मृत्युदंड को लेकर भारत में क्या है उलझन? आजीवन कारावास में भी हो रही मनमानी

भारत में मृत्युदंड rarest of the rare मामलों में होती है। इसका कानूनी अर्थ क्या है?

भारत में “Rarest of the Rare” (अत्यंत विरलतम मामलों में से विरल) मृत्युदंड देने का एक कानूनी सिद्धांत है। इसका अर्थ यह है कि हत्या या किसी अन्य जघन्य अपराध का गंभीर होना मात्र पर्याप्त नहीं है; मृत्युदंड तभी दिया जाना चाहिए, जब मामले की परिस्थितियों और अपराधी की स्थिति पर विचार करने के बाद आजीवन कारावास का विकल्प स्पष्ट रूप से अपर्याप्त हो।

यह सिद्धांत भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने Bachan Singh v. State of Punjab (1980) के ऐतिहासिक फैसले में स्थापित किया था।

### 1\. इस सिद्धांत का कानूनी अर्थ क्या है?

सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, मृत्युदंड सामान्य नियम नहीं, बल्कि असाधारण अपवाद है। अदालत को मुख्यतः इन बातों पर विचार करना होता है:

* अपराध की गंभीरता: हत्या किस प्रकार की गई, उसकी क्रूरता, उद्देश्य और परिस्थितियाँ क्या थीं।

* अपराधी की परिस्थितियाँ: उसकी उम्र, पृष्ठभूमि, मानसिक एवं सामाजिक परिस्थितियाँ तथा सुधार की संभावना।

* वैकल्पिक सजा: क्या आजीवन कारावास पर्याप्त है, या मामले में मृत्युदंड देने के लिए असाधारण कारण मौजूद हैं?

* संतुलित न्याय: अपराध की गंभीरता के साथ अपराधी के व्यक्तिगत और सुधार-संबंधी पहलुओं पर भी विचार होना चाहिए।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि केवल अपराध की बर्बरता देखकर फैसला नहीं किया जा सकता। अदालत को यह भी देखना होता है कि अपराधी के सुधार और पुनर्वास की संभावना को क्यों नकारा जा रहा है।

### 2\. सर्वोच्च न्यायालय ने किन मामलों में यह कसौटी समझाई?

1980 — Bachan Singh v. State of Punjab Indian Kanoon

संविधान पीठ ने मृत्युदंड की संवैधानिक वैधता बरकरार रखते हुए कहा कि हत्या के मामलों में आजीवन कारावास सामान्य नियम है और मृत्युदंड अपवाद। मृत्युदंड तभी दिया जाए, जब आजीवन कारावास का विकल्प उचित रूप से उपलब्ध न रह जाए।

1983 — Machhi Singh v. State of Punjab Indian Kanoon

न्यायालय ने अपराध के तरीके, उद्देश्य, सामाजिक प्रभाव, अपराध की व्यापकता और पीड़ित की स्थिति जैसे पहलुओं पर विचार करने की कसौटियाँ समझाईं। लेकिन इन पहलुओं में से कोई एक अपने आप मृत्युदंड का आधार नहीं बनता।

2022 — Manoj v. State of Madhya Pradesh Indian Kanoon

न्यायालय ने जोर दिया कि सजा तय करते समय अपराधी की उम्र, पृष्ठभूमि, व्यवहार, मानसिक स्थिति और सुधार की संभावना जैसी परिस्थितियों की प्रभावी जाँच आवश्यक है। गंभीर अपराध होने पर भी मृत्युदंड स्वतः उचित नहीं हो जाता।

### 3\. क्या जघन्य हत्या में मृत्युदंड अनिवार्य है?

नहीं। उदाहरण को, किसी मामले में कई लोगों की हत्या हुई हो या हत्या अत्यंत क्रूर तरीके से की गई हो, तब भी अदालत को यह अलग से निर्धारित करना होगा कि मामला rarest of the rare की कसौटी पर खरा उतरता है या नहीं और आजीवन कारावास पर्याप्त क्यों नहीं होगा। Sci API +1

कानून में दो प्रश्न अलग-अलग हैं:

* क्या अभियुक्त दोषी है?

* दोष सिद्ध होने के बाद क्या उसे मृत्युदंड देना न्यायसंगत और कानूनी रूप से आवश्यक है?

