भारत में हिंदू विरोधी इतिहास लेखन हुआ? क्यों और कैसे?
भारत में हिंदू विरोधी इतिहास लेखन में कितनी सच्चाई है?
भारत में हिंदू विरोधी इतिहास लेखन का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसे केवल इतिहासकारों के वैचारिक मतभेद के रूप में नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत पहचान, शिक्षा व्यवस्था, राजनीतिक दृष्टिकोण और ऐतिहासिक स्मृति के संदर्भ में भी देखना चाहिए।
इस प्रश्न का संतुलित उत्तर देने के लिए सबसे पहले तीन बातों को अलग-अलग समझना आवश्यक है:
* हिंदू समाज और सभ्यता के विरुद्ध पूर्वाग्रहपूर्ण इतिहास लेखन — जिसमें तथ्यों का चयनात्मक उपयोग, कुछ घटनाओं को दबाना या ऐतिहासिक पात्रों का असमान मूल्यांकन शामिल हो सकता है।
* वामपंथी अथवा मार्क्सवादी इतिहास लेखन — जिसमें वर्ग, आर्थिक संरचना, सत्ता और सामाजिक संघर्ष को इतिहास की व्याख्या का प्रमुख आधार बनाया गया।
* राष्ट्रवादी इतिहास लेखन — जिसमें भारतीय सभ्यता की निरंतरता, सांस्कृतिक उपलब्धियों और विदेशी आक्रमणों के प्रतिरोध को विशेष महत्व दिया गया।
ये तीनों एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं। किसी इतिहासकार का मार्क्सवादी या धर्मनिरपेक्ष होना अपने आप में हिंदू विरोधी होने का प्रमाण नहीं है। इसी प्रकार राष्ट्रवादी इतिहास लेखन में भी तथ्यात्मक त्रुटियों और अतिशयोक्ति की जाँच जरूरी है।
मेरा सुझाव है कि इस विषय की पड़ताल आरोपों से नहीं, बल्कि इतिहास की पाठ्यपुस्तकों, मूल दस्तावेजों, पुरातात्विक प्रमाणों और इतिहासकारों के लेखन की तुलना से की जाए।
### 1\. इतिहास लेखन में पूर्वाग्रह की शुरुआत कहाँ से हुई?
इसकी जड़ें ब्रिटिश औपनिवेशिक इतिहास लेखन तक जाती हैं।
जेम्स मिल (James Mill) ने 1817 में अपनी पुस्तक The History of British India प्रकाशित की। उन्होंने भारतीय इतिहास को मोटे तौर पर तीन कालखंडों में बाँटने वाली दृष्टि को लोकप्रिय बनाया:
* हिन्दू काल
* मुस्लिम काल
* ब्रिटिश काल
इस विभाजन की समस्या यह थी कि इसने भारतीय इतिहास को धार्मिक पहचान के आधार पर देखने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया। भारत के क्षेत्रीय राज्यों, जनजातीय समाजों, व्यापार, विज्ञान, दर्शन, साहित्य और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की जटिलता इसके सामने गौण हो सकती थी।
इतिहासकार ज्ञानेंद्र पांडे ने भी औपनिवेशिक शासन के दौरान हिन्दू-मुस्लिम संघर्षों की ऐतिहासिक व्याख्या और उसके राजनीतिक संदर्भ का अध्ययन किया है। Oxford Academic +1
### स्वतंत्रता के बाद क्या हुआ?
1947 के बाद भारतीय इतिहास लेखन में मुख्यतः तीन धाराएँ उभरीं:
| इतिहास लेखन की धारा | प्रमुख विशेषता |
| ———————— | —————————————————— |
| धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी | राष्ट्रीय एकता और साझा विरासत |
| मार्क्सवादी | वर्ग, आर्थिक संबंध, सामंतवाद और सामाजिक संरचना |
| सांस्कृतिक राष्ट्रवादी | भारतीय सभ्यता, धार्मिक परंपराएँ और सांस्कृतिक निरंतरता |
ऑक्सफोर्ड के इतिहास लेखन संबंधी अध्ययन में भी स्वतंत्रता के बाद इन तीन प्रमुख प्रवृत्तियों की पहचान की गई है। Oxford Academic
विवाद इस बात पर है कि क्या किसी एक वैचारिक धारा का प्रभाव विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और पाठ्यपुस्तकों पर इतना अधिक हो गया कि दूसरे दृष्टिकोणों को पर्याप्त स्थान नहीं मिला।
इसकी जाँच संस्थानों, नियुक्तियों, पाठ्यक्रमों और प्रकाशित शोध के आधार पर होनी चाहिए, केवल राजनीतिक आरोपों के आधार पर नहीं।
### 2\. किन ऐतिहासिक विषयों पर हिंदू विरोधी इतिहास लेखन के आरोप लगते हैं?
यहाँ कुछ प्रमुख उदाहरण हैं। इनके साथ उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाण और विवाद भी देखना जरूरी है।
### (क) प्राचीन भारतीय सभ्यता और वैदिक इतिहास
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प्रमुख विवाद:
* क्या भारतीय सभ्यता की निरंतरता को इतिहास में पर्याप्त महत्व मिला?
