पटेल-12, नेहरू को 0… 1946 में क्या हुआ था, जिसे बताते हैं भारत की पहली वोट चोरी

पटेल को 12, नेहरू को 0 और फिर गांधी का फैसला… 1946 की वह कहानी, जिसे संबित पात्रा ने बताया- पहली वोट चोरी
भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ INDIA गठबंधन के ‘जन महाभियोग’ कार्यक्रम पर पलटवार करते हुए जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री बनने को ‘पहली वोट चोरी’ बताया. उन्होंने 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के चयन का उल्लेख किया जब 15 में से 12 प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों ने सरदार वल्लभभाई पटेल का नाम प्रस्तावित किया था, लेकिन महात्मा गांधी की पसंद नेहरू बने जिन्हे एक का भी समर्थन नही मिला. आखिर पटेल ने अपना नाम वापस क्यों लिया? कांग्रेस अध्यक्ष बनने से नेहरू अंतरिम सरकार के प्रमुख और फिर आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री कैसे बनें? जानें इस ऐतिहासिक घटनाक्रम की पूरी कहानी…

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी इंडिया गठबंधन मोर्चा खोले हैं. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर शनिवार 31 अक्टूबर की शाम आयोजित मॉक पार्लियामेंट में सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ ‘जन महाभियोग’ प्रस्ताव पारित किया गया है. इस दौरान कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर SIR से वोट चोरी का आरोप लगाया. तो वहीं भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर देश में ‘पहली वोट चोरी’ का आरोप लगाया.

पटेल-12, नेहरू को 0... 1946 में क्या हुआ था, जिसे BJP ने बताया पहली वोट चोरीसरदार पटेल को 12 प्रांतीय कांग्रेस समितियों ने समर्थन दिया था, लेकिन फिर भी महात्मा गांधी के समर्थन से जवाहरलाल नेहरू के पहले पीएम बने.

संबित पात्रा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने सरदार वल्लभभाई पटेल को प्रधानमंत्री बनाने को समर्थन दिया था, लेकिन नेहरू ने बिना कोई समर्थन पाये प्रधानमंत्री पद संभाल लिया. पात्रा ने नेहरू को ‘Unelected Prime Minister’ यानी अनिर्वाचित प्रधानमंत्री तक कह दिया. पात्रा यहीं नहीं रुके. उन्होंने कहा कि ‘यह अनिर्वाचितों की तानाशाही थी. प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने वोट चोरी कर सरदार पटेल को उनके अधिकार से वंचित रखा और उन्हे अपमानित करके वो प्रधानमंत्री बने थे.

संबित पात्रा का यह बयान भले ही SIR और वोट चोरी को लेकर जारी आरोप-प्रत्यारोप की कड़ी में आया है, लेकिन इसके पीछे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के आखिरी दौर की एक महत्वपूर्ण घटना है. तो चलिये जानते हैं संबित पात्रा के इन आरोपों के पीछे की पूरी कहानी…

साल 1946 का अप्रैल-मई महीना. भारत आजादी की कगार पर खड़ा था. कैबिनेट मिशन आ चुका था. अंतरिम सरकार की बात चल रही थी. कांग्रेस अपना अध्यक्ष चुन रही थी जिसे तब राष्ट्रपति कहा जाता था. तय था कि कांग्रेस अध्यक्ष ही अंतरिम सरकार का प्रमुख और आगे चलकर स्वतंत्र भारत का पहला प्रधानमंत्री बनेगा.

पटेल को 12 वोट, नेहरू को एक नहीं

कांग्रेस राष्ट्रपति पद चुनाव सालों से अनियमित था. द्वितीय विश्व युद्ध से 1940 से 1946 तक कोई वार्षिक अधिवेशन भी नहीं हुआ. ऐसे में मौलाना अबुल कलाम आजाद लंबे समय से अध्यक्ष बने हुए थे. इसी में नया अध्यक्ष चुनाव था. तब कांग्रेस में प्रांतीय कांग्रेस समितियां (PCC) ही नामांकन भेज सकती थीं. 29 अप्रैल 1946 अंतिम तारीख थी. इतिहासकारों और तब के अभिलेखों के अनुसार 15 प्रांतीय समितियों में से 12 ने सरदार वल्लभभाई पटेल का नाम प्रस्तावित किया, जबकि तीन समितियों ने किसी का नाम नहीं भेजा. जवाहरलाल नेहरू का नाम किसी भी प्रांतीय समिति ने नहीं भेजा था.

पटेल तब 71 वर्ष के थे. वे संगठन के मास्टर थे, भारत छोड़ो आंदोलन में उनकी भूमिका जानी-मानी थी, और पार्टी मशीनरी पर उनका मजबूत नियंत्रण था. नेहरू 56 वर्ष के थे… युवा, आकर्षक व्यक्तित्व, अंतरराष्ट्रीय पहचान और युवाओं में लोकप्रिय.

गांधी की पहली पसंद थे नेहरू

महात्मा गांधी ने पहले ही अपनी पसंद स्पष्ट कर दी थी.  गांधी का मानना था कि नेहरू आधुनिक सोच के हैं, विदेशों में भारत का बेहतर प्रतिनिधित्व कर युवा पीढ़ी को जोड़ सकते हैं. उन्होंने 20 अप्रैल 1946 को आजाद को पत्र लिखकर अपनी राय बताई थी. उन्होंने लिखा था कि मौजूदा परिस्थितियों में अगर उनसे पूछा जाए तो वह जवाहरलाल नेहरू को प्राथमिकता देंगें. गांधी की यही पसंद आगे चलकर कांग्रेस अध्यक्ष चयन में निर्णायक सिद्ध हुई.

नामांकन की अंतिम तारीख नजदीक आ रही थी और नेहरू के नाम का कहीं अता-पता नहीं था. ऐसे में कांग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक दिल्ली में हुई. चयन प्रक्रिया में जीवतराम भगवान दास कृपलानी (आचार्य जेबी कृपलानी) का नाम भी आया था. लेकिन आगे जो हुआ, उसने पूरी तस्वीर बदल दी. गांधी की पसंद नेहरू थे और वह चाहते थे कि आजादी के भारत का नेतृत्व नेहरू करें. ऐसे में पार्टी के भीतर बातचीत और विचार-विमर्श  शुरू हुआ.

पंडित जवाहरलाल नेहरू. (फोटो : कांग्रेस)

नेहरू का वह मौन और मैसेज

इतिहासकारों के अनुसार, आचार्य जेबी कृपलानी ने कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में नेहरू का नाम प्रस्तावित किया तो पटेल समेत कार्यसमिति के सदस्यों ने भी उस प्रस्ताव का समर्थन कर दिया. कृपलानी ने भी अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली. अंततः पटेल से भी नाम वापस लेने को कहा गया. गांधी ने नेहरू को यह अवसर दिया कि अगर वह चाहें तो पीछे हट सकते हैं, क्योंकि किसी प्रांतीय कांग्रेस कमेटी ने उनका नाम प्रस्तावित नहीं किया था. लेकिन नेहरू ने अपनी उम्मीदवारी वापस नहीं ली और वह मौन बैठे रहे. उनके इस मौन को यह समझा गया कि वे दूसरे स्थान पर रहने को तैयार नहीं हैं.

महात्मा गांधी ने फिर पटेल से कहा कि वे अपना नाम वापस ले लें. पटेल ने बिना किसी विरोध या विलंब वापस ले लिया. पटेल की गांधी के प्रति श्रद्धा जगजाहिर थी. वे अक्सर गांधी की बात मान लेते थे, भले ही खुद असहमत हों.

इस तरह पहले प्रधानमंत्री बने नेहरू

इस तरह नेहरू अकेले उम्मीदवार रह गए और फिर निर्विरोध कांग्रेस अध्यक्ष चुन लिए गए. 6 जुलाई 1946 को बॉम्बे में AICC की बैठक में उन्होंने पदभार संभाला. फिर एक महीने बाद, 12 अगस्त 1946 को वायसराय लॉर्ड वेवेल ने कांग्रेस अध्यक्ष को अंतरिम सरकार बनाने का निमंत्रण दिया. नेहरू अंतरिम सरकार के प्रमुख बने और फिर स्वतंत्रता के बाद वे भारत के पहले प्रधानमंत्री बने और लंबे समय तक पद पर रहे.

माइकल ब्रेचर ने अपनी नेहरू जीवनी में लिखा: ‘अगर गांधी टांग ना अड़ाते तो पटेल 1946-47 में भारत के पहले डी फैक्टो प्रधानमंत्री होते.’ब्रेचर ने आगे कहा कि सरदार से यह पुरस्कार छीन लिया गया और यह बात उनके मन में गहरी चुभन छोड़ गई.

पटेल के मन में रही टीस

महात्मा गांधी के पोते राजमोहन गांधी ने भी अपनी पुस्तक Patel: A Life में विस्तार से इस घटना का वर्णन किया है. सरदार पटेल की बेटी मणिबेन पटेल की डायरी में भी इस प्रसंग का उल्लेख है. कृपलानी ने अपनी पुस्तक में लिखा कि अगर नेहरू का नाम प्रस्तावित न होता तो सरदार अध्यक्ष चुने जाते. सरदार को मेरा हस्तक्षेप पसंद नहीं आया.

यहां एक ऐतिहासिक तथ्य समझना जरूरी है. तब प्रधानमंत्री पद को कोई औपचारिक चुनाव नहीं हुआ था. न कोई मतदान हुआ, न कोई बैलेट बॉक्स. भारत स्वतंत्र देश नहीं था और प्रधानमंत्री पद की मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था भी अस्तित्व में नहीं थी. उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अंतरिम सरकार का नेतृत्व करने का अवसर मिला. 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ तो नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने।

महात्मा गांधी ने बाद में अपनी पसंद के पीछे की वजह भी बताई थी. उन्होंने कहा कि जवाहरलाल को आज नहीं बदला जा सकता, जब अंग्रेजों से सत्ता ली जा रही है. वे नेहरू को अंतरराष्ट्रीय मंच को बेहतर मानते थे, जबकि पटेल को आंतरिक प्रशासन और संगठन के लिए. गांधी ने दोनों को एक साथ काम करने की कल्पना की थी- दो बैल एक ही गाड़ी में जुड़े हुए। गांधी का तब का कथन प्रसिद्ध है कि नेहरु हम सबके बीच सबसे ज्यादा अंग्रेज हैं।

पटेल ने भी नेहरू को अपना नेता स्वीकार किया. गांधी की हत्या के बाद उन्होंने कहा था कि ‘बापू ने जवाहर को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था और हमें उनकी बात माननी चाहिए.’

त्वरित प्रश्नोत्तर 
कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव 1946 में सरदार वल्लभभाई पटेल को कितनी प्रांतीय समितियों का समर्थन मिला था?

वर्ष 1946 के अप्रैल-मई में हुए कांग्रेस अध्यक्ष पद के नामांकन में 15 प्रांतीय समितियों में से 12 ने सरदार वल्लभभाई पटेल का नाम प्रस्तावित किया था।

1946 के कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में जवाहरलाल नेहरू को किन प्रांतीय समितियों का समर्थन था?

1946 के कांग्रेस अध्यक्ष पद को 29 अप्रैल की अंतिम तारीख तक किसी भी प्रांतीय समिति ने जवाहरलाल नेहरू का नाम प्रस्तावित नहीं किया था।

फिर कैसे जवाहरलाल नेहरू 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष और देश के पहले प्रधानमंत्री बने?

महात्मा गांधी की स्पष्ट व्यक्तिगत पसंद और प्राथमिकता से जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष बने, तब वे अंतरिम सरकार के प्रमुख और देश के पहले प्रधानमंत्री बने।

 

“Patel: 12, Nehru: 0… What happened in 1946, which is described as India’s first vote theft?”

Context Behind the Headline

This headline refers to a well-known historical episode during the April 1946 Congress presidential election:

  • The Background: As India’s independence approached, the British Cabinet Mission arrived to discuss the transfer of power. The incoming Congress President was widely expected to head the Interim Government as the de facto Prime Minister of India.
  • The Nomination (12 vs. 0): Nominations were invited from the 15 Provincial Congress Committees (PCCs). 12 or 13 of the provincial committees proposed Sardar Vallabhbhai Patel’s name, while a few supported Acharya J.B. Kripalani or Pattabhi Sitaramayya. Jawaharlal Nehru received zero nominations from the provincial committees.
  • Gandhi’s Intervention: Mahatma Gandhi favoured Nehru, believing Nehru had broader appeal internationally and among younger generations, and feared Nehru would not easily work under Patel. At Gandhi’s request, Acharya Kripalani withdrew his nomination and had several Working Committee members propose Nehru’s name. Gandhi then asked Sardar Patel to withdraw his nomination, which Patel accepted out of loyalty and deference to Gandhi.
  • Why the Phrase “Vote Theft” (वोट चोरी) is Used: Critics and modern political commentators often sensationalize this incident with phrases like “India’s first stolen election” or “vote theft” to argue that internal party democracy was bypassed, even though Patel’s withdrawal was a mutual political compromise driven by Gandhi rather than electoral fraud.

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