सर जार्ज एवरेस्ट से “सागरमाथा/गौरीशंकर/कोमुलंगमा ” का कुछ संबंध नही,फिर भी नाम “माउंट एवरेस्ट “!

माउंट एवरेस्ट, जिसे स्थानीय रूप से सागरमाथा (नेपाल में) या चोमोलुंगमा (तिब्बत में) कहा जाता है, समुद्र तल से ऊपर दुनिया का सबसे ऊँचा पर्वत है। यह हिमालय के महालंगुर हिमाल उपश्रृंखला में स्थित है। चीन और नेपाल की सीमा इसके शिखर बिंदु से होकर गुजरती है। इसका आधिकारिक ऊँचाई (हिम स्तर सहित) 8,848.86 मीटर (29,031 फीट 6 इंच) है, जिसे 2020 में चीन और नेपाल के अधिकारियों ने मान्यता दी थी।

#एक_संकल्प

एक पर्वत शिखर है, ऊँचाई 29,028 फीट। हमारे पुराणों ने इसे #गौरी_शंकर कहा; क्योंकि हमारे पूर्वज मानते थे कि इस पर्वत के उतुंग शिखर पर महादेव अपनी पत्नी गौरी के साथ विचरण करते हैं।

इसी पर्वत को हमारे पूर्वजों ने #सागर_माथा भी कहा यानि अगर हम सागर की ओर से चलें और दृष्टि ऊपर करें तो इसी पर्वत के शिखर को हम देख पातें हैं (भाव रूप में) क्योंकि ये सबसे ऊँची है। जिस नेपाल पर हम आज कल चुट्कुले बना रहे हैं, उस नेपाल में इसे अब भी सागरमाथा ही कहा जाता है।

यह पर्वत शिखर प्रभु राम के पूर्वज राजा सगर की भी तपःस्थली थी।

स्वामी दयानंद सरस्वती जिस तिब्बत को मानव-सभ्यता की उदगम स्थली मानते हैं, उस तिब्बत के लोग इस पर्वत शिखर को #चोमोलुंगमा कहते हैं।

मगर हम लोग इसे क्या कहते हैं?

हम हिन्दू इस पर्वत शिखर को “एवरेस्ट” कहते हैं?

क्यों कहते हैं?

क्योंकि सन 1852 में एक अंग्रेज सर्वेयर था ‘जॉर्ज एवरेस्ट”, उसने इसका एक नक्शा बनाया और हल्ला मचाया कि इस पर्वत की खोज उसने की है और इस झूठ को वो दुनिया भर में लेकर गया। सन 1865 में जब ये आदमी रिटायर होकर अपने देश इंग्लैंड जा रहा था तो उसके रिटायरमेंट फेयरवेल में बतौर तोहफ़ा उसके नाम पर इस शिखर का नाम #एवरेस्ट रख दिया गया।

और हम अभागे, धिम्मी लोग भी उसे सागरमाथा, गौरी-शंकर के नाम से पुकारना छोड़कर एवरेस्ट कहने लग गये।

गुलामी के चिन्हों को उतारिये वरना हम स्वाभिमान से भरे हिन्दू कभी भी नहीं बन सकते। संकल्प करिये कि आज से लिखने में, बोलने में, चर्चा करने में हम इसे एवटेस्ट नहीं कहेंगे।

माउंट एवरेस्ट को गौरी शंकर शिखर
और अरब सागर को सिन्धु सागर कहना शुरू कीजिए।
एक आजादी ये भी।
✍🏻- अभिजीत

पहाड़ों की कहानियाँ:

एक तस्वीर में सबसे ऊंची चोटी केदारनाथ, फिर भरतकुंट और किनारे मेरु पर्वत दिखाया गया था

सिर्फ उत्तराखंड में ही हिमालय की 600 चोटियां हैं, और करीब – करीब सबके स्थानीय नाम हैं। ये अलग बात है कि अधिकांश स्थानीय जनता इन्हें नामों से नहीं पहचानती, पर पुराणों से लेकर लोक परंपराओं में अधिकांश चोटियों के हिन्दी या तिब्बती नाम हैं।

1843 ईस्वी तक दुनिया की सबसे ऊंची चोटी कंचनजंगा को माना जाता था। सर जार्ज एवरेस्ट के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने एंड्रयू वाॅग को भारत का सर्वेयर जनरल नियुक्त किया। उस समय भारत के एक अत्यंत मेधावी गणितज्ञ राधानाथ सिकदर ने जो उस समय सन 1847 में सर्वे विभाग के मुख्य गणक थे, ने अपनी गणना में पाया, कि एक चोटी कंचनजंगा से भी ज्यादा ऊंची है। आश्चर्य की बात ये है कि जार्ज एवरेस्ट को तो छोड़िए, ये बात उनके उत्तराधिकारी एंड्रयू वाॅग को भी पता नहीं थी। पर स्थानीय लोगों को जो ज्ञान था, उसकी टांग तोड़ कर रख दी गई। तिब्बती इस चोटी को “कोमुलंगमा” कहते थे जिसका अर्थ था, दुनिया की मां। दार्जिलिंग में इसे देवधूंगा कहा जाता था, यानि देवताओं की जगह। नेपाली इसे सगरमाथा कहते थे, यानि सबों का मस्तक और हिन्दू इसे गौरीशंकर।

बस यहीं सफेद देवदूतों ने मौका ताड़ लिया। एंड्रयू ने इसे peak 15 कहा, और इंगलैंड की रायल ज्यॉग्रेफिकल सोसाइटी से निवेदन किया कि दुनिया की इस सबसे ऊंची चोटी का नाम पिछले सर्वेयर जनरल जार्ज एवरेस्ट के नाम पर रखा जाए। सर जार्ज एवरेस्ट ईमानदार आदमी रहे होंगे, तो उन्होंने इस नामकरण का विरोध किया, क्योंकि न तो उन्होंने ये चोटी ढूंढ़ी थी, न ही उन्हें अपने कार्यकाल में इसका कुछ पता था।

लेकिन उस समय नेपाल मे रहनेवाले एक अंग्रेज प्रकृतिवादी ब्रायन हाउटन ने एक अद्भुत तर्क रायल सोसाइटी के समक्ष प्रस्तुत किया। उसने बहुत मार्के की बात कही, जो गौर करने लायक है। “चूंकि “पीक 15 ” के बहुत सारे स्थानीय नाम हैं, इसीलिए इसको एक ही विशिष्ट नाम दिया जाए। सारे अंग्रेजों ने ये बात मान ली, और सारे नाम “कोमुलंगमा, देवधूंगा, सगरमाथा, गौरीशंकर ” सब किनारे हो गये, और दुनिया की सबसे ऊंची चोटी का नाम माउंट एवरेस्ट हो गया।

1866 में जब सर जार्ज एवरेस्ट की मृत्यु हुई, तो उन्हें नहीं पता था कि उन्होंने दुनिया की उस सबसे ऊंची चोटी को, कभी देखा भी था या नहीं।
✍🏻आशीष कुमार

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