मत: डॉक्टर सस्ती जैनेरिक दवायें क्यों नहीं लिखते?

डॉक्टरों को जेनेरिक दवाएं लिखने के लिए मजबूर करना कितना सही? 7 बड़ी बातें

नेशनल मेडिकल काउंसिल (NMC) में हाल ही डॉक्टरों के लिए एक आचार संहिता जारी की है। इसमें डॉक्टरों से जेनेरिक दवाएं लिखने को कहा गया है। गुणवत्तापूर्ण कम लागत वाली जेनेरिक दवाएं स्वास्थ्य देखभाल की कुंजी हैं। इस फैसले को लेकर डॉक्टरों में बेचैनी है।

मुख्य बिंदु
नेशनल मेडिकल कमिशन की तरफ से डॉक्टरों के लिए नया एथिक्स कोड
डॉक्टरों को ब्रांडेड दवाओं की जगह जेनेरिक दवाएं लिखने पर दिया है जोर
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) ने NMC पर जमकर निशाना साधा

देश में मेडिकल बिरादरी में इन दिनों एक बहस काफी तेज है। बहस का कारण नेशनल मेडिकल कमिशन से डॉक्टरों के लिए नई आचार संहिता (Ethics Code) है। कोड में इस बात पर जोर  है कि डॉक्टरों को ब्रांडेड दवाओं की जगह जेनेरिक दवाएं लिखनी चाहिए। डॉक्टर इसके खिलाफ हैं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) ने NMC पर जमकर निशाना साधा है। आईएमए का दावा है कि इससे खराब गुणवत्ता वाली दवाओं को बढ़ावा मिलेगा। यह बहस सिर्फ तकनीकी या आंतरिक नहीं है। इसका असर सभी पर पड़ता है। दवाओं की गुणवत्ता और कीमत तो दैनिक बात है, लेकिन पहले कुछ अन्य बातें भी जरूरी हैं।

1. अचानक विवादास्पद मुद्दा क्यों बन गया?

2002 मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया कोड में उल्लेख है कि डॉक्टरों को ‘जहां तक संभव हो’ जेनेरिक नाम वाली दवाएं लिखनी चाहिए। 2016 में इस वाक्यांश को एक निर्देश से बदल दिया गया था। हकीकत में कुछ भी नहीं बदला। इसे बड़े पैमाने पर नजरअंदाज किया गया। अब यह अचानक एक विवादास्पद विषय क्यों बन गया है? क्या यह उन रिपोर्टों के कारण है कि एनएमसी इस विशेष खंड के आधार पर डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई करेगा? या इसलिए कि संहिता ने दंड सूचीबद्ध किये हैं। साथ ही शिकायतों को तंत्र बनाया है? या फिर ऐसा लग रहा है कि प्रधानमंत्री समेत मौजूदा सरकार इस विषय पर उत्सुक है?

2. जेनरिक दवाएं क्या हैं?

तथ्य:जेनेरिक दवाएं वे होती हैं जिनका उत्पादन तब होता है जब कोई नई दवा (इनोवेटर) अपना पेटेंट खो देता है। इससे उसका एकाधिकार खत्म हो जाता है। इनोवेटर्स की तुलना में जेनेरिक दवाएं काफी सस्ती हैं। भारत में दो प्रकार की जेनेरिक दवाएं हैं। प्राइवेट डॉक्टर जो दवा लिखते हैं उसका बड़ा हिस्सा बड़ी कंपनियों की ‘ब्रांडेड’ जेनेरिक दवाओं का होता है। छोटी कंपनियां जो ‘गैर-ब्रांडेड’ जेनेरिक दवाएं बनाती हैं, उन्हें सार्वजनिक अस्पतालों, सार्वजनिक क्षेत्र की योजनाओं और सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों से थोक में खरीदा जाता है। ये भारत सरकार  प्रवर्तित ‘जन औषधि’ स्टोर्स पर भी उपलब्ध हैं।

3. ब्रांडेड और गैर ब्रांडेड के लिए समान टेस्ट

ब्रांडेड और गैर-ब्रांडेड दोनों जेनरिक दवाओं को लाइसेंस को एक जैसे टेस्ट ‘बायोइक्विवलेंस’ से गुजरना होता है। यह केवल ओरल डोज के प्रकार पर लागू होता है। इसमें सामान्य ह्यूमन वॉलिंटीयर्स पर स्टडी होती है जिसमें आकलन किया जाता है कि दवा अच्छी तरह से अवशोषित हो गई है या नहीं। इसे सभी नए जेनेरिक फॉर्मूलेशन को 2017 से अनिवार्य कर दिया गया है। फॉर्मूलेशन बनाने को आवश्यक साल्ट अक्सर थोक निर्माता उत्पादित करते हैं। इनमें से अब मुख्य रूप से चीनी कंपनियां हैं। कंपनियां इसे खरीदकर टैबलेट में बदलती हैं। फिर इसकी ब्रांडिंग करती हैं। कभी-कभी पूरा उत्पादन बड़ी कंपनियों से छोटी कंपनियों को आउटसोर्स कर दिया जाता है। कंपनी ही इसे बाजार में उतारती है। ऐसे उदाहरण हैं कि प्रतिष्ठित कंपनियां एक ही दवा को दो अलग-अलग ब्रांड नामों से अलग-अलग कीमतों पर बेचती हैं। एक खुदरा ब्रांडेड बाजार को और दूसरा जेनेरिक को।

