बंगाल में अभूतपूर्व: सेकुलर राजनीति का शीर्षासन,बहुसंख्यक हो गये एक,बिखर गये मुस्लिम

हिंदू एकता,बिखरा मुस्लिम वोटः क्या बंगाल ने भारत की चुनावी राजनीति उलट दी है?

जो मुस्लिम वोट बैंक ‘सेक्युलर’ पार्टियों ने लगभग पक्का मान लिया था, उसने बंगाल चुनावों में पारंपरिक व्यवहार से हटकर एक चौंकाऊ बदलाव दिखाया है. भाजपा की प्रचंड जीत, और मुस्लिम बहुल विधानसभा सीटों पर तृणमूल कांग्रेस की हार कई रुझान ध्वस्त कर गई.

बंगाल चुनाव में इस बार वोटिंग का भिन्न रुझान दिखा

नई दिल्ली, 11 मई 2026,भारत के चुनावी दंगल  में जाति और धार्मिक विभाजन जीत हार निर्णायक है. इसमें एक बड़ा सच यह है कि हिंदू वोट जाति विभाजन से बिखरा होता है जबकि मुस्लिम वोट चट्टान की तरह ठोस ब्लॉक होता है. दशकों तक, वोटर व्यवहार की इस मौलिक समझ ने भारत की चुनावी राजनीति का स्वरूप तय किया है. इसने यह सुनिश्चित किया कि स्वयंभू  सेक्युलर  पार्टियां हर चुनाव में “पक्के वोटों” के साथ उतरें. दूसरे शब्दों में, इसका मतलब था कि भाजपा हर चुनाव में 20%-40% वोटों के ’सेक्युलर’ नुकसान लेकर उतरती थी. किसी भी पार्टी को यह बहुत कठिन चढ़ाई थी, भले ही वह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी ही क्यों न हो.

लेकिन वह 2014 तक और राष्ट्रीय परिदृश्य पर नरेंद्र मोदी आने तक था. उस साल, मोदी ने 282 सीटें जीत देश चौंका दिया. 25 से अधिक वर्षों में पहली बार किसी पार्टी ने बहुमत पाया था. वह जातियों से ऊपर उठकर हिंदू वोटों के सफल एकीकरण का पहला संकेत था. तब से मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने चुनाव दर चुनाव अधिक जातियां हिंदू छतरी के नीचे लाने की अपनी क्षमता दिखाई है.

लेकिन यह कभी भी उतना स्पष्ट नहीं दिखा जितना अभी हुए बंगाल चुनावों में. इस चुनाव में, भाजपा ने हिंदू वोटों को पहले की तरह एकजुट करने में सफलता पाई, जबकि राजनीतिक स्पेक्ट्रम के दूसरे छोर पर वो हुआ जो असंभव था. किसी भी चुनाव में जहां भाजपा बड़ी दावेदार होती है, माना जाता था कि मुसलमान उस पार्टी को एकजुट वोट करेंगे जो भाजपा को हराने को सबसे अच्छी स्थिति में हो. इस मामले में थी ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC). मुसलमान लंबे समय से इस रणनीतिक ’भाजपा हरानी ही है’ वाला बोझ ढो रहे हैं.ममता इसी भरोसे थीं.इसे पक्का माने बैठी थीं.

लेकिन यहीं चौकाऊ उलटफेर में मुस्लिम बिखर गया. यह शायद कुछ पिछले चुनावों में भी हुआ हो लेकिन बंगाल 2026 में यह टूट बहुत बड़े पैमाने पर थी. जिन पार्टियों से भाजपा रोकने की कोई उम्मीद नहीं थी- कांग्रेस (INC), AJUP, CPM, AIMIM आदि ने मुस्लिम वोटों का जमकर स्वाद चखा, जिसे ममता अपना राजनीतिक अधिकार मानती थीं. इन पार्टियों ने ममता के इस सिक्योरिटी नेट की मुस्लिम वोटों की गांठ एक-एक कर खोल दी.

आइए कुछ उदाहरणों से बताते हैं, एक-एक मुस्लिम बहुल सीट के हिसाब से.

हम परिणाम तीन हिस्सों में बांटेंगें:
1. भाजपा से हारी ममता की सीटें;
2. गैर-भाजपा पार्टियों से हारी ममता की सीटें
3. बहुत कम मार्जिन से जीती ममता की सीटें.

भाजपा से हार गईं ममता की सीटें
पश्चिम बंगाल में मुर्शिदाबाद में सर्वाधिक मुस्लिम जनसंख्या है.मुर्शिदाबाद के बेलडांगा विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम वोटर बहुसंख्यक हैं.यहां भाजपा टिकट पर भरत कुमार झवर जीते.यह सीट बताती है कि कई क्षेत्रों में क्या हुआ-ममता को दोहरी मार,भाजपा को हिंदू वोट एकजुटता और उनके अपने मुस्लिम वोट बिखराव.

