अनुजा अजजा अत्याचार निवारण अधिनियम-1989 संशोधन 2018 बाद क्या है स्थिति?
क्या होता है SC-ST Act? कब दर्ज होता है केस, यहां जानिए पूरी बातएससी-एसटी एक्ट क्या है. सरकार ने इस कानून को क्यों बनाया. क्या इसमें मुकदमा होने पर मिल सकती हैं आरोपित व्यक्ति को अग्रिम जमानत?
देहरादून 09 सितम्बर 2026। देश में अनुसूचित जाति- अनुसूचित जनजाति के लोगों को जाति के आधार पर होने वाले उत्पीड़न से बचाने को एससी-एसटी एक्ट 1989 बनाया गया था. इस कानून का पूरा नाम अनुसूचित जाति- अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम-1989 है. कानून 30 जनवरी 1990 को जम्मू कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू हुआ था. लेकिन अगस्त 2019 में जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटने के बाद से यह कानून केंद्र शासित जम्मू कश्मीर में भी लागू हो गया. इस कानून में अब तक 2015 और 2018 में दो बड़े संशोधन हुए हैं. देखते हैं कि क्या है ये कानून, इसमें मुकदमा कौन करा सकता है. इसमें गिरफ्तारी और सजा के प्रावधान क्या हैं.
कब लगता है एससी-एसटी एक्ट
एससी-एसटी एक्ट अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को जाति के नाम पर सामाजिक, आर्थिक और शारीरिक शोषण से बचाने का प्रावधान करता है. इसका उद्देश्य पीड़ितों को न्याय, मुआवजा और पुनर्वास है. एससी-एसटी एक्ट में कई तरह के अपराध शामिल हैं. साल 2015 में संशोधन के बाद इस कानून में कुल 26 तरह के कृत्य अपराध श्रेणी में डाले गये. इनमें से प्रमुख हैं-
एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य के मुंह में अखाद्य या अप्रिय पदार्थ डालना.
एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य के कब्जे वाले स्थान के प्रवेश द्वार पर या उसके अंदर मल-मूत्र, शव या कोई अन्य घृणित पदार्थ डालना.
एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य को जूतों की माला पहनाना,उन्हें नंगा करके या आधा नंगा करके चलने को मजबूर करना.
एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य का जबरन मुंडन करना या उनकी मूंछें काटना या हटाना, उनकी सहमति के बिना उनके शरीर को अपमानजनक तरीके से रंगना.
एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य से संबंधित या उन्हें आवंटित जमीन पर अवैध कब्जा करना.
एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य के किसी व्यक्ति को शव ढोने या कब्र खोदने को मजबूर करना.
एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य को हाथ से मैला ढोने के काम में लगाने को प्रेरित करना या दूसरों को ऐसा करने की अनुमति देना.
एससी-एसटी वर्ग की महिलाओं को देवदासी या इसी तरह की अन्य भूमिकाओं में काम करने को मजबूर करना.
एससी-एसटी वर्ग के लोगों को डराना-धमकाना या उन पर किसी विशेष तरीके से मतदान करने या न करने का दबाव डालना, या उन्हें उम्मीदवार के रूप में अपना नामांकन दाखिल करने से रोकना या उसे वापस लेना.
एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य को मंदिर, अस्पताल और स्कूल जैसी सार्वजनिक जगहों तक पहुंचने या वहां से गुजरने के अधिकार से वंचित करना.
एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य को सार्वजनिक तौर पर लोगों के सामने कोई भी कारण बताकर अपमानित करना.
एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य की पवित्र वस्तुओं का अपमान करना.
एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य के खिलाफ यौन प्रकृति के शब्दों, कृत्यों या इशारों का प्रयोग करना.
कैसे कराएं शिकायत
एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य को अगर लगता है कि उसके साथ उसकी जाति के आधार पर भेदभाव, अपमान, हिंसा या अत्याचार किया जा रहा है, तो वह पुलिस में शिकायत करा सकता है.इस कानून में एससी-एसटी वर्ग का कोई व्यक्ति एससी-एसटी वर्ग के किसी व्यक्ति के खिलाफ शिकायत नहीं करा सकता. कानून में एफआईआर होने पर आरोपित की गिरफ्तारी होगी. इसका उद्देश्य पीड़ित की सुरक्षा है. कई बार अदालतों ने यह साफ किया है कि अगर कोई व्यक्ति एसटी-एसटी वर्ग के व्यक्ति की जाति का नाम लेता है या अकेले में उसकी बात करता है, तो वह अपराध नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इसमें दोष सिद्धि को अपमान करने की मंशा का सिद्ध होना जरूरी है.