* क्या वैदिक सभ्यता और सिंधु-सरस्वती सभ्यता के संबंधों का निष्पक्ष अध्ययन हुआ?
* क्या भारतीय ज्ञान-विज्ञान, गणित, खगोलशास्त्र, चिकित्सा और दर्शन की उपलब्धियों को पर्याप्त महत्व दिया गया?
आर्य आगमन और प्रवासन का प्रश्न
औपनिवेशिक काल में आर्य आक्रमण की अवधारणा को जिस रूप में प्रस्तुत किया गया, उसमें कई समस्याएँ थीं। लेकिन आधुनिक आनुवंशिक और भाषाई शोध के आधार पर आर्य प्रवासन के प्रश्न को पूरी तरह खारिज करना भी उचित नहीं है।
आर्य भाषा-परंपरा, जनसंख्या के प्रवासन और वैदिक संस्कृति के विकास को एक ही घटना मान लेना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।
इस विषय में पुरातत्व, भाषाविज्ञान, आनुवंशिकी और वैदिक साहित्य के प्रमाणों का संयुक्त अध्ययन जरूरी है।
### (ख) मध्यकालीन भारत और मुस्लिम शासकों का इतिहास
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यह विवाद का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
कुछ इतिहास लेखन में निम्नलिखित प्रश्नों पर आलोचना हुई है:
* मंदिरों के विध्वंस और लूट की घटनाओं का पर्याप्त उल्लेख क्यों नहीं हुआ?
* महमूद गजनवी के सोमनाथ आक्रमण का धार्मिक और आर्थिक पक्ष किस तरह प्रस्तुत किया गया?
* औरंगजेब की धार्मिक नीतियों का मूल्यांकन किस आधार पर हुआ?
* जजिया और गैर-मुस्लिमों पर लगाए गए प्रतिबंधों को कितनी जगह मिली?
* अकबर, औरंगजेब और अन्य मुगल शासकों का मूल्यांकन क्या समान ऐतिहासिक कसौटियों पर किया गया?
इन प्रश्नों को केवल साम्प्रदायिक विवाद बताकर खारिज नहीं किया जा सकता।
मंदिर विध्वंस के मामले में प्रमाण मौजूद हैं। कुछ मुस्लिम शासकों ने मंदिरों को नष्ट किया, लूटा या उनका धार्मिक-राजनीतिक महत्व समाप्त करने का प्रयास किया। इसे इतिहास से हटाना उचित नहीं होगा।
लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है।
इतिहासकार रिचर्ड एम. ईटन ने मंदिर विध्वंस की घटनाओं का अध्ययन करते हुए बताया है कि कुछ मंदिर राजनीतिक विजय, प्रतिद्वंद्वी राजा की सत्ता और राजकीय वैधता को चुनौती देने के लिए भी निशाना बनाए गए थे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हिन्दू शासकों के बीच भी प्रतिद्वंद्वी राज्यों के राजकीय मंदिरों पर हमलों के उदाहरण मिलते हैं।
उनका अध्ययन मंदिर विध्वंस को नकारता नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक और धार्मिक संदर्भों को अलग-अलग समझने की कोशिश करता है। Scroll.in +2
इस दृष्टिकोण की अकादमिक आलोचना भी हुई है। इतिहासकार बाबुल रॉय ने 2023 में ईटन की व्याख्या की पद्धति और उसके निष्कर्षों पर सवाल उठाए। Babul Roy, 2023
इसलिए न तो हर मंदिर विध्वंस को केवल राजनीतिक घटना कहना उचित है, न हर घटना को एक ही धार्मिक उद्देश्य से जोड़ना।
### (ग) जाति व्यवस्था और हिन्दू समाज का चित्रण

यह एक ऐसा उदाहरण है जिसमें सामाजिक और राजनीतिक व्याख्या के कारण ऐतिहासिक बहस लंबे समय तक चलती रही।
मालाबार में मोपला विद्रोह के पीछे कई कारण थे:
* ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध खिलाफत आंदोलन।
* किसानों और जमींदारों के बीच भूमि संबंधी संघर्ष।
* धार्मिक नेतृत्व और सामुदायिक लामबंदी।
* विद्रोह के दौरान हिन्दुओं की हत्याएँ, लूट, जबरन धर्मांतरण और विस्थापन की घटनाएँ।
कुछ इतिहास लेखन में इसे मुख्यतः किसान विद्रोह और औपनिवेशिक विरोध के रूप में प्रस्तुत किया गया। दूसरी ओर, हिन्दू पीड़ितों के अनुभवों और धार्मिक हिंसा को सामने रखने वाले विवरण भी हैं।
