सुप्रीम कोर्ट 1995:चुनाव आयोग के निर्णय बहुमत से, तो अब नया क्या है

TN Seshan Vs Union Of India Supreme Court Judgement: चुनाव आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य आयुक्तों के अधिकारों पर चर्चा तेज है. 1995 के टीएन शेषन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सीईसी आयोग का प्रमुख है,पर अकेला निर्णायक नहीं. फैसले सर्वसहमति से होंगे या फिर बहुमत से होंगे.लेकिन, इसका मतलब नहीं है कि सीईसी के पास कोई विशेष अधिकार नहीं है.आयोग के प्रशासनिक कामकाज में उनके पास कई विशेष अधिकार हैं।
TN Seshan Vs Union Of India Supreme Court Judgement: निर्वाचन आयोग के भीतर अनबन की खबरों के बीच तीनों चुनाव आयुक्तों के अधिकारों और उनकी शक्तियों को लेकर चर्चा तेज हो गई है. एक दिन पहले मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चुनाव आयोग के भीतर मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के अलावा दो अन्य आयुक्तों डॉ. सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने बीते 10 महीने में कम से कम 14 बार आयोग के फैसले को लेकर अपनी आपत्ति जताई. इसके बाद चुनाव आयोग ने भी सफाई दी और कहा कि आयोग के भीतर आयुक्तों द्वारा अपनी बात रखना आयोग के लोकतांत्रिक चरित्र का हिस्सा है. आयोग द्वारा लिए गए तमाम फैसले सर्वसहमति से लिए गए. लेकिन, यह मामला यहीं थमा. विपक्षी दलों ने इस खुलासे के बाद मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की आलोचना की और कई ने उनके इस्तीफे की मांग की. खैर हम आज इस कहानी पर नहीं बल्कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के नियम और उनकी शक्तियों को लेकर बात कर रहे हैं. इसी क्रम में पहला सवाल है.

टीएन सेशन बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में बेहद अहम फैसला दिया था. फाइल फोटो

क्या है 1995 का टीएन शेषन बनाम भारत

इसे समझने के लिए करीब तीन दशक पीछे जाना होगा. साल 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने टीएन शेषन बनाम भारत सरकार मामले में चुनाव आयोग की संरचना और मुख्य निर्वाचन आयुक्त की भूमिका पर अहम फैसला दिया था. उस समय टीएन शेषन मुख्य निर्वाचन आयुक्त थे और केंद्र सरकार ने चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय बनाने को दो और चुनाव आयुक्त नियुक्त किए थे. शेषन ने इस व्यवस्था को चुनौती दी थी. उनका तर्क था कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त होने के नाते चुनाव आयोग में उनकी स्थिति अलग और ज्यादा शक्तिशाली है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया. कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग एक बहुसदस्यीय निकाय हो सकता है और जब ऐसा होता है तो मुख्य निर्वाचन आयुक्त को बाकी चुनाव आयुक्तों से ऊपर ऐसा अधिकार नहीं मिलता कि वह अकेले आयोग के फैसले कर सकें. यही इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है. यानी सीईसी आयोग का प्रमुख है, लेकिन वह आयोग का अकेला निर्णायक नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था माना और इस बात पर जोर दिया कि चुनाव प्रक्रिया को राजनीतिक या कार्यपालिका के दबाव से स्वतंत्र रहना चाहिए. साथ ही अदालत ने बहुसदस्यीय आयोग में सीईसी और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच कामकाज की व्यवस्था को भी स्पष्ट किया. इस फैसले के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को लेकर काफी हद तक स्थिति साफ हो गई. बुधवार को हुए खुलासे के बाद जाने-माने वकील डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी और कपिल सिब्बल ने भी कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ‘फर्स्ट अमॉन्ग्स इक्वल्स हैं.’ यानी तीन चुनाव आयुक्त बराबर हैं और इसमें पहले नंबर मुख्य चुनाव आयुक्त हैं.