पहले प्रश्न का उत्तर हाँ होने से दूसरे का उत्तर अपने आप हाँ नहीं हो जाता।

### 4\. क्या निचली अदालत का मृत्युदंड अंतिम होता है?

नहीं। भारत में मृत्युदंड की प्रक्रिया में कई कानूनी सुरक्षा उपाय हैं।

* सत्र न्यायालय: मृत्युदंड देने पर उसका फैसला उच्च न्यायालय की पुष्टि के लिए भेजना अनिवार्य है।

* उच्च न्यायालय: पुष्टि किए बिना मृत्युदंड लागू नहीं किया जा सकता।

* सर्वोच्च न्यायालय: संबंधित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार अपील या अन्य उपलब्ध न्यायिक उपाय अपनाए जा सकते हैं।

* दया याचिका: संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत राष्ट्रपति या राज्यपाल के समक्ष, लागू अधिकार-क्षेत्र के अनुसार, दया याचिका दी जा सकती है।

### 5\. इसका सबसे महत्त्वपूर्ण कानूनी निष्कर्ष

Rarest of the rare का अर्थ केवल यह नहीं है कि अपराध बहुत भयानक है। इसका वास्तविक कानूनी अर्थ है कि अपराध की गंभीरता और अपराधी की सभी प्रासंगिक परिस्थितियों का मूल्यांकन करने के बाद अदालत इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि आजीवन कारावास का विकल्प पर्याप्त नहीं है और सुधार की संभावना को उपलब्ध सामग्री के आधार पर प्रभावी ढंग से नकारा जा सकता है। Indian Kanoon +1

इसीलिए किसी समाचार में यह लिखा हो कि अदालत ने किसी हत्याकांड में अभियुक्तों को मृत्युदंड दिया है, तो केवल उस फैसले से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मृत्युदंड निश्चित रूप से लागू होगा। उच्च न्यायालय की पुष्टि और आगे उपलब्ध कानूनी उपाय भी महत्त्वपूर्ण हैं।

दंड अपराध निरोधक भी होना चाहिए। हाल में सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा है कि अपराधियों में पुलिस और कानून का भय होना चाहिए। इस संदर्भ में मृत्युदंड को अपवाद रखना कितना उचित है?

यह प्रश्न दंड के उद्देश्य को लेकर एक वास्तविक और महत्त्वपूर्ण न्यायशास्त्रीय बहस उठाता है: यदि दंड से अपराधी में भय पैदा होना चाहिए और समाज में अपराध करने से पहले व्यक्ति को कानून के परिणामों का एहसास होना चाहिए, तो मृत्युदंड को अपवाद तक सीमित रखने का औचित्य क्या है?

इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए दंड के दो अलग-अलग पहलुओं को समझना जरूरी है—दंड कितना कठोर है और कानून का भय वास्तव में कितना प्रभावी है।

### 1\. सर्वोच्च न्यायालय की ताजा टिप्पणी क्या थी?

5 अक्टूबर 2026 को दिल्ली-NCR में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों पर स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने दिल्ली पुलिस से कहा कि संभावित अपराधियों के मन में कानून का भय पैदा होना चाहिए। अदालत ने अपराध होने के बाद कार्रवाई करने के बजाय उसे रोकने पर जोर दिया। The New Indian Express +1

9 अक्टूबर को सामने आए विस्तृत आदेश में भी अदालत ने गश्त, निगरानी, त्वरित पुलिस प्रतिक्रिया और सार्वजनिक स्थलों की सुरक्षा को अपराध-निरोध का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बताया। The Indian Express

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण अंतर है: अदालत की टिप्पणी अपराधियों में कानून का भय पैदा करने और प्रभावी पुलिस व्यवस्था के पक्ष में थी; इसे मृत्युदंड का दायरा बढ़ाने का न्यायिक आदेश नहीं समझना चाहिए।

### 2\. दंड निरोधक हो, तो मृत्युदंड अपवाद क्यों?

दंडशास्त्र में अपराध रोकने के उद्देश्य को deterrence कहते हैं। इसके दो प्रमुख रूप हैं:

* सामान्य निरोध (General deterrence): दूसरे लोग सजा देखकर अपराध करने से डरें।

* विशिष्ट निरोध (Specific deterrence):दंडित व्यक्ति दोबारा अपराध न करे।

मृत्युदंड का समर्थक तर्क देता है कि जब सजा जीवन समाप्त कर देती है, तो उससे अधिक कठोर दंड संभव नहीं है। इसलिए कुछ असाधारण अपराधों में यह उचित भी है और दूसरों के लिए चेतावनी भी।

लेकिन इसके विपरीत एक प्रश्न है: क्या सबसे कठोर सजा का अस्तित्व अपराध रोकने के लिए पर्याप्त है, या अपराधी को यह विश्वास भी होना चाहिए कि वह पकड़ा जाएगा और उसे समय पर सजा मिलेगी?

