अनुजा अजजा
क्या होता है SC-ST Act? कब दर्ज होता है केस, यहां जानिए पूरी बातएससी-एसटी एक्ट क्या है. सरकार ने इस कानून को क्यों बनाया. क्या इसके तहत मामला दर्ज होने पर मिल सकती हैं आरोपी व्यक्ति को अग्रिम जमानत मिल सकती है.
नई दिल्ली:
देश में अनुसूचित जाति- अनुसूचित जनजाति के लोगों को जाति के आधार पर होने वाले उत्पीड़न से बचाने के लिए एससी-एसटी एक्ट 1989 बनाया गया था. इस कानून का पूरा नाम अनुसूचित जाति- अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम-1989 है. इस कानून को 30 जनवरी 1990 को जम्मू कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू किया गया था. लेकिन अगस्त 2019 में जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटने के बाद से यह कानून केंद्र शासित जम्मू कश्मीर में भी लागू हो गया. इस कानून में अब तक 2015 और 2018 में दो बड़े संशोधन किए गए हैं. आइए देखते हैं कि क्या है ये कानून, इसके तहत मुकदमा कौन दर्ज करा सकता है. इसमें गिरफ्तारी और सजा के प्रावधान क्या हैं.
कब लगता है एससी-एसटी एक्ट
एससी-एसटी एक्ट अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को जाति के नाम पर सामाजिक, आर्थिक और शारीरिक शोषण से बचाने का प्रावधान करता है. इसका उद्देश्य पीड़ितों को न्याय, मुआवजा और पुनर्वास है. एससी-एसटी एक्ट के तहत कई तरह के अपराध शामिल हैं. साल 2015 में हुए संशोधन के बाद इस कानून में कुल 26 तरह के कृत्यों को अपराध की श्रेणी में डाला गया. इनमें से प्रमुख हैं-
एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य के मुंह में अखाद्य या अप्रिय पदार्थ डालना.
एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य के कब्जे वाले स्थान के प्रवेश द्वार पर या उसके अंदर मल-मूत्र, शव या कोई अन्य घृणित पदार्थ डालना.
एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य को जूतों की माला पहनाना,उन्हें नंगा करके या आधा नंगा करके चलने के लिए मजबूर करना.
एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य का जबरन मुंडन करना या उनकी मूंछें काटना या हटाना, उनकी सहमति के बिना उनके शरीर को अपमानजनक तरीके से रंगना.
एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य से संबंधित या उन्हें आवंटित जमीन पर अवैध कब्जा करना.
एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य के किसी व्यक्ति को शव ढोने या कब्र खोदने के लिए मजबूर करना.
एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य को हाथ से मैला ढोने के काम में लगाने के लिए प्रेरित करना या दूसरों को ऐसा करने की अनुमति देना.
एससी-एसटी वर्ग की महिलाओं को देवदासी या इसी तरह की अन्य भूमिकाओं में काम करने के लिए मजबूर करना.
एससी-एसटी वर्ग के लोगों को डराना-धमकाना या उन पर किसी विशेष तरीके से मतदान करने या न करने का दबाव डालना, या उन्हें उम्मीदवार के रूप में अपना नामांकन दाखिल करने से रोकना या उसे वापस लेना.
एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य को मंदिर, अस्पताल और स्कूल जैसी सार्वजनिक जगहों तक पहुंचने या वहां से गुजरने के अधिकार से वंचित करना.
एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य को सार्वजनिक तौर पर लोगों के सामने कोई भी कारण बताकर अपमानित करना.
एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य की पवित्र वस्तुओं का अपमान करना.
एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य के खिलाफ यौन प्रकृति के शब्दों, कृत्यों या इशारों का प्रयोग करना.