2021 में,भाजपा ने यहां 28.9 प्रतिशत वोट पाये थे. तृणमूल ने 55+ प्रतिशत वोटों से सीट जीती थी. लेफ्ट-ISF गठबंधन की कांग्रेस के 13+ प्रतिशत से वोट मिले थे. इस साल, भाजपा का वोट शेयर सिर्फ तीन प्रतिशत बढ़कर 31.88 हो गया.यह बेलडांगा की पूरी हिंदू मतदाता जनसंख्या है । मुस्लिम 63% हैं.लेकिन TMC का वोट शेयर 55% से गिरकर 26% रह गया,जिसमें से 20.4% हुमायूं कबीर की AJUP को और 4.5% कांग्रेस को चले गए (जो 13% से बढ़कर 17.5% हो गई). हिंदू वोट एकत्र हुआ और मुस्लिम वोट बिखर गया.

मुर्शिदाबाद के ही कांदी में,TMC विधायक अपूर्व सरकार भाजपा से हारे.कांदी में मुस्लिम वोटर बहुसंख्यक हैं.लेकिन सरकार का वोट शेयर 2021 के 51% से गिरकर 2026 में 31% रह गया.भाजपा की गार्गी दास घोष को 36.7% में सिर्फ 5% अधिक वोट मिले.TMC को सबसे घातक AIMIM रही, जिसे 15.62% वोट मिले.कांग्रेस भी 10.5% से बढ़कर 11.5% पर पहुंची.

जांगीपुर एक और मुस्लिम ( 49%) बहुल सीट है जिसे भाजपा ने TMC से छीना.भाजपा का वोट शेयर 2021 के 22% से बढ़कर 42% हो गया और कांग्रेस ने अपना शेयर 15% (31,000 वोट) तक बढ़ा लिया.TMC के वोट लेफ्ट गठबंधन में भी गए.परिणाम: TMC 10,542 वोटों से हारी.

यही कहानी उत्तर दिनाजपुर की करणदिघी में दोहराई गई, जहां लेफ्ट गठबंधन ने TMC को नुकसान पहुंचा अपना वोट शेयर 2021 के चार प्रतिशत से बढ़ाकर 18% कर लिया.भाजपा 20,000 के अंतर से जीती. TMC विधायक गौतम पाल का हिस्सा 55% से गिरकर 35% रह गया.भाजपा को हिंदू वोट एकजुट होने और TMC के खिलाफ बिखराव का एक और मामला.

उत्तर 24 परगना के अशोकनगर में, भाजपा ने TMC विधायक नारायण गोस्वामी को 9,000+ वोटों से हराया. यहां ISF को 29,000 वोट मिले. भाजपा से हरिपाल विधानसभा क्षेत्र में TMC 3500 से कम वोटों से हारी. ISF उम्मीदवार मुजफ्फर अली ने 12,000+ वोट पाये.

TMC पांडुआ सीट भाजपा से 5,000+ वोटों से हारी . जबकि TMC ने 2021 के मुकाबले 5,000 वोट कम पाए, CPM के अमजद हुसैन एसके ने 27,500 वोट लेकर उसे चोट पहुंचाई.सबसे बड़ा झटका भाजपा ने 30,000 अधिक वोट पाकर दिया. मुर्शिदाबाद ने भाजपा को 31,000 वोटों के बढ़े मार्जिन से वापस भेजा. कांग्रेस, फॉरवर्ड ब्लॉक, AJUP के मुस्लिम उम्मीदवारों को सीट पर भाजपा के जीत मार्जिन से अधिक वोट मिले.

गैर-भाजपा पार्टियों से हारी ममता की सीटें

ममता को सीटों का नुकसान सिर्फ भाजपा से या सिर्फ मुर्शिदाबाद-मालदा जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में ही नहीं हुआ, बल्कि दक्षिण 24 परगना की सीटों पर भी हुआ. गैर-भाजपा पार्टियों- कांग्रेस, CPM और इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) ने सभी मुस्लिम बहुल इलाकों में ममता को चोट पहुँचाई.

इस साधारण आँकड़े से समझें: कांग्रेस के केवल 29 उम्मीदवार जिन्होंने पूरे राज्य में चुनाव लड़ा, वे 20,000 से अधिक वोट पा सके. उनमें से 23 मुसलमान थे. यह दिखाता है कि भले कांग्रेस ज्यादातर जगह मुकाबले में नहीं थी, लेकिन उसका सबसे मजबूत प्रदर्शन मुस्लिम इलाकों में रहा-जो ममता को घातक झटका था.