यहीं मृत्युदंड की बहस का वास्तविक केंद्र है।

### 3\. क्या मृत्युदंड अपराध रोकने में अधिक प्रभावी सिद्ध हुआ है?

इस प्रश्न पर उपलब्ध शोध निर्णायक नहीं है।

भारत के विधि आयोग ने अपनी 262वीं रिपोर्ट (2015) में निष्कर्ष दिया कि उपलब्ध अनुभवजन्य शोध यह प्रमाणित नहीं करता कि मृत्युदंड, आजीवन कारावास की तुलना में अतिरिक्त अपराध-निरोधक प्रभाव रखता है। Indian Kanoon

अमेरिका की National Research Council ने भी 2012 में कहा था कि उस समय उपलब्ध अध्ययनों से यह विश्वसनीय रूप से तय नहीं किया जा सकता कि मृत्युदंड हत्या की दर घटाता है या नहीं। इसका अर्थ यह भी नहीं कि उसका कोई निरोधक प्रभाव हो ही नहीं सकता; अर्थ यह है कि प्रभाव का निर्णायक वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं था। National Academies

इसलिए दो दावों में अंतर रखना चाहिए:

* मृत्युदंड का भय कुछ संभावित अपराधियों को रोक सकता है — यह एक तार्किक संभावना है।

* मृत्युदंड देने से हत्या या बलात्कार की दर निश्चित रूप से घटती है — इसे स्थापित तथ्य की तरह कहना उपलब्ध शोध से उचित नहीं होगा।

### 4\. फिर मृत्युदंड को अपवाद रखने के पक्ष में क्या तर्क हैं?

पहला — न्यायिक भूल की अपरिवर्तनीयता

आजीवन कारावास की सजा बाद में गलत सिद्ध होने पर व्यक्ति को रिहा किया जा सकता है। मृत्युदंड लागू हो जाने के बाद उस गलती को सुधारा नहीं जा सकता।

दूसरा — अपराधी को समाज से अलग रखने का विकल्प

आजीवन कारावास, और कानून के अनुसार विशेष परिस्थितियों में बिना समयपूर्व रिहाई वाली आजीवन सजा, खतरनाक अपराधी को समाज से अलग रख सकती है। इससे सार्वजनिक सुरक्षा का उद्देश्य मृत्युदंड के बिना भी पूरा हो सकता है।

तीसरा — समान अपराधों में समान न्याय

मृत्युदंड का निर्धारण यदि अलग-अलग न्यायाधीशों की व्याख्या पर अत्यधिक निर्भर हो, तो समान प्रकृति के मामलों में अलग सजा का जोखिम रहता है। विधि आयोग ने मृत्युदंड के प्रयोग में असंगति को भी चिंता का विषय माना था। Indian Kanoon +1

### 5\.  तर्क का सबसे मजबूत पक्ष क्या है?

मूल यह है कि दंड केवल अपराध हो जाने के बाद बदला लेने का माध्यम नहीं होना चाहिए; उसे अपराध होने से पहले रोकने का भी साधन होना चाहिए। यह दंडशास्त्र का मान्य उद्देश्य है।

लेकिन यहाँ एक जरूरी अंतर है:

कठोर दंड और निश्चित दंड एक ही चीज नहीं हैं।

यदि अपराधी को लगता है कि पुलिस उसे पकड़ नहीं पाएगी, गवाह मुकर जाएंगे, मुकदमा वर्षों चलेगा या सजा के बावजूद परिणाम नहीं भुगतने पड़ेंगे, तो केवल अधिकतम सजा बढ़ाने से अपेक्षित भय पैदा होना जरूरी नहीं है।

इसलिए अपराध-निरोध की प्रभावी व्यवस्था में कई बातें साथ-साथ काम करती हैं:

* अपराध का शीघ्र पता लगना और विश्वसनीय जाँच;

* पर्याप्त साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि;

* निष्पक्ष और समयबद्ध सुनवाई;

* अपराध के अनुपात में प्रभावी सजा;

* सजा का वास्तविक और विश्वसनीय क्रियान्वयन।

सर्वोच्च न्यायालय की अक्टूबर 2026 की टिप्पणियाँ भी पुलिस की सक्रियता, निगरानी और अपराध को पहले ही रोकने की दिशा में थीं। The Indian Express