कैसे दर्ज कराएं शिकायत
एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य को अगर लगता है कि उसके साथ उसकी जाति के आधार पर भेदभाव, अपमान, हिंसा या अत्याचार किया जा रहा है, तो वह पुलिस में शिकायत दर्ज करा सकता है.इस कानून के तहत एससी-एसटी वर्ग का कोई व्यक्ति एससी-एसटी वर्ग के किसी व्यक्ति के खिलाफ शिकायत दर्ज नहीं करा सकता है. इस कानून में एफआईआर दर्ज होने के बाद आरोपी की गिरफ्तारी का प्रावधान है. इसका मकसद पीड़ित की सुरक्षा है. कई बार अदालतों ने यह साफ किया है कि अगर कोई व्यक्ति एसटी-एसटी वर्ग के व्यक्ति की जाति का नाम लेता है या अकेले में उसकी बात करता है, तो वह अपराध नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इसमें दोष सिद्धि के लिए अपमान करने की मंशा का साबित होना जरूरी है.
Latest and Breaking News on NDTV
एससी-एसटी के तहत दर्ज होने वाले मामलों में तेजी से सुनवाई के लिए जिला स्तर पर विशेष अदालतें बनाई गई हैं, ताकि इन मामलों का जल्द से जल्द निपटारा हो सके. इस कानून के तहत दोषी पाए जाने पर छह माह से लेकर उम्रकैद तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है. संज्ञेय श्रेणी का मामला होने की वजह से इस कानून के तहत दर्ज मामलों में अदालत से बाहर समझौते का कोई प्रावधान नहीं है.
आपके लिए और..
यमन की जेल पर हवाई हमले के बाद भड़की जंग, मलबे से अब भी निकल रहे शव; सऊदी ने किए 32 स्ट्राइक
‘मजिस्ट्रेट की हिम्मत कैसे हुई… ‘ जंतर-मंतर मामले को लेकर छात्र को नोटिस जारी होने पर गुस्साये CJI सूर्यकांत
किन लोगों को राशन कार्ड करना होगा सरेंडर, सरकार ने सख्त किये नियम, 5 साल में ढाई करोड़ कार्ड बंद
एससी-एसटी एक्ट में जमानत
किसी व्यक्ति के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट में मुकदमें को संज्ञेय अपराध माना जाता है. इस मामले में पहले अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं था, लेकिन संशोधन बाद यह फैसला किया गया कि मजिस्ट्रेट के विचारोपरांत मुकदमे में जमानत दी जा सकती है. इन मामलों में पुलिस किसी को गिरफ्तार करती है, तो गिरफ्तारी के दो महीने में उसे आरोपपत्र देना होगा . इस कानून में मुकदमों की संख्या बढ़ने और इसके दुरुपयोग के मामले सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस कानून में अंकित मुकदमे की जांच डिप्टी एसपी रैंक के अधिकारी करेंगे. मुकदमा होने पर आरोपित को अग्रिम जमानत दी जा सकती है. लेकिन जमानत देना या न देना मजिस्ट्रेट के विवेक पर निर्भर होगा. सरकारी अधिकारी-कर्मचारी पर एसी-एसटी एक्ट में मुकदमा होने पर आरोपित की गिरफ्तारी उसके विभाग की अनुमति बिना नहीं होगी. किसी साधारण व्यक्ति पर एससी एसटी एक्ट का मुकदमा होता है, तो उसे अरेस्ट करने को पुलिस को पहले एसपी से पूछना होगा. कुछ इसी तरह के आदेश सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में महाराष्ट्र के एक मुकदमे की सुनवाई में दिए थे.
इसके बाद सरकार ने अगस्त 2018 में कानून में संशोधन किया जिससे आरोपित की गिरफ्तारी को जांच अधिकारी को किसी अथॉरिटी की मंजूरी लेने की जरूरत नहीं रह गई. इस कानून में एफआईआर को शुरुआती जांच की जरूरत नहीं होती है. इसके साथ ही इस कानून में आरोपित की अग्रिम जमानत की व्यवस्था भी खत्म कर दी गई.
क्या करें अगर एससी एसटी एक्ट में झूठा मुकदमा हो जाए?
अगर किसी को एससी एसटी एक्ट केस में झूठा फंसाया जा रहा है तो वह ऐसे बच सकता है.