1990 के दशक में सीईसी टीएन सेशन अपने दो अन्य चुनाव आयुक्तों के साथ. फोटो- पीटीआई
सीईसी और ईसी की नियुक्ति कैसे होती है?

इसी संबंध में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिखा है. इस लेख का शीर्षक है- चीफ इलेक्शन कमिश्नर इज नॉट द इलेक्शन कमिशन ऑफ इंडिया. यानी मुख्य चुनाव आयुक्त अपने आप में भारत का चुनाव आयोग नहीं है. उन्होंने लिखा है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए 2023 का मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम लागू है. इस कानून में चुनाव आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और राष्ट्रपति द्वारा तय संख्या में अन्य चुनाव आयुक्तों का प्रावधान है. इस कानून के तहत पहले एक सर्च कमेटी संभावित नामों का पैनल तैयार करती है. इसके बाद चयन समिति नामों पर विचार करती है और नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं. चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता की व्यवस्था की गई है.

क्या तीनों चुनाव आयुक्तों की शक्तियां बराबर हैं?
यह सबसे बड़ा सवाल है. इसका जवाब थोड़ा दिलचस्प है. फैसला लेने के मामले में तीनों की भूमिका बराबर है. मौजूदा कानून की धारा 18 कहती है कि चुनाव आयोग का काम जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से किया जाएगा. लेकिन अगर मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त किसी मुद्दे पर अलग-अलग राय रखते हैं तो फैसला बहुमत की राय से होगा. यानी तीन सदस्यीय आयोग में अगर एक मामले पर तीनों की अलग-अलग राय है तो किसी एक की राय अपने आप अंतिम नहीं हो जाती. दो सदस्य जिस पक्ष में होंगे, वही आयोग का फैसला माना जाएगा.

उदाहरण के लिए अगर सीईसी किसी विषय पर ‘हां’ कहते हैं और दोनों चुनाव आयुक्त ‘नहीं’ कहते हैं, तो बहुमत के आधार पर ‘नहीं’ वाला फैसला लागू होगा. यहीं 1995 के टीएन शेषन मामले का महत्व समझ में आता है. सुप्रीम कोर्ट ने बहुसदस्यीय चुनाव आयोग की व्यवस्था में सीईसी को ऐसा सुपर बॉस नहीं माना था जिसके पास बाकी आयुक्तों की राय को पलटने का अकेला अधिकार हो.
फिर सीईसी के पास विशेष अधिकार क्या हैं?
इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि सीईसी और बाकी चुनाव आयुक्तों में कोई फर्क ही नहीं है. सीईसी आयोग के प्रमुख होते हैं. संविधान में भी मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों का अलग-अलग उल्लेख है. आयोग के कामकाज और प्रशासन में सीईसी की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है. मौजूदा कानून भी आयोग के काम के संचालन और उसके भीतर काम के बंटवारे की व्यवस्था करता है. लेकिन किसी नीतिगत या संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण मामले में सीईसी अकेले अपनी राय को आयोग का फैसला नहीं बना सकते. यानी प्रमुख होने और अकेले अंतिम फैसला लेने वाले होने में फर्क है.

किसी विषय पर मतभेद की स्थिति में कैसे फैसला होगा?
कानून ने इसकी प्रक्रिया काफी साफ रखी है. पहली कोशिश होगी कि तीनों आयुक्त किसी फैसले पर सहमत हों. अगर सहमति नहीं बनती तो बहुमत का रास्ता अपनाया जाएगा. 2023 के कानून की धारा 18 में साफ कहा गया है कि मतभेद होने पर मामला बहुमत की राय से तय होगा. इस व्यवस्था का मतलब है कि चुनाव आयोग को एक व्यक्ति की संस्था के तौर पर नहीं बल्कि बहुसदस्यीय संवैधानिक निकाय के तौर पर काम करना है. इसलिए आयोग के भीतर किसी आयुक्त का अपनी राय रखना या किसी प्रस्ताव से असहमति जताना अपने आप में असामान्य बात नहीं है. असली सवाल यह होता है कि अंतिम फैसला तय प्रक्रिया के मुताबिक हुआ या नहीं. यानी चुनाव आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त की भूमिका विशेष है, लेकिन असीमित या अकेले फैसला करने का सुपर पावर नहीं है.