### 6\. तो क्या भारत में मृत्युदंड को अपवाद रखना उचित है?

इसका उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि हम न्याय के किस उद्देश्य को प्राथमिकता देते हैं।

| दृष्टिकोण |    मृत्युदंड के बारे में तर्क |

———————————————————————————————————- |
| प्रतिशोधात्मक न्याय | कुछ अपराध इतने गंभीर होते हैं कि अपराधी मृत्युदंड का पात्र है। |
| अपराध-निरोध | मृत्युदंड का भय संभावित अपराधियों को रोक सकता है, लेकिन इसका अतिरिक्त प्रभाव निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं है। |
| सार्वजनिक सुरक्षा | खतरनाक अपराधी को आजीवन कारावास से भी समाज से अलग रखा जा सकता है। |
| न्यायिक सावधानी | अपरिवर्तनीय सजा के लिए दोषसिद्धि और सजा निर्धारण में असाधारण सावधानी आवश्यक है। |
| पीड़ित-केंद्रित न्याय | कठोर सजा के साथ पीड़ित परिवार को न्याय, सुरक्षा, सहायता और समयबद्ध सुनवाई भी जरूरी है। |

कानूनी स्थिति यह है कि Bachan Singh v. State of Punjab (1980) के फैसले के अनुसार मृत्युदंड संवैधानिक है, लेकिन उसका प्रयोग rarest of the rare मामलों तक सीमित है। इसे बदलने के लिए केवल किसी हालिया न्यायिक टिप्पणी से व्यवस्था नहीं बदल जाती; स्थापित न्यायिक सिद्धांत और लागू कानून का पालन करना होगा। Indian Kanoon

निष्कर्ष: अपराधियों में कानून का भय पैदा करना और दंड को प्रभावी बनाना आवश्यक है। लेकिन यह मान लेना कि अधिक मृत्युदंड अपने आप अधिक अपराध रोक देगा, प्रमाण से आगे जाना होगा। दूसरी ओर, rarest of the rare का सिद्धांत भी अपराध की गंभीरता कम करके देखने का निर्देश नहीं है; वह यह सुनिश्चित करता है कि जीवन समाप्त करने वाली सजा केवल असाधारण और कानूनी रूप से उचित मामलों में ही दी जाए।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है: क्या भारत में अपराधियों को सजा की कठोरता से अधिक, पकड़े जाने, दोषसिद्ध होने और समय पर दंडित होने की निश्चितता का भय पैदा करने की जरूरत है? दोनों उपाय एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, लेकिन उनके प्रभाव को अलग-अलग परखना जरूरी है।

पूर्ववर्ती निर्णयों का विश्लेषण (Analysis of Precedents) इस निर्णय में विभिन्न मामलों का जिक्र किया गया, जिनसे मृत्युदंड के प्रयोग पर गहराई से चर्चा होती है:

1. अपहरण और हत्या के मामले (Kidnapping and Murder Cases): उदाहरण के लिए, हेनरी वेस्टमुलर रॉबर्ट्स बनाम असम राज्य (Henry Westmuller Roberts v. State of Assam) और मोहन बनाम तमिलनाडु राज्य (Mohan v. State of T.N.) जैसे मामलों में मृत्युदंड की सजा दी गई क्योंकि इन मामलों में मासूम बच्चों का अपहरण और हत्या शामिल था। इन निर्णयों में यह दिखाया गया कि जब अपराध निर्दोष बच्चों का क्रूरतापूर्वक अपहरण और हत्या हो, तो यह “सबसे विरले मामलों” की श्रेणी में आता है।

2. संवेदनशील तथ्यों पर विचार (Considering Mitigating Factors): न्यायालय ने कहा कि मृत्युदंड देने से पहले दोषी के पक्ष में ऐसे संवेदनशील पहलुओं पर विचार किया जाना चाहिए। बच्चन सिंह के मामले में कहा गया कि दोषी की उम्र, सुधार की संभावना और मानसिक स्थिति जैसे तत्वों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। अन्य मामलों जैसे धोंडिबा गुंडू पोमाजे बनाम महाराष्ट्र राज्य (Dhondiba Gundu Pomaje v. State of Maharashtra) में युवा उम्र को एक नरम कारण के रूप में देखा गया।