इसी तरह, CPM के 14 मुस्लिम उम्मीदवार 20,000 का आंकड़ा पार कर गए । ISF के 23 उम्मीदवारों को 10,000 से अधिक वोट मिले. इसने केतुग्राम में 10,700 और जगतबल्लभपुर में 20,000+ से वोट पाये. TMC ये दोनों सीटें भाजपा से 6,000 वोटों से हार गई.

ISF के नौशाद सिद्दीकी ने दक्षिण 24 परगना की भांगड़ सीट अच्छे मार्जिन से बचा ली. CPM ने 2026 में पश्चिम बंगाल में अपना खाता फिर से खोला. डोमकल सीट से उनके एकमात्र विधायक मुस्तफिजुर रहमान हैं. कांग्रेस के मोताब शेख फरक्का से जीते और जुल्फिकार अली ने रानीनगर जीता. AJUP संस्थापक हुमायूं कबीर दोनों सीटों रेजीनगर और नौदा से जीते जहां से उन्होंने चुनाव लड़ा था.

हुमायूं कबीर की AJUP- जिसे चुनावों से पहले गंभीर दावेदार नहीं माना गया था, ने ममता को चौंका दिया. कबीर ने अपनी दोनों सीटें जीतीं. रेजीनगर लगभग 59,000 वोटों से और नौदा 27,000 से अधिक वोटों से, TMC तीसरे स्थान पर रही.

हरिहरपाड़ा में, AJUP ही TMC की मुख्य प्रतिद्वंद्वी बनी. यहां TMC, AJUP और CPM के बीच मुस्लिम वोट बिखर गये. 2021 में यहां TMC को 47% वोट मिले थे. फरक्का में लड़ाई कांग्रेस और भाजपा में थी. TMC यहां भी तीसरे स्थान पर खिसक गई. कांग्रेस के मोताब शेख ने 8,193 वोट मार्जिन से सीट जीती. कांग्रेस ने रानीनगर भी TMC पर 2,701 वोटों के मामूली मार्जिन से जीत लिया. यहां भी, CPM के जमाल हुसैन को 48,587 वोट मिले. 2021 में TMC ने 60% वोट बटोरे थे लेकिन अबकी ऐसा नहीं हुआ.

मुस्लिम बहुल सीट डोमकल CPM के मुस्तफिजुर रहमान ने 16,000 से अधिक वोटों के मार्जिन से जीती. कांग्रेस को 30,000 वोट मिले और AJUP को 7,000 से अधिक.

वो सीटें जो TMC जीती, लेकिन बस जैसे-तैसे 

ममता के मुस्लिम गढ़ में सेंध उन सीटों पर भी दिखती है जो उनकी पार्टी ने जीती हैं. जलंगी में, TMC की जीत का मार्जिन 2021 के भारी-भरकम 80,000+ वोटों से गिरकर 2026 में 21,000 रह गया. महत्वपूर्ण यह है कि लेफ्ट और कांग्रेस ने 2021 का चुनाव गठबंधन में लड़ा था. अगर कांग्रेस और CPM के वोट जोड दें, तो उन्होंने 2026 में 1,00,000 से अधिक वोट पाए , जो TMC के नवनिर्वाचित विधायक बाबर अली (88,684) के वोटों से अधिक हैं. यहां तक कि इस सीट पर AJUP उम्मीदवार को भी 5,000 वोट मिले. मुस्लिम वोट बैंक में विभाजन साफ है.

भगवानगोला में, 2021 में TMC का अंतर 1,00,000+ था, लेकिन यह आधा गिरकर 56,000 रह गया. यहां CPM को 50,000 और कांग्रेस को 29,000+ वोट मिले. कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों ने इसी तरह नलहाटी और रतुआ में भी TMC के वोट शेयर में सेंध लगाई.

कालीगंज में, CPM और AJUP के मुस्लिम उम्मीदवारों को क्रमशः 23,000 और 16,000 वोट मिले. कांग्रेस के शेख काबिल उद्दीन को 4,000 से अधिक वोट मिले. हालांकि TMC कालीगंज बचा गई, लेकिन 2021 की तुलना में इसका वोट शेयर 53 प्रतिशत से गिरकर 40 प्रतिशत रह गया .

मालदा के सुजापुर जैसे मुस्लिम गढ़ में भी TMC का वोट शेयर 23% गिरा. यहां मुख्य लाभार्थी कांग्रेस और ISF रहे -दोनों ने ही सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे. भाजपा वोट शेयर काफी हद तक बना रहा. यही पैटर्न मालतीपुर, रघुनाथगंज में भी है जहां मुस्लिम वोटरों की संख्या 70 प्रतिशत से अधिक मानी जाती है.

तो ममता के लिए क्या गलत हुआ?