चुनाव आयोग में ऑल इज नॉट वेल? SIR पर मतभेद…विपक्ष ने घेरा तो आया ECI का जवाब

Election Commission SIR Dispute:
चुनाव आयोग में SIR को लेकर मतभेद की खबरों के बीच आयोग के आधिकारिक सूत्रों ने इसका खंडन किया है. सूत्रों का कहना है कि SIR समेत सभी फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिए गए हैं. दूसरी तरफ सूत्रों के हवाले से दावा किया गया है कि सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने Form-6 में बदलाव से लेकर वोटर डेटा और फैसले लेने की प्रक्रिया तक कई मुद्दों पर आपत्तियां दर्ज की थीं. पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़ी अपीलों को लेकर भी सवाल उठने की बात कही गई है. ऐसे में आयोग के आधिकारिक पक्ष और सूत्रों के दावों के बीच अंतर चर्चा में है. इस मामले पर अखिलेश यादव ने भी सवाल उठाए हैं.

चुनाव आयोग के भीतर सब कुछ ठीक है या फैसलों को लेकर मतभेद चल रहे हैं? SIR को लेकर यह सवाल अब चर्चा में है. कारण इंडियन एक्स्रेस ने एक इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट छापी और उस रिपोर्ट में दावा किया गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के बीच SIR को लेकर मतभेद था. इस रिपोर्ट को विपक्ष ने मौके के रूप में लपक लिया और हमलावर हो गई. अब इस खबर को लेकर चुनाव आयोग की ओर से जवाब आया है. चुनाव आयोग के आधिकारिक सूत्रों ने इन खबरों का खंडन किया है कि SIR समेत आयोग के फैसलों पर चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद थे. आयोग के सूत्रों का कहना है कि SIR समेत सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं. इनमें दोनों चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की मंजूरी रही है. इस मामले को लेकर चुनाव आयोग पर विपक्ष हमलावर है. समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और कन्नौज सांसद अखिलेश यादव अखिलेश यादव ने बड़ा दावा किया है. यहां तक कि कपिल सिब्बल ने भी सवाल उठाया है.

SIR विवाद के बीच चुनाव आयोग के आधिकारिक सूत्रों ने मतभेद की खबरों का खंडन किया है. (फाइल फोटो)

इन आपत्तियों का दायरा सिर्फ SIR तक सीमित नहीं बताया गया है. सूत्रों के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कई फैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज की थीं. इनमें नए मतदाताओं का रजिस्ट्रेशन, वोटर लिस्ट से नाम हटाने और बहाल करने की प्रक्रिया, चुनावी डेटा की सुरक्षा, आईटी सिस्टम और आयोग के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं. दोनों आयुक्तों की आपत्तियां मुख्य चुनाव आयुक्त तक भी भेजे जाने की बात कही गई है. सूत्रों का यह भी दावा है कि दोनों आयुक्तों ने कैबिनेट सेक्रेटरी को पत्र लिखा था. हालांकि आयोग के आधिकारिक सूत्र SIR समेत फैसलों पर किसी तरह के मतभेद की बात को खारिज कर रहे हैं.