3. न्यायिक विवेक और समानुपातिकता (Judicial Discretion and Proportionality): न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि सजा तय करने में न्यायिक विवेक का महत्व है। धारा 303 IPC (जिसे मिथु बनाम पंजाब राज्य (Mithu v. State of Punjab) मामले में असंवैधानिक घोषित किया गया था) के विपरीत, धारा 364A न्यायालय को विवेक का अधिकार देती है। इस तरह की संरचना संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन के अधिकार के अनुरूप है। न्यायिक विवेक और उचित सजा (Judicial Prudence and Just Punishment) न्यायालय ने कहा कि सजा का अपराध के अनुरूप होना आवश्यक है। यदि कोई सजा बहुत कठोर हो और अपराध के अनुपात में न हो, तो उसे असंवैधानिक माना जा सकता है। उदाहरण के लिए, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के वीम्स बनाम यूनाइटेड स्टेट्स (Weems v. United States) और एन्मुंड बनाम फ्लोरिडा (Enmund v. Florida) जैसे मामलों में न्यायालय ने कहा कि सजा अपराध के अनुपात में होनी चाहिए। सोलेम बनाम हेल्म (Solem v. Helm) के मामले में, यह बताया गया कि समानुपातिकता का सिद्धांत न केवल मृत्युदंड बल्कि अन्य सजा के मामलों में भी लागू होता है। भारत में न्यायालयों ने भी यह सिद्ध किया है कि वे सजा के प्रकार पर विधायिका के निर्णयों का सम्मान करते हैं, लेकिन यह सुनिश्चित करते हैं कि वे संविधान के प्रावधानों और नागरिकों के मूल अधिकारों के अनुकूल हों। अनिवार्य मृत्युदंड के खिलाफ तर्क (Arguments Against Mandatory Death Sentences) न्यायालय ने बार-बार यह कहा है कि अनिवार्य मृत्युदंड को संवैधानिक नहीं माना जा सकता। मिथु बनाम पंजाब राज्य (Mithu v. State of Punjab) मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने धारा 303 IPC को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित किया कि यह न्यायालयों के विवेक को समाप्त करता है। इसके विपरीत, धारा 364A अदालत को सजा के चयन का अधिकार देती है, जिससे निष्पक्षता सुनिश्चित होती है। इसकी वजह यह है कि अनिवार्य मृत्युदंड से व्यक्तिगत परिस्थितियों पर विचार करने की संभावना समाप्त हो जाती है, जैसे दोषी के सुधार की संभावना और सामाजिक पृष्ठभूमि। धारा 364A में अदालत को यह अधिकार देने से न्याय और निष्पक्षता के सिद्धांतों का पालन होता है। विधायी इरादा और न्यायिक विवेक (Legislative Intent and Judicial Prudence) धारा 364A के पीछे विधायिका का उद्देश्य यह था कि गंभीर अपराधों के लिए सख्त प्रावधान हों, जिनका समाज पर गहरा प्रभाव हो सकता है। हालांकि, न्यायपालिका का दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करना है कि इस प्रावधान का उपयोग सावधानी से हो और यह सुनिश्चित किया जाए कि यह केवल उन मामलों में हो जहां समाज की सामूहिक अंतरात्मा की मांग हो कि ऐसी कठोर सजा दी जाए। इस निर्णय में अदालत ने दोहराया कि मृत्युदंड का प्रयोग केवल उन्हीं मामलों में किया जाना चाहिए जहां जीवन पर्यंत कारावास (Life Imprisonment) का विकल्प अपर्याप्त हो। यह सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि सजा का निर्धारण मनमाने या अनुपातहीन तरीके से न हो और प्रत्येक मामले के सभी पहलुओं पर पूर्ण विचार किया जाए। भारत में मृत्युदंड के प्रावधान और उनके न्यायिक व्याख्या से पता चलता है कि इसमें विधायी इरादे, संवैधानिक सुरक्षा और नैतिक मुद्दों का जटिल मिश्रण है। न्यायपालिका ने ऐसे ढांचे को परिभाषित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है जो सुनिश्चित करता है कि मृत्युदंड का प्रयोग केवल “सबसे विरले मामलों” में हो। यह दृष्टिकोण नागरिकों के जीवन के अधिकार की रक्षा करते हुए सबसे गंभीर अपराधों के लिए राज्य के न्यायसंगत उद्देश्य की भी सेवा करता है।

 