दोनों पहलुओं को शामिल किए बिना इसका इतिहास अधूरा रहेगा।
### (ग) 1946 का डायरेक्ट एक्शन डे और 1947 का विभाजन

16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग के डायरेक्ट एक्शन डे के आह्वान के बाद कलकत्ता में भीषण साम्प्रदायिक हिंसा हुई।
इसके बाद नोआखाली में हिन्दुओं पर हमले, हत्याएँ, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा, जबरन धर्मांतरण और पलायन की घटनाएँ हुईं।
विभाजन के समय पंजाब, बंगाल और अन्य क्षेत्रों में हिन्दुओं, मुसलमानों और सिखों के विरुद्ध बड़े पैमाने पर हिंसा हुई।
यहाँ एक गंभीर ऐतिहासिक प्रश्न है: क्या राष्ट्रीय एकता और धर्मनिरपेक्षता की छवि बनाए रखने के लिए हिन्दू-सिख पीड़ितों के अनुभवों को पर्याप्त स्थान नहीं दिया गया?
इस प्रश्न पर शोध उपलब्ध है। सिल्वी गिशार्द (Sylvie Guichard) ने 2013 के अपने शोधपत्र The Indian Nation and Selective Amnesia में स्वतंत्रता के बाद की भारतीय इतिहास पुस्तकों का तुलनात्मक अध्ययन किया। उनका निष्कर्ष था कि राष्ट्रीय एकता की कल्पना के अनुरूप कुछ आंतरिक संघर्षों और हिंसा के विवरण को दबाया या कम करके प्रस्तुत किया गया। Wiley Online Library +1
इसका अर्थ यह नहीं कि केवल हिन्दू पीड़ितों की घटनाएँ दबाई गईं। विभाजन में मुस्लिम पीड़ितों की हिंसा और विस्थापन की घटनाएँ भी कई राष्ट्रीय आख्यानों में अपर्याप्त रूप से दर्ज हुईं।
### (घ) हैदराबाद का 1948 का पुलिस एक्शन

यहाँ इतिहास लेखन का एक दूसरा पहलू भी सामने आता है।
हैदराबाद रियासत के भारत में विलय के बाद पुलिस एक्शन के दौरान और उसके बाद मुसलमानों के विरुद्ध हिंसा हुई। सुन्दर लाल समिति की रिपोर्ट में भी इन घटनाओं की जाँच की गई थी।
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के इतिहासकार सुनील पुरुषोत्तम ने 2015 के शोधपत्र Internal Violence: The Police Action in Hyderabad में बताया कि इस हिंसा और उसके प्रभावों को ऐतिहासिक अभिलेखों तथा सार्वजनिक स्मृति में पर्याप्त स्थान नहीं मिला। Cambridge Core
इस उदाहरण से स्पष्ट है कि इतिहास में चयनात्मक स्मृति केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं रही।
### 2\. क्या इतिहासकारों ने जानबूझकर ऐसा किया?
इसका उत्तर सभी इतिहासकारों के लिए एक जैसा नहीं दिया जा सकता।
कुछ संभावित कारण रहे हैं:
* नेहरूवादी राष्ट्र निर्माण: आजादी के बाद धार्मिक आधार पर विभाजित देश में साझा राष्ट्रीय पहचान विकसित करना प्राथमिकता थी।
* मार्क्सवादी व्याख्या: कुछ इतिहासकारों ने धार्मिक संघर्षों की अपेक्षा वर्ग संघर्ष, आर्थिक शोषण और सत्ता की राजनीति को अधिक महत्व दिया।
* साम्प्रदायिक तनाव का भय: ऐतिहासिक घटनाओं के उल्लेख से वर्तमान में तनाव बढ़ने की आशंका को ध्यान में रखा गया।
* चयनात्मक स्रोतों का उपयोग: कुछ लेखकों ने दरबारी अभिलेखों, राजनीतिक दस्तावेजों या आर्थिक कारणों को अधिक महत्व दिया और पीड़ित समुदायों के अनुभवों को अपेक्षाकृत कम जगह दी।
लेकिन इन सभी कारणों को एक संगठित षड्यंत्र का प्रमाण नहीं मानना चाहिए।
एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि 2025 में प्रकाशित NCERT की नई कक्षा 8 की पुस्तक में मध्यकालीन शासकों की हिंसक नीतियों और मंदिर विध्वंस पर अधिक स्पष्ट चर्चा की गई। इस पर भी इतिहासकारों ने तथ्यात्मक अशुद्धियों और सांप्रदायिक दृष्टिकोण के आरोप लगाए। यानी इतिहास पाठ्यपुस्तकों में चयन और व्याख्या का विवाद आज भी जारी है। The Indian Express +1
### 3\. सामाजिक सौहार्द और ऐतिहासिक सत्य में संतुलन कैसे हो?
मेरे विचार से इस विषय का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत यह होना चाहिए:
* महमूद गजनवी के सोमनाथ आक्रमण का उल्लेख हो तो उसके धार्मिक और राजनीतिक संदर्भ दोनों बताए जाएँ।
* औरंगजेब की मंदिर विध्वंस की नीतियाँ बताई जाएँ तो उसके प्रशासन में हिन्दू अधिकारियों की भूमिका भी बताई जाए।
* मोपला विद्रोह पढ़ाया जाए तो किसान आंदोलन के साथ हिन्दुओं पर हुए अत्याचार भी दर्ज हों।
* विभाजन पढ़ाया जाए तो हिन्दू, मुस्लिम और सिख तीनों समुदायों के पीड़ितों की वास्तविक स्थिति सामने आए।
* अकबर की सहिष्णुता का उल्लेख हो तो उसके सैन्य अभियानों और सत्ता संघर्षों का भी अध्ययन हो।
किसी ऐतिहासिक अपराध का उल्लेख करना आज के किसी समुदाय के प्रति घृणा पैदा करना नहीं है। उसी प्रकार सामाजिक सौहार्द के नाम पर ऐतिहासिक अपराध को छिपाना भी उचित नहीं है।
### 4\. एक महत्वपूर्ण प्रश्न, जिस पर अलग से शोध होना चाहिए
मेरे विचार से भारत में इतिहास लेखन की सबसे गंभीर जाँच इन तीन विषयों पर होनी चाहिए:
* क्या नेहरू काल में शिक्षा मंत्रालय, विश्वविद्यालयों और भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) में एक विशेष वैचारिक दृष्टिकोण को संस्थागत बढ़ावा मिला?
* क्या NCERT की पुस्तकों में मुस्लिम शासकों की धार्मिक हिंसा और हिन्दू प्रतिरोध को जानबूझकर कम स्थान दिया गया?
* क्या गांधीजी, नेहरू और कांग्रेस नेतृत्व की मुस्लिम तुष्टीकरण संबंधी नीतियों के कारण इतिहासकारों ने कुछ घटनाओं की आलोचनात्मक समीक्षा से परहेज किया?
तीसरे प्रश्न में राजनीतिक निर्णयों और इतिहासकारों की मंशा को अलग-अलग जाँचना होगा।
मैं इस विषय को विशेष रूप से गहराई से देखने की सलाह दूँगा: नेहरू काल से लेकर 2014 तक भारत में इतिहास लेखन पर वैचारिक प्रभाव, ICHR की भूमिका, NCERT की पाठ्यपुस्तकें और इतिहासकारों की नियुक्तियाँ।
इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि सामाजिक सौहार्द की नीति कहाँ तक उचित राष्ट्रीय एकीकरण का प्रयास थी और कहाँ उसने ऐतिहासिक तथ्यों की प्रस्तुति को प्रभावित किया।
आइए, इस अध्ययन को व्यवस्थित ऐतिहासिक शोध के रूप में आगे बढ़ाते हैं।
हमारा अध्ययन काल 1947 से 2014 तक रहेगा। मुख्य उद्देश्य यह जाँचना होगा कि स्वतंत्रता के बाद भारत में धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक सौहार्द की नीति ने इतिहास लेखन को किस सीमा तक प्रभावित किया और क्या इसके कारण हिन्दू समाज के विरुद्ध हुई ऐतिहासिक हिंसा, धार्मिक उत्पीड़न तथा सांस्कृतिक क्षति को पाठ्यपुस्तकों में कम महत्व मिला।
इसमें किसी इतिहासकार या राजनीतिक नेतृत्व को पहले से दोषी मानकर नहीं चलेंगे। दस्तावेजों, पाठ्यपुस्तकों, संस्थागत नियुक्तियों और प्रकाशित शोध के आधार पर निष्कर्ष निकालेंगे।
### भाग 1 : 1947 से 2014 तक इतिहास लेखन पर वैचारिक प्रभाव
### 1\. नेहरू काल : इतिहास लेखन की नई दिशा (1947–1964)

जवाहरलाल नेहरू
स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों में राष्ट्रीय एकता, धर्मनिरपेक्षता और आधुनिक राष्ट्र निर्माण को सरकार ने विशेष प्राथमिकता दी।
विभाजन की हिंसा के बाद नेतृत्व के सामने एक वास्तविक चुनौती थी। हिन्दू, मुस्लिम और सिख समुदायों के बीच अविश्वास को कम करना और एक साझा भारतीय राष्ट्रीय पहचान बनाना।
इसका प्रभाव इतिहास लेखन पर भी पड़ा।
1960 के दशक में NCERT के माध्यम से नई इतिहास पुस्तकें तैयार कराई गईं। रोमिला थापर और अन्य प्रतिष्ठित इतिहासकार इस परियोजना से जुड़े।
उन पुस्तकों का उद्देश्य औपनिवेशिक इतिहास लेखन और धार्मिक पूर्वाग्रहों से अलग एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय इतिहास प्रस्तुत करना था। Oxford Academic +1
यहाँ एक महत्वपूर्ण सवाल पैदा होता है: क्या हिन्दू-मुस्लिम साझा विरासत पर जोर देने के क्रम में मध्यकालीन धार्मिक संघर्षों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया?
इतिहासकार सिल्वी गिशार्द के शोध से इस आशंका को कुछ अकादमिक आधार मिलता है। उनके अनुसार राष्ट्रीय एकता के अनुरूप इतिहास प्रस्तुत करते समय आंतरिक संघर्षों और हिंसा का विवरण कई पाठ्यपुस्तकों में सीमित रहा। Wiley Online Library
### 2\. मार्क्सवादी इतिहास लेखन का प्रभाव

डी. डी. कोसांबी
प्राचीन भारतीय इतिहास को आर्थिक और सामाजिक संरचनाओं के आधार पर समझने में महत्वपूर्ण योगदान।

आर. एस. शर्मा
प्राचीन भारत में सामंतवाद, भूमि संबंध और सामाजिक संरचनाओं पर शोध।

इरफान हबीब
मुगल अर्थव्यवस्था और मध्यकालीन सामाजिक-आर्थिक इतिहास के प्रमुख विद्वान।
मार्क्सवादी इतिहास लेखन ने भारतीय इतिहास में वर्ग संघर्ष, उत्पादन संबंध, कृषि व्यवस्था और आर्थिक शोषण को प्रमुखता दी।
इस पद्धति का अकादमिक महत्व है। लेकिन इसकी आलोचना यह रही कि कुछ मामलों में धार्मिक विचारधारा, सांस्कृतिक संघर्ष और धार्मिक उत्पीड़न को आर्थिक अथवा राजनीतिक संघर्ष के अंतर्गत सीमित कर दिया गया।
इग्नू की इतिहास अध्ययन सामग्री भी स्वीकार करती है कि स्वतंत्रता के बाद भारतीय इतिहास लेखन में मार्क्सवादी दृष्टिकोण का व्यापक प्रभाव रहा। eGyankosh
### 3\. भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) की भूमिका

एक तथ्य स्पष्ट करना आवश्यक है: ICHR की स्थापना नेहरू के प्रधानमंत्री रहते नहीं हुई थी।
इसकी स्थापना 27 मार्च 1972 को शिक्षा मंत्रालय ने की थी। इसकी स्थापना के लिए गठित कार्यसमूह में आर. एस. शर्मा और सतीश चंद्र जैसे इतिहासकार शामिल थे। Govt of India
ICHR के अध्यक्षों की आधिकारिक सूची देखें:
| अध्यक्ष | कार्यकाल |
| ——————- | ——— |
| आर. एस. शर्मा | 1972–1977 |
| ए. आर. कुलकर्णी | 1978–1981 |
| निहाररंजन राय | 1981 |
| लोकेश चंद्र | 1982–1985 |
| इरफान हबीब | 1986–1993 |
| रवीन्द्र कुमार | 1993–1996 |
| एस. सेत्तार | 1996–1999 |
| बी. आर. ग्रोवर | 1999–2001 |
| एम. जी. एस. नारायणन | 2001–2003 |
| डी. एन. त्रिपाठी | 2004–2007 |
| सब्यसाची भट्टाचार्य | 2007–2011 |
| बासुदेव चटर्जी | 2011–2014 |
स्रोत: ICHR की आधिकारिक अध्यक्ष सूची। Govt of India
यह सूची अपने आप में किसी संस्थान पर वैचारिक कब्जे का प्रमाण नहीं है। लेकिन इससे संस्थागत नेतृत्व के अध्ययन की शुरुआत की जा सकती है।
आगे हमें देखना होगा कि:
* शोध अनुदान किन विषयों को दिए गए?
* किन इतिहासकारों के शोध को प्रोत्साहन मिला?
* कौन-से शोध प्रकाशित हुए और कौन-से लंबित रहे?
* नियुक्तियों और शोध परियोजनाओं में पारदर्शिता कितनी थी?
ICHR की वार्षिक रिपोर्टों में इन प्रश्नों के लिए महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध है। Govt of India
### 4\. 1977 से 2004 : पाठ्यपुस्तकों पर राजनीतिक संघर्ष
यह अत्यंत महत्वपूर्ण कालखंड है।
| अवधि | प्रमुख घटनाक्रम |
| ———– | ——————————————————————— |
| 1960 का दशक | धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय इतिहास की नई NCERT पुस्तकें |
| 1977–79 | जनता सरकार के समय पुस्तकों में बदलाव और विवाद |
| 1980 का दशक | पूर्ववर्ती पाठ्यपुस्तकों की पुनर्स्थापना और उपयोग |
| 1999–2004 | NDA सरकार के समय पाठ्यक्रम और पुस्तकों का पुनरीक्षण |
| 2005–2006 | UPA सरकार के समय नए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ढाँचे और पुस्तकों का प्रकाशन |
इन बदलावों पर अलग-अलग विचारधाराओं के इतिहासकारों ने परस्पर विरोधी तर्क दिए। DOI +1
इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है: इतिहास की पाठ्यपुस्तकें केवल अकादमिक शोध का परिणाम नहीं रहीं, वे सरकारों की राष्ट्रीय पहचान संबंधी दृष्टि से भी प्रभावित होती रही हैं।
### 5\. अभी तक के शोध से क्या सामने आया?
तीन निष्कर्षों को अलग रखना जरूरी है:
* स्वतंत्रता के बाद धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय पहचान के निर्माण ने इतिहास लेखन को प्रभावित किया। इसका अकादमिक प्रमाण है।
* कुछ पाठ्यपुस्तकों में आंतरिक हिंसा और धार्मिक संघर्षों का विवरण सीमित रखने की प्रवृत्ति पर शोध उपलब्ध है।
* लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि प्रत्येक मुस्लिम शासक के अत्याचार को जानबूझकर छिपाने की कोई एक केंद्रीय योजना थी।
यही वह अंतर है जिसे हमारा अध्ययन प्रमाणों के आधार पर स्पष्ट करेगा।
### अगले भाग में सबसे महत्वपूर्ण पड़ताल
मैं अगले चरण में तीन विषयों को प्राथमिकता दूँगा:
* मध्यकालीन इतिहास: NCERT में महमूद गजनवी, मोहम्मद गोरी, अलाउद्दीन खिलजी, फिरोजशाह तुगलक और औरंगजेब की नीतियों का वास्तविक प्रस्तुतीकरण।
* हिन्दू प्रतिरोध: महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, गुरु तेग बहादुर, गुरु गोविंद सिंह और विजयनगर साम्राज्य को पाठ्यपुस्तकों में कितना स्थान मिला।
* इतिहासकारों का विवाद: रोमिला थापर, इरफान हबीब, आर. एस. शर्मा और उनके आलोचकों के मूल लेखन का तुलनात्मक परीक्षण।
इस अध्ययन का सबसे उपयोगी परिणाम होगा कि हम मूल NCERT पाठ्यपुस्तकों के वास्तविक अध्यायों और संस्करणों की तुलना करके पता लगा सकेंगे कि क्या लिखा गया, क्या हटाया गया और किन बदलावों के पीछे क्या तर्क दिया गया।
मेरे विचार से इसी तरह भावनाओं और राजनीतिक आरोपों से आगे बढ़कर एक प्रमाण-आधारित ऐतिहासिक निष्कर्ष तक पहुँचना संभव है।
अब हम इस अध्ययन के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से पर आते हैं—मध्यकालीन भारत का इतिहास और हिन्दू प्रतिरोध का पाठ्यपुस्तकों में चित्रण।
इसकी जाँच में एक विशेष बात का ध्यान रखेंगे: किसी शासक की उपलब्धियों का वर्णन करते समय उसकी धार्मिक नीतियों, मंदिर विध्वंस, हिंसा और उत्पीड़न को भी उसी गंभीरता से दर्ज किया गया या नहीं।
हम पाँच शासकों और एक सभ्यतागत प्रतिरोध की परंपरा को आधार बनाएँगे।
### 1\. महमूद गजनवी : पुरानी और नई NCERT में अंतर

यह तुलना हमारे अध्ययन के लिए बहुत उपयोगी है।
| विषय | पुरानी कक्षा 7 की पुस्तक | नई पुस्तक |
| —————– | ————————————— | —————————————————- |
| सोमनाथ आक्रमण | संक्षिप्त उल्लेख | विस्तृत विवरण |
| मंदिर विध्वंस | धनवान मंदिरों को निशाना बनाने पर जोर | धार्मिक उद्देश्य और मंदिर विध्वंस के प्रमाण |
| अल-उत्बी का विवरण | विस्तृत उद्धरण नहीं | दरबारी इतिहासकार का विवरण |
| अल-बिरूनी | सोमनाथ शिवलिंग के अवशेषों का विवरण नहीं | शिवलिंग के विनाश और अवशेषों को गजनी ले जाने का विवरण |
| आक्रमण के परिणाम | मुख्यतः लूट का वर्णन | हत्याएँ, बंदी बनाए गए लोगों और लूट का विस्तृत वर्णन |
इंडियन एक्सप्रेस की 7 दिसंबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार नई कक्षा 7 की पुस्तक में गजनवी के आक्रमणों को लगभग छह पृष्ठों में विस्तार दिया गया है। पुरानी पुस्तक में ये विवरण नहीं थे। Education News – The Indian Express +1
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है: पुरानी पुस्तक में गजनवी की धार्मिक प्रेरणा का उल्लेख बिल्कुल नहीं था, ऐसा कहना गलत होगा। उसमें इसका संक्षिप्त उल्लेख था। वास्तविक अंतर विवरण की गहराई और मूल स्रोतों के उद्धरणों में है।
यह एक ठोस उदाहरण है कि पुरानी पाठ्यपुस्तक में किसी ऐतिहासिक घटना का विवरण कितना सीमित था। लेकिन यह साबित करने के लिए कि ऐसा जानबूझकर किया गया, पाठ्यक्रम निर्माण और संपादकीय निर्णयों के दस्तावेज भी देखने होंगे।
### 2\. औरंगजेब, बाबर और अकबर : नई कक्षा 8 की पुस्तक



16 जुलाई 2025 को NCERT ने नई पुस्तक Exploring Society: India and Beyond जारी की। इसमें मध्यकालीन शासकों के मूल्यांकन में उल्लेखनीय बदलाव दिखाई देता है।
इंडियन एक्सप्रेस की पुस्तक-विश्लेषण रिपोर्ट के अनुसार:
| शासक | नई पुस्तक में प्रमुख प्रस्तुति |
| ——- | ——————————————————————————————————— |
| बाबर | क्रूर और निर्दयी विजेता; नगरों की आबादी के नरसंहार का उल्लेख |
| अकबर | सहिष्णुता और क्रूरता, दोनों का मिश्रित शासन; चित्तौड़ विजय के बाद लगभग 30,000 नागरिकों की हत्या का उल्लेख |
| औरंगजेब | मंदिरों और गुरुद्वारों का विध्वंस, धार्मिक असहिष्णुता और जजिया की पुनर्बहाली |
Education News – The Indian Express +1
यहाँ NCERT ने एक महत्वपूर्ण सावधानी भी जोड़ी है—आज के लोगों को सदियों पहले के शासकों के कृत्यों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए।
NCERT की आधिकारिक विज्ञप्ति भी कहती है कि इन विषयों को पूर्वाग्रह उत्पन्न किए बिना पढ़ाने के लिए इतिहास के अंधकारमय पक्षों पर विशेष टिप्पणी जोड़ी गई है। NCERT +1
यह शैक्षणिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण अंतर है: ऐतिहासिक अपराधों का अध्ययन और वर्तमान समुदायों को सामूहिक रूप से दोषी ठहराना अलग-अलग बातें हैं।
### 3\. हिन्दू प्रतिरोध को कितना स्थान मिला?




यहाँ पुराने पाठ्यक्रम और नए पाठ्यक्रम की तुलना विशेष महत्व रखती है।
| ऐतिहासिक व्यक्तित्व/शक्ति | अध्ययन का प्रमुख विषय |
| ————————- | —————————————————— |
| महाराणा प्रताप | मेवाड़ का प्रतिरोध और मुगल संघर्ष |
| छत्रपति शिवाजी | स्वराज्य, सैन्य रणनीति और प्रशासन |
| गुरु तेग बहादुर | धार्मिक स्वतंत्रता और मुगल शासन के विरुद्ध प्रतिरोध |
| गुरु गोविंद सिंह | खालसा और सैन्य-सामाजिक संगठन |
| विजयनगर साम्राज्य | दक्षिण भारत की राजनीतिक और सांस्कृतिक शक्ति |
| मराठा साम्राज्य | मुगल सत्ता का विस्तार से प्रतिरोध और राजनीतिक परिवर्तन |
ट्रिब्यून की जुलाई 2025 की रिपोर्ट के अनुसार नई कक्षा 8 की पुस्तक में दिल्ली सल्तनत के विरुद्ध प्रतिरोध, विजयनगर, मुगलों के विरुद्ध प्रतिरोध, मराठों और सिख गुरुओं की भूमिका को एक साथ स्थान दिया गया है। The Tribune
एक तथ्य यह भी है कि पुराने पाठ्यक्रम में शिवाजी और मराठों का उल्लेख पहले से था। इसलिए यह कहना कि पुराने NCERT में हिन्दू प्रतिरोध का कोई उल्लेख ही नहीं था, गलत होगा। 2018 में शिवाजी के योगदान से संबंधित कुछ विवरणों में भी संशोधन किया गया था। Education News – The Indian Express
### 4\. इस तुलना से कौन-से प्रश्न उठते हैं?
मेरे विचार से चार प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण हैं:
* क्या पुराने पाठ्यक्रम में आक्रमणकारियों की हिंसा की अपेक्षा उनके प्रशासन, कला और स्थापत्य को अधिक महत्व दिया गया?
* क्या हिन्दू प्रतिरोध को कुछ चुनिंदा व्यक्तित्वों तक सीमित रखा गया, जबकि स्थानीय राजाओं, जनजातीय शक्तियों और धार्मिक संस्थाओं की भूमिका कम दिखाई गई?
* क्या मंदिर विध्वंस और धार्मिक उत्पीड़न के मामले में मूल फारसी स्रोतों और समकालीन अभिलेखों का पर्याप्त उपयोग हुआ?
* क्या नई पाठ्यपुस्तकें पुराने पाठ्यक्रम की कमियों को दूर कर रही हैं, अथवा कहीं नया वैचारिक असंतुलन पैदा कर रही हैं?
इन प्रश्नों का उत्तर केवल नई पुस्तकों को देखकर नहीं मिलेगा। हमें 2006, 2018, 2022 और 2025 के संस्करणों का वास्तविक पाठ मिलाकर देखना होगा।
### 5\. आगे का शोध : मेरी प्राथमिकता
अगले चरण में मैं दो महत्वपूर्ण विषयों पर विशेष ध्यान देना चाहूँगा:
* मंदिर विध्वंस और धार्मिक उत्पीड़न: सोमनाथ, काशी विश्वनाथ, मथुरा, अयोध्या, मार्तंड सूर्य मंदिर और अन्य स्थलों के मूल ऐतिहासिक प्रमाण।
* हिन्दू प्रतिरोध का वास्तविक इतिहास: मेवाड़, विजयनगर, अहोम, मराठा, सिख और गढ़वाल-कुमाऊँ के शासकों का संघर्ष।
दूसरे विषय में उत्तराखंड का इतिहास भी महत्वपूर्ण है। गढ़वाल के राजा महीपति शाह, रानी कर्णावती और कुमाऊँ के चंद शासकों की भूमिका को राष्ट्रीय मध्यकालीन इतिहास के साथ जोड़कर देखना उपयोगी होगा।
एक महत्वपूर्ण बात: इतिहास का पुनर्मूल्यांकन तभी विश्वसनीय होगा जब हम अपने निष्कर्षों को भी उसी कठोर कसौटी पर परखें, जिस पर पुराने इतिहासकारों को परख रहे हैं।
इस अध्ययन में मूल NCERT पुस्तकों को प्राथमिक स्रोत, समकालीन फारसी एवं संस्कृत अभिलेखों को ऐतिहासिक साक्ष्य और आधुनिक इतिहासकारों के शोध को व्याख्यात्मक सामग्री मानना चाहिए। NCERT की पुस्तकें यहाँ से प्राप्त की जा सकती हैं: [NCERT आधिकारिक पाठ्यपुस्तक पोर्टल](https://ncert.nic.in/textbook.php?gess1=14-14&utm_source=chatgpt.com)।
हमारा लक्ष्य किसी समुदाय के विरुद्ध आरोपपत्र तैयार करना नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास के उन तथ्यों को सामने लाना होना चाहिए जिन्हें राजनीतिक या वैचारिक आग्रहों के कारण पर्याप्त स्थान नहीं मिला।