एससी-एसटी में होने वाले मुकदमों में तेजी से सुनवाई को जिला स्तर पर विशेष अदालतें बनाई गई हैं, ताकि इन मामलों का जल्द से जल्द निपटारा हो सके. इस कानून में दोषी पाए जाने पर छह माह से लेकर आजीवन कारावास तक सजा और अर्थदण्ड का प्रावधान है. संज्ञेय श्रेणी का मामला होने से इस कानून में मुकदमों में अदालत से बाहर समझौते का कोई प्रावधान नहीं है.
एससी-एसटी एक्ट में जमानत
किसी व्यक्ति के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट में मुकदमें को संज्ञेय अपराध माना जाता है. इस मामले में पहले अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं था, लेकिन संशोधन बाद यह फैसला किया गया कि मजिस्ट्रेट के विचारोपरांत मुकदमे में जमानत दी जा सकती है. इन मामलों में पुलिस किसी को गिरफ्तार करती है, तो गिरफ्तारी के दो महीने में उसे आरोपपत्र देना होगा . इस कानून में मुकदमों की संख्या बढ़ने और इसके दुरुपयोग के मामले सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस कानून में अंकित मुकदमे की जांच डिप्टी एसपी रैंक के अधिकारी करेंगें. मुकदमा होने पर आरोपित को अग्रिम जमानत दी जा सकती है. लेकिन जमानत देना या न देना मजिस्ट्रेट के विवेक पर निर्भर है. सरकारी अधिकारी-कर्मचारी पर एसी-एसटी एक्ट में मुकदमा होने पर आरोपित की गिरफ्तारी उसके विभाग की अनुमति बिना नहीं होगी. किसी साधारण व्यक्ति पर एससी एसटी एक्ट का मुकदमा होता है, तो उसकी गिरफ्तारी को पुलिस को एसपी से पूछना होगा. कुछ इसी तरह के आदेश सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में महाराष्ट्र के एक मुकदमे की सुनवाई में दिए थे.
इसके बाद सरकार ने अगस्त 2018 में कानून में संशोधन किया जिससे आरोपित की गिरफ्तारी को जांच अधिकारी को किसी अथॉरिटी की मंजूरी लेने की जरूरत नहीं रह गई. इस कानून में एफआईआर को शुरुआती जांच की जरूरत नहीं होती है. इसके साथ ही इस कानून में आरोपित की अग्रिम जमानत की व्यवस्था भी खत्म कर दी गई.
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Prevention of Atrocities Act) का इतिहास भारत में सदियों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव, छूआछूत और जातिगत हिंसा को रोकने के कानूनी प्रयासों से जुड़ा है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान ने अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता (छूआछूत) समाप्त कर इसे दंडनीय अपराध घोषित किया। इसके क्रियान्वयन को समय-समय पर निम्न कानून बनाए गए:
अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, 1955: यह स्वतंत्रता के बाद छूआछूत के खिलाफ बनाया गया पहला प्रमुख कानून था।
नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1976 (PCR Act): 1955 के अधिनियम में कमियां पाए जाने पर 1976 में इसमें संशोधन कर इसकी परिधि बढ़ायी गयी।
नए कानून की आवश्यकता: इन कानूनों के बाद भी दलितों और आदिवासियों पर होने वाले गंभीर अपराधों— शारीरिक प्रताड़ना, सामाजिक बहिष्कार, भूमि पर अवैध कब्जे, महिलाओं से दुर्व्यवहार और नरसंहार—में कमी नहीं आई। सामान्य भारतीय दंड संहिता (IPC) इन अपराधों के पीछे की जातिगत दुर्भावना का पूरी तरह समाधान नहीं कर पा रही थी।
1989 का अधिनियम: निर्माण और उद्देश्य
बढ़ते अपराधों को देखते हुए राजीव गांधी सरकार के समय संसद में एक कठोर और व्यापक कानून तैयार किया गया।
पारित और लागू होना: संसद ने इसे 11 सितंबर 1989 को पारित किया और 30 जनवरी 1990 से यह पूरे देश में प्रभावी हुआ।
मुख्य उद्देश्य: अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के विरुद्ध गैर-एससी/एसटी वर्ग के अपराधों को रोकना, पीड़ितों को त्वरित न्याय दिलाना तथा उनका पुनर्वास सुनिश्चित करना।
1989 अधिनियम की प्रमुख विशेषताएं:
अपराधों की स्पष्ट परिभाषा: जबरन अखाद्य पदार्थ खिलाना, निर्वस्त्र घुमाना, वोट डालने से रोकना, सामाजिक बहिष्कार और जमीन हड़पने जैसे कई कृत्यों को स्पष्ट रूप से संज्ञेय अपराध माना गया।
कठोर प्रक्रियाएं: आरोपितों को अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail – धारा 18) का प्रावधान समाप्त।
विशेष अदालतें: मामलों की त्वरित सुनवाई को प्रत्येक जिले में विशेष सत्र न्यायालय (Special Courts) स्थापना ।
राहत और पुनर्वास: पीड़ितों के लिए आर्थिक सहायता और सुरक्षा की व्यवस्था।
प्रमुख पड़ाव और कानूनी संशोधन




क्या करें अगर एससी एसटी एक्ट में झूठा मुकदमा हो जाए?