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मृत्युदंड
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मृत्युदण्ड (अंग्रेज़ी:कैपिटल पनिश्मैन्ट), किसी व्यक्ति को कानूनी तौर पर न्यायिक प्रक्रिया के फलस्वरूप किसी अपराध के परिणाम में प्राणान्त का दण्ड देने को कहते हैं। अंग्रेज़ी में इसके लिये प्रयुक्त कैपिटल शब्द लैटिन के कैपिटलिस शब्द से आया है, जिसका शाब्दिक अर्थ है “सिर के सम्बन्ध में या से सम्बन्धित” (लैटिन कैपुट)। इसके मूल में आरम्भिक रूप में दिये जाने वाले मृत्युदण्ड का स्वरूप सिर को धड़ से अलग कर देने की प्रक्रिया में है। वर्तमान समय में एमनेस्टी इंटरनेशनल के आंकड़ों के अनुसार विश्व के 58 देशों में अभी मृत्युदण्ड दिया जाता है[1], जबकि अन्य देशों में या तो इस पर रोक लगा दी गई है, या गत दस वर्षो से किसी को फांसी नहीं दी गई है। यूरोपियाई संघ के सदस्य देशों में,चार्टर ऑफ फ़्ण्डामेण्टल राइट्स ऑफ द यूरोपियन यूनियन की धारा-2 मृत्युदण्ड को निषेध करती है।[2]

एशियाई विश्व में सबसे प्रचलित मृत्युदण्ड का रूप है फांसी
फ़िल्म के लिए, मृत्युदंड (फ़िल्म) देखें।
अनुक्रम
1 विवाद
2 विश्व में प्रयोग
3 सन्दर्भ
4 इन्हें भी देखें
5 बाहरी कड़ियाँ
विवाद
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मायरा के सन्त निकोलस ने तीन गलत निर्णय द्वारा मृत्युदण्ड भागियों को अन्तिम घड़ी में बचाने हेतु जल्लाद के हाथ से तलवार खींचते हुए। (तैल चित्र, इलिया रेपिन 1888, रूसी राजकीय संग्रहालय
मृत्युदण्ड पर अभी भी विभिन्न देशों में विवाद जोरों पर है। इसके विपक्षियों का कहना है कि यह बहुत हद तक सम्भव है कि कानून को तोड़-मरोड़ कर और झूठी गवाही के आधार पर निर्दोष व्यक्ति को फांसी दे दी जाए। इसके लिए आंकड़ों को आधार बनाकर कहा जाता है कि मृत्युदण्ड के शिकार बनने जा रहे लोगों में से अधिकांश गरीब वर्ग के लोग होते हैं या ऐसे लोग जो अपनी पैरवी के लिए वकील नहीं रख सकते हैं।[3] इसके विपरीत, मृत्युदण्ड के पक्षधर अनेक आधारों पर विभिन्न सजाओं को श्रेणीबद्ध करते हुए यह कहते हैं कि किसी अपराधी को मृत्युदण्ड दिया जाना उसे सदा के लिए कारागार में रखने से कहीं सस्ता सौदा होता है। इसके अलावा इसे एक सबक के तौर पर भी मानते हैं, ताकि अन्य लोग सीख लें, लेकिन इसके बावजूद मृत्युदंड का भय अपराधों पर रोक नहीं लगाता।

चार्टर ऑफ फ़्ण्डामेण्टल राइट्स ऑफ द यूरोपियन यूनियन की धारा-2 यूरोपियन संघ के सदस्य राष्ट्रों में मृत्युदण्ड को निषेध करती है।
आज ऍमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार अधिकांश देश मृत्युदण्ड के विपक्षी हैं,[4] जिनके लिये संयुक्त राष्ट्र में यू.एन. को मृत्युदण्ड उन्मूलोअन करने हेतु एक गैर-अनिवार्य प्रस्ताव पर मतदान किया गया था।[5] यहां ये ध्यानयोग्य है कि जिन अधिकांश देशों में मृत्युदण्ड का उन्मूलन किया गया है, वे पाश्चात्य देश हैं, जबकि जिन देशों में विश्व की अधिकांश जनसंख्या (लगभग 60%) रहती है, वहां मृत्युदण्ड अभी तक जारी है।[3] इन देशों में प्रमुख चार देश आते हैं: चीन, भारत, संयुक्त राज्य और इंडोनेशिया। इन चारों देशॊं में अभी तक मृत्युदण्ड जारी है और निकट भविष्य में निषेध होने की कोई सम्भावना भी नहीं दिखती है।[6][7][8][9][10][11][12][13][14]