अपने समर्थन में गवाहों के बयान, सीसीटीवी फुटेज, कॉल रिकॉर्ड जैसे प्रमाण इकट्ठा करें, जिससे यह सिद्ध हो सके कि आपने कुछ नहीं किया है.
पुलिस की जांच में सहयोग करें.पुलिस जांच में सही जानकारी और प्रमाण दें.
अगर आपको लगता है कि आपके खिलाफ कराई गई शिकायत झूठी है तो आप अदालत में याचिका दायर कर एफआईआर निरस्त करने की मांग कर सकते हैं.
अगर निचली अदालत में जमानत नहीं मिलती है तो उच्च अदालत का रुख करें.
इस कानून में झूठा मुकदमा कराने पर किसी सजा का प्रावधान नहीं हैं. लेकिन पीड़ित भारतीय न्याय संहिता की धाराओं का उपयोग कर झूठा मुकदमा कराने वाले व्यक्ति के खिलाफ अदालत की शरण ले सकता है.
मुकदमा कराने वाले को सरकार कितनी क्षतिपूर्ति देती है
पीड़ित व्यक्तियों को सरकार आर्थिक क्षतिपूर्ति भी देती है. जैसे उत्तर प्रदेश सरकार 85 हजार से सवा आठ लाख रुपये तक क्षतिपूर्ति देती है. क्षतिपूर्ति की राशि अपराध के अलग-अलग प्रकार में अलग-अलग होती है. यह क्षतिपूर्ति सरकार मुकदमें के अलग-अलग चरणों में देती है. मुकदमा होने के बाद पुलिस जांच कर आर्थिक सहायता का प्रस्ताव संबंधित जिले के जिला समाज कल्याण अधिकारी को देती है. क्षतिपूर्ति का वितरण जिला समाज कल्याण अधिकारी से ही होता है.
SC/ST (अत्याचार निवारण) संशोधन कानून 2018: SC निर्णय
चर्चा में क्यों ?
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन कानून (SC/ST Atrocities Amendment Act), 2018 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर निर्णय देते हुए इसकी संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है।
प्रमुख बिंदु:
सर्वोच्च न्यायालय ने 20 मार्च 2018 के अपने पूर्ववर्ती निर्णय पलटते हुए स्पष्ट किया कि इस कानून में गिरफ्तारी पूर्व प्राथमिक जाँच की ज़रूरत नहीं है।
साथ ही इस तरह के मामलों में गिरफ्तारी से पूर्व किसी अथॉरिटी से अनुमति लेना भी अनिवार्य नहीं है।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि अपने विरुद्ध FIR निरस्त कराने को आरोपित व्यक्ति न्यायालय की शरण में जा सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार यदि प्रथम दृष्टया एससी/एसटी अधिनियम में कोई मामला नहीं बनता है तो कोई भी न्यायालय FIR को रद्द किया जा सकता है।
अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिये तमाम सामाजिक आर्थिक बदलावों के बावजूद सिविल अधिकार कानून 1955 व भारतीय दंड संहिता 1860 के प्रावधान इस वर्ग के लोगों की समस्याओं को सही तरीके से संबोधित नहीं कर पा रहे थे, ऐसी परिस्थिति में संसद ने वर्ष 1989 में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 पारित किया।
राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षर किये जाने के बाद 30 जनवरी 1990 को यह कानून जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू कर दिया गया।
प्रावधान
यदि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के अतिरिक्त कोई व्यक्ति किसी भी तरह से किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति वर्ग से संबंध रखने वाले किसी व्यक्ति को प्रताड़ित करता है, तो उसके विरुद्ध यह कानून कार्य करता है।
इसके अलावा यह कानून पीड़ितों को विशेष सुरक्षा देता है। इस कानून में पीड़ित को अलग-अलग अपराध से पीड़ित होने पर 75,000 रुपए से लेकर 8 लाख 50 हजार रुपए तक की सहायता दी जाती है।
साथ ही ऐसे मामलों को इस कानून में विशेष न्यायालय बनाए जाते हैं जो ऐसे प्रकरण में तुरंत निर्णय लेते हैं।