अगर किसी को एससी एसटी एक्ट केस में झूठा फंसाया जा रहा है तो वह ऐसे बच सकता है.
अपने समर्थन में गवाहों के बयान, सीसीटीवी फुटेज, कॉल रिकॉर्ड जैसे प्रमाण इकट्ठा करें, जिससे सिद्ध हो सके कि आप निर्दोष है.
पुलिस जांच में सहयोग करें.उसे सही जानकारी और प्रमाण दें.
अगर आपको लगता है कि आपके खिलाफ कराई गई शिकायत झूठी है तो अदालत में याचिका दे एफआईआर निरस्त करने की मांग कर सकते हैं.
निचली अदालत में जमानत नहीं मिलती है तो उच्च अदालत का रुख करें.
इस कानून में झूठा मुकदमा कराने पर किसी सजा का प्रावधान नहीं हैं. लेकिन पीड़ित भारतीय न्याय संहिता की धाराओं का उपयोग कर झूठा मुकदमा कराने वाले व्यक्ति के खिलाफ अदालत की शरण ले सकता है.
मुकदमा कराने वाले को सरकार कितनी क्षतिपूर्ति देती है
पीड़ित व्यक्तियों को सरकार आर्थिक क्षतिपूर्ति भी देती है. जैसे उत्तर प्रदेश सरकार 85 हजार से सवा आठ लाख रुपये तक क्षतिपूर्ति देती है. क्षतिपूर्ति राशि अपराध के अलग-अलग प्रकार में अलग-अलग होती है.क्षतिपूर्ति सरकार मुकदमें के अलग-अलग चरणों में देती है. मुकदमा होने पर पुलिस जांच कर आर्थिक सहायता का प्रस्ताव संबंधित जिला समाज कल्याण अधिकारी को देती है. क्षतिपूर्ति का वितरण जिला समाज कल्याण अधिकारी ही करते हैं.
SC/ST (अत्याचार निवारण) संशोधन कानून 2018: SC निर्णय
चर्चा में क्यों ?
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन कानून (SC/ST Atrocities Amendment Act), 2018 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर निर्णय देते हुए इसकी संवैधानिक वैधता बनाये रखी है।
प्रमुख बिंदु:
सर्वोच्च न्यायालय ने 20 मार्च 2018 के अपने पूर्ववर्ती निर्णय पलट स्पष्ट किया कि इस कानून में गिरफ्तारी पूर्व प्राथमिक जाँच की ज़रूरत नहीं है।
साथ ही इस तरह के मामलों में गिरफ्तारी से पूर्व किसी अथॉरिटी से अनुमति लेना भी अनिवार्य नहीं है।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि अपने विरुद्ध FIR निरस्त कराने को आरोपित व्यक्ति न्यायालय की शरण में जा सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार यदि प्रथम दृष्टया एससी/एसटी अधिनियम में कोई मामला नहीं बनता है तो कोई भी न्यायालय FIR निरस्त कर सकता है।
अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद 30 जनवरी 1990 को जम्मू-कश्मीर छोड़कर पूरे देश में लागू हो गया।
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के अतिरिक्त कोई व्यक्ति कैसे भी किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति वर्ग से संबंधित किसी व्यक्ति को प्रताड़ित करता है, तो उसके विरुद्ध यह कानून कार्य करता है।
कानून पीड़ितों को विशेष सुरक्षा देता है। अलग-अलग अपराध से पीड़ित होने पर 75,000 रुपए से लेकर 8 लाख 50 हजार रुपए तक की सहायता दी जाती है।
इस कानून में विशेष न्यायालय बनते हैं जो ऐसे प्रकरण में तुरंत निर्णय लेते हैं।
इस कानून में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में पीड़ित को राहत राशि और अलग से मेडिकल जाँच की भी व्यवस्था है।
सर्वोच्च न्यायालय का पूर्ववर्ती निर्णय
सर्वोच्च न्यायालय ने 20 मार्च 2018 को सुभाष काशीनाथ बनाम महाराष्ट्र राज्य के वाद में निर्णय देते प्रावधान किया कि-
एससी/एसटी कानून के मामलों की जाँच कम से कम डिप्टी एसपी रैंक के अधिकारी करेंगें। पहले यह कार्य इंस्पेक्टर रैंक अधिकारी करता था।