विश्व में प्रयोग
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इतिहास में अनेक सभ्यताओं में मृत्युदण्ड का नाम आता है। प्राचीन यूनानी, मिस्र, चीनी और भारतीय सभ्यताओं में इस दण्ड के सन्दर्भ मिलते हैं, लेकिन उस समय इसे देने के अजीबोगरीब तरीके हुआ करते थे। द्वितीय विश्व युद्ध से मृत्युदण्ड उन्मूलन हेतु लगातार प्रयास होते रहे हैं। 1977 में, 6 देशों ने इसे निषेध किया था। वर्तमान स्थिति ये है कि 95 देशों ने मृत्युदण्ड निषेध कर दिया है, 9 देशों ने इसे अन्य सभी अपराधों के लिये निषेध किया है, सिवाय विशेष परिस्थितियों के और 35 देशों ने इसे पिछले दस वर्षों ने किसी को आरोपित नहीं किया है। अन्य 58 देशों ने इसे पूरी तरह लागू किया हुआ है।[15] एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, वर्ष 2009 में 18 देशों ने कम से कम 714 मृत्युदण्ड दिये हैं और लागू भी किये हैं।[16]

विश्व भर के देशों में मृत्युदण्ड का प्रयोग (जून 2025 के अनुसार)
सभी अपराधों के लिये निषिद्ध (110)
सिवाय विशेष परिस्थितियों के, सभी अपराधों के लिये निषिद्ध (9)
जारी है, किन्तु कम से कम 10 वर्षों से नहीम दी गई (23)
मृत्युदण्ड जारी है (53)*
* ये ध्यानयोग्य है, कि हालांकि संयुक्त राज्य के विभिन्न राज्यों के कानून में अन्तर है, किन्तु फिर भी इसे पक्षधर माना जाता है, क्योंकि संघीय मृत्युदण्ड अभी भी प्रयोग में है।

at the वेबैक मशीन। हिन्दुस्तान लाइव। 11 मई 2010
↑ peine de mort – इंडोनेशियन एक्टिविस्ट्स फ़ेस अपवर्ड डेथ पैनेल्टी ट्रेण्ड – एशिया – पैसिफ़िक – ऍक्चुएलाइट्स[मृत कड़ियाँ]
↑ “नो सीरियस चाइन्सेज़ ऑफ रिपील इन दोज़ स्टेट्स दैट आर ऍक्चुअली यूज़िंग डैथ पैनेल्टी”. मूल से से 28 सितंबर 2011 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 13 मई 2010.
↑ AG Brown says he’ll follow law on मूल से से 7 जुलाई 2011 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 13 मई 2010.
↑ “A new Texas? Ohio’s death penalty examined – Campus”. मूल से से 2 जून 2009 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 13 मई 2010.
↑ “THE DEATH PENALTY IN JAPAN-FIDH > Human Rights for All / Les Droits de l’Homme pour Tous”. मूल से से 28 अगस्त 2010 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 13 मई 2010.
↑

आजीवन कारावास में भी भ्रम और मनमानी

आजीवन कारावास में भी सर्वोच्च न्यायालय का आदेश मरते दम तक जेल की पुष्टि करता है लेकिन व्यवहार में आजीवन कारावास प्राप्त कैदी 14 वर्ष बाद छोड दिये जाते हैं जिसमें जेल प्रशासन रात और दिन अलग-अलग गिनता है। इसमें एकरूपता का अभाव अन्याय और मनमाना दर्शाता है

आजीवन कारावास की सजा के क्रियान्वयन में एक वास्तविक कानूनी और नीतिगत समस्या है। यदि अदालत किसी अपराधी को मरते दम तक जेल में रखने का आदेश देती है, लेकिन सामान्य धारणा यह बनी रहती है कि आजीवन कारावास का अर्थ केवल 14 वर्ष है, तो दंड की निश्चितता और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

हालाँकि, इस विषय में तीन अलग-अलग बातों को स्पष्ट करना जरूरी है—आजीवन कारावास की वास्तविक अवधि, जेल में दिन-रात की गणना और समयपूर्व रिहाई की कानूनी व्यवस्था।

### 1\. कानून में आजीवन कारावास का अर्थ 14 वर्ष नहीं है

सर्वोच्च न्यायालय ने Gopal Vinayak Godse तथा बाद के अनेक फैसलों में स्पष्ट किया है कि आजीवन कारावास का अर्थ सामान्यतः अपराधी के शेष प्राकृतिक जीवन तक कारावास है, जब तक सक्षम सरकार कानून के अनुसार उसकी सजा में छूट देकर रिहाई का आदेश न दे। Orissa High Court +1