इस कानून में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में पीड़ित को राहत राशि और अलग से मेडिकल जाँच की भी व्यवस्था है।
सर्वोच्च न्यायालय का पूर्ववर्ती निर्णय
सर्वोच्च न्यायालय ने 20 मार्च 2018 को सुभाष काशीनाथ बनाम महाराष्ट्र राज्य के वाद में निर्णय देते हुए यह प्रावधान किया कि-
एससी/एसटी कानून के मामलों की जाँच कम से कम डिप्टी एसपी रैंक के अधिकारी करेंगें। पहले यह कार्य इंस्पेक्टर रैंक अधिकारी करता था।
यदि किसी सामान्य जन पर एससी-एसटी कानून में केस होता है, तो उसकी भी गिरफ्तारी तुरंत नहीं होगी बल्कि इसको जिले के SP या SSP से अनुमति लेनी होगी।
किसी व्यक्ति पर केस होने के बाद उसे अग्रिम जमानत भी दी जा सकती है।
अग्रिम जमानत देने या न देने का अधिकार दंडाधिकारी के पास होगा। अभी तक अग्रिम जमानत नहीं मिलती थी तथा जमानत भी उच्च न्यायालय से होती थी।
किसी भी सरकारी कर्मचारी/अधिकारी पर केस होने पर उसकी गिरफ्तारी तुरंत नहीं होगी, बल्कि उस सरकारी अधिकारी के विभाग से गिरफ्तारी को अनुमति लेनी होगी।
न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि जाँच पूर्ण रूप से समयबद्ध होनी चाहिये। जाँच किसी भी सूरत में 7 दिन से अधिक समय तक न चले। इन नियमों का पालन न करने की स्थिति में पुलिस पर अनुशासनात्मक एवं न्यायालय की अवमानना करने के संदर्भ में कार्यवाई होगी।
उत्पीड़न के ज़्यादातर मामले झूठे हैं
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़ों के संबंध में विचार करने पर ज्ञात होता है कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम में दर्ज ज़्यादातर मामले झूठे पाए गए।
न्यायालय ने अपने फैसले में ऐसे कुछ मामले शामिल किये हैं जिसके अनुसार 2016 की पुलिस जाँच में अनुसूचित जाति को प्रताड़ित किये जाने के 5347 झूठे मामले सामने आए, जबकि अनुसूचित जनजाति के कुल 912 मामले झूठे पाए गए।
वर्ष 2015 में एससी-एसटी कानून में न्यायालय ने 15638 मुकदमों का निपटारा किया। इसमें से 11024 मामलों में या तो अभियुक्त छोड़ दिये गये या फिर वे आरोप मुक्त हुए। जबकि 495 मुकदमें वापस ले लिये गये।
केंद्र सरकार के किये गए संशोधन
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध केंद्र सरकार ने एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) संशोधन कानून 2018 पारित करते हुए अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 के मूल प्रावधान फिर से लागू कर दिये, जो इस प्रकार हैं –
एससी/एसटी संशोधन विधेयक 2018 के जरिये मूल कानून में धारा 18A जोड़ी गई, इसके अंतर्गत पुराना कानून यथावत कर दिया गया।
नए प्रावधानों के अनुसार, अब इस तरह के मामले में केस होते ही गिरफ्तारी होगी। इसके अतिरिक्त आरोपित को अग्रिम जमानत भी न देने की व्यवस्था की गई।
आरोपित को उच्च न्यायालय से ही नियमित जमानत मिल सकेगी। अब पूर्व की भाँति मामले की जाँच इंस्पेक्टर रैंक के पुलिस अधिकारी करेंगें।
जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल संबंधी शिकायत पर तुरंत मामला दर्ज होगा।
एससी/एसटी मामलों की सुनवाई सिर्फ स्पेशल कोर्ट में होगी।
सरकारी कर्मचारी/अधिकारी के विरुद्ध न्यायालय में चार्जशीट दायर करने से पहले जाँच एजेंसी को अथॉरिटी से अनुमति लेने की अनिवार्यता नहीं होगी।
आगे की राह:
लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार हैं और कानून के समक्ष भी सभी को समान माना गया है। ऐसे में किसी भी नागरिक के अधिकारों का हनन अनुचित है फिर चाहे वह सवर्ण हो या दलित। न्यायालय का निर्णय भी इसी तर्क की पुष्टि करता है।
यह शासनतंत्र की ज़िम्मेदारी है कि वह पिछड़े समुदायों और दलितों के संरक्षण हेतु बनाए गए कानूनों का ईमानदारीपूर्वक और भेदभाव रहित दृष्टिकोण अपनाकर अनुपालन सुनिश्चित करे, जिससे इन वर्गों में उत्पन्न असुरक्षा और उत्पीड़न का डर समाप्त हो सके एवं इनका शासनतंत्र और न्याय प्रणाली में विश्वास बना रहे।
स्रोत: द हिंदू
SC/ST Act अत्याचार निवारण अधिनियम 1985 से संबंधित प्रावधान
भारत के पार्लियामेंट ने इस अधिनियम में अत्याचार निवारण से संबंधित प्रावधान किये हैं- अत्याचार के अपराधों के लिए दंड-1
[ (1) कोई भी व्यक्ति, जो अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं है-
(क) अनुसूचति जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य के मुख में कोई अखाद्य या घृणाजनक पदार्थ रखता है या ऐसे सदस्य को ऐसे अखाद्य या घृणाजनक पदार्थ पीने या खाने क मजबूर करेगा;
(ख) अनूसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य के दखलकृत परिसरों में या परिसरों के प्रवेश द्वार पर मल-मूत्र, मल, पशु-शव या कोई अन्य घृणास्पद पदार्थ इकट्ठा करेगा;
(ग) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य की क्षति, अपमानित करने या क्षुब्ध करने को उसके पड़ोस में मल-मूत्र, कूड़ा, पशु-शव या कोई अन्य घृणाजनक पदार्थ इकट्ठा करेगा;
(घ) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को जूतों की माला पहनाएगा या नग्न या अर्धनग्न घुमाएगा;
(ङ) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य पर बलपूर्वक ऐसा कोई कार्य करेगा जैसे व्यक्ति के कपड़े उतारना, बलपूर्वक सिर का मुण्डन करना, मूँछे हटाना, चेहरे या शरीर को पोतना या ऐसा कोई अन्य कार्य करना, जो मानव गरिमा के विरुद्ध है;
(च) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य के स्वामित्वाधीन या उसके कब्जे में या उसको आवंटित या किसी सक्षम अधिकारी से उसको आवंटित करने को अधिसूचित किसी भूमि को सदोष अधिभोग में लेगा या उस पर खेती करेगा या ऐसी भूमि को अन्तरित करा लेगा;
(छ) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य को उसकी भूमि या परिसरों से सदोष छीनेगा या किसी भूमि या परिसरों या जल या सिंचाई सुविधाओं पर वन अधिकारों सहित उसके अधिकारों के उपभोग में हस्तक्षेप करेगा या उसकी फसल नष्ट करेगा या उसके उत्पाद को ले जायेगा;
स्पष्टीकरण-खण्ड (च) और इस खण्ड के प्रयोजनों के लिए, “सदोष” पद में:- निम्नलिखित सम्मिलित हैं (अ) व्यक्ति की इच्छा विरुद्धः (आ) व्यक्ति की सहमति के बिना; (3) व्यक्ति की सहमति से, जहाँ ऐसी सहमति, व्यक्ति या किसी ऐसे अन्य व्यक्ति को, जिसके व्यक्ति हितबद्ध है, मृत्यु या उपहति का भय दिखाकर, अभिप्राप्त की गई है; या (ई) ऐसी भूमि के अभिलेखों को बनाना; (ज) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को ‘बेगार’ करने को या सरकार से लोक प्रयोजनों को अधिरोपित किसी अनिवार्य सेवा से भिन्न अन्य प्रकार के बलात्श्रम या बंधुआ श्रम करने को तैयार करेगा;
(झ) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को मानव या पशु-शवों की अंत्येष्टि या ले जाने या कब्र खोदने को विवश करेगा;
