाले भी टीएमसी के पाले से खिसक सकते हैं। उससे भी बड़ी चिंता विधानसभा और संसद में पार्टी की बचाने की होगी। महाराष्ट्र में भाजपा ने शिवसेना और एनसीपी तोड़कर राजनीति ही बदल दी। अब वहां ठाकरे और पवार ब्रांड कमजोर हो चुका। दोनों पार्टियों के दूसरे नेता बड़े धड़े का नेतृत्व कर रहे हैं, जो भाजपा के साथ है। बंगाल में टीएमसी के साथ ऐसा नहीं होगा, इसकी संभावना कम है। पिछले चुनाव के बाद भाजपा विधायकों को तोड़कर खुद ममता बनर्जी ने इस परंपरा की शुरुआत की थी।

विधानसभा में तेज तर्रार नेता प्रतिपक्ष कौन होगा
अभी तृणमूल कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन का चरण चल रहा है। डायमंड हार्बर सांसद और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी नंबर दो बन चुके हैं। अगर बंगाल में चौथी बार टीएमसी को सत्ता मिलती तो अभिषेक अगले पांच साल में नेता के तौर पर स्थापित हो जाते। मगर खेल बदल चुका है। 71 साल की ममता बनर्जी ने त्यागपत्र नहीं देकर संघर्ष के तेवर बनाये रखने के संकेत दिए हैं, मगर इसे पांच साल तक कायम रखना आसान नहीं है।

अभिषेक बनर्जी ने कभी राजनीतिक संघर्ष की राजनीति नहीं की। जब टीएमसी विधानसभा में विपक्ष की हैसियत में होगी, तब वहां न तो ममता बनर्जी होंगी और न ही अभिषेक बनर्जी। उन्हें ऐसे विधायकों की जरूरत होगी जो विधानसभा में भाजपा को चुनौती दे सके। इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर पर भी ममता बनर्जी को झटका लग सकता है। अब तक कांग्रेस पर भारी रही टीएमसी को राहुल गांधी का नेतृत्व स्वीकार करना पड़ सकता है।

 

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