इसलिए तीन स्थितियों में अंतर करना आवश्यक है:
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दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 433A के अंतर्गत आने वाले मामलों में सामान्यतः कम-से-कम 14 वर्ष का वास्तविक कारावास पूरा करना आवश्यक है। लेकिन यह रिहाई का अधिकार नहीं, बल्कि वैधानिक न्यूनतम सीमा है। Sci API +1

### 2\. जेल में दिन-रात अलग-अलग गिनने का प्रश्न

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण तकनीकी अंतर है। जेल में बंदी द्वारा वास्तविक रूप से बिताए गए दिन और जेल नियमों के तहत अर्जित remission (सजा में छूट) अलग-अलग चीजें हैं।

* वास्तविक कारावास की गणना में जेल में बिताई गई अवधि देखी जाती है।

* नियमों में अच्छे आचरण या अन्य निर्धारित आधारों पर छूट मिल सकती है।

* समयपूर्व रिहाई के लिए वास्तविक कारावास, अर्जित छूट और राज्य की लागू नीति को साथ देखकर निर्णय लिया जा सकता है।

इसलिए यदि कहीं दिन और रात को अलग-अलग जोड़कर कारावास की अवधि घटाने की बात कही जाती है, तो उसके लिए संबंधित जेल नियम और गणना का आधिकारिक रिकॉर्ड देखना होगा। सिर्फ रात और दिन अलग होने से एक दिन दो दिन नहीं बन जाता। छूट के नियमों के कारण कागजी गणना और वास्तविक जेल-प्रवास में अंतर हो सकता है।

### 3\. तर्क के संदर्भ में 2026 का एक महत्त्वपूर्ण फैसला

24 सितंबर 2026 के Naval Kishore v. State of Punjab फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि निचली अदालत अपने स्तर पर ऐसा विशेष आजीवन कारावास नहीं थोप सकती, जो सक्षम सरकार की वैधानिक सजा-छूट और परिवर्तन संबंधी शक्तियों को समाप्त कर दे। ऐसी विशेष सजा निर्धारित करने की शक्ति उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के पास है। 2026 Supreme(SC) 1178

फैसला इस चिंता से सीधे जुड़ता है- दंड की अवधि तय करने वाली अदालत और रिहाई या छूट पर निर्णय लेने वाली सरकार की शक्तियाँ अलग हैं। इससे सजा के वास्तविक प्रभाव को समझने के लिए न्यायिक आदेश के साथ-साथ लागू रिहाई नीति देखना भी आवश्यक हो जाता है।

### 4\. क्या यह अन्याय और मनमानेपन का संकेत हो सकता है?

हाँ, यदि समान परिस्थितियों वाले कैदियों के मामलों में बिना स्पष्ट, सार्वजनिक और तर्कसंगत मानदंडों के अलग-अलग निर्णय हों, तो यह मनमानेपन और समानता के सिद्धांत से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। लेकिन केवल अलग-अलग अवधि में रिहाई होने से अपने आप अवैध भेदभाव सिद्ध नहीं होता; अपराध की प्रकृति, अदालत का आदेश, कैदी का आचरण और लागू नीति भी देखनी होगी।

इस समस्या का एक व्यावहारिक समाधान यह हो सकता है कि:

* प्रत्येक राज्य रिहाई और remission के मानदंड स्पष्ट और सार्वजनिक रखे।

* सभी पात्र कैदियों के मामलों की समयबद्ध समीक्षा हो।

* रिहाई या अस्वीकृति के कारण लिखित और न्यायिक समीक्षा योग्य हों।

* अदालत से निर्धारित विशेष अवधि के कारावास और सामान्य आजीवन कारावास के बीच स्पष्ट अंतर रखा जाए।

उत्तर प्रदेश में समयपूर्व रिहाई के मामलों की समीक्षा में सर्वोच्च न्यायालय ने 2026 में भी लंबित मामलों और प्रशासनिक प्रक्रिया की समस्याओं पर विचार किया। O

मूल चिंता दंड की कठोरता से भी आगे की है:   सजा का अर्थ वही होना चाहिए जो अदालत ने निर्धारित किया है, और उसके क्रियान्वयन में पारदर्शिता तथा एकरूपता होनी चाहिए। यदि जनता को सजा का वास्तविक अर्थ ही स्पष्ट न हो, तो कानून के भय और न्याय व्यवस्था पर विश्वास—दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

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