(ञ) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य को हाथ से सफाई करने को तैयार करेगा या ऐसे प्रयोजन को ऐसे सदस्य का नियोजन करेगा या नियोजन को अनुज्ञात करेगा; (ट) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति की स्त्री को, किसी देवदासी के रूप में पूजा, मंदिर या किसी अन्य धार्मिक संस्थान को देवी, मूर्ति या पात्र के समर्पण को या वैसी ही किसी अन्य प्रथा को निष्पादित या संवर्धन करेगा या पूर्वोक्त कार्यों को अनुज्ञात करेगा;
(ठ) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजातीय सदस्य को, निम्नलिखित को मजबूर या अभित्रस्त या निवारित करेगा:-
(अ) मतदान न करने या किसी विशिष्ट अभ्यर्थी को मतदान करने या विधि उपबन्धित से भिन्न रीति से मतदान करने,
(आ) किसी अभ्यर्थी के रूप में नामनिर्देशन फाइल न करने या ऐसे नामनिर्देशन को प्रत्याहत करने; या
(इ) किसी निर्वाचन में अभ्यर्थी के रूप में अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य के नामनिर्देशन का प्रस्ताव या समर्थन नहीं करेंगे;
(ड) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी ऐसे को, जो संविधान के भाग 9 के अधीन पंचायत या संविधान के भाग 9 क के अधीन नगरपालिका का सदस्य या अध्यक्ष या किसी अन्य पद का धारक है, उसके सामान्य कर्तव्यों या कृत्यों के पालन में मजबूर या अभित्रस्त या बाधित करेगा;
(ढ) मतदान पश्चात्, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को उपहति या घोर उपहति या हमला करेगा या सामाजिक या आर्थिक बहिष्कार अधिरोपित करेगा या अधिरोपित करने की धमकी देगा या किसी ऐसी लोक सेवा के उपलब्ध फायदों से, निवारित करेगा, जो उसको प्राप्त हैं;
(ण) किसी विशिष्ट अभ्यर्थी को मतदान करने या उसको मतदान नहीं करने या विधि उपबन्धित रीति से मतदान करने को अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य के विरुद्ध इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध करेगा; (त) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य के विरुद्ध मिथ्या, द्वेषपूर्ण या तंग करने वाला वाद या दाण्डिक या अन्य विधिक कार्यवाहियाँ संस्थित करेगा;
(घ) किसी लोक सेवक को कोई मिथ्या या तुच्छ सूचना देगा जिससे ऐसा लोक सेवक अपनी विधिपूर्ण शक्ति का प्रयोग अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को क्षति करने या क्षुब्ध करने के लिए करेगा;
(द) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को अवमानित करने का आशय करेगा; लोक दृष्टि में आने वाले किसी स्थान पर अपमानित या अभित्रस्त
(ध) लोक दृष्टि में आने वाले किसी स्थान पर जाति के नाम से अनुसूचित अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को गाली जाति से गलौज करेगा;
(न) अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के सामान्यतया धार्मिक मानी जाने वाली या अति श्रद्धा से ज्ञात किसी वस्तु नष्ट करेगा, हानि पहुँचाएगा या अपवित्र करेगा;
स्पष्टीकरण- इस खण्ड के प्रयोजनों को “वस्तु” पद से अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत मूर्ति, फोटो और रंगचित्र है;
(प) अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के विरुद्ध शत्रुता, घृणा या वैमनस्य की भावनाओं की या तो लिखित या मौखिक शब्दों या चिह्नों से या दृश्य रूपण से या अन्यथा, अभिवृद्धि करेगा या अभिवृद्धि करने का प्रयत्न करेगा;
(फ) अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के अति श्रद्धेय किसी दिवंगत व्यक्ति का या तो लिखित या मौखिक शब्दों से या किसी अन्य साधन से अनादर करेगा; Tags SC/ST ActSupreme CourtSC/ST Community