4. प्रेस्क्रिप्शन पर अनैतिक मार्केटिंग का प्रभाव

भारतीय बाजार अतार्किक दवा कॉम्बिनेशन से भरा पड़ा है। इनका टेस्ट करना और भी कठिन है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों सहित छोटे जेनेरिक और बड़े फार्मा दोनों ही गुणवत्ता विषय पर फंस गए हैं। पूरे भारत में दुकानों से एकत्र किए गए हजारों नमूनों पर तीन राष्ट्रीय औषधि सर्वेक्षणों से पता चला है कि ‘नॉट स्टैंडर्ड वाली’ दवाओं का अनुपात 2004-05 में 7.5% से घटकर 2014-16 में 3% हो गया है। एक सर्वेक्षण में फाइजर और एलेम्बिक, दोनों प्रतिष्ठित कंपनियों के क्रमश: 10% और 3.7% नमूने घटिया थे। प्रेस्क्रिप्शन में सामान्य नाम के उपयोग की सिफारिश नैतिक संहिता में क्यों होनी चाहिए? ऊंची लागत, घटिया और अतार्किक दवाएं मरीजों को नुकसान पहुंचाती हैं। दुनिया भर में प्रेस्क्रिप्शन अनैतिक फार्मा मार्केटिंग से प्रभावित हैं। लागत कम करके पहुंच में सुधार करना भी एक नैतिक प्रतिबद्धता है।

5. डॉक्टरों को आपत्ति क्यों है?

तो फिर डॉक्टरों को इस पर आपत्ति क्यों है? एक तर्क यह है कि यदि कोई मरीज सामान्य नुस्खे के साथ केमिस्ट के पास जाता है तो केमिस्ट ब्रांड तय करता है। डॉक्टर ‘गुणवत्ता’ पर नियंत्रण खो देता है। यह तर्क कई धारणाएं बनाता है कि ब्रांडों के बीच गुणवत्ता में बहुत बड़ा अंतर है। डॉक्टर अपने लिखे ब्रांडों की गुणवत्ता से आश्वस्त हैं। केमिस्ट प्रोत्साहन या रोगी से सस्ते ब्रांड की मांग करने पर घटिया ब्रांड दे देगा। क्या लागत गुणवत्ता से संबंधित है? क्या जेनेरिक दवाएं घटिया हैं क्योंकि वे सस्ती हैं? इससे जुड़े कई सवाल है।

6. कम महंगी दवाओं का असर

2018 में प्रकाशित कर्नाटक की स्टडी में पब्लिक हेल्थ रिसर्चर्स ने चार सामान्य डायबिटिज और हाइ ब्लड प्रेशर दवाओं के ब्रांडेड और जेनेरिक वेरिएंट में कई गुणवत्ता मानकों की तुलना की। परिणामों से स्पष्ट रूप से गुणवत्ता में कोई अंतर नहीं दिखा। भारत में लिवर प्रत्यारोपण के शुरुआती दिनों में इनोवेटर इम्यूनोस्प्रेसिव दवाओं ने इसे रोगियों को बेहद महंगा बना दिया था। जब भारतीय कंपनियों ने अपने उत्पाद लॉन्च किए तो गुणवत्ता का विषय उठाया गया। हालांकि, डॉक्टर्स ब्लड लेवल को लेकर स्टडी अध्ययन कर रहे थे, इसलिए वे आश्वस्त हो गए। ऐसे में प्रोडक्ट्स का जल्द ही व्यापक उपयोग किया जाने लगा। लिवर प्रत्यारोपण अधिक किफायती हो गया है। कैंसर थेरेपी में ‘बायोसिमिलर’, जिसे कुछ परीक्षण चरणों को छोड़ने की अनुमति है, ने पहुंच में काफी सुधार हुआ है। कैंसर, एचआईवी या हेपेटाइटिस सी के लिए काफी कम महंगी दवाओं ने बहुत बड़ा प्रभाव डाला है।

7. दवा के प्रेस्क्रिप्शन को डॉक्टर जवाबदेह

हेल्थकेयर में क्वालिटी और लागत दोनों महत्वपूर्ण हैं। मुनाफाखोरी से बचाने को गुणवत्ता का सहारा लिया जा सकता है। अस्पतालों को केवल महंगी दवाओं का स्टॉक रखने के लिए जाना जाता है क्योंकि वे अधिकतम मार्जिन देते हैं। यदि जेनेरिक दवाएं खराब गुणवत्ता की हैं तो उन्हें सार्वजनिक अस्पतालों और फार्मेसियों से लाखों नागरिकों पर थोपना अनुचित है। यदि ऐसा नहीं है, तो क्या हमें मरीजों को सस्ती दवाओं के विकल्प से वंचित कर देना चाहिए? जब हम सामान्य प्रेस्क्रिप्शन पर सवाल उठाते हैं, तो क्या हम अतार्किक दवाओं और कॉम्बिनेशंस लिखना बंद करने का भी निर्णय ले सकते हैं? एंटीबायोटिक दवाओं का बड़े पैमाने पर उपयोग कम करें जो भारत में प्रतिरोध की जानलेवा महामारी बढ़ा रहा है? दवा की गुणवत्ता का विनियमन मुख्य रूप से सरकार की जिम्मेदारी है। निसंदेह, मरीज हमारा दायित्व है। लेकिन हम तथ्यों को दुष्प्रचार से अलग करके बेहतर न्याय कर सकते हैं। यह स्वीकार करें कि विश्व स्तर पर डॉक्टर दवा के प्रेस्क्रिप्शन को जवाबदेह हैं। इसीलिए हमारे मरीज हम पर भरोसा करते हैं

(लेखक संजय नगराल मुंबई में सर्जन हैं और लेखन से जुड़े हुए हैं.)

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