इंदिरा गांधी ने बनाया था सबसे कठोर स्वर्ण नियंत्रण कानून

इंदिरा गांधी से जुड़ी “सोना न खरीदने की अपील” वाली खबर हाल ही में काफी चर्चा में रही है, लेकिन इसके पीछे की सच्चाई थोड़ी अलग है। ​संक्षेप में कहें तो, सोशल मीडिया पर जो 6 जून 1967 की ‘द हिंदू’ (The Hindu) अखबार की कटिंग वायरल हो रही है, वह पूरी तरह से फर्जी (Fake) है। खुद ‘द हिंदू’ ने स्पष्ट किया है कि उनके आर्काइव्स में ऐसा कोई पेज नहीं है और उस वायरल इमेज को डिजिटल रूप से एडिट किया गया है। ​वायरल दावे और असलियत का तुलनात्मक विवरण

 

 

 

इंदिरा गांधी द्वारा लागू किया गया गोल्ड कंट्रोल एक्ट, 1968 स्वतंत्र भारत के सबसे सख्त आर्थिक कानूनों में से एक था। इसे भारत के तत्कालीन वित्त मंत्री (जो बाद में प्रधानमंत्री बने) मोरारजी देसाई के विचारों के आधार पर इंदिरा गांधी की सरकार ने औपचारिक रूप दिया था।
​यहाँ इस कानून के मुख्य प्रावधान और उनके प्रभावों का विश्लेषण दिया गया है:
​1. कानून के मुख्य प्रावधान (Key Provisions)
​सोने के बिस्कुट और सिक्कों पर प्रतिबंध: आम नागरिकों के लिए सोने के शुद्ध रूप (बिस्कुट, बार या सिक्के) को रखना पूरी तरह से गैरकानूनी घोषित कर दिया गया।
​आभूषणों की शुद्धता पर सीमा: उस समय नियम बनाया गया कि ज्वेलर्स 14 कैरेट से अधिक शुद्धता वाले सोने के गहने नहीं बना सकते थे (हालांकि बाद में भारी विरोध के कारण इसे वापस ले लिया गया)।
​घोषित सीमा (Declaration Limit): एक व्यक्ति या परिवार कितना सोना (गहनों के रूप में) रख सकता है, इसकी एक सीमा तय कर दी गई। उससे अधिक सोना होने पर सरकार को जानकारी देना अनिवार्य था।
​लाइसेंसिंग: केवल लाइसेंस प्राप्त ज्वेलर्स ही सोने का व्यापार कर सकते थे। उनके स्टॉक की कड़ी निगरानी की जाती थी।
​2. इस कानून के पीछे का उद्देश्य
​सरकार का मानना था कि भारतीयों का सोने के प्रति गहरा लगाव देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचा रहा है।
​विदेशी मुद्रा की बचत: भारत को सोना बाहर से आयात करना पड़ता था, जिससे कीमती विदेशी मुद्रा खर्च होती थी।
​तस्करी पर लगाम: सोने की भारी मांग के कारण अवैध स्मगलिंग बढ़ रही थी, जिसे सरकार रोकना चाहती थी।
​3. भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
​इस कानून के परिणाम सरकार की उम्मीदों के बिल्कुल विपरीत रहे:
​ज्वेलरी उद्योग का पतन: हजारों पारंपरिक सुनार और कारीगर बेरोजगार हो गए क्योंकि वे केवल 14 कैरेट सोने के साथ काम करने के अभ्यस्त नहीं थे।
​कालाबाजारी और तस्करी में वृद्धि: कानून ने सोने की मांग कम नहीं की, बल्कि उसे ‘अंडरग्राउंड’ कर दिया। तस्करी और बढ़ गई क्योंकि लोग अवैध रूप से 22-24 कैरेट का सोना खरीदने लगे।
​भ्रष्टाचार: ‘इंस्पेक्टर राज’ को बढ़ावा मिला। आबकारी (Excise) अधिकारी घरों और दुकानों पर छापेमारी करने लगे, जिससे आम जनता और व्यापारियों में डर का माहौल बना।
​सामाजिक प्रभाव: भारतीय परंपराओं (जैसे शादी-ब्याह) में सोने का महत्व कम नहीं हुआ, बल्कि लोगों ने कानून से बचने के लिए इसे छिपाकर रखना शुरू कर दिया।
​4. कानून का अंत
​22 साल तक प्रभावी रहने के बाद, 1990 में तत्कालीन वित्त मंत्री मधु दंडवते ने इसे निरस्त कर दिया। उन्होंने स्वीकार किया कि यह कानून अपने उद्देश्यों में पूरी तरह विफल रहा और इसने केवल भ्रष्टाचार और तस्करी को बढ़ावा दिया। इसके बाद ही भारत में सोने का बाजार फिर से खुला और आधुनिक ज्वेलरी ब्रांड्स की शुरुआत हुई।

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