चुनाव आयोग में मतभेद पर ECI की आई सफाई तो शशि थरूर ने उठाए 7 सवाल, लिस्ट गिनाकर मांगा जवाब

इंडियन एक्सप्रेस की जांच पर चुनाव आयोग की सफाई के बाद कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने आयोग से कई अहम सवाल पूछे हैं. थरूर का कहना है कि ECI ने आंतरिक आपत्तियों को सामान्य प्रक्रिया और अपने फैसलों को सर्वसम्मत बताया है, लेकिन इससे जांच में उठाए गए कई विशिष्ट सवालों का जवाब नहीं मिलता. उन्होंने पूछा है कि रिपोर्ट में बताई गई 14 आपत्तियां वास्तव में दर्ज हुई थीं या नहीं और हर आपत्ति पर क्या फैसला हुआ. इसके अलावा Form-6 में बदलाव का कानूनी आधार, वोटर डेटाबेस के केंद्रीकरण, गोवा के 97 वोटरों के मामले, बहाल किए गए वोटरों के खिलाफ अपील और कैबिनेट सचिव से कथित पत्राचार पर भी उन्होंने बिंदुवार जवाब मांगा है. थरूर ने कहा कि चुनाव आयोग को इन मुद्दों पर दस्तावेजों के साथ पारदर्शी स्पष्टीकरण देना चाहिए.

चुनाव आयोग के भीतर मतभेद को लेकर इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट से खलबली मची है. चुनाव आयोग और सीईसी ज्ञानेश कुमार विपक्ष के निशाने पर हैं. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि एसआईआर समेत कई मसलों पर ज्ञानेश कुमार ने मनमाने तरीके से फैसले लिए. हालांकि, चुनाव आयोग ने इसका खंडन किया है. अब इसे घमासान में कांग्रेस सांसद शशि थरूर कूद पड़े हैं. चुनाव आयोग पर शशि थरूर ने कई सवाल उठाए हैं. उनरी मांग है कि 14 आपत्तियों से लेकर 97 वोटरों तक…जांच के हर मुद्दे पर देनी चाहिए सफाई.

दरअसल, चुनाव आयोग यानी ECI को लेकर द इंडियन एक्सप्रेस की जांच के बाद शशि थरूर ने एक्स पर एक पोस्ट किया. इसमें कहा कि चुनाव आयोग ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति में कहा है कि आंतरिक टिप्पणियां निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं, आयोग के फैसले कानून के मुताबिक होते हैं, उसके डिजिटल सिस्टम में सुरक्षा व्यवस्था है और पिछले एक साल के सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं. हालांकि, शशि थरूर का कहना है कि यह जवाब जांच में उठाए गए कई खास सवालों को स्पष्ट नहीं करता.
रिपोर्ट में क्या है?

इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की जांच में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीने में कम से कम 14 बार चुनाव आयोग के नाम पर लिए गए कुछ फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की. रिपोर्ट के मुताबिक, ये आपत्तियां नए वोटरों के पंजीकरण, वोटर लिस्ट से नाम हटाने और जोड़ने, Form-6 में बदलाव और चुनावी डेटा से जुड़े IT सिस्टम जैसे विषयों पर थीं.

शशि थरूर ने क्या सवाल उठाए

अब इसके आधार पर ही शशि थरूर ने कुछ सवाल उठाए हैं. शशि थरूर ने लिखा, ‘ ECI ने अब द इंडियन एक्सप्रेस की जांच पर जवाब दिया है. उनका कहना है कि अंदरूनी टिप्पणियां विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं. उनके फैसले कानून के मुताबिक होते हैं. उनके डिजिटल सिस्टम में सुरक्षा कंट्रोल हैं. और पिछले साल आयोग के सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे. हालांकि, प्रेस नोट (जो साथ में है) में जांच के दौरान उठाए गए कई खास सवालों का जवाब नहीं मिलता है. खासकर-

