स्कूल-कॉलेज में यौन-शोषण छुपाया तो प्रिंसिपल,हेड मिस्ट्रेस जिम्मेदार,SC की POCSO गाईडलाईन्स
Supreme Court Revives Pocso Case Against School Headmistress
स्कूल में हुए यौन-शोषण की जानकारी छुपायी,तो प्रिंसिपल,हेड मिस्ट्रेस होंगे जिम्मेदार,सुप्रीम कोर्ट ने POCSO केस में दी गाईडलाईन्स
एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बाल यौन शोषण मामलों में अनिवार्य रिपोर्टिंग को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि किसी स्कूल अधिकारी को पीड़ित बच्चे से सीधे यौन अपराध की जानकारी मिलती है तो वह स्वयं जांच करने या तथ्यों का सत्यापन करने का अधिकार नहीं रखता।
नई दिल्ली 12 जुलाई 2026 : देखने में आता है कि स्कूलों में जब कोई बच्चा अपने साथ हुए दुर्व्यवहार की स्कूल अधिकारियों से शिकायत करता है, तो स्कूल में ही जांच की बात कह कर मामला दबा दिया जाता है। ऐसे ही एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बाल यौन शोषण मामलों में अनिवार्य रिपोर्टिंग को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि किसी स्कूल अधिकारी को पीड़ित बच्चे से सीधे यौन अपराध की जानकारी मिलती है तो वह स्वयं जांच करने या तथ्यों का सत्यापन करने का अधिकारी नहीं है। POCSO Act में साफ प्रावधान हैं कि इस तरह की दुर्घटना में जानकारी मिलते ही पुलिस या सक्षम प्राधिकारी को सूचना देना कानूनी दायित्व है। शीर्ण अदालत ने और भी बहुत कुछ कहा है, और मामले में हेड मिस्ट्रेस को भी नहीं बख्शा है,
असम के स्कूल से है POCSO केस मामला
यह मामला असम के एक स्कूल से जुड़ा है। यहां एक नाबालिग छात्रा ने कथित तौर पर अपनी हेडमिस्ट्रेस को यौन शोषण की जानकारी दी थी। आरोप थे कि आठवी कक्षा के छात्र ने उसका यौन उत्पीड़न किया था। लेकिन बच्ची के जरिए और फिर बच्ची की मां की शिकायत के बाद भी सूचना मिलने के बावजूद स्कूल प्रशासन ने पुलिस को इसकी जानकारी नहीं दी। बच्ची की मां ने मामले में इंसाफ के लिए लेकर ट्रायल कोर्ट और फिर गुवाहाटी हाई कोर्ट में गुहार लगाई थी। लेकिन हाईकोर्ट के द्वारा स्कूल अधिकारियों – जिनमें हेडमिस्ट्रेस, प्रिंसिपल, शिक्षक और हॉस्टल वार्डन शामिल थे – को आरोपमुक्त करने के फैसला आने से, अंत में सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी।
सुप्रीम कोर्ट का अवलोकन और POCSO Act में अनिवार्य रिपोर्टिंग
बच्ची की मां की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की बेंच ने सुनवाई की
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी स्कूल अधिकारी का यह कहना पर्याप्त नहीं है कि उसने पहले स्वयं मामले की जांच की और अपराध नहीं पाया।
POCSO Act की धारा 19 किसी भी व्यक्ति पर यह कानूनी दायित्व डालती है कि यदि उसे बाल यौन अपराध की जानकारी हो तो वह तत्काल संबंधित अधिकारियों को सूचित करे। कानून का उद्देश्य अपराध छिपाना नही, त्वरित हस्तक्षेप सुनिश्चित करना है।
कोर्ट ने कहा कि अपराध हुआ या नहीं,इसका निर्णय पुलिस और सक्षम जांच एजेंसियां करेंगी,न कि स्कूल प्रशासन। इसलिए किसी अधिकारी का स्वयं निष्कर्ष निकाल लेना कानूनी जिम्मेदारी से मुक्ति का आधार नहीं बन सकता।
और फिर शीर्ष अदालत स्कूल की हेड मिस्ट्रेस के खिलाफ POCSO Act में मामला चलाए जाने को अनुमति दे दी।

POCSO एक्ट की धारा 21 में बतायी गई है सजा
असम के स्कूल की ऐसी गलती पर पॉक्सो एक्ट की धारा 21 लागू होती है। पॉक्सो एक्ट की धारा 21 उन लोगों या संस्थाओं को सजा प्राविधानित करती है, जिन्हें किसी बच्चे से यौन अपराध की जानकारी होती है या वे इसे देखने पर भी पुलिस या विशेष किशोर पुलिस इकाई को रिपोर्ट कराने से बचते हैं। इसमें भी दो एंगल है
सामान्य नागरिक के रिपोर्ट न करने पर:
यदि कोई व्यक्ति (जो बच्चा नहीं है) किसी अपराध की जानकारी होने पर उसकी रिपोर्ट नहीं करता है, तो उसे 6 महीने कारावास, अर्थदण्ड या दोनों से दंडित किया जा सकता है।
संस्था प्रमुख के रिपोर्ट न करने पर: यदि किसी स्कूल, अस्पताल, शेल्टर होम या कंपनी का प्रमुख अपने नियंत्रण वाले किसी कर्मचारी या व्यक्ति के किए अपराध की रिपोर्ट करने में विफल रहता है, तो उसे 1 साल तक जेल और अर्थदण्ड दोनों हो सकती है।
बच्चों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता
शीर्ष अदालत ने इस फैसले से साफ कर दिया है कि बाल यौन शोषण की जानकारी मिलने पर किसी भी अधिकारी का निजी जांच, सत्यापन या संस्थागत प्रक्रिया का सहारा लेकर रिपोर्टिंग से बचना स्वीकार्य नहीं है। उम्मीद है आगे से ऐसे संस्थान, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद POCSO Act की अनिवार्य रिपोर्टिंग व्यवस्था पर ध्यान देंगे ताकि बच्चों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के साथ जवाबदेही तय करने और POCSO Act के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में सक्रिय सहयोग हो सके।