यदि किसी सामान्य जन पर एससी-एसटी कानून में केस होता है, तो उसकी भी गिरफ्तारी तुरंत नहीं होगी बल्कि इसको जिले के SP या SSP से अनुमति लेनी होगी।
किसी व्यक्ति पर केस होने के बाद उसे अग्रिम जमानत भी दी जा सकती है।
अग्रिम जमानत देने या न देने का अधिकार दंडाधिकारी के पास होगा। अभी तक अग्रिम जमानत नहीं मिलती थी तथा जमानत भी उच्च न्यायालय से होती थी।
किसी भी सरकारी कर्मचारी/अधिकारी पर केस होने पर उसकी गिरफ्तारी तुरंत नहीं होगी, बल्कि उस सरकारी अधिकारी के विभाग से गिरफ्तारी को अनुमति लेनी होगी।
न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि जाँच पूर्ण रूप से समयबद्ध होनी चाहिये। जाँच किसी भी सूरत में 7 दिन से अधिक समय तक न चले। इन नियमों का पालन न करने की स्थिति में पुलिस पर अनुशासनात्मक एवं न्यायालय की अवमानना करने के संदर्भ में कार्यवाई होगी।
उत्पीड़न के ज़्यादातर मामले झूठे हैं
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़ों के संबंध में विचार करने पर ज्ञात होता है कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम में दर्ज ज़्यादातर मामले झूठे मिले।
न्यायालय ने अपने फैसले में ऐसे कुछ मामले शामिल किये हैं जिसके अनुसार 2016 की पुलिस जाँच में अनुसूचित जाति को प्रताड़ित किये जाने के 5347 झूठे मामले सामने आए, जबकि अनुसूचित जनजाति के कुल 912 मामले झूठे पाए गए।
वर्ष 2015 में एससी-एसटी कानून में न्यायालय ने 15638 मुकदमों का निपटारा किया। इसमें से 11024 मामलों में या तो अभियुक्त छोड़ दिये गये या फिर वे आरोप मुक्त हुए। जबकि 495 मुकदमें वापस ले लिये गये।
केंद्र सरकार के किये गए संशोधन
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध केंद्र सरकार ने एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) संशोधन कानून 2018 पारित करते हुए अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 के मूल प्रावधान फिर से लागू कर दिये, जो इस प्रकार हैं –
एससी/एसटी संशोधन विधेयक 2018 के जरिये मूल कानून में धारा 18A जोड़ी गई, इसमें पुराना कानून यथावत कर दिया गया।
नए प्रावधानों के अनुसार, अब इन मामलों में केस होते ही गिरफ्तारी होगी। इसके अतिरिक्त आरोपित को अग्रिम जमानत भी न देने की व्यवस्था की गई।
आरोपित को उच्च न्यायालय से ही नियमित जमानत मिल सकेगी। अब पूर्व की भाँति मामले की जाँच इंस्पेक्टर रैंक के पुलिस अधिकारी करेंगें।
जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल संबंधी शिकायत पर तुरंत मामला दर्ज होगा।
एससी/एसटी मामलों की सुनवाई सिर्फ स्पेशल कोर्ट में होगी।
सरकारी कर्मचारी/अधिकारी के विरुद्ध न्यायालय में चार्जशीट दायर करने से पहले जाँच एजेंसी को अथॉरिटी से अनुमति लेने की अनिवार्यता नहीं होगी।
आगे की राह:
लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार हैं और कानून के समक्ष भी सभी को समान माना गया है। ऐसे में किसी भी नागरिक के अधिकारों का हनन अनुचित है फिर चाहे वह सवर्ण हो या दलित। न्यायालय का निर्णय भी इसी तर्क की पुष्टि करता है।
यह शासनतंत्र की ज़िम्मेदारी है कि वह पिछड़े समुदायों और दलितों के संरक्षण हेतु बनाए गए कानूनों का ईमानदारीपूर्वक और भेदभाव रहित दृष्टिकोण अपनाकर अनुपालन सुनिश्चित करे, जिससे इन वर्गों में उत्पन्न असुरक्षा और उत्पीड़न का डर समाप्त हो सके एवं इनका शासनतंत्र और न्याय प्रणाली में विश्वास बना रहे।
स्रोत: द हिंदू