क्या बताई गई 14 आपत्तियां असल में दर्ज की गई थीं और हर एक पर क्या कार्रवाई हुई?
फॉर्म-6 में बदलाव का खास कानूनी आधार क्या था, खासकर तब जब कमिश्नरों ने आपत्तियां दर्ज कराई थीं?
इलेक्टोरल-रोल डेटाबेस एक्सेस और IT कंट्रोल के सेंट्रलाइज़ेशन (केंद्रीकरण) को लेकर जताई गई चिंताओं का क्या हुआ?
97 वोटरों से जुड़े गोवा के मामले पर ECI का क्या स्पष्टीकरण है?
जिन वोटरों के नाम दोबारा शामिल किए गए थे, उनसे जुड़ी अपीलों को किसने मंज़ूरी दी और किस प्रक्रिया में?
कैबिनेट सेक्रेटरी को भेजे गए संदेशों के पीछे क्या हालात थे?
क्या आयोग के नाम से बिना ज़रूरी मंज़ूरी के कोई संदेश जारी किए गए थे, जैसा कि बताया गया है?
शशि थरूर का कहना है कि यह अंतर महत्वपूर्ण लगता है. यह कहना कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे, अपने आप में यह नहीं बताता कि फैसला लेने की प्रक्रिया में उठाई गई आपत्तियों का क्या हुआ. इसलिए चुनाव आयोग के लिए यह बेहतर होगा कि वे जांच के जवाब के तौर पर सिर्फ़ एक सामान्य प्रेस नोट देने के बजाय इन मामलों पर हर बिंदु पर दस्तावेज़ों के साथ स्पष्टीकरण दें. चुनावी संस्थाओं की अहमियत को देखते हुए इन सवालों को सार्वजनिक रिकॉर्ड में लाना और पारदर्शी तरीके से इनका जवाब देना जरूरी है.

त्वरित प्रश्नोत्तर

क्या 1995 के टीएन शेषन मामले में मुख्य निर्वाचन आयुक्त को अन्य आयुक्तों पर कोई विशेष सुपर पावर मिली थी?
नहीं, 1995 के टीएन शेषन बनाम भारत सरकार फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बहुसदस्यीय निर्वाचन आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पास अन्य चुनाव आयुक्तों की तुलना में ऐसी कोई अतिरिक्त शक्ति नहीं होती जिससे वह अकेले फैसले ले सकें।

चुनाव आयोग में मतभेद होने की स्थिति में निर्णय लेने की क्या प्रक्रिया निर्धारित की गई है?
वर्तमान कानून की धारा 18 के अनुसार, आयोग के कार्य यथासंभव सर्वसम्मति से किए जाते हैं, लेकिन मतभेद होने पर निर्णय बहुमत की राय से लिया जाता है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति किस कानून में होती है?
मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023’ में की जाती है।

चुनाव आयोग में आंतरिक मतभेद को लेकर मीडिया रिपोर्ट में क्या दावे किए गए हैं?
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार चुनाव आयोग के फैसलों और आदेशों पर आपत्ति जताई थी. ये आपत्तियां नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और जोड़ने, फॉर्म-6 में बदलाव और चुनावी डेटा से जुड़े आईटी सिस्टम जैसे विषयों पर थीं।

शशि थरूर ने चुनाव आयोग के सामने कौन से प्रमुख सवाल उठाए हैं?
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने मांग की है कि आयोग को 14 आपत्तियों, फॉर्म-6 में बदलाव के कानूनी आधार, चुनावी डेटाबेस के केंद्रीकरण, गोवा मामले में 97 मतदाताओं के स्पष्टीकरण और कैबिनेट सचिव को भेजे गए संदेशों के हालातों पर बिंदुवार जवाब देना चाहिए।

चुनाव आयोग और भाजपा ने आंतरिक असहमति की खबरों पर क्या प्रतिक्रिया दी है?
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि आंतरिक टिप्पणियां निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं और पिछले एक साल में एसआईआर (SIR) सहित सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं. वहीं भाजपा नेता संबित पात्रा ने कहा कि आयोग के भीतर इस तरह की चर्चाएं तानाशाही नहीं बल्कि एक स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी हैं।

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