विशेषज्ञों के अनुसार पश्चिम बंगाल में मान्यता थी कि मुस्लिम वोटर TMC का एकजुट साथ देंगे क्योंकि 2026 चुनाव स्पेशल इंटेंसिव रिव्यू (SIR) पृष्ठभूमि में हुए थे. वोटिंग अधिकार खोने और सामाजिक कल्याण योजना से बाहर होने का डर मुस्लिम समुदाय में दिख रहा था. हालांकि, यह धारणा गलत निकली.

कोलकाता की आलिया यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉक्टर मोहम्मद रियाज बताते हैं कि 2021 के राज्य चुनाव CAA-NRC विरोध प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में हुए थे. TMC को इसका लाभ मिला. उन्होंने वक्फ बोर्ड बिल पर ममता के स्टैंड, मुस्लिमों का OBC कोटे विषय हल करने से इनकार और विकास व नौकरियों की कमी पर सामान्य नाराजगी जैसे कारणों का हवाला दिया. रियाज कहते हैं, ’मुस्लिम बहुल सीटों पर 90% हिंदू वोट भाजपा को चले गए,’ जिससे ममता को दोहरी मार पड़ी.
उन्होंने तर्क दिया कि ISF का विस्तार रोकने पर TMC का फोकस फुरफुरा शरीफ के अनुयायियों ने पसंद नहीं किया. ’यह ISF का उत्पीड़न माना गया. इससे फुरफुरा शरीफ समर्थकों में धारणा बनी कि ममता भाजपा से मजबूती से लड़ने के बजाय भांगड़ में भी ISF को दबाने पर अधिक केंद्रित थीं.’

रियाज और जादवपुर यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर अब्दुल मतीन जैसे विशेषज्ञ जोर देते हैं कि TMC ने प्रमुखत: भाजपा का डर दिखाकर मुस्लिम वोट बैंक कब्जाने की कोशिश की. इसने 2021 में काम किया था. लेकिन ’कैप्टिव वोट बैंक’ (बंधुआ वोट बैंक) जैसा व्यवहार मुस्लिम सकारात्मक रूप से नहीं ले रहे हैं. मुस्लिम वोटों में बिखराव राज्य में क्षेत्रीय कारक था. मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर और दक्षिण 24 परगना के कुछ हिस्सों में यह चलन दिखा. मुर्शिदाबाद कांग्रेस का गढ़ होता था. ममता बनर्जी ने इन इलाकों में कांग्रेस खत्म कर दी थी. मालदा के मुसलमान कांग्रेस, TMC और लेफ्ट-ISF गठबंधन में चले गए. बेलडांगा की कहानी इसी बिखराव की है. इस क्षेत्र में SIR के प्रभाव और बड़े पैमाने पर नाम हटने ने भी TMC को प्रभावित किया,दक्षिण 24 परगना में TMC इसलिए नहीं हारी कि मुस्लिम वोट बंटे. इसका संबंध भाजपा के पक्ष में हिंदू वोट एकजुटता होने से अधिक है.’

रियाज और मतीन दोनों ने इशारा किया कि पांच वर्षों में TMC के सॉफ्ट हिंदुत्व वाले दिखावे ने मुस्लिम वोटरों पर अच्छा प्रभाव नहीं डाला.

तो क्या बंगाल के मुस्लिम वोटरों ने ’भाजपा हराने’ का बोझ छोड़ दिया है? इस सवाल पर अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर खालिद अनीस अंसारी ने कहा,कि ’ धारणा है कि मुसलमान एकजुट वोट करते हैं. लेकिन बंगाल में इस बार बिखराव दिखा.’

अंसारी ने बताया कि जहां क्षेत्रीय पार्टियां मुस्लिम वोटों पर भरोसा करती हैं, वहीं वे भाजपा के हिंदू बहुसंख्यकवाद के मुकाबले को पर्याप्त काम नहीं करती . “मुसलमानों को लगता है कि ये पार्टियां पर्याप्त प्रयास नहीं कर रही. जहां वे मुस्लिम वोटों पर निर्भर हैं, वहीं वे दक्षिणपंथी हिंदू बहुसंख्यकवाद से सीधे टक्कर नहीं लेते.उन्हे डर है कि यह हिंदू वोटरों को रास नहीं आएगा. क्षेत्रीय पार्टियों के साथ यही विरोधाभास है,”

कारण जो भी हों, हिंदू वोटों का ठोस जुटान और इसी के समानांतर मुस्लिम वोट का बिखराव अब तक के भारतीय वोटिंग पैटर्न में एक बड़ा उलटफेर है. राजनीतिक पार्टियां अगले बड़े मुकाबले को बंगाल चुनाव परिणाम बार-बार बारीकी से स्टडी करेंगी. 2027 शुरु में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव और निश्चित रूप से उसके बाद के लिए भी.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *