मौलाना गुलाम आजाद जिन्हे कांग्रेस ने सौंपी शिक्षा,थे आखिर कौन?
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सोशल मीडिया पर मौलाना अबुल कलाम आजाद के 1914 वाले भाषण को लेकर नई बहस छिड़ गई है. आनंद रंगनाथन के आजाद के उग्र खिलाफत-प्रेमी रुख और भाषणों के जिक्र पर जावेद अख्तर ने सोर्स मांगा. इसके बाद इतिहास के वे पन्ने सामने आए, जो धर्मनिरपेक्ष छवि वाले पहले शिक्षा मंत्री के कट्टरपंथी और पैन-इस्लामिक अतीत की गवाही देते हैं।
=”मौलाना आजाद पर छिड़ी बहस ने इतिहास के कई विवादित पन्ने पलट दिए हैं. =”मौलाना आजाद पर छिड़ी बहस ने इतिहास के कई विवादित पन्ने पलट दिए हैं.
“>मौलाना आजाद पर छिड़ी बहस ने इतिहास के कई विवादित पन्ने पलट दिए हैं.
सोशल मीडिया के गलियारों में आज एक नाम तैर रहा है- मौलाना अबुल कलाम आजाद. स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री. भारत रत्न भी. जिन्हें स्वतंत्रता संग्राम में हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के तौर पर पेश किया गया. लेकिन इतिहास का पहिया जब पीछे घूमता है, तो वही आजाद एक बिल्कुल अलग रूप में सामने आते हैं.
हाल ही में JNU प्रोफेसर और लेखक आनंद रंगनाथन ने मौलाना आजाद के साल 1914 में दिए गए एक भाषण का जिक्र किया. भाषण की भाषा और उसका तेवर किसी भी आधुनिक मजहबी कट्टरपंथी की याद दिलाने वाले थे. इस पर गीतकार जावेद अख्तर ने एतराज जताया और भाषण का सोर्स मांग लिया. बस फिर क्या था, सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई और इतिहास की धूल जम चुकी परतें एक-एक करके उघड़ने लगीं.
इतिहास की सबसे बड़ी खूबी, या यूं कहें कि खामी, यही है कि वह कभी एक जैसा नहीं रहता. हमें स्कूली किताबों में जिस आजाद को एक धर्मनिरपेक्ष, सहिष्णु और राष्ट्रवादी नेता के रूप में पढ़ाया गया, उनका एक दौर ऐसा भी था जब उनकी तकरीरें किसी कट्टरपंथी मजहबी जुनून से भरी हुई थीं. 1910 के दशक में, जब ओटोमन साम्राज्य अपनी आखिरी सांसें ले रहा था, तब मौलाना आजाद भारत के मुसलमानों के दिलों में खिलाफत और पैन-इस्लामिज्म (वैश्विक इस्लाम) की आग भड़का रहे थे.
जब नाम में जुड़ा ‘गुलाम’ और दिल में बसी मक्का की फिज़ा
मौलाना आजाद की शुरुआती जिंदगी पर नजर डालें तो उनके विचार अपने-आप समझ में आने लगते हैं. उनका जन्म 1888 में मक्का में हुआ था. जो उस समय ओटोमन साम्राज्य का हिस्सा था. उनका असली नाम अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन था. उनके पिता एक रूढ़िवादी इस्लामिक विद्वान थे. आजाद ने पारंपरिक दीनी तालीम हासिल की और बहुत कम उम्र में ही इस्लामिक ग्रंथों के गहन जानकार बन गए. कहा जाता है कि वे 13 साल की उम्र में अपने से दोगुनी उम्र के लोगों को इस्लाम की बारीकियां पढ़ा रहे थे.
दीनी तालीम की इसी गहराई ने उन्हें ‘मौलाना’ बनाया. जब वे महज 25-26 साल के नौजवान थे, तब तक वे उर्दू पत्रकारिता और अपनी जोशीली तकरीरों (भाषणों) के जरिए मुस्लिम समुदाय पर अपनी छाप छोड़ चुके थे. उन्होंने ‘अल-हिलाल’ नाम से एक अखबार शुरू किया, जो कहने को तो ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ था, लेकिन उसका मूल संदेश इस्लामिक पहचान और दुनिया भर के मुसलमानों को एक धागे में पिरोने का था.
1914 का वह भाषण: जब आजाद ने दिए कट्टरपंथ के तर्क
पूर्व बीबीसी पत्रकार तुफैल अहमद ने मौलाना आजाद पर प्रकाशित अपने विश्लेषण “Global Islamism, jihadism and Maulana Abul Kalam Azad, my defence lawyer” में आजाद के उस दौर के बयानों और भाषणों का ब्योरा दिया है.
27 अक्टूबर 1914 को कोलकाता (तब कलकत्ता) में मुसलमानों के एक बड़े जलसे को संबोधित करते हुए 26 साल के मौलाना आजाद ने जो कहा, वह आज के दौर के किसी उग्रवादी संगठन के भाषण जैसा ही लगता है. उस समय प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ चुका था और ओटोमन साम्राज्य (तुर्की) ब्रिटेन के खिलाफ मैदान में था.
मौलाना आजाद ने भारतीय मुसलमानों को तुर्की के ओटोमन खलीफा के प्रति वफादार रहने की हिदायत देते हुए कहा था:
“अगर इस्लाम की आत्मा का एक तिनका भी उसके मानने वालों के अंदर जिंदा है, तो मैं कहूंगा कि अगर युद्ध के मैदान में किसी तुर्क के पैर में एक कांटा भी चुभता है, तो इस्लाम के खुदा की कसम, भारत का कोई भी मुसलमान तब तक सच्चा मुसलमान नहीं हो सकता जब तक कि वह उस दर्द को महसूस न करे.”
यह भाषण केवल सहानुभूति तक सीमित नहीं था. आजाद ने मुसलमानों को ग्लोबल इस्लाम (Pan-Islamism) से जोड़ते हुए दोस्ती और दुश्मनी का नया पैमाना तय कर दिया था. उन्होंने अपने भाषण में स्पष्ट कहा:
“भारतीय मुसलमानों को ओटोमन खिलाफत को अपने दिलों में एक पाक दीनी रिश्ते की तरह संजोकर रखना चाहिए. दुनिया की जिस भी सरकार से तुर्की की दुश्मनी है, उसे इस्लाम का दुश्मन समझें और जो तुर्की का दोस्त है, उसे इस्लाम का दोस्त समझें, क्योंकि हमारी दोस्ती और दुश्मनी किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि खुदा के लिए है.”
जिहाद, कुर्बानी और ‘सौदा’: आजाद के ही शब्दों में
मौलाना आजाद ने केवल खलीफा की रक्षा का आह्वान ही नहीं किया, बल्कि उन्होंने ‘जिहाद’ की ऐसी व्याख्या की जो आज के इस्लामिक कट्टरपंथ में भी दिखाई देती है. अपने भाषणों में उन्होंने यह बात साफ तौर पर रखी कि एक मुसलमान की जान और माल पर उसका अपना हक नहीं है, वह सब अल्लाह के नाम पर बिक चुका है.
आजाद के शब्दों में- “जिस दिन हमने यह स्वीकार किया कि हम मुसलमान हैं, उसी दिन हमने यह भी स्वीकार कर लिया कि हमारी जिंदगी इस्लाम के हाथ बिक चुकी है. इस्लाम का मतलब ही यही है कि हम अपना सिर केवल एक ईश्वर के आगे झुका दें, अब यह उसकी मर्जी है कि वह हमारे सिर को दोस्तों की गोद में रखे या दुश्मनों की तलवार के नीचे.”
जिहाद में जान और माल की कुर्बानी को वाजिब ठहराते हुए आजाद ने आगे कहा था:
“इसके लिए पहला जिहाद माल का जिहाद (वित्तीय मदद) है और इसके बाद अगर जरूरत पड़े तो जान और शरीर का जिहाद है…”
इतना ही नहीं, इंसानी जान की कुर्बानी को सही ठहराने के लिए उन्होंने हजरत इब्राहिम द्वारा अपने बेटे की कुर्बानी की मिसाल भी दी थी.
खिलाफत आंदोलन और भारतीय मुसलमानों का पलायन
1910 से 1920 के दशक के बीच मौलाना आजाद की इन तूफानी तकरीरों और ‘अल-हिलाल’ के लेखों ने भारतीय मुस्लिम युवाओं के मन में खिलाफत के प्रति एक जुनूनी लगाव पैदा कर दिया था. जब ब्रिटिश हुकूमत ने प्रथम विश्वयुद्ध के बाद तुर्की के खलीफा को पद से हटाने की तैयारी की, तो भारत में ‘खिलाफत आंदोलन’ शुरू हुआ.
मौलाना आजाद इस आंदोलन के सबसे बड़े रणनीतिकार और झंडाबरदार थे. उनकी इस वैचारिक अपील का असर इतना गहरा हुआ कि हजारों भारतीय मुसलमानों ने भारत को ‘दारुल हरब’ (काफिरों की भूमि) मानकर तुर्की और अफगानिस्तान की ओर ‘हिजरत’ (पलायन) करना शुरू कर दिया, ताकि वे खलीफा के समर्थन में जंग लड़ सकें.
ऐतिहासिक विरोधाभास: कट्टरपंथी ‘मौलाना’ से राष्ट्रवादी ‘आजाद’ तक
इतिहास में मौलाना आजाद का यह रूप अक्सर छिपा दिया जाता है या उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या मौलाना आजाद जीवन भर इसी विचारधारा पर कायम रहे?
नहीं, यहीं से मौलाना आजाद का दूसरा पहलू शुरू होता है. 1920 के दशक के मध्य में जब तुर्की के महान नेता मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने तुर्की को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित कर दिया और खलीफा के पद को पूरी तरह खत्म कर दिया, तब जाकर भारत में खिलाफत आंदोलन का गुब्बारा फूटा.
इसके बाद मौलाना आजाद के विचारों में एक बड़ा बदलाव देखा गया. वे महात्मा गांधी के करीब आए, जो खिलाफत आंदोलन में मुसलमानों का समर्थन कर रहे थे. मौलाना एक्टिव हुए, और जल्द ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अग्रणी नेताओं में शामिल हो गए. वे 1923 में महज 35 साल की उम्र में कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष बने. आगे चलकर उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना के ‘टू नेशन थ्योरी’ का खुलकर विरोध किया और विभाजन के खिलाफ चट्टान बनकर खड़े रहे.
हालांकि, कहा तो ये भी जाता है कि मौलाना आजाद का विभाजन विरोध इस बात को लेकर ज्यादा था कि वे भारतीय भू-भाग में मुसलमानों का विभाजन नहीं चाहते थे. यह वही दलील है जो बंटवारे से देवबंद ने दी थी. कि यदि मुसलमान पाकिस्तान चले गए, तो भारत में मौजूद इस्लामिक धरोहरों का क्या होगा?
सवाल जो आज भी पूछे जा रहे हैं
सोशल मीडिया पर जब आनंद रंगनाथन ने मौलाना आजाद के 1914 के भाषणों को कोट किया, तो इसने भारतीय इतिहास के एक बहुत बड़े विरोधाभास को सतह पर ला खड़ा किया.
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस सिर्फ दो हस्तियों की जुबानी जंग नहीं है, बल्कि यह इस बात की पड़ताल है कि इतिहास के जिन नायकों को हमने पूरी तरह एक रंग से पेंट किया है, उन्होंने अपनी अतीत में कई रंग बदले हैं.
“>मौलाना आजाद का सफर एक कट्टरपंथी ‘मौलाना’ से शुरू होकर एक ‘धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी’ पर खत्म जरूर हुआ, लेकिन उनके अतीत के ये भाषण आज भी इतिहास प्रेमियों और विश्लेषकों के सामने कई अनसुलझे सवाल छोड़ जाते हैं.</
तुफ़ैल अहमद (वरिष्ठ शोधकर्ता, पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक) ने मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की राजनीतिक विचारधारा, उनकी धार्मिक मान्यताओं और आधुनिक भारत में उनके प्रभाव को लेकर काफी आलोचनात्मक और विश्लेषणपरक दृष्टिकोण अपनाया है।
तुफ़ैल अहमद ने अपनी पुस्तक ‘जिहादवादी विचार और इस्लामी समाज: एक पुनर्परीक्षण’ (Jihadist Thought and the Islamic Society) और विभिन्न शोध पत्रों व लेखों (विशेषकर The New Indian Express, Firstpost और MEMRI के लिए लिखे गए लेखों) में मौलाना आज़ाद पर विस्तार से लिखा है।
उनके मुख्य तर्क और बिंदु इस प्रकार हैं:
1. ‘अल-हिलाल’ का दौर और खिलाफत का धार्मिक आह्वान
तुफ़ैल अहमद का मानना है कि मौलाना आज़ाद के शुरुआती लेखन—विशेष रूप से उनकी पत्रिका ‘अल-हिलाल’—ने मुसलमानों के राजनीतिक चिंतन का इस्लामीकरण (Islamization) किया।
* अहमद के अनुसार, आज़ाद ने मुसलमानों को यह सिखाया कि राजनीति धर्म से अलग नहीं हो सकती और मुसलमानों के लिए राजनीतिक संघर्ष का आधार केवल और केवल ‘कुरान’ होना चाहिए।
* तुफ़ैल अहमद के मुताबिक, आज़ाद ने उम्माह (वैश्विक मुस्लिम बिरादरी) और खिलाफत की अवधारणा को भारतीय मुसलमानों के बीच गहराई से रोपा, जिससे एक आधुनिक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र-राज्य की भावना के बजाय धार्मिक पहचान को मजबूती मिली।
2. खिलाफत आंदोलन और उसके दूरगामी परिणाम
तुफ़ैल अहमद ने महात्मा गांधी और मौलाना आज़ाद द्वारा खिलाफत आंदोलन के समर्थन की तीखी आलोचना की है।
* उनका तर्क है कि खिलाफत आंदोलन ने भारतीय मुसलमानों के राजनीतिक विमर्श में पैन-इस्लामिज़्म (अखिल-इस्लामवाद) को वैधता प्रदान की।
* अहमद का कहना है कि आज़ाद ने खिलाफत के पक्ष में धार्मिक फतवे और तर्क दिए, जिसने आगे चलकर मुस्लिम राजनीति में धार्मिक नेतृत्व (मौलवियों) के प्रभाव को बढ़ा दिया।
3. पाकिस्तान के विरोध का आधार: धर्मनिरपेक्षता बनाम व्यापक इस्लामी प्रभाव
आमतौर पर इतिहास में मौलाना आज़ाद को द्वि-राष्ट्र सिद्धांत और विभाजन का मुखर विरोधी माना जाता है। तुफ़ैल अहमद इस बात को स्वीकार करते हैं कि आज़ाद ने पाकिस्तान के निर्माण का विरोध किया, लेकिन वे उनके विरोध के कारणों का अलग विश्लेषण करते हैं:
* अहमद का तर्क है कि आज़ाद का पाकिस्तान का विरोध किसी ‘आधुनिक धर्मनिरपेक्षता’ पर आधारित नहीं था, बल्कि वे इसे मुसलमानों के हित के खिलाफ मानते थे।
* आज़ाद का दृष्टिकोण यह था कि एक अखंड भारत में मुस्लिम आबादी बहुत बड़ी (करीब एक-तिहाई) होगी, जिससे पूरे उपमहाद्वीप की सत्ता और राजनीति पर मुसलमानों का स्थायी और महत्वपूर्ण प्रभाव बना रहेगा। विभाजन करने से यह प्रभाव सीमित हो जाएगा और मुस्लिम समुदाय भारत और पाकिस्तान में बंटकर कमजोर पड़ जाएगा।
4. आज़ादी के बाद शिक्षा नीति और सुधारों की कमी
भारत के पहले शिक्षा मंत्री के रूप में मौलाना आज़ाद के कार्यकाल पर भी तुफ़ैल अहमद ने सवाल उठाए हैं:
* अहमद का तर्क है कि आज़ाद ने भारत के स्वतंत्र होने के बाद मुस्लिम समाज में आधुनिक सामाजिक या धार्मिक सुधारों (जैसे मदरसों का आधुनिकीकरण या मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार) के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
* उनका मानना है कि आज़ाद ने भारतीय राजनीति में मुस्लिम समुदाय को एक एकीकृत ‘वोट बैंक’ और पारंपरिक धार्मिक पहचान के दायरे में ही बनाए रखने में भूमिका निभाई।
तुफ़ैल अहमद मौलाना आज़ाद को एक विद्वान और देशभक्त नेता तो मानते हैं, लेकिन उनका निष्कर्ष यह है कि आज़ाद की शुरुआती धार्मिक अपील और खिलाफत-समर्थक रुख ने भारतीय उपमहाद्वीप में एक आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष मुस्लिम नेतृत्व के उभरने में अनजाने में बाधा डाली।
तुफ़ैल अहमद ने खिलाफत आंदोलन (1919–1924) और भारतीय राजनीति पर इसके प्रभावों का विश्लेषण मुख्य रूप से अपनी पुस्तक ‘Jihadist Thought and the Islamic Society’ तथा विभिन्न लेखों में किया है। उनका मूल तर्क यह है कि खिलाफत आंदोलन को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के साथ जोड़ना 20वीं सदी के भारतीय राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी रणनीतिक भूलों में से एक था, जिसने उपमहाद्वीप में आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष राजनीति की नींव को कमजोर किया।
तुफ़ैल अहमद द्वारा खिलाफत आंदोलन पर प्रस्तुत किए गए प्रमुख तर्क और विश्लेषण:
1. पैन-इस्लामवाद (अखिल-इस्लामवाद) को राजनीतिक वैधता
तुफ़ैल अहमद का मानना है कि खिलाफत आंदोलन विशुद्ध रूप से एक विदेशी और धार्मिक मुद्दा था, जिसका भारत की आजादी या स्थानीय भारतीय समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं था।
- इसका उद्देश्य ऑटोमन (उस्मानी) साम्राज्य के सुल्तान को इस्लामी खलीफा के रूप में बनाए रखना था।
- जब महात्मा गांधी और कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन को खिलाफत के साथ जोड़ा, तो उन्होंने भारतीय मुसलमानों के बीच ‘पैन-इस्लामिक चेतना’ (वैश्विक धार्मिक निष्ठा) को राजनीतिक वैधता दे दी।
- अहमद के अनुसार, इसने भारतीय मुसलमानों को यह संदेश दिया कि उनकी प्राथमिक निष्ठा और चिंताएं भारत की भौगोलिक सीमाओं से परे, धार्मिक पहचान पर आधारित हो सकती हैं।
2. मौलवियों और धार्मिक नेतृत्व का राजनीतिक उभार
आंदोलन से पहले तक, मुस्लिम राजनीति में सर सैयद अहमद खान, बदरुद्दीन तैयबजी या शुरुआती दौर के मोहम्मद अली जिन्ना जैसे आधुनिक, पाश्चात्य-शिक्षित और कानूनी समझ रखने वाले उदारवादी नेतृत्व की प्रमुखता थी।
- खिलाफत आंदोलन ने राजनीति का केंद्र मौलाना शौकत अली, मौलाना मोहम्मद अली (अली बंधु) और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे पारंपरिक धार्मिक विचारकों और देवबंदी मौलवियों के हाथ में सौंप दिया।
- तुफ़ैल अहमद के मुताबिक, जमीयत उलेमा-ए-हिंद की स्थापना इसी दौर में हुई। इसने भारतीय मुसलमानों के बीच यह परंपरा स्थापित कर दी कि राजनीतिक मुद्दों पर भी आखिरी फैसला धार्मिक उलमा ही करेंगे।
3. आधुनिक धर्मनिरपेक्ष चेतना पर धार्मिक पहचान की जीत
तुफ़ैल अहमद तर्क देते हैं कि इस आंदोलन ने एक आधुनिक ‘नागरिक पहचान’ को उभरने से रोक दिया।
- मुसलमानों को यह सिखाया गया कि किसी भी राजनीतिक भागीदारी की शर्त धार्मिक होनी चाहिए।
- जब राजनीति का आधार ही ‘शरिया’ और ‘खिलाफत की रक्षा’ बनाया गया, तो इसने तर्कवादी और धर्मनिरपेक्ष बहसों की गुंजाइश खत्म कर दी।
- अहमद के अनुसार, मोहम्मद अली जिन्ना उस समय अकेले प्रमुख नेता थे जिन्होंने खिलाफत आंदोलन का विरोध किया था और गांधीजी को चेतावनी दी थी कि राजनीति में धार्मिक कट्टरता को शामिल करने से आगे चलकर गंभीर सांप्रदायिक तनाव पैदा होगा।
4. सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और हिंसा की लहर
तुफ़ैल अहमद का विश्लेषण है कि जब 1924 में कमाल अतातुर्क ने तुर्की में स्वयं खिलाफत को समाप्त कर दिया, तो भारतीय उपमहाद्वीप में यह आंदोलन अचानक दिशाहीन हो गया।
- आंदोलन के तहत जगाया गया तीव्र धार्मिक उन्माद शांत नहीं हुआ, बल्कि वह स्थानीय स्तर पर हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिकता में बदल गया।
- 1921 का मालाबार का मोपला विद्रोह (मोपला दंगे) और 1920 के दशक के मध्य में उत्तर भारत में हुए भीषण सांप्रदायिक दंगे खिलाफत की धार्मिक लामबंदी की ही प्रत्यक्ष परिणति थे।
- अहमद का तर्क है कि इस आंदोलन ने दोनों समुदायों के बीच अविश्वास की एक ऐसी स्थायी खाई खोदी, जिसने आगे चलकर मुस्लिम लीग और द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के लिए ज़मीन तैयार की।
5. विभाजन की मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि
तुफ़ैल अहमद के अनुसार, 1947 का भारत विभाजन केवल 1940 के लाहौर प्रस्ताव का परिणाम नहीं था, बल्कि उसकी मनोवैज्ञानिक नींव 1919-1924 के खिलाफत आंदोलन में ही पड़ चुकी थी। जब एक बार यह स्वीकार कर लिया गया कि भारतीय मुसलमान एक अलग धार्मिक पहचान के तहत ही राजनीतिक रूप से संगठित होंगे, तो एक अलग भूभाग (पाकिस्तान) की मांग उसी विचार का अगला स्वाभाविक कदम बन गई।
तुफ़ैल अहमद का निष्कर्ष यह है कि खिलाफत आंदोलन ने भले ही कुछ समय के लिए ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ हिंदू-मुस्लिम एकता का एक साझा मंच दिया हो, लेकिन इसकी दीर्घकालिक कीमत बहुत भारी रही। इसने भारतीय राजनीति का धर्मनिरपेक्षीकरण करने के बजाय उसे धार्मिक पहचान के इर्द-गिर्द स्थायी रूप से जकड़ दिया।

